यमगौतमसंवाद : माता-पिता के ऋण से मुक्ति और पुण्य लोक की प्राप्ति कैसे होती है?
तप, सत्य और पितृसेवा
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 129 · पृष्ठ 843–845
350 शब्द · 2 मिनटका पाठ · 4 श्लोक
भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा
युधिष्ठिर की धर्मोपदेश की निरन्तर इच्छा पूर्ति हेतु
"भरतनन्दन! जैसे अमृत को पीने से इच्छा पूर्ण नहीं होती, बल्कि उसे पीने की इच्छा बढ़ती जाती है, उसी प्रकार जब आप उपदेश करने लगते हैं, तो उसे सुनने से मेरा मन नहीं भरता। जैसे परमात्मा के ध्यान में निमग्न हुआ योगी परमानन्द से तृप्त हो जाता है, मैं भी वैसा ही अनुभव करता हूँ। अतः पितामह! आप पुनः धर्म की ही बात बताइये। आपके धर्मोपदेश रूपी अमृत का पान करते समय मुझे यह नहीं लगता कि अब सब पूरा हो गया, बल्कि सुनने की प्यास और बढ़ती जाती है।" युधिष्ठिर के इन वचनों ने भीष्म को प्रभावित किया। भीष्म बोले— "युधिष्ठिर! इस धर्म के विषय में विज्ञ पुरुषों ने गौतम तथा महात्मा यम के संवाद रूप एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया है।"
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
गौतमस्य च संवादं यमस्य च महात्मनः ॥
भीष्मजीने कहा - युधिष्ठिर! इस धर्मके विषयमें भी विज्ञ पुरुष गौतम तथा महात्मा यमके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ।
"पारियात्र नामक पर्वत पर महर्षि गौतम का महान आश्रम है। उस आश्रम में गौतम जितने समय तक रहे, वह भी मुझसे सुनो। गौतम ने उस आश्रम में साठ हजार वर्षों तक तपस्या की। नरश्रेष्ठ! एक दिन उग्र तपस्या में लगे हुए पवित्र महात्मा महामुनि गौतम के पास लोकपाल यम स्वयं आए।" भीष्म कथा को आगे बढ़ाते हुए बोले कि जब यमराज वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने उत्तम तपस्वी गौतम ऋषि को देखा। ब्रह्मर्षि गौतम ने वहाँ आए हुए यमराज को उनके तेज से ही पहचान लिया। वे तपोधन मुनि हाथ जोड़कर, संयत चित्त होकर उनके पास जा बैठे।
तं धर्मराजो दृष्ट्वैव सत्कृत्यैव द्विजर्षभम् ।
न्यमन्त्रयत धर्मेण क्रियतां किमिति ब्रुवन् ॥
धर्मराजने विप्रवर गौतमको देखते ही उनका सत्कार किया और मैं आपकी क्या सेवा करूँ? ऐसा कहते हुए उन्हें धर्मचर्चा सुननेके लिये सम्मति प्रदान की ।
धर्मराज ने विप्रवर गौतम को देखते ही उनका सत्कार किया और पूछा— "मैं आपकी क्या सेवा करूँ?" ऐसा कहते हुए उन्होंने उन्हें धर्म चर्चा सुनने के लिए सम्मति प्रदान की। तब गौतम ने प्रश्न किया— "भगवन्! मनुष्य कौन सा कर्म करके माता-पिता के ऋण से उऋण हो सकता है? और किस प्रकार उसे दुर्लभ एवं पवित्र लोकों की प्राप्ति होती है?"
मातापितृभ्यामानृण्यं कि कृत्वा समवाप्नुयात् ।
कथं च लोकानाप्नोति पुरुषो दुर्लभान् शुचीन् ॥
तब गौतमने कहा — भगवन्! मनुष्य कौन - सा कर्म करके माता-पिताके ऋणसे उऋण हो सकता है? और किस प्रकार उसे दुर्लभ एवं पवित्र लोकोंकी प्राप्ति होती है?
यमराज ने उत्तर दिया— "ब्रह्मन्! मनुष्य तप करे, बाहर और भीतर से पवित्र रहे और सदा सत्यभाषण रूप धर्म के पालन में तत्पर रहे। यह सब करते हुए ही उसे नित्यप्रति माता-पिता की सेवा और पूजा करनी चाहिए। राजा को तो पर्याप्त दक्षिणाओं से युक्त अनेक अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान भी करना चाहिए। ऐसा करने से पुरुष अद्भुत दृश्यों से सम्पन्न पुण्य लोकों को प्राप्त कर लेता है।"
तपः शौचवता नित्यं सत्यधर्मरतेन च ।
मातापित्रोरहरहः पूजनं कार्यमञ्जसा ॥
यमराजने कहा —ब्रह्मन्! मनुष्य तप करे, बाहर- भीतरसे पवित्र रहे और सदा सत्यभाषणरूप धर्मके पालनमें तत्पर रहे । यह सब करते हुए ही उसे नित्यप्रति माता-पिताकी सेवा - पूजा करनी चाहिये ।
In English
The Dialogue of Gautama and Yama
Yudhisthira asks Bhishma to continue teaching him about dharma. Bhishma tells a story about the sage Gautama, who lived in an ashram on Mount Pariayatra for sixty thousand years. When the deity Yama visits Gautama, the sage asks how a person can repay their debt to their parents and reach sacred worlds.
This page answers
- How long did gautama live on mount pariayatra?
- What did gautama ask yama?
- How can a person repay their debt to their parents according to yama?
- How does one achieve sacred worlds?
Also written: Yamagautamasanvada, Yudhishthira, Bhishma, Yamaraja, यमगौतमसंवाद