श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 211–220
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 211–220
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वे दोनों तपस्वी पृथ्वीतलपर विचरते और मानवीय भोगोंका उपभोग करते हुए यहाँ यथावत्रूपसे परिभ्रमण करने लगे ॥ ७ ॥
प्रीतिमन्तौ मुदा युक्तौ समयं चैव चक्रतुः ।
यो भवेद्धृदि संकल्पः शुभो वा यदि वाशुभः ॥ ८ ॥
अन्योन्यस्य स आख्येयो मृषा शापोऽन्यथा भवेत् । उन दोनोंने बड़ी प्रसन्नताके साथ प्रेमपूर्वक यह शर्त कर रखी थी कि हमलोगोंके मनमें शुभ या अशुभ जो भी संकल्प प्रकट हो, उसे हम एक दूसरेसे कह दें; अन्यथा झूठे ही शापका भागी होना पड़ेगा ॥ ८३ ॥
तौ तथेति प्रतिज्ञाय महर्षी लोकपूजितौ ॥ ९ ॥
सृजयं श्वैत्यमभ्येत्य राजानमिदमूचतुः । वे दोनों लोकपूजित महर्षि ' तथास्तु' कहकर पूर्वोक्त प्रतिज्ञा करनेके पश्चात् श्वेतपुत्र राजा सृजयके पास जाकर इस प्रकार बोले—- ॥ ९ ३ ॥ आवां भवति वत्स्यावः कञ्चित् कालं हिताय ते ॥ १० ॥
यथावत् पृथिवीपाल आवयोः प्रगुणीभव । ' भूपाल! हम दोनों तुम्हारे हितके लिये कुछ कालतक तुम्हारे पास ठहरेंगे । तुम हमारे अनुकूल होकर रहो ' ॥ १० ॥
तथेति कृत्वा राजा तौ सत्कृत्योपचचार ह ॥ ११ ॥
ततः कदाचित्तौ राजा महात्मानौ तपोधनौ ।
अब्रवीत् परमप्रीतः सुतेयं वरवर्णिनी ॥ १२ ॥
एकैव मम कन्यैषा युवां परिचरिष्यसि ।
दर्शनीयानवद्याङ्गी शीलवृत्तसमाहिता ॥ १३ ॥
सुकुमारी कुमारी च पद्मकिञ्जल्कसुप्रभा । तब ‘ बहुत अच्छा ' कहकर राजाने उन दोनोंका सत्कारपूर्वक पूजन किया । तदनन्तर एक दिन राजा सृजयने अत्यन्त प्रसन्न होकर उन दोनों तपस्वी महात्माओंसे कहा - ' महर्षियो! यह मेरी एक ही कन्या है, जो परम सुन्दरी, दर्शनीय, निर्दोष अङ्गोंवाली तथा शील और सदाचारसे सम्पन्न है । कमल- केसरके समान कान्तिवाली यह सुकुमारी कुमारी -आजसे आप दोनोंकी सेवा करेगी ' ॥ ११ – १३३ ॥ परमं सौम्यमित्युक्तं ताभ्यां राजा शशास ताम् ॥ १४ ॥
कन्ये विप्रावुपचर देववत् पितृवच्च ह । तब उन दोनोंने कहा- ' बहुत अच्छा । ' इसके बाद राजाने उस कन्याको आदेश दिया
— -'बेटी! तुम इन दोनों महर्षियोंकी देवता और पितरोंके समान सेवा किया करो ' ।
सा तु कन्या तथेत्युक्त्वा पितरं धर्मचारिणी ॥ १५ ॥
यथानिदेशं राज्ञस्तौ सत्कृत्योपचचार ह ।
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धर्माचरणमें तत्पर रहनेवाली उस कन्याने पितासे ' ऐसा ही होगा' यों कहकर राजाकी आज्ञाके अनुसार उन दोनोंकी सत्कारपूर्वक सेवा आरम्भ कर दी ॥ १५३ ॥
तस्यास्तेनोपचारेण रूपेणाप्रतिमेन च ॥ १६ ॥
नारदं हृच्छयस्तूर्णं सहसैवाभ्यपद्यत । उसकी उस सेवा तथा अनुपम रूप-सौन्दर्यसे नारदके हृदयमें सहसा कामभावका संचार हो गया ॥ १६३ ॥
ववृधे हि ततस्तस्य हृदि कामो महात्मनः ॥ १७ ॥
यथा शुक्लस्य पक्षस्य प्रवृत्तौ चन्द्रमाः शनैः । उन महामनस्वी नारदके हृदयमें काम उसी प्रकार धीरे - धीरे बढ़ने लगा, जैसे शुक्लपक्ष आरम्भ होनेपर शनैः - शनैः चन्द्रमाकी वृद्धि होती है ॥ १७३ ॥
न च तं भागिनेयाय पर्वताय महात्मने ॥ १८ ॥
शशंस हृच्छयं तीव्रं व्रीडमानः स धर्मवित् । धर्मज्ञ नारदने लज्जावश भानजे महात्मा पर्वतको अपने बढ़े हुए दुःसह कामकी बात नहीं बतायी ॥ तपसा चेङ्गितैश्चैव पर्वतोऽथ बुबोध तम् ॥ १ ९ ॥ कामार्तं नारदं क्रुद्धः शशापैनं ततो भृशम् । परंतु पर्वतने अपनी तपस्या और नारदजीकी चेष्टाओंसे जान लिया कि नारद कामवेदनासे पीड़ित हैं; फिर तो उन्होंने अत्यन्त कुपित हो उन्हें शाप देते हुए कहा - - ॥ १ ९ ३ ॥ कृत्वा समयमव्यग्रो भवान् वै सहितो मया ॥ २० ॥
यो भवेद्धृदि संकल्पः शुभो वा यदि वाशुभः ।
अन्योन्यस्य स आख्येय इति तद् वै मृषा कृतम् ॥ २१ ॥
भवता वचनं ब्रह्मंस्तस्मादेष शपाम्यहम् । ‘ आपने मेरे साथ स्वस्थचित्तसे यह शर्त की थी कि ' हम दोनोंके हृदयमें जो भी शुभ या अशुभ संकल्प हो, उसे हम दोनों एक दूसरेसे कह दें । ' परंतु ब्रह्मन्! आपने अपने उस वचनको मिथ्या कर दिया; इसलिये मैं शाप देनेको उद्यत हुआ हूँ ॥ २०-२१ ॥ न हि कामं प्रवर्तन्तं भवानाचष्ट मे पुरा ॥ २२ ॥
सुकुमार्यां कुमार्यां ते तस्मादेष शपाम्यहम् । ‘ जब आपके मनमें पहले इस सुकुमारी कुमारीके प्रति कामभावका उदय हुआ तो आपने मुझे नहीं बताया; इसलिये यह मैं आपको शाप दे रहा हूँ ॥ २२ ॥
ब्रह्मचारी गुरुर्यस्मात् तपस्वी ब्राह्मणश्च सन् ॥ २३ ॥
अकार्षीः समयभ्रंशमावाभ्यां यः कृतो मिथः ।
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शप्स्ये तस्मात् सुसंक्रुद्धो भवन्तं तं निबोध मे ॥ २४ ॥
' आप ब्रह्मचारी, मेरे गुरुजन, तपस्वी और ब्राह्मण हैं तो भी आपने हमलोगोंमें जो शर्त हुई थी, उसे तोड़ दिया है; इसलिये मैं अत्यन्त कुपित होकर आपको जो शाप दे रहा हूँ उसे सुनिये— ॥ २३-२४ ॥
सुकुमारी च ते भार्या भविष्यति न संशयः ।
वानरं चैव ते रूपं विवाहात् प्रभृति प्रभो ॥ २५ ॥
संद्रक्ष्यन्ति नराश्चान्ये स्वरूपेण विनाकृतम् । ' प्रभो! यह सुकुमारी आपकी भार्या होगी, इसमें संशय नहीं है, परंतु विवाहके बादसे ही कन्या तथा अन्य सब लोग आपका रूप ( मुख ) वानरके समान देखने लगेंगे । बंदर जैसा-मुँह आपके स्वरूपको छिपा देगा' ॥ २५३ ॥
स तद् वाक्यं तु विज्ञाय नारदः पर्वतं तथा ॥ २६ ॥
अशपत्तमपि क्रोधाद् भागिनेयं स मातुलः ।
तपसा ब्रह्मचर्येण सत्येन च दमेन च ॥ २७ ॥
युक्तोऽपि नित्यधर्मश्च न वै स्वर्गमवाप्स्यसि । उस बातको समझकर मामा नारदजी भी कुपित हो उठे और उन्होंने अपने भानजे पर्वतको शाप देते हुए कहा – ' अरे! तू तपस्या, ब्रह्मचर्य, सत्य और इन्द्रिय- संयमसे युक्त एवं नित्य धर्मपरायण होनेपर भी स्वर्गलोकमें नहीं जा सकेगा' ॥ २६-२७३ ॥ तौ तु शप्त्वा भृशं क्रुद्धौ परस्परममर्षणौ ॥ २८ ॥
प्रतिजग्मतुरन्योन्यं क्रुद्धाविव गजोत्तमौ । इस प्रकार अत्यन्त कुपित हो एक दूसरेको शाप दे वे दोनों क्रोधमें भरे हुए दो हाथियोंके समान अमर्षपूर्वक प्रतिकूल दिशाओंमें चल दिये ॥ २८३ ॥
पर्वतः पृथिवीं कृत्स्नां विचचार महामतिः ॥ २ ९ ॥ पूज्यमानो यथान्यायं तेजसा स्वेन भारत । भारत! परम बुद्धिमान् पर्वत अपने तेजसे यथोचित सम्मान पाते हुए सारी पृथ्वीपर विचरने लगे ॥ २ ९ ३ ॥ अथ तामलभत् कन्यां नारदः सृजयात्मजाम् ॥ ३० ॥
धर्मेण विप्रप्रवरः सुकुमारीमनिन्दिताम् । इधर विप्रवर नारदजीने उस अनिन्द्य सुन्दरी संजय कुमारी सुकुमारीको धर्मके अनुसार पत्नीरूपमें प्राप्त किया ॥ सा तु कन्या यथाशापं नारदं तं ददर्श ह ॥ ३१ ॥
पाणिग्रहणमन्त्राणां नियोगादेव नारदम् ।
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वैवाहिक मन्त्रोंका प्रयोग होते ही वह राजकन्या शापके अनुसार नारद मुनिको वानराकार मुखसे युक्त देखने लगी ॥ ३१३ ॥
सुकुमारी च देवर्षिं वानरप्रतिमाननम् ॥ ३२ ॥
नैवावामन्यत तदा प्रीतिमत्येव चाभवत् । देवर्षिका मुँह वानरके समान देखकर भी सुकुमारीने उनकी अवहेलना नहीं की । वह उनके प्रति अपना प्रेम बढ़ाती ही गयी ॥ ३२ ॥
उपतस्थे च भर्तारं न चान्यं मनसाप्यगात् ॥ ३३ ॥
देवं मुनिं वा यक्षं वा पतित्वे पतिवत्सला । पतिपर स्नेह रखनेवाली सुकुमारी अपने स्वामीकी सेवामें सदा उपस्थित रहती और दूसरे किसी पुरुषका, वह यक्ष, मुनि अथवा देवता ही क्यों न हो, मनके द्वारा भी पतिरूपसे चिन्तन नहीं करती थी ॥ ३३ ॥
ततः कदाचिद् भगवान् पर्वतोऽनुचचार ह ॥ ३४ ॥
वनं विरहितं किंचित् तत्रापश्यत् स नारदम् । तदनन्तर किसी समय भगवान् पर्वत घूमते हुए किसी एकान्त वनमें आ गये । वहाँ उन्होंने नारदजीको देखा ॥ ततोऽभिवाद्य प्रोवाच नारदं पर्वतस्तदा ॥ ३५ ॥
भवान् प्रसादं कुरुतात् स्वर्गादेशाय मे प्रभो । तब पर्वतने नारदजीको प्रणाम करके कहा-' प्रभो! आप मुझे स्वर्गमें जानेके लिये आज्ञा देनेकी कृपा करें' ॥ ३५३ ॥ ॥
तमुवाच'ततो'दृष्ट्वा पर्वतं नारदस्तथा ॥ ३६ ॥
कृताञ्जलिमुपासीनं दीनं दीनतरः स्वयम् । नारदजीने देखा, पर्वत दीनभावसे हाथ जोड़कर मेरे पास खड़ा है; फिर तो वे स्वयं भी अत्यन्त दीन होकर उनसे बोले— ॥ ३६३ ॥
त्वयाहं प्रथमं शप्तो वानरस्त्वं भविष्यसि ॥ ३७ ॥
इत्युक्तेन मया पश्चाच्छप्तस्त्वमपि मत्सरात् ।
अद्यप्रभृति वै वासं स्वर्गे नावाप्स्यसीति ह ॥ ३८ ॥
तव नैतद्धि विसदृशं पुत्रस्थाने हि मे भवान् । ‘ वत्स! पहले तुमने मुझे यह शाप दिया था कि ' तुम वानर हो जाओ । ' तुम्हारे ऐसा कहनेके बाद मैंने भी मत्सरतावश तुम्हें शाप दे दिया, जिससे आजतक तुम स्वर्गमें नहीं जा सके । यह तुम्हारे योग्य कार्य नहीं था; क्योंकि तुम मेरे पुत्रकी जगहपर हो' ॥ ३७-३८३ ॥ न्यवर्तयेतां तौ शापावन्योन्येन तदा मुनी ॥ ३ ९ ॥ श्रीसमृद्धं तदा दृष्ट्वा नारदं देवरूपिणम् ।
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सुकुमारी प्रदुद्राव परपत्यभिशङ्कया ॥ ४० ॥
इस प्रकार बातचीत करके उन दोनों ऋषियोंने एक दूसरेके शापको निवृत्त कर दिया । तब नारदजीको देवताके समान तेजस्वी रूपमें देखकर सुकुमारी पराये पतिकी आशङ्कासे भाग चली ॥ ३ ९ -४० ॥
तां पर्वतस्ततो दृष्ट्वा प्रद्रवन्तीमनिन्दिताम् ।
अब्रवीत् तव भर्तेष नात्र कार्या विचारणा ॥ ४१ ॥
उस सती साध्वी राजकन्याको भागती देख पर्वतने इससे कहा – ' देवि! ये तुम्हारे पति ही हैं । इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ' ॥ ४१ ॥
ऋषिः परमधर्मात्मा नारदो भगवान् प्रभुः ।
तवैवाभेद्यहृदयो मा तेऽभूदत्र संशयः ॥ ४२ ॥
' ये तुम्हारे पति अभेद्य हृदयवाले परम धर्मात्मा प्रभु भगवान् नारद मुनि ही हैं । इस विषयमें तुम्हें संदेह नहीं होना चाहिये ' ॥ ४२ ॥
सानुनीता बहुविधं पर्वतेन महात्मना ।
शापदोषं च तं भर्तुः श्रुत्वा प्रकृतिमागता ॥ ४३ ॥
पर्वतोऽथ ययौ स्वर्गं नारदोऽभ्यगमद् गृहान् । महात्मा पर्वतके बहुत समझाने- बुझानेपर पतिके शाप-दोषकी बात सुनकर सुकुमारीका मन स्वस्थ हुआ। तत्पश्चात् पर्वतमुनि स्वर्गमें लौट गये और नारदजी सुकुमारीके घर आये ॥ ४३३ ॥
वासुदेव उवाच
प्रत्यक्षकर्ता सर्वस्य नारदो भगवानृषिः ।
एष वक्ष्यति ते पृष्टो यथावृत्तं नरोत्तम ॥ ४४ ॥
श्रीकृष्ण कहते हैं— नरश्रेष्ठ! भगवान् नारद ऋषि इन सब घटनाओंके प्रत्यक्षदर्शी हैं । तुम्हारे पूछनेपर ये सारी बातें बता देंगे ॥ ४४ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि नारदपर्वतोपाख्याने त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें नारद और पर्वतका उपाख्यानविषयक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३० ॥
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एकत्रिंशोऽध्यायः सुवर्णष्ठीवीके जन्म, मृत्यु और पुनर्जीवनका वृत्तान्त वैशम्पायन उवाच
ततो राजा पाण्डुसुतो नारदं प्रत्यभाषत ।
भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि सुवर्णष्ठीविसम्भवम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तदनन्तर पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरने नारदजीसे कहा— ‘ भगवन्! मैं सुवर्णष्ठीवीके जन्मका वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ' ॥
एवमुक्तस्तु स मुनिर्धर्मराजेन नारदः ।
आचचक्षे यथावृत्तं सुवर्णष्ठीविनं प्रति ॥ २ ॥
धर्मराजके ऐसा कहनेपर नारदमुनिने सुवर्णष्ठीवीके जन्मका यथावत् वृत्तान्त कहना आरम्भ किया ॥ २ ॥
नारद उवाच
एवमेतन्महाबाहो यथायं केशवोऽब्रवीत् ।
कार्यस्यास्य तु यच्छेषं तत् ते वक्ष्यामि पृच्छतः ॥ ३ ॥
नारदजी बोले – महाबाहो! भगवान् श्रीकृष्णने इस विषयमें जैसा कहा है, वह सब सत्य है । इस प्रसङ्गमें जो कुछ शेष है, वह तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैं बता रहा हूँ ॥ ३ ॥
अहं च पर्वतश्चैव स्वस्रीयो मे महामुनिः ।
वस्तुकामावभिगतौ सृजयं जयतां वरम् ॥ ४ ॥
मैं और मेरे भानजे महामुनि पर्वत दोनों विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ राजा सृजयके यहाँ निवास करनेके लिये गये ||
तत्रावां पूजितौ तेन विधिदृष्टेन कर्मणा ।
सर्वकामैः सुविहितौ निवसावोऽस्य वेश्मनि ॥ ५ ॥
वहाँ राजाने हम दोनोंका शास्त्रीय विधिके अनुसार पूजन किया और हमारे लिये सभी मनोवाञ्छित वस्तुओंके प्राप्त होनेकी सुव्यवस्था कर दी । हम दोनों उनके महलमें रहने लगे ॥ ५ ॥
व्यतिक्रान्तासु वर्षासु समये गमनस्य च ।
पर्वतो मामुवाचेदं काले वचनमर्थवत् ॥ ६ ॥
जब वर्षाके चार महीने बीत गये और हमलोगोंके वहाँसे चलनेका समय आया, तब पर्वतने मुझसे समयोचित एवं सार्थक वचन कहा— ॥ ६ ॥
आवामस्य नरेन्द्रस्य गृहे परमपूजितौ ।
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उषितौ समये ब्रह्मंस्तद् विचिन्तय साम्प्रतम् ॥ ७ ॥
‘ मामा! हमलोग राजा सृजयके घरमें बड़े आदर- सत्कारके साथ रहे हैं, अतः ब्रह्मन्! इस समय इनका कुछ उपकार करनेकी बात सोचिये ' ॥ ७ ॥
ततोऽहमब्रवं राजन् पर्वतं शुभदर्शनम् ।
सर्वमेतत् त्वयि विभो भागिनेयोपपद्यते ॥ ८ ॥
राजन्! तब मैंने शुभदर्शी पर्वत मुनिसे कहा-' भगिनीपुत्र! यह सब तुम्हें ही शोभा देता है ॥ ८ ॥
वरेण च्छन्द्यतां राजा लभतां यद् यदिच्छति ।
आवयोस्तपसा सिद्धिं प्राप्नोतु यदि मन्यसे ॥ ९ ॥
‘ राजाको मनोवाञ्छित वर देकर संतुष्ट करो । वे जो- जो चाहते हैं, वह सब उन्हें मिले । तुम्हारी राय हो तो हम दोनोंकी तपस्यासे उनके मनोरथकी सिद्धि हो ' ॥
तत आहूय राजानं सृजयं जयतां वरम् ।
पर्वतोऽनुमतो वाक्यमुवाच कुरुपुङ्गव ॥ १० ॥
कुरुश्रेष्ठ! तब मेरी अनुमति ले पर्वतने विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ राजा सृजयको बुलाकर कहा ॥ १० ॥
प्रीतौ स्वो नृप सत्कारैर्भवदार्जवसम्भृतैः ।
आवाभ्यामभ्यनुज्ञातो वरं नृवर चिन्तय ॥ ११ ॥
‘ नरेश्वर! हम दोनों तुम्हारे द्वारा सरलतापूर्वक किये गये सत्कारसे बहुत प्रसन्न हैं । हम तुम्हें आज्ञा देते हैं कि तुम इच्छानुसार कोई वर सोचकर माँग लो ॥ ११ ॥
देवानामविहिंसायां न भवेन्मानुषक्षयम् ।
तद् गृहाण महाराज पूजार्हो नौ मतो भवान् ॥ १२ ॥
महाराज! कोई ऐसा वर माँग लो, जिससे न तो देवताओंकी हिंसा हो और न मनुष्योंका संहार ही हो सके । तुम हमारी दृष्टिमें आदरके योग्य हो ' ॥ १२ ॥
संजय उवाच
प्रीतौ भवन्तौ यदि मे कृतमेतावता मम ।
एष एव परो लाभो निर्वृत्तों मे महाफलः ॥ १३ ॥
सृजयने कहा – ब्रह्मन्! यदि आप दोनों प्रसन्न हैं तो मैं इतनेसे ही कृतकृत्य हो गया । यही हमारे लिये महान् फलदायक परम लाभ सिद्ध हो गया ॥ १३ ॥
तमेवंवादिनं भूयः पर्वतः प्रत्यभाषत ।
वृणीष्व राजन् संकल्पं यत् ते हृदि चिरं स्थितम् ॥ १४ ॥
राजन्! ऐसी बात कहनेवाले राजा सृजयसे पर्वतमुनिने फिर कहा - ' राजन्! तुम्हारे हृदयमें जो चिरकालसे संकल्प हो, वही माँग लो’ ॥ १४ ॥
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संजय उवाच
अभीप्सामि सुतं वीरं वीरवन्तं दृढव्रतम् ।
आयुष्मन्तं महाभागं देवराजसमद्युतिम् ॥ १५ ॥
सृजय बोले- भगवन्! मैं एक ऐसा पुत्र पाना चाहता हूँ, जो वीर, बलवान्, दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाला, आयुष्मान्, परम सौभाग्यशाली और देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी हो ॥ १५ ॥
पर्वत उवाच
भविष्यत्येष ते कामो न त्वायुष्मान् भविष्यति ।
देवराजाभिभूत्यर्थं संकल्पो ह्येष ते हृदि ॥ १६ ॥
पर्वतने कहा— राजन्! तुम्हारा यह मनोरथ पूर्ण होगा, परंतु वह पुत्र दीर्घायु नहीं हो सकेगा; क्योंकि देवराज इन्द्रको पराजित करनेके लिये तुम्हारे हृदयमें यह संकल्प उठा ॥ १६ ॥
ख्यातः सुवर्णष्ठीवीति पुत्रस्तव भविष्यति ।
रक्ष्यश्च देवराजात् स देवराजसमद्युतिः ॥ १७ ॥
तुम्हारा वह पुत्र सुवर्णष्ठीवीके नामसे विख्यात तथा देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी होगा । तुम्हें देवराजसे सदा उसकी रक्षा करनी चाहिये ॥ १७ ॥
तच्छ्रुत्वा सृजयो वाक्यं पर्वतस्य महात्मनः ।
प्रसादयामास तदा नैतदेवं भवेदिति ॥ १८ ॥
आयुष्मान् मे भवेत् पुत्रो भवतस्तपसा मुने ।
न च तं पर्वतः किंचिदुवाचेन्द्रव्यपेक्षया ॥ १ ९ ॥
महात्मा पर्वतका यह वचन सुनकर सृजयने उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा करते हुए कहा — ' ऐसा न हो । मुने! आपकी तपस्यासे मेरा पुत्र दीर्घजीवी होना चाहिये । ' परंतु इन्द्रका ख्याल करके पर्वत मुनि कुछ नहीं बोले ॥ १८-१९ ॥
तमहं नृपतिं दीनमब्रवं पुनरेव च ।
स्मर्तव्योऽस्मि महाराज दर्शयिष्यामि ते सुतम् ॥ २० ॥
अहं ते दयितं पुत्रं प्रेतराजवशं गतम् ।
पुनर्दास्यामि तद्रूपं मा शुचः पृथिवीपते ॥ २१ ॥
तब मैंने दीन हुए उस नरेशसे कहा - ' महाराज! संकटके समय मुझे याद करना । मैं तुम्हारे पुत्रको तुमसे मिला दूँगा । पृथ्वीनाथ! चिन्ता न करो । यमराजके वशमें पड़े हुए तुम्हारे उस प्रिय पुत्रको मैं पुनः उस रूपमें लाकर तुम्हें दे दूँगा' ॥ २०-२१ ॥
एवमुक्त्वा तु नृपतिं प्रयातौ स्वो यथेप्सितम् ।
सृजयश्च यथाकामं प्रविवेश स्वमन्दिरम् ॥ २२ ॥
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राजासे ऐसा कहकर हम दोनों अपने अभीष्ट स्थानको चल दिये और राजा सृजयने अपने इच्छानुसार महलमें प्रवेश किया ॥ २२ ॥
संजयस्याथ राजर्षेः कस्मिंश्चित् कालपर्यये ।
जज्ञे पुत्रो महावीर्यस्तेजसा प्रज्वलन्निव ॥ २३ ॥
तदनन्तर किसी समय राजर्षि सृजयके एक पुत्र हुआ, जो अपने तेजसे प्रज्वलित- सा हो रहा था । वह महान् बलशाली था ॥ २३ ॥
ववृधे स यथाकालं सरसीव महोत्पलम् ।
बभूव काञ्चनष्ठीवी यथार्थं नाम तस्य तत् ॥ २४ ॥
जैसे सरोवरमें कमल बढ़ता है, उसी प्रकार वह राजकुमार यथासमय बढ़ने लगा । वह मुखसे स्वर्ण उगलनेके कारण सुवर्णष्ठीवी नामसे प्रसिद्ध हुआ । उसका वह नाम सार्थक था ॥ २४ ॥
तदद्भुततमं लोके पप्रथे कुरुसत्तम ।
बुबुधे तच्च देवेन्द्रो वरदानं महर्षितः ॥ २५ ॥
कुरुश्रेष्ठ! उसका वह अत्यन्त अद्भुत वृत्तान्त सारे जगत्में फैल गया । देवराज इन्द्रको भी यह मालूम हो गया कि वह बालक महर्षि पर्वतके वरदानका फल है ॥
ततः स्वाभिभवाद् भीतो बृहस्पतिमते स्थितः ।
कुमारस्यान्तरप्रेक्षी बभूव बलवृत्रहा ॥ २६ ॥
तदनन्तर अपनी पराजयसे डरकर बृहस्पतिकी सम्मतिके अनुसार चलते हुए बल और वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्र उस राजकुमारके वधका अवसर देखने लगे ॥ २६ ॥
चोदयामास तद् वज्रं दिव्यास्त्रं मूर्तिमत् स्थितम् ।
व्याघ्रो भूत्वा जहीमं त्वं राजपुत्रमिति प्रभो ॥ २७ ॥
प्रवृद्धः किल वीर्येण मामेषोऽभिभविष्यति ।
सृजयस्य सुतो वज्र यथैनं पर्वतोऽब्रवीत् ॥ २८ ॥
प्रभो! इन्द्रने मूर्तिमान् होकर सामने खड़े हुए अपने दिव्य अस्त्र वज्रसे कहा — ' वज्र! तुम बाघ बनकर इस राजकुमारको मार डालो । जैसा कि इसके विषयमें पर्वतने बताया है, बड़ा होनेपर सृजयका यह पुत्र अपने पराक्रमसे मुझे परास्त कर देगा ' ॥ २७-२८ ॥
एवमुक्तस्तु शक्रेण वज्रः परपुरञ्जयः ।
कुमारमन्तरप्रेक्षी नित्यमेवान्वपद्यत ॥ २ ९ ॥
इन्द्रके ऐसा कहनेपर शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाला वज्र मौका देखता हुआ सदा उस राजकुमारके आस- पास ही रहने लगा ॥ २ ९ ॥
जयोऽपि सुतं प्राप्य देवराजसमद्युतिम् ।
हृष्टः सान्तःपुरो राजा वननित्यो बभूव ह ॥ ३० ॥
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सृजय भी देवराजके समान पराक्रमी पुत्र पाकर रानी - सहित बड़े प्रसन्न हुए और निरन्तर वनमें ही रहने लगे ।
ततो भागीरथीतीरे कदाचिन्निर्जने वने ।
धात्रीद्वितीयो बालः स क्रीडार्थं पर्यधावत ॥ ३१ ॥
तदनन्तर एक दिन निर्जन वनमें गङ्गाजीके तटपर वह बालक धायको साथ लेकर खेलनेके लिये गया और इधर- उधर दौड़ने लगा ॥ ३१ ॥
पञ्चवर्षकदेशीयो बालो नागेन्द्रविक्रमः ।
सहसोत्पतितं व्याघ्रमाससाद महाबलम् ॥ ३२ ॥
उस बालककी अवस्था अभी पाँच वर्षकी थी तो भी वह गजराजके समान पराक्रमी था । वह सहसा उछलकर आये हुए एक महाबली बाघके पास जा पहुँचा ॥ ३२ ॥
स बालस्तेन निष्पिष्टो वेपमानो नृपात्मजः ।
व्यसुः पपात मेदिन्यां ततो धात्री विचुक्रुशे ॥ ३३ ॥
उस बाघने वहाँ काँपते हुए राजकुमारको गिराकर पीस डाला । वह प्राणशून्य होकर
पृथ्वीपर गिर पड़ा । यह देखकर धाय चिल्ला उठी ॥ ३३ ॥
हत्वा तु राजपुत्रं स तत्रैवान्तरधीयत ।
शार्दूलो देवराजस्य माययान्तर्हितस्तदा ॥ ३४ ॥
राजकुमारकी हत्या करके देवराज इन्द्रका भेजा हुआ वह वज्ररूपी बाघ मायासे वहीं अदृश्य हो गया ॥
धात्र्यास्तु निनदं श्रुत्वा रुदत्याः परमार्तवत् ।
अभ्यधावत तं देशं स्वयमेव महीपतिः ॥ ३५ ॥
रोती हुई धायका वह आर्तनाद सुनकर राजा सृजय स्वयं ही उस स्थानपर दौड़े हुए आये ॥ ३५ ॥
स ददर्श शयानं तं गतासुं पीतशोणितम् ।
कुमारं विगतानन्दं निशाकरमिव च्युतम् ॥ ३६ ॥
उन्होंने देखा, राजकुमार प्राणशून्य होकर आकाशसे गिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति पड़ा है । उसका सारा रक्त बाघके द्वारा पी लिया गया है और वह आनन्दहीन हो गया है ॥ ३६ ॥
स तमुत्सङ्गमारोप्य परिपीडितमानसः ।
पुत्रं रुधिरसंसिक्तं पर्यदेवयदातुरः ॥ ३७ ॥
खूनसे लथपथ हुए उस बालकको गोदमें लेकर व्यथितचित्त हुए राजा सृजय व्याकुल होकर विलाप करने लगे ॥
ततस्ता मातरस्तस्य रुदत्यः शोककर्शिताः ।
अभ्यधावन्त तं देशं यत्र राजा स सृजयः ॥ ३८ ॥