श्रीगणेशाय नमः।

विचख्नुगीता : अत्यधिक अहिंसा के कारण क्या मनुष्य अपने अस्तित्व को बचा पाएगा?

कर्म और शरीर का सन्तुलन

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 265 · पृष्ठ 1704–1707

575 शब्द · 3 मिनटका पाठ · 5 श्लोक

भीष्म से कहा गया

युधिष्ठिर के प्रश्न का उत्तर देने हेतु

भीष्मजी ने कहा— राजन्! प्राचीन काल में राजा विचख्नु ने समस्त प्राणियों पर दया करने के लिए जो उद्गार प्रकट किए थे, उस प्राचीन इतिहास का यह प्रसङ्ग मनुष्य उदाहरण के रूप में दिया करते हैं।

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
प्रजानामनुकम्पार्थं गीतं राज्ञा विचख्नुना ॥

भीष्मजीने कहा — राजन्! प्राचीन कालमें राजा विचख्नुने समस्त प्राणियोंपर दया करनेके लिये जो उद्गार प्रकट किया था, उस प्राचीन इतिहासका इस प्रसंगमें जानकार मनुष्य उदाहरण दिया करते हैं ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 265 · श्लोक 1पृष्ठ 1705

एक समय की बात है, एक यज्ञशाला के प्राङ्गण में राजा विचख्नु उपस्थित थे। वहाँ का दृश्य अत्यन्त हृदयविदारक था; राजा ने देखा कि एक बैल की गर्दन कटी हुई पड़ी है और उसके आसपास बहुत-सी गौएँ आर्तनाद कर रही हैं। यज्ञशाला के प्राङ्गण में कितनी ही गौएँ खड़ी होकर विलाप कर रही थीं। उस भीषण दृश्य को देखकर राजा का हृदय द्रवित हो उठा और वे बोले— ‘संसार में समस्त गौओं का कल्याण हो।’ जब हिंसा आरम्भ होने जा रही थी, तब उन्होंने गौओं के लिए यह शुभ कामना प्रकट की और इस हिंसा का कड़ा निषेध करते हुए कहा— ‘जो धर्म की मर्यादा से भ्रष्ट हो चुके हैं, मूर्ख हैं, नास्तिक हैं तथा जिन्हें आत्मा के विषय में सन्देह है एवं जिनकी कहीं प्रसिद्धि नहीं है, ऐसे लोगों ने ही हिंसा का समर्थन किया है। धर्मात्मा मनु ने सम्पूर्ण कर्मों में अहिंसा का ही प्रतिपादन किया है। मनुष्य अपनी ही इच्छा से यज्ञ की बाह्य वेदी पर पशुओं का बलिदान करते हैं। अतः विज्ञ पुरुष को उचित है कि वह वैदिक प्रमाण से धर्म के सूक्ष्म स्वरूप का निर्णय करे। सम्पूर्ण भूतों के लिये जिन धर्मों का विधान किया गया है, उनमें अहिंसा ही सबसे बड़ी मानी गई है। उपवासपूर्वक कठोर नियमों का पालन करें। वेद की फलश्रुतियों का परित्याग कर दें अर्थात् काम्य कर्मों को छोड़ दें; सकाम कर्मों के आचरण को अनाचार समझकर उनमें प्रवृत्त न हों। कृपण मनुष्य ही फल की इच्छा से कर्म करते हैं।’

भीष्म उवाच

सर्वकर्मस्वहिंसा हि धर्मात्मा मनुरब्रवीत् ।
कामकाराद् विहिंसन्ति बहिर्वेद्यां पशून् नराः ॥

धर्मात्मा मनुने सम्पूर्ण कर्मोंमें अहिंसाका ही प्रतिपादन किया है । मनुष्य अपनी ही इच्छासे यज्ञकी बाह्यवेदीपर पशुओंका बलिदान करते हैं ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 265 · श्लोक 5पृष्ठ 1705

राजा ने आगे स्पष्ट किया कि यदि लोग यह कहें कि यज्ञ के यूप निर्माण के उद्देश्य से जो वृक्ष काटे जाते हैं और यज्ञ के उद्देश्य से पशु बलि देकर जो मांस खाया जाता है, वह व्यस्त नहीं है अपितु धर्म है— तो यह ठीक नहीं; क्योंकि ऐसे धर्म की कोई प्रशंसा नहीं करता। सुरा, आसव, मधु, मांस और मछली तथा तिल और चावल की खिचड़ी— इन सब वस्तुओं को धूर्त लोगों ने यज्ञ में प्रचलित कर दिया है। वेदों में इनके उपयोग का कोई विधान नहीं है। अभिमान, मोह और लोभ के वशीभूत होकर उन धूर्त लोगों ने इन वस्तुओं के प्रति अपनी लोलुपता ही प्रकट की है। ब्राह्मण तो सम्पूर्ण यज्ञों में केवल भगवान् विष्णु का ही आदरभाव मानते हैं; उनके लिए खीर तथा फूल आदि से ही पूजा का विधान है। वेदों में जो यज्ञ-सम्बन्धी वृक्ष बताये गये हैं, उन्हीं का यज्ञों में उपयोग होना चाहिये। शुद्ध आचार-विचार वाले महान सत्त्वगुणी पुरुष अपनी विशुद्ध भावना से प्रोक्षण आदिके द्वारा उत्तम संस्कार करके जो कोई भी हविष्य या नैवेद्य तैयार करते हैं, वह सब देवताओं को अर्पण करने के योग्य ही होता है।

सुरा मत्स्या मधु मांसमासवं कृसरौदनम् ।
धूर्तेः प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम् ॥

सुरा, आसव, मधु, मांस और मछली तथा तिल और चावलकी खिचड़ी — इन सब वस्तुओंको धूर्तोंने यज्ञमें प्रचलित कर दिया है । वेदोंमें इनके उपयोगका विधान नहीं है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 265 · श्लोक 9पृष्ठ 1706

इस चर्चा के बीच युधिष्ठिर ने एक गम्भीर प्रश्न पूछा— ‘पितामह! जो हिंसा से अत्यन्त दूर रहने वाला है, उस पुरुष का शरीर और आपत्तियाँ परस्पर विवाद करने लगती हैं— आपत्तियाँ शरीर का शोषण करती हैं और शरीर आपत्तियों का नाश चाहता है; अतः सूक्ष्म हिंसा के भय से कृषि आदि किसी कार्य का आरम्भ न करने वाले पुरुष की शरीर-यात्रा का निर्वाह कैसे होगा?’

कथं यात्रा शरीरस्य निरारम्भस्य सेत्स्यते ॥

युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! जो हिंसासे अत्यन्त दूर रहनेवाला है, उस पुरुषका शरीर और आपत्तियाँ परस्पर विवाद करने लगती हैं- आपत्तियाँ शरीरका शोषण करती हैं और शरीर आपत्तियोंका नाश चाहता है; अतः सूक्ष्म हिंसाके भयसे कृषि आदि किसी कार्यका आरम्भ न करनेवाले पुरुषकी शरीरयात्राका निर्वाह कैसे होगा?

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 265 · श्लोक 13पृष्ठ 1707

भीष्मजी ने युधिष्ठिर को उत्तर देते हुए कहा— ‘युधिष्ठिर! कर्मों में इस प्रकार प्रवृत्त होना चाहिये, जिससे शरीर की शक्ति सर्वथा क्षीण न हो जाये और वह मृत्यु के अधीन न हो जाये; क्योंकि मनुष्य शरीर के समर्थ होने पर ही धर्म का पालन कर सकता है।’

भीष्म उवाच

यथा शरीरं न ग्लायेन्नेयान्मृत्युवशं यथा ।
तथा कर्मसु वर्तेत समर्थो धर्ममाचरेत् ॥

भीष्मजीने कहा – युधिष्ठिर! कर्मोंमें इस प्रकार प्रवृत्त होना चाहिये, जिससे शरीरकी शक्ति सर्वथा क्षीण न हो जाय, जिससे वह मृत्युके अधीन न हो जाय; क्योंकि मनुष्य शरीरके समर्थ होनेपर ही धर्मका पालन कर सकता है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 265 · श्लोक 14पृष्ठ 1707

In English

King Vichakshu and the Importance of Non-violence

King Vichakshu observes a violent sacrifice and declares that non-violence is the highest duty for all living beings. He criticizes those who perform sacrifices involving animal slaughter or specific foods not prescribed by the Vedas. Yudhishthira asks how one can survive without performing tasks like agriculture that involve killing, and Bhishma explains that one must work in a way that maintains physical strength to fulfill dharma.

This page answers

  • What did king vichakshu say about animal sacrifice?
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  • How did yudhishthira ask about the difficulty of avoiding all violence?
  • What was bhishma's advice to yudhishthira regarding work and survival?

Also written: Vichakhnugita, Vichakhnu, Bhishma, Yudhishthira, विचख्नुगीता