श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1461–1470

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1461–1470

पृष्ठ 1461

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उस घरके निवासी, जो परब्रह्मस्वरूप गायत्री - मन्त्रके गुणोंका कीर्तन सुनते हैं, उन्हें कभी दुःख नहीं होता है तथा वे परमगतिको प्राप्त होते हैं ॥ ७२ ॥

गवां मध्ये तु त पठतो गावोऽस्य 'बहुवत्सलाः ।

प्रस्थाने वा प्रवासे वा सर्वावस्थां गतः पठेत् ॥ ७३ ॥

गौओंके बीचमें गायत्रीका जप करनेवाले पुरुषपर गौओंका वात्सल बहुत बढ़ जाता है । प्रस्थान- कालमें अथवा परदेशमें सभी अवस्थाओंमें मनुष्यको इसका जप करना चाहिये ॥ ७३ ॥

जपतां जुह्वतां चैव नित्यं च प्रयतात्मनाम् ।

ऋषीणां परमं जप्यं गुह्यमेतन्नराधिप ॥ ७४ ॥

नरेश्वर! सदा शुद्धचित्त होकर जप करे, होम करनेवाले ऋषियोंके लिये यह परम गोपनीय मन्त्र है ॥ ७४ ॥

याधातथ्येन सिद्धस्य इतिहासं पुरातनम् ।

पराशरमतं दिव्यं शकाय कथितं पुरा ॥ ७५ ॥

यह सिद्धिको प्राप्त हुए महर्षि वेदव्यासका कहा हुआ यथार्थ एवं प्राचीन इतिहास है । इसमें पराशर मुनिके दिव्य मतका वर्णन है । पूर्वकालमें इन्द्रको इसका उपदेश किया गया था ॥ ७५ ॥

तदेतत् ते समाख्यातं तथ्यं ब्रह्म सनातनम् ।

हृदयं सर्वभूतानां श्रुतिरेषा सनातनी ॥ ७६ ॥

वही यह मन्त्र तुमसे कहा गया है । यह गायत्री मन्त्र सत्य एवं सनातन ब्रह्मरूप है । यह सम्पूर्ण भूतोंका हृदय एवं सनातन श्रुति है ॥ ७६ ॥

सोमादित्यान्वयाः सर्वे राघवाः कुरवस्तथा ।

पठन्ति शुचयो नित्यं सावित्रीं प्राणिनां गतिम् ॥ ७७ ॥

चन्द्र, सूर्य, रघु और कुरुके वंशमें उत्पन्न हुए सभी राजा पवित्र भावसे प्रतिदिन गायत्री-मन्त्रका जप करते आये हैं । गायत्री संसारके प्राणियोंकी परमगति है ॥ ७७ ॥

अभ्यासे नित्यं देवानां सप्तर्षीणां ध्रुवस्य च ।

मोक्षणं सर्वकृच्छ्राणां मोचयत्यशुभात् सदा ॥ ७८ ॥

प्रतिदिन देवताओं, सप्तर्षियों और ध्रुवका बारंबार स्मरण करनेसे समस्त संकटोंसे छुटकारा मिल जाता है । उनका कीर्तन सदा ही अशुभ अर्थात् पापके बन्धनसे मुक्त कर देता है ॥ ७८ ॥

वृद्धैः काश्यपगौतमप्रभृतिभिर्भृग्वङ्गिरोऽत्र्यादिभिः शुक्रागस्त्यबृहस्पतिप्रभृतिभिर्ब्रह्मर्षिभिः सेवितम् । भारद्वाजमतमृचीकतनयैः प्राप्तं वसिष्ठात् पुनः सावित्रीमधिगम्य शक्रवसुभिः कृत्स्ना जिता दानवाः ॥ ७ ९ ॥

पृष्ठ 1462

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काश्यप, गौतम, भृगु, अंगिरा, अत्रि, शुक्र, अगस्त्य और बृहस्पति आदि वृद्ध ब्रह्मर्षियोंने सदा ही गायत्री मन्त्रका सेवन किया है । महर्षि भारद्वाजने जिसका भलीभाँति मनन किया है, उस गायत्री मन्त्रको ऋचीकके पुत्रोंने उन्हींसे प्राप्त किया तथा इन्द्र और वसुओंने वसिष्ठजीसे सावित्री - मन्त्रको पाकर उसके प्रभावसे सम्पूर्ण दानवोंको परास्त कर दिया ॥ ७ ९ ॥ यो गोशतं कनकशृङ्गमयं ददाति विप्राय वेदविदुषे च बहुश्रुताय । दिव्यां च भारतकथां कथयेच्च नित्यं तुल्यं फलं भवति तस्य च तस्य चैव ॥ ८० ॥

जो मनुष्य विद्वान् और बहुश्रुत ब्राह्मणको सौ गौओंके सींगोंमें सोना मढ़ाकर दान करता है और जो केवल दिव्य महाभारत कथाका प्रतिदिन प्रवचन करता है, उन दोनोंको एक- सा पुण्य फल प्राप्त होता है ॥ ८० ॥

धर्मो विवर्धति भृगोः परिकीर्तनेन वीर्यं विवर्धति वसिष्ठनमोनतेन । संग्रामजिद् भवति चैव रघुं नमस्यन् स्यादश्विनौ च परिकीर्तयतो न रोगः ॥ ८१ ॥

भृगुका नाम लेनेसे धर्मकी वृद्धि होती है । वसिष्ठ मुनिको नमस्कार करनेसे वीर्य बढ़ता है । राजा रघुको प्रणाम करनेवाला क्षत्रिय संग्रामविजयी होता है तथा अश्विनीकुमारोंका नाम लेनेवाले मनुष्यको कभी रोग नहीं सताता ॥ ८१ ॥

एषा ते कथिता राजन् सावित्री ब्रह्म शाश्वती ।

विवक्षुरसि यच्चान्यत् तत् ते वक्ष्यामि भारत ॥ ८२ ॥

राजन्! यह सनातन ब्रह्मरूपा गायत्रीका माहात्म्य मैंने तुमसे कहा है । भारत! अब और जो कुछ भी तुम पूछना चाहते हो, वह भी तुम्हें बताऊँगा ॥ ८२ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सावित्रीव्रतोपाख्याने पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें सावित्रीमन्त्रकी महिमाविषयक एक सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५० ॥

पृष्ठ 1463

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एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ब्राह्मणोंकी महिमाका वर्णन युधिष्ठिर उवाच

के पूज्याः के नमस्कार्याः कथं वर्तेत केषु च ।

किमाचारः कीदृशेषु पितामह न रिष्यते ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! संसारमें कौन मनुष्य पूज्य हैं? किनको नमस्कार करना चाहिये? किनके साथ कैसा बर्ताव करना उचित है तथा कैसे लोगोंके साथ किस प्रकारका आचरण किया जाय तो वह हानिकर नहीं होता? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

ब्राह्मणानां परिभव सादयेदपि देवताः ।

ब्राह्मणांस्तु नमस्कृत्य युधिष्ठिर न रिष्यते ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा - युधिष्ठिर! ब्राह्मणोंका अपमान देवताओंको भी दुःखमें डाल सकता है । परंतु यदि ब्राह्मणोंको नमस्कार करके उनके साथ विनयपूर्ण बर्ताव किया जाय तो कभी कोई हानि नहीं होती ॥ २ ॥

ते पूज्यास्ते नमस्कार्या वर्तेथास्तेषु पुत्रवत् ।

ते हि लोकानिमान् सर्वान् धारयन्ति मनीषिणः ॥ ३ ॥

अतः ब्राह्मणोंकी पूजा करे । ब्राह्मणोंको नमस्कार करे । उनके प्रति वैसा ही बर्ताव करे, जैसा सुयोग्य पुत्र अपने पिताके प्रति करता है; क्योंकि मनीषी ब्राह्मण इन सब लोकोंको धारण करते हैं ॥ ३ ॥

ब्राह्मणाः सर्वलोकानां महान्तो धर्मसेतवः ।

धनत्यागाभिरामाश्च वाक्संयमरताश्च ये ॥ ४ ॥

ब्राह्मण समस्त जगत्की धर्ममर्यादाका संरक्षण करनेवाले सेतुके समान हैं । वे धनका त्याग करके प्रसन्न होते हैं और वाणीका संयम रखते हैं ॥ ४ ॥

रमणीयाश्च भूतानां निधानं च धृतव्रताः ।

प्रणेतारश्च लोकानां शास्त्राणां च यशस्विनः ॥ ५ ॥

वे समस्त भूतोंके लिये रमणीय, उत्तम निधि, दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले, लोकनायक, शास्त्रोंके निर्माता और परम यशस्वी हैं ॥ ५ ॥

तपो येषां धनं नित्यं वाक् चैव विपुलं बलम् ।

प्रभवश्चैव धर्माणां धर्मज्ञाः सूक्ष्मदर्शिनः ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1464

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सदा तपस्या उनका धन और वाणी उनका महान् बल है । वे धर्मोकी उत्पत्तिके कारण, धर्मके ज्ञाता और सूक्ष्मदर्शी हैं ॥ ६ ॥

धर्मकामाः स्थिता धर्मे सुकृतैर्धर्मसेतवः ।

यान् समाश्रित्य जीवन्ति प्रजाः सर्वाश्चतुर्विधाः ॥ ७ ॥

वे धर्मकी ही इच्छा रखनेवाले, पुण्यकर्मोंद्वारा धर्ममें ही स्थित रहनेवाले और धर्मके सेतु हैं । उन्हींका आश्रय लेकर चारों प्रकारकी सारी प्रजा जीवन धारण करती है ॥ ७ ॥

पन्थानः सर्वनेतारो यज्ञवाहाः सनातनाः ।

पितृपैतामहीं गुर्वीमुद्वहन्ति धुरं सदा ॥ ८ ॥

ब्राह्मण ही सबके पथप्रदर्शक, नेता और सनातन यज्ञ - निर्वाहक हैं । वे बाप -दादोंकी चलायी हुई भारी धर्म - मर्यादाका भार सदा वहन करते हैं ॥ ८ ॥

धुरि ये नावसीदन्ति विषये सद्गवा इव ।

पितृदेवातिथिमुखा हव्यकव्याग्रभोजिनः ॥ ९ ॥

जैसे अच्छे बैल बोझ ढोनेमें शिथिलता नहीं दिखाते, उसी प्रकार वे धर्मका भार वहन करनेमें कष्टका अनुभव नहीं करते हैं । वे ही देवता, पितर और अतिथियोंके मुख तथा हव्य-कव्यमें प्रथम भोजनके अधिकारी हैं ॥ ९ ॥

भोजनादेव लोकांस्त्रींस्त्रायन्ते महतो भयात् ।

दीपः सर्वस्य लोकस्य चक्षुश्चक्षुष्मतामपि ॥ १० ॥

ब्राह्मण भोजनमात्र करके तीनों लोकोंकी महान् भयसे रक्षा करते हैं । वे सम्पूर्ण जगत्के लिये दीपकी भाँति प्रकाशक तथा नेत्रवालोंके भी नेत्र हैं ॥ १० ॥

सर्वशिक्षा श्रुतिधना निपुणा मोक्षदर्शिनः ।

गतिज्ञाः सर्वभूतानामध्यात्मगतिचिन्तकाः ॥ ११ ॥

ब्राह्मण सबको सीख देनेवाले हैं । वेद ही उनका धन है । वे शास्त्रज्ञानमें कुशल, मोक्षदर्शी, समस्त भूतोंकी गतिके ज्ञाता और अध्यात्म- तत्त्वका चिन्तन करनेवाले हैं ॥ ११ ॥

आदिमध्यावसानानां ज्ञातारश्छिन्नसंशयाः ।

परावरविशेषज्ञा गन्तारः परमां गतिम् ॥ १२ ॥

ब्राह्मण आदि, मध्य और अन्तके ज्ञाता, संशयरहित, भूत- भविष्यका विशेष ज्ञान रखनेवाले तथा परम गतिको जानने और पानेवाले हैं ॥ १२ ॥

विमुक्ता धूतपाप्मानो निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः ।

मानार्हा मानिता नित्यं ज्ञानविद्भिर्महात्मभिः ॥ १३ ॥

श्रेष्ठ ब्राह्मण सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त और निष्पाप हैं । उनके चित्तपर द्वन्द्वोंका प्रभाव नहीं पड़ता । वे सब प्रकारके परिग्रहका त्याग करनेवाले और सम्मान पानेके योग्य हैं । ज्ञानी महात्मा उन्हें सदा ही आदर देते हैं ॥ १३ ॥

पृष्ठ 1465

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चन्दने मलपङ्के च भोजनेऽभोजने समाः ।

समं येषां दुकूलं च तथा क्षौमाजिनानि च ॥ १४ ॥

वे चन्दन और मलकी कीचड़में, भोजन और उपवासमें समान दृष्टि रखते हैं । उनके लिये साधारण वस्त्र, रेशमी वस्त्र और मृगछाला समान हैं ॥ १४ ॥

तिष्ठेयुरप्यभुञ्जाना बहूनि दिवसान्यपि ।

शोषयेयुश्च गात्राणि स्वाध्यायैः संयतेन्द्रियाः ॥ १५ ॥

वे बहुत दिनोंतक बिना खाये रह सकते हैं और अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखकर स्वाध्याय करते हुए शरीरको सुखा'सकते हैं ॥ १५ ॥

अदैवं दैवतं कुर्युर्दैवतं चाप्यदैवतम् ।

लोकानन्यान् सृजेयुस्ते लोकपालांश्च कोपिताः ॥ १६ ॥

ब्राह्मण अपने तपोबलसे जो देवता नहीं है, उसे भी देवता बना सकते हैं । यदि वे क्रोधमें भर जायँ तो देवताओंको भी देवत्वसे भ्रष्ट कर सकते हैं । दूसरे दूसरे लोक और लोकपालोंकी रचना कर सकते हैं ॥ १६ ॥

अपेयः सागरो येषामपि शापान्महात्मनाम् ।

येषां कोपाग्निरद्यापि दण्डके नोपशाम्यति ॥ १७ ॥

उन्हीं महात्माओंके शापसे समुद्रका पानी पीनेयोग्य नहीं रहा । उनकी क्रोधाग्नि दण्डकारण्यमें आजतक शान्त नहीं हुई ॥ १७ ॥

देवानामपि ये देवाः कारणं कारणस्य च ।

प्रमाणस्य प्रमाणं च कस्तानभिभवेद् बुधः ॥ १८ ॥

वे देवताओंके भी देवता, कारणके भी कारण और प्रमाणके भी प्रमाण हैं । भला कौन मनुष्य बुद्धिमान् होकर भी ब्राह्मणोंका अपमान करेगा ॥ १८ ॥

येषां वृद्धश्च बालश्च सर्वः सम्मानमर्हति ।

तपोविद्याविशेषात्तु मानयन्ति परस्परम् ॥ १ ९ ॥

ब्राह्मणोंमें कोई बूढ़े हों या बालक सभी सम्मानके योग्य हैं । ब्राह्मणलोग आपसमें तप और विद्याकी अधिकता देखकर एक- दूसरेका सम्मान करते हैं ॥ १ ९ ॥

अविद्वान् ब्राह्मणो देवः पात्रं वै पावनं महत् ।

विद्वान् भूयस्तरो देवः पूर्णसागरसंनिभः ॥ २० ॥

विद्याहीन ब्राह्मण भी देवताके समान और परम पवित्र पात्र माना गया है । फिर जो विद्वान् है उसके लिये तो कहना ही क्या है । वह महान् देवताके समान है और भरे हुए महासागरके समान सद्गुण- सम्पन्न है ॥ २० ॥

अविद्वांश्चैव विद्वांश्च ब्राह्मणो दैवतं महत् ।

प्रणीतश्चाप्रणीतश्च यथाग्निर्देवतं महत् ॥ २१ ॥

पृष्ठ 1466

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ब्राह्मण विद्वान् हो या अविद्वान् इस भूतलका महान् देवता है । जैसे अग्नि पञ्चभू- संस्कारपूर्वक स्थापित हो या न हो, वह महान् देवता ही है ॥ २१ ॥

श्मशाने ह्यपि तेजस्वी पावको नैव दुष्यति ।

हविर्यज्ञे च विधिवद् गृह एवातिशोभते ॥ २२ ॥

तेजस्वी अग्निदेव श्मशानमें हों तो भी दूषित नहीं होते । विधिवत् हविष्यसे सम्पादित होनेवाले यज्ञमें तथा घरमें भी उनकी अधिकाधिक शोभा होती है ॥ २२ ॥

एवं यद्यप्यनिष्टेषु वर्तते सर्वकर्मसु ।

सर्वथा ब्राह्मणो मान्यो दैवतं विद्धि तत्परम् ॥ २३ ॥

इस प्रकार यद्यपि ब्राह्मण सब प्रकारके अनिष्ट कर्मोंमें लगा हो तो भी वह सर्वथा माननीय है । उसे परम देवता समझो ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि ब्राह्मणप्रशंसायामेकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें ब्राह्मणकीप्रशंसाविषयक एक सौ इक्यावनवाँ अध्यायFara पूरा हुआFatal ॥ १५१ ॥

पृष्ठ 1467

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द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः कार्तवीर्य अर्जुनको दत्तात्रेयजीसे चार वरदान प्राप्त होनेका एवं उनमें अभिमानकी उत्पत्तिका वर्णन तथा ब्राह्मणोंकी महिमाके विषयमें कार्तवीर्य अर्जुन और वायुदेवताके संवादका उल्लेख युधिष्ठिर उवाच

कां तु ब्राह्मणपूजायां व्युष्टिं दृष्ट्वा जनाधिप ।

कं वा कर्मोदयं मत्वा तानर्चसि महामते ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने कहा – जनेश्वर! आप कौन- सा फल देखकर ब्राह्मणपूजामें लगे रहते हैं? महामते! अथवा किस कर्मका उदय सोचकर आप उन ब्राह्मणोंकी पूजा - अर्चा करते हैं? ॥ १ ॥

भीष्मउवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

पवनस्य च संवादमर्जुनस्य च भारत ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा - भरतनन्दन! इस विषयमें विज्ञपुरुष कार्तवीर्य अर्जुन और वायुदेवताके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥

सहस्रभुजभृच्छ्रीमान् कार्तवीर्योऽभवत् प्रभुः अस्य लोकस्य सर्वस्य माहिष्मत्यां महाबलः ॥ ३ ॥

स तु रत्नाकरवतीं सद्वीपां सागराम्बराम् ।

शशास पृथिवीं सर्वां हैहयः सत्यविक्रमः ॥ ४ ॥

पूर्वकालकी बात है— माहिष्मती नगरीमें सहस्र- भुजधारी परम कान्तिमान् कार्तवीर्य अर्जुन नामवाला एक हैहयवंशी राजा समस्त भूमण्डलका शासन करता था । वह महान्

बलवान् और सत्यपराक्रमी था । इस लोकमें सर्वत्र उसीका आधिपत्य था ॥ ३-४ ॥

स्ववित्तं तेन दत्तं तु दत्तात्रेयाय कारणे ।

क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य विनयं श्रुतमेव च ॥ ५ ॥

आराधयामास च तं कृतवीर्यात्मजो मुनिम् । एक समय कृतवीर्यकुमार अर्जुनने क्षत्रिय धर्मको सामने रखते हुए विनय और शास्त्रज्ञानके अनुसार बहुत दिनोंतक मुनिवर दत्तात्रेयकी आराधना की तथा किसी कारणवश अपना सारा धन उनकी सेवामें समर्पित कर दिया ॥ ५३ ॥

पृष्ठ 1468

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न्यमन्त्रयत संतुष्टो द्विजश्चैनं वरैस्त्रिभिः ॥ ६ ॥

स वरैश्छन्दितस्तेन नृपो वचनमब्रवीत् ।

सहस्रबाहुर्भूयां वै चमूमध्ये गृहेऽन्यथा ॥ ७ ॥

मम बाहुसहस्रं तु पश्यतां सैनिका रणे ।

विक्रमेण महीं कृत्स्नां जयेयं संशितव्रत ॥ ८ ॥

तां च धर्मेण सम्प्राप्य पालयेयमतन्द्रितः ।

चतुर्थं तु वरं याचे त्वामहं द्विजसत्तम ॥ ९ ॥

तं ममानुग्रहकृते दातुमर्हस्यनिन्दित ।

अनुशासन्तु मां सन्तो मिथ्योद्वृत्तं त्वदाश्रयम् ॥ १० ॥

विप्रवर दत्तात्रेय उसके ऊपर बहुत संतुष्ट हुए और उन्होंने उसे तीन वर माँगनेकी आज्ञा दी । उनके द्वारा वर माँगनेकी आज्ञा मिलनेपर राजाने कहा-' भगवन्! मैं युद्धमें तो हजार भुजाओंसे युक्त रहूँ; किन्तु घरपर मेरी दो ही बाँहें रहें । रणभूमिमें सभी सैनिक मेरी एक हजार भुजाएँ देखें । कठोर व्रतका पालन करनेवाले गुरुदेव! मैं अपने पराक्रमसे सम्पूर्ण पृथ्वीको जीत लूँ। इस प्रकार पृथ्वीको धर्मके अनुसार प्राप्तकर मैं आलस्यरहित हो उसका पालन करूँ। द्विजश्रेष्ठ! इन तीन वरोंके सिवा एक चौथा वर भी मैं आपसे माँगता हूँ । अनिन्द्य महर्षे! मुझपर कृपा करनेके लिये आप वह वर भी अवश्य प्रदान करें । मैं आपका आश्रित भक्त हूँ । यदि कभी मैं सन्मार्गका परित्याग करके असत्य मार्गका आश्रय लूँ तो श्रेष्ठ पुरुष मुझे राहपर लानेके लिये शिक्षा दें ' ॥ ६–१० ॥

पृष्ठ 1469

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भगवान् दत्तात्रेयकी कार्तवीर्यपर कृपा

पृष्ठ 1470

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इत्युक्तः स द्विजः प्राह तथास्त्विति नराधिपम् ।

एवं समभवंस्तस्य वरास्ते दीप्ततेजसः ॥ ११ ॥

- उसके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर दत्तात्रेयजीने उस नरेशसे कहा - ' तथास्तु — ऐसा ही हो । ' फिर तो उस तेजस्वी राजाके लिये वे सभी वर उसी रूपमें सफल हुए ॥ ११ ॥

ततः स रथमास्थाय ज्वलनार्कसमद्युतिम् ।

अब्रवीद् वीर्यसम्मोहात् को वास्ति सदृशो मम ॥ १२ ॥

धैर्यैर्वीर्यैर्यशः शौर्यैर्विक्रमेणौजसापि वा । तदनन्तर राजा कार्तवीर्य अर्जुन सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी रथपर बैठकर ( सम्पूर्ण पृथ्वीपर विजय पानेके पश्चात्) बलके अभिमानसे मोहित हो कहने लगा— ' धैर्य, वीर्य, यश, शूरता, पराक्रम और ओजमें मेरे समान कौन है? ' ॥ १२३ ॥

तद्वाक्यान्ते चान्तरिक्षे वागुवाचाशरीरिणी ॥ १३ ॥

न त्वं मूढ विजानीषे ब्राह्मणं क्षत्रियाद् वरम् ।

सहितो ब्राह्मणेनेह क्षत्रियः शास्ति वै प्रजाः ॥ १४ ॥

उसकी यह बात पूरी होते ही आकाशवाणी हुई-' मूर्ख! तुझे पता नहीं है कि ब्राह्मण क्षत्रियसे भी श्रेष्ठ है । ब्राह्मणकी सहायतासे ही क्षत्रिय इस लोकमें प्रजाकी रक्षा करता है ' ॥ १३-१४ ॥ अर्जुनउवाच

कुर्यां भूतानि तुष्टोऽहं क्रुद्धो नाशं तथानये ।

कर्मणा मनसा वाचा न मत्तोऽस्ति वरो द्विजः ॥ १५ ॥

कार्तवीर्य अर्जुनने कहा- मैं प्रसन्न होनेपर प्राणियोंकी सृष्टि कर सकता हूँ और कुपित होनेपर उनका नाश कर सकता हूँ। मन, वाणी और क्रियाद्वारा कोई भी ब्राह्मण मुझसे श्रेष्ठ नहीं है ॥ १५ ॥

पूर्वी ब्रह्मोत्तरो वादो द्वितीयः क्षत्रियोत्तरः ।

त्वयोक्तौ हेतुयुक्तौ तौ विशेषस्तत्र दृश्यते ॥ १६ ॥

इस जगत्में ब्राह्मणकी ही प्रधानता है - यह कथन पूर्वपक्ष है, क्षत्रियकी श्रेष्ठता ही उत्तर या सिद्धान्तपक्ष है । आपने ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनोंको प्रजापालनरूपी हेतुसे युक्त बताया है; परंतु उनमें यह अन्तर देखा जाता है ॥ १६ ॥

ब्राह्मणाः संश्रिताः क्षत्रं न क्षत्रं ब्राह्मणाश्रितम् ।

श्रिता ब्रह्मोपधा विप्राः खादन्ति क्षत्रियान् भुवि ॥ १७ ॥

ब्राह्मण क्षत्रियोंके आश्रित रहकर जीविका चलाते हैं, किंतु क्षत्रिय कभी ब्राह्मणके आश्रयमें नहीं रहता । वेदोंके अध्ययनाध्यापनके ब्याजसे जीविका चलानेवाले ब्राह्मण इस भूतलपर क्षत्रियोंके ही सहारे भोजन पाते हैं ॥ १७ ॥