श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1701–1710

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1701–1710

पृष्ठ 1701

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चतुःषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः जाजलिको पक्षियोंका उपदेश तुलाधारउवाच

सद्भिर्वा यदि वासद्भि पन्थानमिममास्थितम् ।

प्रत्यक्षं क्रियतां साधु ततो ज्ञास्यसि तद् यथा ॥ १ ॥

तुलाधारने कहा — ब्रह्मन्! मैंने धर्मके जिस मार्गका दर्शन कराया है, उसपर सज्जन पुरुष चलते हैं या दुर्जन? इस बातको अच्छी तरह जाँचकर प्रत्यक्ष कर लो । तब तुम्हें इसकी यथार्थताका ज्ञान होगा ॥ १ ॥

एते शकुन्ता बहवः समन्ताद् विचरन्ति ह ।

तवोत्तमाङ्गे सम्भूताः श्येनाश्चान्याश्च जातयः ॥ २ ॥

देखो! आकाशमें ये जो बहुत- से श्येन एवं दूसरी जातियोंके पक्षी चारों ओर विचरण कर रहे हैं, इनमें तुम्हारे सिरपर उत्पन्न हुए पक्षी भी हैं ॥ २ ॥

आहूयैनान् महाब्रह्मन् विशमानांस्ततस्ततः ।

पश्येमान् हस्तपादैश्च श्लिष्टान् देहेषु सर्वशः ॥ ३ ॥

ब्रह्मन्! ये यत्र- तत्र घोंसलोंमें घुस रहे हैं । देखो, इन सबके हाथ- पैर सिकुड़कर शरीरोंसे सट गये हैं । इन सबको बुलाकर पूछो ॥ ३ ॥

सम्भावयन्ति पितरं त्वया सम्भाविताः खगाः ।

असंशयं पिता वै त्वं पुत्रानाहूय जाजले ॥ ४ ॥

ये पक्षी तुम्हारे द्वारा पालित और समादृत हुए हैं । अतः तुम्हारा पिताके समान सम्मान करते हैं । जाजले! इसमें संदेह नहीं कि तुम इनके पिता ही हो; अतः इन पुत्रोंको बुलाकर प्रश्न करो ॥ ४ ॥

भीष्म उवाच

ततो जाजलिना तेन समाहूताः पतत्त्रिणः ।

वाचमुच्चारयन्ति स्म धर्मस्य वचनात् किल ॥ ५ ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर जाजलिने उन पक्षियोंको बुलाया । उनका धर्मयुक्त वचन सुनकर वे पक्षी वहाँ आये और उनसे मनुष्यके समान स्पष्ट वाणीमें बोलने लगे – ॥ ५ ॥

अहिंसादिकृतं कर्म इह चैव परत्र च ।

श्रद्धां निहन्ति वै ब्रह्मन् सा हता हन्ति तं नरम् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1702

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‘ अहिंसा और दया आदि भावोंसे प्रेरित होकर किया हुआ कर्म इहलोक और परलोकमें भी उत्तम फल देनेवाला है । ब्रह्मन्! यदि मनमें हिंसाकी भावना हो तो वह श्रद्धाका नाश कर देती है । फिर नष्ट हुई श्रद्धा कर्म करनेवाले इस हिंसक मनुष्यका ही सर्वनाश कर डालती है ॥ ६ ॥

समानां श्रद्दधानानां संयतानां सुचेतसाम् ।

कुर्वतां यज्ञ इत्येव न यज्ञो जातु नेष्यते ॥ ७ ॥

' जो हानि और लाभमें समान भाव रखनेवाले, श्रद्धालु, संयमी और शुद्ध चित्तवाले पुरुष हैं तथा यज्ञको कर्तव्य समझकर करते हैं, उनका यज्ञ कभी असफल नहीं होता ॥ ७ ॥

श्रद्धा वैवस्वती सेयं सूर्यस्य दुहिता द्विज ।

सावित्री प्रसवित्री च बहिर्वाङ्मनसी ततः ॥ ८ ॥

'ब्रह्मन्! श्रद्धा सूर्यकी पुत्री है, इसलिये उसे वैवस्वती, सावित्री और प्रसवित्री ( विशुद्ध

जन्मदायिनी ) भी कहते हैं । वाणी और मन भी श्रद्धाकी अपेक्षा बहिरंग हैं ॥ ८ ॥

वाग्वृद्धं त्रायते श्रद्धा मनोवृद्धं च भारत ।

श्रद्धावृद्धं वाङ्मनसी न कर्म त्रातुमर्हति ॥ ९ ॥

‘ भरतनन्दन! यदि वाणीके दोषसे मन्त्रके उच्चारणमें त्रुटि रह जाय और मनकी चंचलताके कारण इष्टदेवताका ध्यान आदि कर्म सम्पन्न न हो सके तो भी यदि श्रद्धा हो तो वह वाणी और मनके दोषको दूर करके उस कर्मकी रक्षा कर सकती है । परंतु यदि श्रद्धा न होनेके कारण कर्ममें त्रुटि रह जाय तो वाणी और मन ( मन्त्रोच्चारण और ध्यान ) उस कर्मकी रक्षा नहीं कर सकते ॥ ९ ॥

अत्र गाथा ब्रह्मगीताः कीर्तयन्ति पुराविदः ।

शुचेरश्रद्दधानस्य श्रद्दधानस्य चाशुचेः ॥ १० ॥

देवा वित्तममन्यन्त सदृशं यज्ञकर्मणि ।

श्रोत्रियस्य कदर्यस्य वदान्यस्य च वार्धुषेः ॥ ११ ॥

मीमांसित्वोभयं देवाः सममन्नमकल्पयन् । इस विषयमें प्राचीन वृत्तान्तोंको जाननेवाले लोग ब्रह्माजीकी गायी हुई गाथाका वर्णन किया करते हैं, जो इस प्रकार है- पहले देवतालोग श्रद्धाहीन पवित्र और पवित्रतारहित श्रद्धालुके द्रव्यको यज्ञकर्मके लिये एक- सा ही समझते थे । इसी प्रकार वे कृपण वेदवेत्ता और महादानी सूदखोरके अन्नमें भी कोई अन्तर नहीं मानते थे । देवताओंने खूब सोच-विचारकर दोनों प्रकारके अन्नोंको समान निश्चित किया था ॥ १०-११३ ॥ प्रजापतिस्तानुवाच विषमं कृतमित्युत ॥ १२ ॥

श्रद्धापूतं वदान्यस्य हतमश्रद्धयेतरत् ।

पृष्ठ 1703

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‘किंतु एक बार यज्ञमें प्रजापतिने उनके इस बर्तावको देखकर कहा - ' देवताओ! तुमने यह अनुचित किया है । वास्तवमें उदारका अन्न उसकी श्रद्धाके कारण पवित्र होता है और कंजूसका अश्रद्धाके कारण अपवित्र एवं नष्टप्राय समझा जाता है * ॥ १२३ ॥

भोज्यमन्नं वदान्यस्य कदर्यस्य न वार्धुषेः ॥ १३ ॥

अश्रद्दधान एवैको देवानां नार्हते हविः ।

तस्यैवान्नं न भोक्तव्यमिति धर्मविदो विदुः ॥ १४ ॥

‘ सारांश यह कि उदारका ही अन्न भोजन करना चाहिये; कृपण, श्रोत्रिय एवं केवल सूदखोरका नहीं । जिसमें श्रद्धा नहीं है, एकमात्र वही देवताओंको हविष्य अर्पण करनेका अधिकार नहीं रखता है । उसीका अन्न नहीं खाना चाहिये । धर्मज्ञ पुरुष ऐसा ही मानते हैं ॥

अश्रद्धा परमं पापं श्रद्धा पापप्रमोचिनी ।

जहाति पापं श्रद्धावान् सर्पो जीर्णामिव त्वचम् ॥ १५ ॥

' अश्रद्धा सबसे बड़ा पाप है और श्रद्धा पापसे छुटकारा दिलानेवाली है । जैसे साँप अपने पुरानी केंचुलको छोड़ देता है, उसी प्रकार श्रद्धालु पुरुष पापका परित्याग कर देता है ॥ १५ ॥

ज्यायसी या पवित्राणां निवृत्तिः श्रद्धया सह ।

निवृत्तशीलदोषो यः श्रद्धावान् पूत एव सः ॥ १६ ॥

' श्रद्धा होनेके साथ - ही- साथ पापोंसे निवृत्त हो जाना समस्त पवित्रताओंसे बढ़कर है । जिसके शील - सम्बन्धी दोष दूर हो गये हैं, वह श्रद्धालु पुरुष सदा पवित्र ही है ॥ १६ ॥

किं तस्य तपसा कार्यं किं वृत्तेन किमात्मना ।

श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥ १७ ॥

‘ उसे तपस्याद्वारा क्या लेना है? आचार- व्यवहार अथवा आत्मचिन्तनद्वारा कौन- सा प्रयोजन सिद्ध करना है? यह पुरुष श्रद्धामय है, जिसकी जैसी सात्त्विकी, राजसी या तामसी श्रद्धा होती है, वह वैसा सात्त्विक, राजस या तामस होता है ॥ १७ ॥

इति धर्मः समाख्यातः सद्भिर्धर्मार्थदर्शिभिः ।

वयं जिज्ञासमानास्तु सम्प्राप्ता धर्मदर्शनात् ॥ १८ ॥

‘ धर्म और अर्थका साक्षात्कार करनेवाले सत्पुरुषोंने इसी प्रकार धर्मकी व्याख्या की है । हमलोगोंने धर्मदर्शन नामक मुनिसे जिज्ञासा प्रकट करनेपर उस धर्मका ज्ञान प्राप्त किया है ॥ १८ ॥

श्रद्धां कुरु महाप्राज्ञ ततः प्राप्स्यसि यत् परम् ।

श्रद्धावान् श्रद्दधानश्च धर्मश्चैव हि जाजले ।

स्ववर्त्मनि स्थितश्चैव गरीयानेव जाजले ॥ १ ९ ॥

महाज्ञानी जाजलि! तुम इसपर श्रद्धा करो । तदनन्तर इसके अनुसार आचरण करनेसे तुम्हें परमगतिकी प्राप्ति होगी । श्रद्धा करनेवाला श्रद्धालु पुरुष साक्षात् धर्मका स्वरूप है ।

पृष्ठ 1704

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जाजले! जो श्रद्धापूर्वक अपने धर्मपर स्थित है, वही सबसे श्रेष्ठ माना गया है ' ॥ १ ९ ॥ भीष्म उवाच

ततोऽचिरेण कालेन तुलाधारः स एव च ।

दिवं गत्वा महाप्राज्ञौ विहरेतां यथासुखम् ॥ २० ॥

स्वं स्वं स्थानमुपागम्य स्वकर्मफलनिर्जितम् । भीष्मजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर थोड़े ही समयमें तुलाधार और जाजलि दोनों महाज्ञानी पुरुष परमधाममें जाकर अपने शुभ कर्मोंके फलस्वरूप अपने - अपने स्थानको पाकर वहाँ सुखपूर्वक विहार करने लगे ॥ २० ॥

एवं बहुविधार्थं च तुलाधारेण भाषितम् ॥ २१ ॥

सम्यक् चेदमुपालब्धो धर्मश्चोक्तः सनातनः ।

तस्य विख्यातवीर्यस्य श्रुत्वा वाक्यानि स द्विजः ॥ २२ ॥

इस प्रकार तुलाधारने नाना प्रकारके वक्तव्य विषयोंसे युक्त उत्तम भाषण किया । उन्होंने सनातन धर्मका भी वर्णन किया । ब्राह्मण जाजलिने विख्यात प्रभावशाली तुलाधारके वे वचन सुनकर उनके इस तात्पर्यको भलीभाँति हृदयंगम किया ॥ २१-२२ ॥ तुलाधारस्य कौन्तेय शान्तिमेवान्वपद्यत ।

एवं बहुमतार्थं च तुलाधारेण भाषितम् ।

यथौपम्योपदेशेन किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ २३ ॥

कुन्तीनन्दन! तुलाधारने जो उपदेश दिया था, वह बहुजनसम्मत अर्थसे युक्त था । उसे

सुनकर जाजलिको परम शान्ति प्राप्त हुई। उसे यथावत् दृष्टान्तपूर्वक समझाया गया है ।

अब तुम और क्या सुनना चाहते हो? ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि तुलाधारजाजलिसंवादे चतुःषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें तुलाधार-जाजलि- संवादविषयक दो सौ चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६४ ॥

* अतः श्रद्धाहीन पवित्रकी अपेक्षा पवित्रताहीन श्रद्धालुका ही अन्न ग्रहण करनेयोग्य है । इसी प्रकार कृपण वेदवेत्ता और दानी सूदखोरमेंसे दानी सूदखोरका ही अन्न श्रद्धापूत एवं ग्राह्य है । केवल सूदखोर और केवल कृपणका अन्न तो त्याज्य है ही ।

पृष्ठ 1705

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पञ्चषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः राजा विचख्नुके द्वारा अहिंसा धर्मकी प्रशंसा भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

प्रजानामनुकम्पार्थं गीतं राज्ञा विचख्नुना ॥ १ ॥

भीष्मजीने कहा — राजन्! प्राचीन कालमें राजा विचख्नुने समस्त प्राणियोंपर दया करनेके लिये जो उद्गार प्रकट किया था, उस प्राचीन इतिहासका इस प्रसंगमें जानकार मनुष्य उदाहरण दिया करते हैं ॥ १ ॥

छिन्नस्थूणं वृषं दृष्ट्वा विलापं च गवां भृशम् ।

गोग्रहे यज्ञवाटस्य प्रेक्षमाणः स पार्थिवः ॥ २ ॥

एक समय किसी यज्ञशालामें राजाने देखा कि एक बैलकी गरदन कटी हुई है और वहाँ बहुत - सी गौएँ आर्तनाद कर रही हैं। यज्ञशालाके प्रांगणमें कितनी ही गौएँ खड़ी हैं । यह सब देखकर राजा बोले— ॥ २ ॥

स्वस्ति गोभ्योऽस्तु लोकेषु ततो निर्वचनं कृतम् ।

हिंसायां हि प्रवृत्तायामाशीरेषा तु कल्पिता ॥ ३ ॥

‘ संसारमें समस्त गौओंका कल्याण हो। ' जब हिंसा आरम्भ होने जा रही थी, उस समय उन्होंने गौओंके लिये यह शुभ कामना प्रकट की और उस हिंसाका निषेध करते हुए कहा ॥ ३ ॥

अव्यवस्थितमर्यादैर्विमूढैर्नास्तिकैर्नरैः ।

संशयात्मभिरव्यक्तैर्हिसा समनुवर्णिता ॥ ४ ॥

‘ जो धर्मकी मर्यादासे भ्रष्ट हो चुके हैं, मूर्ख हैं, नास्तिक हैं तथा जिन्हें आत्माके विषयमें संदेह है एवं जिनकी कहीं प्रसिद्धि नहीं है, ऐसे लोगोंने ही हिंसाका समर्थन किया है ॥ ४ ॥

सर्वकर्मस्वहिंसा हि धर्मात्मा मनुरब्रवीत् ।

कामकाराद् विहिंसन्ति बहिर्वेद्यां पशून् नराः ॥ ५ ॥

धर्मात्मा मनुने सम्पूर्ण कर्मोंमें अहिंसाका ही प्रतिपादन किया है । मनुष्य अपनी ही इच्छासे यज्ञकी बाह्यवेदीपर पशुओंका बलिदान करते हैं ॥ ५ ॥

तस्मात् प्रमाणतः कार्यो धर्मः सूक्ष्मो विजानता ।

अहिंसा सर्वभूतेभ्यो धर्मेभ्यो ज्यायसी मता ॥ ६ ॥

अतः विज्ञ पुरुषको उचित है कि वह वैदिक प्रमाणसे धर्मके सूक्ष्म स्वरूपका निर्णय करे । सम्पूर्ण भूतोंके लिये जिन धर्मोंका विधान किया गया है, उनमें अहिंसा ही सबसे बड़ी

पृष्ठ 1706

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मानी गयी है ॥ ६ ॥

उपोष्य संशितो भूत्वा हित्वा वेदकृताः श्रुतीः ।

आचार इत्यनाचारः कृपणाः फलहेतवः ॥ ७ ॥

उपवासपूर्वक कठोर नियमोंका पालन करे । वेदकी फलश्रुतियोंका परित्याग कर दे अर्थात् काम्य कर्मोंको छोड़ दे, सकाम कर्मोंके आचरणको अनाचार समझकर उनमें प्रवृत्त न हो । कृपण ( क्षुद्र) मनुष्य ही फलकी इच्छासे कर्म करते हैं ॥ ७ ॥

यदि यज्ञांश्च वृक्षांश्च यूपांश्चोद्दिश्य मानवाः ।

वृथा मांसं न खादन्ति नैष धर्मः प्रशस्यते ॥ ८ ॥

यदि कहें कि मनुष्य यूपनिर्माणके उद्देश्यसे जो वृक्ष काटते और यज्ञके उद्देश्यसे पशुबलि देकर जो मांस खाते हैं, वह व्यर्थ नहीं है । अपितु धर्म ही है तो यह ठीक नहीं; क्योंकि ऐसे धर्मकी कोई प्रशंसा नहीं करते ॥ ८ ॥

सुरा मत्स्या मधु मांसमासवं कृसरौदनम् ।

धूर्तेः प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम् ॥ ९ ॥

सुरा, आसव, मधु, मांस और मछली तथा तिल और चावलकी खिचड़ी — इन सब वस्तुओंको धूर्तोंने यज्ञमें प्रचलित कर दिया है । वेदोंमें इनके उपयोगका विधान नहीं है ॥ ९ ॥

मानान्मोहाच्च लोभाच्च लौल्यमेतत्प्रकल्पितम् । उन धूर्तोंने अभिमान, मोह और लोभके वशीभूत होकर उन वस्तुओंके प्रति अपनी यह लोलुपता ही प्रकट की है ॥ ९ ३ ॥ विष्णुमेवाभिजानन्ति सर्वयज्ञेषु ब्राह्मणाः ॥ १० ॥

पायसैः सुमनोभिश्च तस्यापि यजनं स्मृतम् । ब्राह्मण तो सम्पूर्ण यज्ञोंमें भगवान् विष्णुका ही आदरभाव मानते हैं और खीर तथा फूल आदिसे ही उनकी पूजाका विधान है ॥ १०३ ॥

यज्ञियाश्चैव ये वृक्षा वेदेषु परिकल्पिताः ॥ ११ ॥

यच्चापि किंचित् कर्तव्यमन्यच्चोक्षैः सुसंस्कृतम् ।

महासत्त्वैः शुद्धभावैः सर्वं देवार्हमेव तत् ॥ १२ ॥

वेदोंमें जो यज्ञ - सम्बन्धी वृक्ष बताये गये हैं, उन्हींका यज्ञोंमें उपयोग होना चाहिये । शुद्ध आचार-र- विचारवाले महान् सत्त्वगुणी पुरुष अपनी विशुद्ध भावनासे प्रोक्षण आदिके द्वारा उत्तम संस्कार करके जो कोई भी हविष्य या नैवेद्य तैयार करते हैं, वह सब देवताओंको अर्पण करनेके योग्य ही होता है ॥ ११-१२ ॥ युधिष्ठिर उवाच शरीरमापदश्चापि विवदन्त्यविहिंसतः ।

पृष्ठ 1707

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कथं यात्रा शरीरस्य निरारम्भस्य सेत्स्यते ॥ १३ ॥

युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! जो हिंसासे अत्यन्त दूर रहनेवाला है, उस पुरुषका शरीर और आपत्तियाँ परस्पर विवाद करने लगती हैं- आपत्तियाँ शरीरका शोषण करती हैं और शरीर आपत्तियोंका नाश चाहता है; अतः सूक्ष्म हिंसाके भयसे कृषि आदि किसी कार्यका आरम्भ न करनेवाले पुरुषकी शरीरयात्राका निर्वाह कैसे होगा? ॥ १३ ॥

भीष्म उवाच

यथा शरीरं न ग्लायेन्नेयान्मृत्युवशं यथा ।

तथा कर्मसु वर्तेत समर्थो धर्ममाचरेत् ॥ १४ ॥

भीष्मजीने कहा – युधिष्ठिर! कर्मोंमें इस प्रकार प्रवृत्त होना चाहिये, जिससे शरीरकी शक्ति सर्वथा क्षीण न हो जाय, जिससे वह मृत्युके अधीन न हो जाय; क्योंकि मनुष्य शरीरके समर्थ होनेपर ही धर्मका पालन कर सकता है ॥ १४ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि विचख्नुगीतायां पञ्चषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें विचख्नुगीताविषयक दो सौ पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६५ ॥

Fard

पृष्ठ 1708

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षट्षष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः महर्षि गौतम और चिरकारीका उपाख्यान - दीर्घकालतक सोच - विचारकर कार्य करनेकी प्रशंसा युधिष्ठिर उवाच

कथं कार्यं परीक्षेत शीघ्रं वाथ चिरेण वा ।

सर्वथा कार्यदुर्गेऽस्मिन् भवान् नः परमो गुरुः ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा – पितामह! आप मेरे परम गुरु हैं । कृपया यह बतलाइये कि यदि कभी सर्वथा ऐसा कार्य उपस्थित हो जाय, जो गुरुजनोंकी आज्ञाके कारण अवश्य कर्तव्य हो, परंतु हिंसायुक्त होनेके कारण दुष्कर एवं अनुचित प्रतीत होता हो तो ऐसे अवसरपर उस कार्यकी परख कैसे करनी चाहिये? उसे शीघ्र कर डाले या देरतक उसपर विचार करता रहे ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

चिरकारेस्तु यत् पूर्वं वृत्तमाङ्गिरसे कुले ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा- बेटा! इस विषयमें जानकार लोग इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, जो पहले आंगिरस-कुलमें उत्पन्न चिरकारीपर बीत चुका है ॥ २ ॥

चिरकारिक भद्रं ते भद्रं ते चिरकारिक ।

चिरकारी हि मेधावी नापराध्यति कर्मसु ॥ ३ ॥

‘ चिरकारी! तुम्हारा कल्याण हो । चिरकारी! तुम्हारा मंगल हो । चिरकारी बड़ा बुद्धिमान् है । चिरकारी कर्तव्योंके पालनमें कभी अपराध नहीं करता है । ' ( यह बात चिरकारीकी प्रशंसा करते हुए उसके पिताने कही थी ) ॥ ३ ॥

चिरकारी महाप्राज्ञो गौतमस्याभवत् सुतः ।

चिरेण सर्वकार्याणि विमृश्यार्थान् प्रपद्यते ॥ ४ ॥

कहते हैं, महर्षि गौतमके एक महाज्ञानी पुत्र था, जिसका नाम था चिरकारी । वह कर्तव्य- विषयोंका भलीभाँति विचार करके सारे कार्य विलम्बसे किया करता था ॥ ४ ॥

चिरं स चिन्तयत्यर्थांश्चिरं जाग्रच्चिरं स्वपन् ।

चिरं कार्याभिपत्तिं च चिरकारी तथोच्यते ॥ ५ ॥

वह सभी विषयोंपर बहुत देरतक विचार करता था, चिरकालतक जागता था और चिरकालतक सोता था तथा चिर- विलम्बके बाद ही कार्य पूर्ण करता था; इसलिये सब लोग उसे चिरकारी कहने लगे ॥ ५ ॥

पृष्ठ 1709

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अलसग्रहणं प्राप्तो दुर्मेधावी तथोच्यते ।

बुद्धिलाघवयुक्तेन जनेनादीर्घदर्शिना ॥ ६ ॥

जो दूतककी बात नहीं सोच सकते, ऐसे मन्दबुद्धि मानवोंने उसे आलसीकी उपाधि दे दी । उसे दुर्बुद्धि कहा जाने लगा ॥ ६ ॥

व्यभिचारे तु कस्मिंश्चिद् व्यतिक्रम्यापरान् सुतान् ।

पित्रोक्तः कुपितेनाथ जहीमां जननीमिति ॥ ७ ॥

एक दिनकी बात है, गौतमने अपनी स्त्रीके द्वारा किये गये किसी व्यभिचारपर कुपित हो अपने दूसरे पुत्रोंको न कहकर चिरकारीसे कहा- बेटा! तू अपनी इस पापिनी माताको मार डाल ' ॥ ७ ॥

इत्युक्त्वा स तदा विप्रो गौतमो जपतां वरः ।

अविमृश्य महाभागो वनमेव जगाम सः ॥ ८ ॥

उस समय बिना बिचारे ही ऐसी आज्ञा देकर जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि महाभाग गौतम वनमें चले गये ॥ ८ ॥

स तथेति चिरेणोक्त्वा स्वभावाच्चिरकारिकः ।

विमृश्य चिरकारित्वाच्चिन्तयामास वै चिरम् ॥ ९ ॥

चिरकारीने अपने स्वभावके अनुसार देर करके कहा, ' बहुत अच्छा' । चिरकारी तो वह था ही, चिरकालतक उस बातपर विचार करता रहा ॥ ९ ॥

पितुराज्ञां कथं कुर्यां न हन्यां मातरं कथम् ।

कथं धर्मच्छलेनास्मिन् निमज्जेयमसाधुवत् ॥ १० ॥

उसने सोचा कि ‘ मैं किस उपायसे काम लूँ जिससे पिताकी आज्ञाका पालन भी हो जाय और माताका वध भी न करना पड़े । धर्मके बहाने यह मेरे ऊपर महान् संकट आ गया है । भला, अन्य असाधु पुरुषोंकी भाँति मैं भी इसमें डूबनेका कैसे साहस करूँ? ॥ १० ॥

पितुराज्ञा परो धर्मः स्वधर्मो मातृरक्षणम् ।

अस्वतन्त्रं च पुत्रत्वं किं तु मां नानुपीडयेत् ॥ ११ ॥

‘ पिताकी आज्ञाका पालन परम धर्म है और माताकी रक्षा करना पुत्रका प्रधान धर्म है । पुत्र कभी स्वतन्त्र नहीं होता, वह सदा माता - पिताके अधीन ही रहता है, अतः क्या करूँ जिससे मुझे धर्मकी हानिरूप पीड़ा न हो ॥ ११ ॥

स्त्रियं हत्वा मातरं च को हि जातु सुखी भवेत् ।

पितरं चाप्यवज्ञाय कः प्रतिष्ठामवाप्नुयात् ॥ १२ ॥

'एक तो स्त्री-जाति, दूसरे माताका वध करके कौन पुत्र कभी भी सुखी हो सकता है? पिताकी अवहेलना करके भी कौन प्रतिष्ठा पा सकता है? ॥ १२ ॥

अनवज्ञा पितुर्युक्ता धारणं मातृरक्षणम् ।

युक्तक्षमावुभावेतौ नातिवर्तेत मां कथम् ॥ १३ ॥

पृष्ठ 1710

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‘ पिताका अनादर उचित नहीं है, साथ ही माताकी रक्षा करना भी पुत्रका धर्म है । ये

दोनों ही धर्म उचित और योग्य हैं । मैं किस प्रकार इनका उल्लंघन न करूँ? ॥

पिता ह्यात्मानमाधत्ते जायायां जज्ञिवानिति ।

शीलचारित्रगोत्रस्य धारणार्थं कुलस्य च ॥ १४ ॥

‘ पिता स्वयं अपने शील, सदाचार, कुल और गोत्रकी रक्षाके लिये स्त्रीके गर्भमें अपना ही आधान करता और पुत्ररूपमें उत्पन्न होता है ॥ १४ ॥

सोऽहं मात्रा स्वयं पित्रा पुत्रत्वे प्रकृतः पुनः ।

विज्ञानं मे कथं न स्याद् द्वौ बुद्धये चात्मसम्भवम् ॥ १५ ॥

‘ अतः मुझे माता और पिता — दोनोंने ही पुत्रके रूपमें जन्म दिया है । मैं इन दोनोंको ही

अपनी उत्पत्तिका कारण समझता हूँ । मेरा ऐसा ही ज्ञान क्यों न सदा बना रहे? ॥ १५ ॥

जातकर्मणि यत् प्राह पिता यच्चोपकर्मणि ।

पर्याप्तः स दृढीकारः पितुर्गौरवनिश्चये ॥ १६ ॥

‘ जातकर्म - संस्कार और उपनयन संस्कारके समय पिताने जो आशीर्वाद दिया है, वह पिताके गौरवका निश्चय करानेमें पर्याप्त एवं सुदृढ़ प्रमाण है ॥ १६ ॥

गुरुरग्र्यः परो धर्मः पोषणाध्यापनान्वितः ।

पिता यदाह धर्मः स वेदेष्वपि सुनिश्चितः ॥ १७ ॥

‘ पिता भरण- पोषण करने तथा शिक्षा देनेके कारण पुत्रका प्रधान गुरु है । वह परम धर्मका साक्षात् स्वरूप है । पिता जो कुछ आज्ञा दे, उसे ही धर्म समझकर स्वीकार करना चाहिये । वेदोंमें भी उसीको धर्म निश्चित किया गया है ॥ १७ ॥

प्रीतिमात्रं पितुः पुत्रः सर्वं पुत्रस्य वै पिता ।

शरीरादीनि देयानि पिता त्वेकः प्रयच्छति ॥ १८ ॥

' पुत्र पिताकी सम्पूर्ण प्रीतिरूप है और पिता पुत्रका सर्वस्व है । केवल पिता ही पुत्रको देह आदि सम्पूर्ण देने योग्य वस्तुओंको देता है ॥ १८ ॥

तस्मात् पितुर्वचः कार्यं न विचार्यं कदाचन ।

पातकान्यपि पूयन्ते पितुः शासनकारिणः ॥ १९ ॥

' इसलिये पिताके आदेशका पालन करना चाहिये । उसपर कभी कोई विचार नहीं करना चाहिये । जो पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाला है, उसके पातक भी नष्ट हो जाते हैं ॥ १ ९ ॥

भोग्ये भोज्ये प्रवचने सर्वलोकनिदर्शने ।

भर्त्रा चैव समायोगे सीमन्तोन्नयने तथा ॥ २० ॥

' पुत्रके भोग्य ( वस्त्र आदि ), भोज्य (अन्न आदि ), प्रवचन ( वेदाध्ययन ), सम्पूर्ण लोक-व्यवहारकी शिक्षा तथा गर्भाधान, पुंसवन और सीमन्तोन्नयन आदि समस्त संस्कारोंके सम्पादनमें पिता ही प्रभु है ॥ २० ॥