श्रीगणेशाय नमः।

ब्राह्मणमाहात्म्य : ब्राह्मणों की वास्तविक श्रेष्ठता और उनकी भूमिका क्या है?

क्षत्रिय और ब्राह्मण का धर्म

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ६ · अनुशासनपर्व → दानधर्मपर्व · अध्याय 152 · पृष्ठ 1466–1472

738 शब्द · 4 मिनटका पाठ · 14 श्लोक

भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा

ब्राह्मण-पूजा के वास्तविक प्रयोजन को समझाने हेतु

युधिष्ठिर ने जनेश्वर! आप कौन-सा फल देखकर ब्राह्मण-पूजा में लगे रहते हैं? महामते! अथवा किस कर्म का उदय सोचकर आप उन ब्राह्मणों की पूजा-अर्चा करते हैं?

स्तुति महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 152
युधिष्ठिर उवाच

कां तु ब्राह्मणपूजायां व्युष्टिं दृष्ट्वा जनाधिप ।
कं वा कर्मोदयं मत्वा तानर्चसि महामते ॥

युधिष्ठिरने कहा – जनेश्वर! आप कौन- सा फल देखकर ब्राह्मणपूजामें लगे रहते हैं? महामते! अथवा किस कर्मका उदय सोचकर आप उन ब्राह्मणोंकी पूजा - अर्चा करते हैं?

श्लोक 1पृष्ठ 1467
भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
पवनस्य च संवादमर्जुनस्य च भारत ॥

भीष्मजीने कहा - भरतनन्दन! इस विषयमें विज्ञपुरुष कार्तवीर्य अर्जुन और वायुदेवताके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ।

श्लोक 2पृष्ठ 1467
भीष्म उवाच

सहस्रभुजभृच्छ्रीमान् कार्तवीर्योऽभवत् प्रभुः अस्य लोकस्य सर्वस्य माहिष्मत्यां महाबलः ॥

स तु रत्नाकरवतीं सद्वीपां सागराम्बराम् ।
शशास पृथिवीं सर्वां हैहयः सत्यविक्रमः ॥

पूर्वकालकी बात है— माहिष्मती नगरीमें सहस्र- भुजधारी परम कान्तिमान् कार्तवीर्य अर्जुन नामवाला एक हैहयवंशी राजा समस्त भूमण्डलका शासन करता था । वह महान् बलवान् और सत्यपराक्रमी था । इस लोकमें सर्वत्र उसीका आधिपत्य था ।

श्लोक 3-4पृष्ठ 1467
भीष्म उवाच

स्ववित्तं तेन दत्तं तु दत्तात्रेयाय कारणे ।
क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य विनयं श्रुतमेव च ॥

श्लोक 5पृष्ठ 1467

न्यमन्त्रयत संतुष्टो द्विजश्चैनं वरैस्त्रिभिः ॥

स वरैश्छन्दितस्तेन नृपो वचनमब्रवीत् ।
सहस्रबाहुर्भूयां वै चमूमध्ये गृहेऽन्यथा ॥

मम बाहुसहस्रं तु पश्यतां सैनिका रणे ।
विक्रमेण महीं कृत्स्नां जयेयं संशितव्रत ॥

तां च धर्मेण सम्प्राप्य पालयेयमतन्द्रितः ।
चतुर्थं तु वरं याचे त्वामहं द्विजसत्तम ॥

तं ममानुग्रहकृते दातुमर्हस्यनिन्दित ।
अनुशासन्तु मां सन्तो मिथ्योद्वृत्तं त्वदाश्रयम् ॥

भुजाओंसे युक्त रहूँ; किन्तु घरपर मेरी दो ही बाँहें रहें । रणभूमिमें सभी सैनिक मेरी एक हजार भुजाएँ देखें । कठोर व्रतका पालन करनेवाले गुरुदेव! मैं अपने पराक्रमसे सम्पूर्ण पृथ्वीको जीत लूँ। इस प्रकार पृथ्वीको धर्मके अनुसार प्राप्तकर मैं आलस्यरहित हो उसका पालन करूँ। द्विजश्रेष्ठ! इन तीन वरोंके सिवा एक चौथा वर भी मैं आपसे माँगता हूँ । अनिन्द्य महर्षे! मुझपर कृपा करनेके लिये आप वह वर भी अवश्य प्रदान करें । मैं आपका आश्रित भक्त हूँ । यदि कभी मैं सन्मार्गका परित्याग करके असत्य मार्गका आश्रय लूँ तो श्रेष्ठ पुरुष मुझे राहपर लानेके लिये शिक्षा दें '

श्लोक 6–10पृष्ठ 1468

इत्युक्तः स द्विजः प्राह तथास्त्विति नराधिपम् ।
एवं समभवंस्तस्य वरास्ते दीप्ततेजसः ॥

- उसके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर दत्तात्रेयजीने उस नरेशसे कहा - ' तथास्तु — ऐसा ही हो । ' फिर तो उस तेजस्वी राजाके लिये वे सभी वर उसी रूपमें सफल हुए ।

श्लोक 11पृष्ठ 1470

ततः स रथमास्थाय ज्वलनार्कसमद्युतिम् ।
अब्रवीद् वीर्यसम्मोहात् को वास्ति सदृशो मम ॥

श्लोक 12पृष्ठ 1470

तद्वाक्यान्ते चान्तरिक्षे वागुवाचाशरीरिणी ॥

न त्वं मूढ विजानीषे ब्राह्मणं क्षत्रियाद् वरम् ।
सहितो ब्राह्मणेनेह क्षत्रियः शास्ति वै प्रजाः ॥

उसकी यह बात पूरी होते ही आकाशवाणी हुई-' मूर्ख! तुझे पता नहीं है कि ब्राह्मण क्षत्रियसे भी श्रेष्ठ है । ब्राह्मणकी सहायतासे ही क्षत्रिय इस लोकमें प्रजाकी रक्षा करता है '

श्लोक 13-14पृष्ठ 1470
अर्जुन उवाच

कुर्यां भूतानि तुष्टोऽहं क्रुद्धो नाशं तथानये ।
कर्मणा मनसा वाचा न मत्तोऽस्ति वरो द्विजः ॥

कार्तवीर्य अर्जुनने कहा- मैं प्रसन्न होनेपर प्राणियोंकी सृष्टि कर सकता हूँ और कुपित होनेपर उनका नाश कर सकता हूँ। मन, वाणी और क्रियाद्वारा कोई भी ब्राह्मण मुझसे श्रेष्ठ नहीं है ।

श्लोक 15पृष्ठ 1470
अर्जुन उवाच

पूर्वी ब्रह्मोत्तरो वादो द्वितीयः क्षत्रियोत्तरः ।
त्वयोक्तौ हेतुयुक्तौ तौ विशेषस्तत्र दृश्यते ॥

इस जगत्में ब्राह्मणकी ही प्रधानता है - यह कथन पूर्वपक्ष है, क्षत्रियकी श्रेष्ठता ही उत्तर या सिद्धान्तपक्ष है । आपने ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनोंको प्रजापालनरूपी हेतुसे युक्त बताया है; परंतु उनमें यह अन्तर देखा जाता है ।

श्लोक 16पृष्ठ 1470
अर्जुन उवाच

ब्राह्मणाः संश्रिताः क्षत्रं न क्षत्रं ब्राह्मणाश्रितम् ।
श्रिता ब्रह्मोपधा विप्राः खादन्ति क्षत्रियान् भुवि ॥

ब्राह्मण क्षत्रियोंके आश्रित रहकर जीविका चलाते हैं, किंतु क्षत्रिय कभी ब्राह्मणके आश्रयमें नहीं रहता । वेदोंके अध्ययनाध्यापनके ब्याजसे जीविका चलानेवाले ब्राह्मण इस भूतलपर क्षत्रियोंके ही सहारे भोजन पाते हैं ।

श्लोक 17पृष्ठ 1470

क्षत्रियेष्वाश्रितो धर्मः प्रजानां परिपालनम् ।
क्षत्राद् वृत्तिर्ब्राह्मणानां तैः कथं ब्राह्मणो वरः ॥

प्रजापालनरूपी धर्म क्षत्रियोंपर ही अवलम्बित है । क्षत्रियसे ही ब्राह्मणोंको जीविका प्राप्त होती है । फिर ब्राह्मण क्षत्रियसे श्रेष्ठ कैसे हो सकता है?

श्लोक 18पृष्ठ 1471

सर्वभूतप्रधानांस्तान् भैक्षवृत्तीनहं सदा ।
आत्मसम्भावितान् विप्रान् स्थापयाम्यात्मनो वशे ॥

आजसे मैं सब प्राणियोंसे श्रेष्ठ कहे जानेवाले, सदा भीख माँगकर जीवन निर्वाह करनेवाले और अपनेको सबसे उत्तम माननेवाले ब्राह्मणोंको अपने अधीन रखूँगा ।

श्लोक 19पृष्ठ 1471

कथितं त्वनयासत्यं गायत्र्या कन्यया दिवि ।
विजेष्याम्यवशान् सर्वान् ब्राह्मणांश्चर्मवाससः ॥

न च मां च्यावयेद् राष्ट्रात् त्रिषु लोकेषु कश्चन ।
देवो वा मानुषो वापि तस्माज्ज्येष्ठो द्विजादहम् ॥

आकाशमें स्थित हुई इस गायत्री नामक कन्याने जो ब्राह्मणोंको क्षत्रियोंसे श्रेष्ठ बतलाया है, वह बिलकुल झूठ है । मृगछाला धारण करनेवाले सभी ब्राह्मण प्रायः विवश होते हैं, मैं इन सबको जीत लूँगा । तीनों लोकोंमें कोई भी देवता या मनुष्य ऐसा नहीं है, जो मुझे राज्यसे भ्रष्ट करे । अतः मैं ब्राह्मणसे श्रेष्ठ हूँ ।

श्लोक 20-21पृष्ठ 1471

इस स्तुतिके श्लोक 1–28 में से आरम्भके 14 यहाँ दिये गये हैं। पूरी स्तुति मूल ग्रन्थमें पढ़ें →

भीष्मजी ने उत्तर दिया— भरतनन्दन! इस विषय में विज्ञ पुरुष कार्तवीर्य अर्जुन और वायुदेवता के संवाद रूप इस प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं। पूर्वकाल की बात है— माहिष्मती नगरी में सहस्र-भुजधारी परम कान्तिमान् कार्तवीर्य अर्जुन नाम वाला एक हयवंशी राजा समस्त भूमण्डल का शासन करता था। वह महान् बलवान् और सत्य-पराक्रमी था। इस लोक में सर्वत्र उसी का आधिपत्य था।

एक समय कृतवीर्य कुमार अर्जुन ने क्षत्रिय धर्म को सामने रखते हुए, विनय और शास्त्रज्ञान के अनुसार बहुत दिनों तक मुनिवर दत्तात्रेय की आराधना की तथा किसी कारणवश अपना सारा धन उनकी सेवा में समर्पित कर दिया। उसने प्रार्थना की— "भुजाओं से युक्त रहूँ; किन्तु घर पर मेरी दो ही बाँहें रहें। रणभूमि में सभी सैनिक मेरी एक हजार भुजाएँ देखें। कठोर व्रत का पालन करने वाले गुरुदेव! मैं अपने पराक्रम से सम्पूर्ण पृथ्वी को जीत लूँ। इस प्रकार पृथ्वी को धर्म के अनुसार प्राप्त कर मैं आलस्यरहित होकर उसका पालन करूँ। द्विजश्रेष्ठ! इन तीन वरों के सिवा एक चौथा वर भी मैं आपसे माँगता हूँ। अनिन्द्य महर्षे! मुझ पर कृपा करने के लिये आप वह वर भी अवश्य प्रदान करें। मैं आपका आश्रित भक्त हूँ। यदि कभी मैं सन्मार्ग का परित्याग करके असत्य मार्ग का आश्रय लूँ, तो श्रेष्ठ पुरुष मुझे राह पर लाने के लिये शिक्षा दें।"

उसकी इस प्रकार की प्रार्थना सुनकर दत्तात्रेय जी ने उस नरेश से कहा— "तथास्तु— ऐसा ही हो।" फिर तो उस तेजस्वी राजा के लिये वे सभी वर उसी रूप में सफल हुए। तदनन्तर राजा कार्तवीर्य अर्जुन सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी रथ पर बैठकर, सम्पूर्ण पृथ्वी पर विजय पाने के पश्चात्, धैर्य, वीर्य, यश, शूरता, पराक्रम और ओज के बल से मोहित होकर कहने लगा— "धैर्य, वीर्य, यश, शूरता, पराक्रम और ओज में मेरे समान कौन है?"

उसकी यह बात पूरी होते ही आकाशवाणी हुई— "मूर्ख! तुझे पता नहीं है कि ब्राह्मण क्षत्रिय से भी श्रेष्ठ है। ब्राह्मण की सहायता से ही क्षत्रिय इस लोक में प्रजा की रक्षा करता है।"

कार्तवीर्य अर्जुन ने कहा— "मैं प्रसन्न होने पर प्राणियों की सृष्टि कर सकता हूँ और कुपित होने पर उनका नाश कर सकता हूँ। मन, वाणी और क्रिया द्वारा कोई भी ब्राह्मण मुझसे श्रेष्ठ नहीं है। इस जगत् में ब्राह्मण की ही प्रधानता है— यह कथन पूर्वपक्ष है, क्षत्रिय की श्रेष्ठता ही उत्तर या सिद्धान्त पक्ष है। आपने ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों को प्रजा-पालन रूपी हेतु से युक्त बताया है; परन्तु उनमें यह अन्तर देखा जाता है कि ब्राह्मण क्षत्रियों के आश्रित रहकर जीविका चलाते हैं, किन्तु क्षत्रिय कभी ब्राह्मण के आश्रय में नहीं रहता। वेदों के अध्ययनाध्यापन के ब्याज से जीविका चलाने वाले ब्राह्मण इस भूतल पर क्षत्रियों के ही सहारे भोजन पाते हैं। प्रजापालन रूपी धर्म क्षत्रियों पर ही अवलम्बित है। क्षत्रिय से ही ब्राह्मणों को जीविका प्राप्त होती है। फिर ब्राह्मण क्षत्रिय से श्रेष्ठ कैसे हो सकता है? आज से मैं सब प्राणियों से श्रेष्ठ कहे जाने वाले, सदा भीख माँगकर जीवन निर्वाह करने वाले और अपने को सबसे उत्तम मानने वाले ब्राह्मणों को अपने अधीन रखूँगा। आकाश में स्थित हुई इस गायत्री नामक कन्या ने जो ब्राह्मणों को क्षत्रियों से श्रेष्ठ बतलाया है, वह बिलकुल झूठ है। मृगछाला धारण करने वाले सभी ब्राह्मण प्रायः विवश होते हैं, मैं इन सबको जीत लूँगा। तीनों लोकों में कोई भी देवता या मनुष्य ऐसा नहीं है, जो मुझे राज्य से भ्रष्ट करे। अतः मैं ब्राह्मण से श्रेष्ठ हूँ। सङ्ग्राम में कोई भी मेरे बल को नहीं सह सकता।"

अर्जुन की यह बात सुनकर निशाचरी भी भयभीत हो गयी। तदनन्तर अन्तरिक्ष में स्थित हुए वायु देवता ने कहा— "कार्तवीर्य! तुम इस कलुषित भाव को त्याग दो और ब्राह्मणों को नमस्कार करो। यदि इनकी बुराई करोगे तो तुम्हारे राज्य में हलचल मच जाएगी। अथवा महीपाल! महान् शक्तिशाली ब्राह्मण तुम्हें शान्त कर देंगे। यदि तुमने उनके उत्साह में बाधा डाली तो वे तुम्हें राज्य से बाहर निकाल देंगे।"

यह बात सुनकर कार्तवीर्य ने पूछा— "महानुभाव! आप कौन हैं?" तब वायु देवता ने उससे कहा— "राजन्! मैं देवताओं का दूत वायु हूँ और तुम्हें हित की बात बता रहा हूँ।"

कार्तवीर्य अर्जुन ने कहा— "वायुदेव! ऐसी बात कहकर आपने ब्राह्मणों के प्रति भक्ति और अनुराग का परिचय दिया है। अच्छा, आपकी जानकारी में यदि पृथ्वी के समान क्षमाशील ब्राह्मण हों, तो ऐसे द्विज को मुझे बताइये। अथवा यदि कोई जल, अग्नि, सूर्य, वायु एवं आकाश के समान श्रेष्ठ ब्राह्मण हो, तो उसको भी बताइये।"

In English

The Pride of Kartavirya Arjuna

King Kartavirya Arjuna performs penance to receive boons from Dattatreya. After gaining great power and conquering the earth, the king grows arrogant and disputes the superiority of Brahmins over Kshatriyas. Vayu warns him about his pride, but the king remains defiant.

This page answers

  • What boons did kartavirya arjuna ask from dattatreya?
  • Why did a voice from the sky call kartavirya arjuna a fool?
  • How did vayu warn kartavirya arjuna about the brahmins?
  • What was the argument between the king and the voice regarding kshatriyas and brahmins?

Also written: Brahmanamahatmya, Brahmana, Yudhishthira, Bhishma, Dattatreya, Vayu, Nishachari, ब्राह्मणमाहात्म्य