श्रीगणेशाय नमः।

महेश्वरमाहात्म्य : परमेश्वर के विविध रूपों और उनके नामों का रहस्य क्या है?

महेश्वर की व्यापकता और महिमा

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ६ · अनुशासनपर्व → दानधर्मपर्व · अध्याय 161 · पृष्ठ 1520–1524

681 शब्द · 4 मिनटका पाठ · 14 श्लोक

वासुदेव ने युधिष्ठिर से कहा

महादेव के बहुआयामी स्वरूपों और उनके नामकरण के रहस्य को समझाने हेतु

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा - "महाबाहु युधिष्ठिर! अब मैं अनेक नाम और रूप धारण करनेवाले महात्मा भगवान् रुद्रका माहात्म्य बतला रहा हूँ, सुनिये।"

स्तुति महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 161
वासुदेव उवाच

युधिष्ठिर महाबाहो महाभाग्यं महात्मनः ।
रुद्राय बहुरूपाय बहुनाम्ने निबोध मे ॥

भगवान् श्रीकृष्णने कहा - महाबाहु युधिष्ठिर! अब मैं अनेक नाम और रूप धारण करनेवाले महात्मा भगवान् रुद्रका माहात्म्य बतला रहा हूँ, सुनिये ।

श्लोक 1पृष्ठ 1521
वासुदेव उवाच

वदन्त्यग्निं महादेवं तथा स्थाणुं महेश्वरम् ।
एकाक्षं त्र्यम्बकं चैव विश्वरूपं शिवं तथा ॥

विद्वान् पुरुष इन महादेवजीको अग्नि, स्थाणु, महेश्वर, एकाक्ष, त्र्यम्बक, विश्वरूप और शिव आदि अनेक नामोंसे पुकारते हैं ।

श्लोक 2पृष्ठ 1521
वासुदेव उवाच

द्वेत तस्य देवस्य वेदज्ञा ब्राह्मणा विदुः ।
घोरामन्यां शिवामन्यां ते तनू बहुधा पुनः ॥

वेदमें उनके दो रूप बताये गये हैं, जिन्हें वेदवेत्ता ब्राह्मण जानते हैं । उनका एक स्वरूप तो घोर है और दूसरा शिव । इन दोनोंके भी अनेक भेद हैं ।

श्लोक 3पृष्ठ 1521
वासुदेव उवाच

उग्रा घोरा तनुर्यास्य सोऽग्निर्विद्युत् स भास्करः ।
शिवा सौम्या च या त्वस्य धर्मस्त्वापोऽथ चन्द्रमाः ॥

इनकी जो घोर मूर्ति है, वह भय उपजानेवाली है । उसके अग्नि, विद्युत् और सूर्य आदि अनेक रूप हैं । इससे भिन्न जो शिव-नामवाली मूर्ति है, वह परम शान्त एवं मंगलमयी है । उसके धर्म, जल और चन्द्रमा आदि कई रूप हैं ।

श्लोक 4पृष्ठ 1521
वासुदेव उवाच

आत्मनोऽर्धं तु तस्याग्निः सोमोऽर्थं पुनरुच्यते ।
ब्रह्मचर्यं चरत्येका शिवा चास्य तनुस्तथा ॥

यास्य घोरतमा मूर्तिर्जगत् संहरते तथा ।
ईश्वरत्वान्महत्त्वाच्च महेश्वर इति स्मृतः ॥

महादेवजीके आधे शरीरको अग्नि और आधेको सोम कहते हैं । उनकी शिवमूर्ति ब्रह्मचर्यका पालन करती है और जो अत्यन्त घोर मूर्ति है, वह जगत्का संहार करती है । उनमें महत्त्व और ईश्वरत्व होनेके कारण वे ' महेश्वर' कहलाते हैं ।

श्लोक 5-6पृष्ठ 1521
वासुदेव उवाच

यन्निर्दहति यत्तीक्ष्णो यदुग्रो यत् प्रतापवान् ।
मांसशोणितमज्जादो यत् ततो रुद्र उच्यते ॥

वे जो सबको दग्ध करते हैं, अत्यन्त तीक्ष्ण हैं, उग्र और प्रतापी हैं, प्रलयाग्निरूपसे मांस, रक्त और मज्जाको भी अपना ग्रास बना लेते हैं; इसलिये ' रुद्र ' कहलाते हैं ।

श्लोक 7पृष्ठ 1521

देवानां सुमहान् यच्च यच्चास्य विषयो महान् ।
यच्च विश्वं महत् पाति महादेवस्ततः स्मृतः ॥

वे देवताओंमें महान् हैं, उनका विषय भी महान् है तथा वे महान् विश्वकी रक्षा करते हैं; इसलिये ' महादेव' कहलाते हैं ।

श्लोक 8पृष्ठ 1522

धूम्ररूपं च यत्तस्य धूर्जटीत्यत उच्यते ।
समेधयति यन्नित्यं सर्वान् वै सर्वकर्मभिः ॥

श्लोक 9पृष्ठ 1522

दहत्यूर्ध्वं स्थितो यच्च प्राणान् तॄणां स्थिरश्च यत् ॥

श्लोक 10पृष्ठ 1522

यदस्य बहुधा रूपं भूतं भव्यं भवत्तथा ॥

स्थावरं जङ्गमं चैव बहुरूपस्ततः स्मृतः ।
विश्वे देवाश्च यत्तस्मिन् विश्वरूपस्ततः स्मृतः ॥

भूत, भविष्य और वर्तमानकालमें स्थावर और जंगमोंके आकारमें उनके अनेक रूप प्रकट होते हैं, इसलिये वे ' बहुरूप' कहे गये हैं। समस्त देवता उनमें निवास करते हैं; इसलिये वे ' विश्वरूप' कहे गये हैं ।

श्लोक 11-12पृष्ठ 1522

सहस्राक्षोऽयुताक्षो वा सर्वतोऽक्षिमयोऽपि वा ।
चक्षुषः प्रभवेत् तेजो नास्त्यन्तोऽथास्य चक्षुषाम् ॥

उनके नेत्रसे तेज प्रकट होता है तथा उनके नेत्रोंका अन्त नहीं है । इसलिये ये ' सहस्राक्ष ', ' आयुताक्ष' और ' सर्वतोऽक्षिमय' कहलाते हैं ।

श्लोक 13पृष्ठ 1522

सर्वथा यत् पशून् पाति तैश्च यद् रमते सह ।
तेषामधिपतिर्यच्च तस्मात् पशुपतिः स्मृतः ॥

वे सब प्रकारसे पशुओंका पालन करते हैं, उनके साथ रहनेमें सुख मानते हैं तथा पशुओंके अधिपति हैं । इसलिये वे ' पशुपति' कहलाते हैं ।

श्लोक 14पृष्ठ 1522

नित्येन ब्रह्मचर्येण लिङ्गमस्य यदा स्थितम् ।
महयत्यस्य लोकश्च प्रियं ह्येतन्महात्मनः ॥

मनुष्य यदि ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए प्रतिदिन स्थिर शिवलिंगकी पूजा करता है तो इससे महात्मा शंकरको बड़ी प्रसन्नता होती है ।

श्लोक 15पृष्ठ 1522

लिङ्गं पूजयिता नित्यं महतीं श्रियमश्नुते ॥

जो महात्मा शंकरके श्रीविग्रह अथवा लिंगकी पूजा करता है, वह लिंगपूजक सदा बहुत बड़ी सम्पत्तिका भागी होता है ।

श्लोक 16पृष्ठ 1523

इस स्तुतिके श्लोक 1–29 में से आरम्भके 14 यहाँ दिये गये हैं। पूरी स्तुति मूल ग्रन्थमें पढ़ें →

विद्वान् पुरुष इन महादेवजी को अग्नि, स्थाणु, महेश्वर, एकाक्ष, त्र्यम्बक, विश्वरूप और शिव आदि अनेक नामोंसे पुकारते हैं। वेदमें उनके दो रूप बताये गये हैं, जिन्हें वेदवेत्ता ब्राह्मण जानते हैं। उनका एक स्वरूप तो घोर है और दूसरा शिव। इन दोनोंके भी अनेक भेद हैं। उनकी जो घोर मूर्ति है, वह भय उपजानेवाली है; उसके अग्नि, विद्युत् और सूर्य आदि अनेक रूप हैं। इससे भिन्न जो शिव-नामवाली मूर्ति है, वह परम शान्त एवं मङ्गलमयी है; उसके धर्म, जल और चन्द्रमा आदि कई रूप हैं। महादेवजीके आधे शरीरको अग्नि और आधेको सोम कहते हैं। उनकी शिवमूर्ति ब्रह्मचर्यका पालन करती है और जो अत्यन्त घोर मूर्ति है, वह जगत्का संहार करती है। उनमें महत्त्व और ईश्वरत्व होनेके कारण वे 'महेश्वर' कहलाते हैं। वे जो सबको दग्ध करते हैं, अत्यन्त तीक्ष्ण हैं, उग्र और प्रतापी हैं, प्रलयाग्निरूपसे मांस, रक्त और मज्जाको भी अपना ग्रास बना लेते हैं; इसलिये उन्हें 'रुद्र' कहा जाता है। वे देवताओंमें महान् हैं, उनका विषय भी महान् है तथा वे महान् विश्वकी रक्षा करते हैं; इसलिये वे 'महादेव' कहलाते हैं।

मनुष्यान् शिवमन्विच्छंस्तस्मादेष शिवः स्मृतः। अथवा उनकी जटाका रूप धूम्र वर्णका है, इसलिये उन्हें 'धूर्जटि' कहते हैं। सब प्रकारके कर्मोंद्वारा सब लोगोंकी उन्नति करते हैं और सबका कल्याण चाहते हैं; इसलिये इनका नाम ‘शिव' है। स्थिरलिङ्गश्च यन्नित्यं तस्मात् स्थाणुरिति स्मृतः। ये ऊर्ध्वभागमें स्थित होकर देहधारियोंके प्राणोंका नाश करते हैं। सदा स्थिर रहते हैं और जिनका लिङ्ग- विग्रह सदा स्थिर रहता है; इसलिये ये 'स्थाणु' कहलाते हैं। भूत, भविष्य और वर्तमानकालमें स्थावर और जङ्गमोंके आकारमें उनके अनेक रूप प्रकट होते हैं, इसलिये वे 'बहुरूप' कहे गये हैं। समस्त देवता उनमें निवास करते हैं; इसलिये वे 'विश्वरूप' कहे गये हैं। उनके नेत्रसे तेज प्रकट होता है तथा उनके नेत्रोंका अन्त नहीं है; इसलिये ये 'सहस्राक्ष', 'आयुताक्ष' और 'सर्वतोऽक्षिमय' कहलाते हैं। वे सब प्रकारसे पशुओंका पालन करते हैं, उनके साथ रहनेमें सुख मानते हैं तथा पशुओंके अधिपति हैं; इसलिये वे 'पशुपति' कहलाते हैं।

मनुष्य यदि ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए प्रतिदिन स्थिर शिवलिङ्गकी पूजा करता है तो इससे महात्मा शङ्करको बड़ी प्रसन्नता होती है। जो महात्मा शङ्करके श्रीविग्रह अथवा लिङ्गकी पूजा करता है, वह लिङ्गपूजक सदा बहुत बड़ी सम्पत्तिका भागी होता है। ऋषि, देवता, गन्धर्व और अप्सराएँ ऊर्ध्वलोकमें स्थित शिवलिङ्गकी ही पूजा करती हैं। इस प्रकार शिवलिङ्गकी पूजा होनेपर भक्तवत्सल भगवान् महेश्वर बड़े प्रसन्न होते हैं और प्रसन्नचित्त होकर वे भक्तोंको सुख देते हैं। ये ही भगवान् शङ्कर अग्निरूपसे शवको दग्ध करते हुए श्मशानभूमिमें निवास करते हैं। जो लोग वहाँ उनकी पूजा करते हैं, उन्हें वीरोंको प्राप्त होनेवाले उत्तम लोक प्राप्त होते हैं। वे प्राणियोंके शरीरोंमें रहनेवाले और उनके मृत्युरूप हैं; वे ही प्राण- अपान आदि वायुके रूपसे देहके भीतर निवास करते हैं। उनके बहुत - से भयङ्कर एवं उद्दीप्त रूप हैं, जिनकी जगत्में पूजा होती है। विद्वान् ब्राह्मण ही उन सब रूपोंको जानते हैं। उनकी महत्ता, व्यापकता तथा दिव्य कर्मोंके अनुसार देवताओंमें उनके बहुत - से यथार्थ नाम प्रचलित हैं। वेदके शतरुद्रिय प्रकरणमें उनके सैकड़ों उत्तम नाम हैं, जिन्हें वेदवेत्ता ब्राह्मण जानते हैं। महर्षि व्यासने भी उन महात्मा शिवका उपस्थान बताया है।

ये सम्पूर्ण लोकोंको उनकी अभीष्ट वस्तु देनेवाले हैं। यह महान् विश्व उन्हींका स्वरूप बताया गया है। ब्राह्मण और ऋषि उन्हें सबसे ज्येष्ठ कहते हैं। वे देवताओंमें प्रधान हैं; उन्होंने अपने मुखसे अग्निको उत्पन्न किया है। वे नाना प्रकारकी ग्रह - बाधाओंसे ग्रस्त प्राणियोंको दुःखसे छुटकारा दिलाते हैं। स ददाति मनुष्येभ्यः स एवाक्षिपते पुनः। पुण्यात्मा और शरणागतवत्सल तो वे इतने हैं कि शरणमें आये हुए किसी प्राणीका त्याग नहीं करते। वे ही मनुष्योंको आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, धन और सम्पूर्ण कामनाएँ प्रदान करते हैं और वे ही पुनः उन्हें छीन लेते हैं। स एव व्यापृतो नित्यं त्रैलोक्यस्य शुभाशुभे। इन्द्र आदि देवताओंके पास उन्हींका दिया हुआ ऐश्वर्य बताया जाता है। तीनों लोकोंके शुभाशुभ कर्मोंका फल देनेके लिये वे ही सदा तत्पर रहते हैं। महेश्वरश्च लोकानां महतामीश्वरश्च सः। समस्त कामनाओंके अधीश्वर होनेके कारण उन्हें 'ईश्वर' कहते हैं और महान् लोकोंके ईश्वर होनेके कारण उनका नाम 'महेश्वर' हुआ है। उन्होंने नाना प्रकारके बहुसङ्ख्यक रूपोंद्वारा इस सम्पूर्ण लोकको व्याप्त कर रखा है; उन महादेवजीका जो मुख है, वही समुद्रमें वडवानल के रूप में व्याप्त है।

In English

The Glory of Lord Rudra

Krishna describes the various names and forms of the deity Rudra to Yudhishthira. He explains the differences between the fierce, destructive aspect of the god and his peaceful, auspicious form known as Shiva.

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Also written: Maheshvaramahatmya, Maheshvara, Vasudeva, Yudhishthira, Mahadeva, Apsaraen, महेश्वरमाहात्म्य