कर्मफलिकोपाख्यान : मनुष्य के पूर्व कर्मों का फल उसे कैसे प्राप्त होता है?
कर्मफल और तृष्णा का शाश्वत नियम
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ६ · अनुशासनपर्व → दानधर्मपर्व · अध्याय 7 · पृष्ठ 90–95
940 शब्द · 5 मिनटका पाठ · 8 श्लोक
वैशम्पायन ने जनमेजय से कहा
पाप के विनाश हेतु धर्म की व्याख्या
युधिष्ठिर ने पूछा— "महापुरुषों में प्रधान भरतश्रेष्ठ! अब मैं समस्त शुभ कर्मों के फल क्या हैं? यह पूछ रहा हूँ, अतः यही बताइये।"
कर्मणां च समस्तानां शुभानां भरतर्षभ ।
फलानि महतां श्रेष्ठ प्रब्रूहि परिपृच्छतः ॥
युधिष्ठिरने पूछा — महापुरुषोंमें प्रधान भरतश्रेष्ठ! अब मैं समस्त शुभ कर्मोंके फल क्या हैं? यह पूछ रहा हूँ, अतः यही बताइये ।
भीष्मजी ने कहा— "भरतनन्दन युधिष्ठिर! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, यह ऋषियों के लिये भी रहस्य का विषय है; किन्तु मैं तुम्हें बतला रहा हूँ। सुनो, मरने के बाद जिस मनुष्य को जैसी चिर अभिलषित गति मिलती है, उसका भी वर्णन करता हूँ। मनुष्य जिस-जिस स्थूल या सूक्ष्म शरीर से जो-जो कर्म करता है, उसी-इसी शरीर से उस-उस कर्म का फल भोगता है। जिस-जिस अवस्थामें वह जो-जो शुभ या अशुभ कर्म करता है, प्रत्येक जन्म की उसी-इसी अवस्थामें वह उसका फल भोगता है। पाँचों इन्द्रियों द्वारा किया हुआ कर्म कभी नष्ट नहीं होता है; वे पाँचों इन्द्रियाँ और छठा मन—ये उस कर्म के साक्षी होते हैं।"
न नश्यति कृतं कर्म सदा पञ्चेन्द्रियैरिह ।
ते ह्यस्य साक्षिणो नित्यं षष्ठ आत्मा तथैव च ॥
पाँचों इन्द्रियोंद्वारा किया हुआ कर्म कभी नष्ट नहीं होता है । वे पाँचों इन्द्रियाँ और छठा मन — ये उस कर्मके साक्षी होते हैं ।
"अतः मनुष्य को उचित है कि यदि कोई अतिथि घर पर आ जाय तो उसको प्रसन्न दृष्टि से देखे। उसकी सेवा में मन लगावे। मीठी बोली बोलकर उसे सन्तुष्ट करे। जब वह जाने लगे तो उसके पीछे-पीछे कुछ दूर तक जाय और जब तक वह रहे उसके स्वागत-सत्कार में लगा रहे—ये पाँच काम करना गृहस्थ के लिये पाँच प्रकार की दक्षिणाओं से युक्त यज्ञ कहलाता है। जो वानप्रस्थी वेदी पर शयन करते हैं, उन्हें जन्मान्तर में उत्तम गृह और शय्या की प्राप्ति होती है। जो चीर और वल्कल वस्त्र पहनते हैं, उन्हें दूसरे जन्म में उत्तम वस्त्र और उत्तम आभूषणों की प्राप्ति होती है। जिसका चित्त योगयुक्त होता है, उस तपोधन पुरुष को दूसरे जन्म में अच्छे-अच्छे वाहन और यान उपलब्ध होते हैं तथा अग्निकी उपासना करने वाले राजा को जन्मान्तर में पौरुष की प्राप्ति होती है। रसों का परित्याग करने से सौभाग्य की और मांस का त्याग करने से पशुओं तथा पुत्रों की प्राप्ति होती है। जो तपस्वी नीचे सिर करके लटकता है अथवा जल में निवास करता है; तथा जो सदा ही अकेला सोता है, वह मनोवाञ्छित गतिको प्राप्त करता है।"
हन्त ते कथयिष्यामि यन्मां पृच्छसि भारत ।
रहस्यं यदृषीणां तु तच्छ्रणुष्व युधिष्ठिर ।
या गतिः प्राप्यते येन प्रेत्यभावे चिरेप्सिता ॥
भीष्मजीने कहा— भरतनन्दन युधिष्ठिर! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, यह ऋषियोंके लिये भी रहस्यका विषय है; किंतु मैं तुम्हें बतला रहा हूँ । सुनो, मरनेके बाद जिस मनुष्यको जैसी चिर अभिलषित गति मिलती है, उसका भी वर्णन करता हूँ ।
"जो अतिथि को पैर धोने के लिये जल, बैठने के लिये आसन, प्रकाश के लिये दीपक, खाने के लिये अन्न और ठहरने के लिये घर देता है, इस प्रकार अतिथिका सत्कार करने के लिये इन पाँच वस्तुओं का दान 'पञ्चदक्षिण यज्ञ' कहलाता है। जो वीरासन रणभूमि में जाकर वीरशय्या यानी मृत्यु को प्राप्त हो, वह वीरस्थान यानी स्वर्गलोक में जाता है; उसे अक्षय लोकों की प्राप्ति होती है जो सम्पूर्ण कामनाओं की प्राप्ति कराने वाले होते हैं। प्रजानाथ! मनुष्य दान से धन पाता है, मौन व्रत के पालन से दूसरों द्वारा आज्ञापालन कराने की शक्ति प्राप्त करता है, तपस्या से भोग और ब्रह्मचर्य पालन से जीवन की उपलब्धि होती है। अहिंसा धर्म के आचरण से रूप, ऐश्वर्य और आरोग्य रूपी फल की प्राप्ति होती है। फल-मूल खाने वाले को राज्य और पत्ते चबाकर रहने वाले को स्वर्ग की प्राप्ति होती है।"
रूपमैश्वर्यमारोग्यमहिंसाफलमश्नुते ।
फलमूलाशिनो राज्यं स्वर्गः पर्णाशिनां भवेत् ॥
अहिंसा धर्मके आचरणसे रूप, ऐश्वर्य और आरोग्यरूपी फलकी प्राप्ति होती है । फल-मूल खानेवालेको राज्य और पत्ते चबाकर रहनेवालेको स्वर्गकी प्राप्ति होती है ।
"राजन्! जो आमरण अनशन का व्रत लेकर बैठता है, उसके लिये सर्वत्र सुख बताया गया है। शाकाहार की दीक्षा लेने पर गोधन की प्राप्ति होती है और तृण खाकर रहने वाला पुरुष स्वर्गलोक में जाता है। स्त्री सम्बन्धी भोगों का परित्याग करके त्रिकाल स्नान करते हुए वायु पीकर रहने से यज्ञ का फल प्राप्त होता है। सत्य से मनुष्य स्वर्ग को और दीक्षा से उत्तम कुल को पाता है। जो ब्राह्मण सदा जल पीकर रहता है, अग्निहोत्र करता है और मन्त्र-साधना में संलग्न रहता है, उसे राज्य मिलता है और निराहार व्रत करने से मनुष्य स्वर्गलोक में जाता है। पृथ्वीनाथ! जो पुरुष बारह वर्षों तक के लिये व्रत की दीक्षा लेकर अन्न का त्याग करता और तीर्थों में स्नान करता रहता है, उसे रणभूमि में प्राण त्यागने वाले वीर से भी बढ़कर उत्तम लोक की प्राप्ति होती है। जो सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन कर लेता है, वह तत्काल दुःख से मुक्त हो जाता है तथा जो मन से धर्म का आचरण करता है, उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है।"
स्थण्डिलेषु शयानानां गृहाणि शयनानि च ।
चीरवल्कलसंवीते वासांस्याभरणानि च ॥
जो वानप्रस्थी वेदीपर शयन करते हैं उन्हें जन्मान्तरमें उत्तम गृह और शय्याकी प्राप्ति होती है । जो चीर और वल्कल वस्त्र पहनते हैं उन्हें दूसरे जन्ममें उत्तम वस्त्र और उत्तम आभूषणोंकी प्राप्ति होती है ।
"खोटी बुद्धि वाले पुरुषों के लिये जिसका त्याग करना कठिन है, जो मनुष्य के जीर्ण हो जाने पर भी स्वयं जीर्ण नहीं होती तथा जो प्राणनाशक रोग के समान सदा कष्ट देती रहती है, उस तृष्णा का त्याग कर देने वाले पुरुष को ही सुख मिलता है। जैसे बछड़ा हजारों गौओं के बीच में अपनी माता को ढूँढ लेता है, उसी प्रकार पहले का किया हुआ कर्म भी कर्ता को पहचानकर उसका अनुसरण करता है। जैसे फूल और फल किसी की प्रेरणा न होने पर भी अपने समय का उल्लङ्घन नहीं करते—ठीक समय पर फूलने-फलने लग जाते हैं, वैसे ही पहले का किया हुआ कर्म भी समय पर फल देता ही है। मनुष्य के जीर्ण होने पर उसके केश झड़ जाते हैं, वृद्ध पुरुष के दाँत टूट जाते हैं, नेत्र और कान भी जीर्ण होकर अन्धे-बहरे हो जाते हैं; केवल तृष्णा ही जीर्ण नहीं होती है, वह सदा नयी नवेली बनी रहती है।"
जीर्यन्ति जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः ।
चक्षुःश्रोत्रे च जीर्येते तृष्णैका न तु जीर्यते ॥
मनुष्यके जीर्ण ( जराग्रस्त) होनेपर उसके केश जीर्ण होकर झड़ जाते हैं, वृद्ध पुरुषके दाँत भी टूट जाते हैं, नेत्र और कान भी जीर्ण होकर अन्धे - बहरे हो जाते हैं । केवल तृष्णा ही जीर्ण नहीं होती है ( वह सदा नयी नवेली बनी रहती है )
"मनुष्य जिस व्यवहार से पिता को प्रसन्न करता है, उससे भगवान प्रजापति प्रसन्न होते हैं। जिस बर्ताव से वह माता को सन्तुष्ट करता है, उससे पृथ्वी देवी की भी पूजा हो जाती है तथा जिससे वह उपाध्याय को तृप्त करता है, उसके द्वारा परब्रह्म परमात्मा की पूजा सम्पन्न हो जाती है। जिसने इन तीनों का आदर किया, उसके द्वारा सभी धर्मों का आदर हो गया और जिसने इन तीनों का अनादर कर दिया, उसकी सम्पूर्ण यज्ञादिक क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। युधिष्ठिर! वेदमन्त्रों का व्यर्थ उपयोग करने पर जो पाप लगता है, सोमयाग को दक्षिणा आदि न देने के कारण व्यर्थ कर देने पर जो दोष लगता है तथा विधि और मन्त्र के बिना अग्नि में निरर्थक आहुति देने पर जो पाप होता है; वह सारा पाप मिथ्या भाषण करने से प्राप्त होता है।"
यन्मन्त्रे भवति वृथोपयुज्यमाने यत् सोमे भवति वृथाभिषूयमाणे ।
यच्चाग्नौ भवति वृथाभिहूयमाने तत् सर्वं भवति वृथाभिधीयमाने ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! वेदमन्त्रोंका व्यर्थ ( अशुद्ध ) उपयोग ( उच्चारण) करनेपर जो पाप लगता है, सोमयागको दक्षिणा आदि न देनेके कारण व्यर्थ कर देनेपर जो दोष लगता है तथा विधि और मन्त्रके बिना अग्निमें निरर्थक आहुति देनेपर जो पाप होता है; वह सारा पाप मिथ्या भाषण करनेसे प्राप्त होता है ।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! भीष्मजी की यह बात सुनकर समस्त श्रेष्ठ कुरुवंशी आश्चर्यचकित हो उठे। सबके मन में हर्षजनित उल्लास भर गया और उस समय सभी बड़े प्रसन्न हुए।
भीष्मस्यैतद् वचःश्रुत्वा विस्मिताः कुरुपुङ्गवाः ।
आसन् प्रहृष्टमनसः प्रीतिमन्तोऽभवंस्तदा ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! भीष्मजीकी यह बात सुनकर समस्त श्रेष्ठ कुरुवंशी आश्चर्यचकित हो उठे । सबके मनमें हर्षजनित उल्लास भर गया । उस समय सभी बड़े प्रसन्न हुए ।
In English
Bhishma explains the fruits of good and bad deeds
Yudhisthira asks Bhishma about the results of performing righteous actions. Bhishma describes how different lifestyles, austerities, and behaviors determine a person's future status and destinations.
This page answers
- What are the fruits of pancha dakshina yajna?
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- What is the result of abandoning trishna?
- Who should be respected to please all dharma?
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