श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1521–1530
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1521–1530
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एकषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः भगवान् शङ्करके माहात्म्यका वर्णन वासुदेव उवाच
युधिष्ठिर महाबाहो महाभाग्यं महात्मनः ।
रुद्राय बहुरूपाय बहुनाम्ने निबोध मे ॥ १ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा - महाबाहु युधिष्ठिर! अब मैं अनेक नाम और रूप धारण करनेवाले महात्मा भगवान् रुद्रका माहात्म्य बतला रहा हूँ, सुनिये ॥ १ ॥
वदन्त्यग्निं महादेवं तथा स्थाणुं महेश्वरम् ।
एकाक्षं त्र्यम्बकं चैव विश्वरूपं शिवं तथा ॥ २ ॥
विद्वान् पुरुष इन महादेवजीको अग्नि, स्थाणु, महेश्वर, एकाक्ष, त्र्यम्बक, विश्वरूप और शिव आदि अनेक नामोंसे पुकारते हैं ॥ २ ॥
द्वेत तस्य देवस्य वेदज्ञा ब्राह्मणा विदुः ।
घोरामन्यां शिवामन्यां ते तनू बहुधा पुनः ॥ ३ ॥
वेदमें उनके दो रूप बताये गये हैं, जिन्हें वेदवेत्ता ब्राह्मण जानते हैं । उनका एक स्वरूप
तो घोर है और दूसरा शिव । इन दोनोंके भी अनेक भेद हैं ॥ ३ ॥
उग्रा घोरा तनुर्यास्य सोऽग्निर्विद्युत् स भास्करः ।
शिवा सौम्या च या त्वस्य धर्मस्त्वापोऽथ चन्द्रमाः ॥ ४ ॥
इनकी जो घोर मूर्ति है, वह भय उपजानेवाली है । उसके अग्नि, विद्युत् और सूर्य आदि अनेक रूप हैं । इससे भिन्न जो शिव-नामवाली मूर्ति है, वह परम शान्त एवं मंगलमयी है । उसके धर्म, जल और चन्द्रमा आदि कई रूप हैं ॥ ४ ॥
आत्मनोऽर्धं तु तस्याग्निः सोमोऽर्थं पुनरुच्यते ।
ब्रह्मचर्यं चरत्येका शिवा चास्य तनुस्तथा ॥ ५ ॥
यास्य घोरतमा मूर्तिर्जगत् संहरते तथा ।
ईश्वरत्वान्महत्त्वाच्च महेश्वर इति स्मृतः ॥ ६ ॥
महादेवजीके आधे शरीरको अग्नि और आधेको सोम कहते हैं । उनकी शिवमूर्ति
ब्रह्मचर्यका पालन करती है और जो अत्यन्त घोर मूर्ति है, वह जगत्का संहार करती है ।
उनमें महत्त्व और ईश्वरत्व होनेके कारण वे ' महेश्वर' कहलाते हैं ॥ ५-६ ॥
यन्निर्दहति यत्तीक्ष्णो यदुग्रो यत् प्रतापवान् ।
मांसशोणितमज्जादो यत् ततो रुद्र उच्यते ॥ ७ ॥
वे जो सबको दग्ध करते हैं, अत्यन्त तीक्ष्ण हैं, उग्र और प्रतापी हैं, प्रलयाग्निरूपसे मांस, रक्त और मज्जाको भी अपना ग्रास बना लेते हैं; इसलिये ' रुद्र ' कहलाते हैं ॥ ७ ॥
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देवानां सुमहान् यच्च यच्चास्य विषयो महान् ।
यच्च विश्वं महत् पाति महादेवस्ततः स्मृतः ॥ ८ ॥
वे देवताओंमें महान् हैं, उनका विषय भी महान् है तथा वे महान् विश्वकी रक्षा करते हैं; इसलिये ' महादेव' कहलाते हैं ॥ ८ ॥
धूम्ररूपं च यत्तस्य धूर्जटीत्यत उच्यते ।
समेधयति यन्नित्यं सर्वान् वै सर्वकर्मभिः ॥ ९ ॥
मनुष्यान् शिवमन्विच्छंस्तस्मादेष शिवः स्मृतः । अथवा उनकी जटाका रूप धूम्र वर्णका है, इसलिये उन्हें ' धूर्जटि ' कहते हैं । सब प्रकारके कर्मोंद्वारा सब लोगोंकी उन्नति करते हैं और सबका कल्याण चाहते हैं; इसलिये इनका नाम ‘ शिव' है ॥ ९ ३ ॥ दहत्यूर्ध्वं स्थितो यच्च प्राणान् तॄणां स्थिरश्च यत् ॥ १० ॥
स्थिरलिंगश्च यन्नित्यं तस्मात् स्थाणुरिति स्मृतः । ये ऊर्ध्वभागमें स्थित होकर देहधारियोंके प्राणोंका नाश करते हैं । सदा स्थिर रहते हैं
और जिनका लिंग- विग्रह सदा स्थिर रहता है । इसलिये ये ' स्थाणु' कहलाते हैं ॥ १०३ ॥
यदस्य बहुधा रूपं भूतं भव्यं भवत्तथा ॥ ११ ॥
स्थावरं जङ्गमं चैव बहुरूपस्ततः स्मृतः ।
विश्वे देवाश्च यत्तस्मिन् विश्वरूपस्ततः स्मृतः ॥ १२ ॥
भूत, भविष्य और वर्तमानकालमें स्थावर और जंगमोंके आकारमें उनके अनेक रूप प्रकट होते हैं, इसलिये वे ' बहुरूप' कहे गये हैं। समस्त देवता उनमें निवास करते हैं; इसलिये वे ' विश्वरूप' कहे गये हैं ॥ ११-१२ ॥
सहस्राक्षोऽयुताक्षो वा सर्वतोऽक्षिमयोऽपि वा ।
चक्षुषः प्रभवेत् तेजो नास्त्यन्तोऽथास्य चक्षुषाम् ॥ १३ ॥
उनके नेत्रसे तेज प्रकट होता है तथा उनके नेत्रोंका अन्त नहीं है । इसलिये ये ' सहस्राक्ष ', ' आयुताक्ष' और ' सर्वतोऽक्षिमय' कहलाते हैं ॥ १३ ॥
सर्वथा यत् पशून् पाति तैश्च यद् रमते सह ।
तेषामधिपतिर्यच्च तस्मात् पशुपतिः स्मृतः ॥ १४ ॥
वे सब प्रकारसे पशुओंका पालन करते हैं, उनके साथ रहनेमें सुख मानते हैं तथा
पशुओंके अधिपति हैं । इसलिये वे ' पशुपति' कहलाते हैं ॥ १४ ॥
नित्येन ब्रह्मचर्येण लिङ्गमस्य यदा स्थितम् ।
महयत्यस्य लोकश्च प्रियं ह्येतन्महात्मनः ॥ १५ ॥
मनुष्य यदि ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए प्रतिदिन स्थिर शिवलिंगकी पूजा करता है तो इससे महात्मा शंकरको बड़ी प्रसन्नता होती है ॥ १५ ॥
विग्रहं पूजयेद् यो वै लिङ्गं वापि महात्मनः ।
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लिङ्गं पूजयिता नित्यं महतीं श्रियमश्नुते ॥ १६ ॥
जो महात्मा शंकरके श्रीविग्रह अथवा लिंगकी पूजा करता है, वह लिंगपूजक सदा बहुत बड़ी सम्पत्तिका भागी होता है ॥ १६ ॥
ऋषयश्चापि देवाश्च गन्धर्वाप्सरसस्तथा ।
लिङ्गमेवार्चयन्ति स्म यत् तदूर्ध्वं समास्थितम् ॥ १७ ॥
पूज्यमाने ततस्तस्मिन् मोदते स महेश्वरः ।
सुखं ददाति प्रीतात्मा भक्तानां भक्तवत्सलः ॥ १८ ॥
ऋषि, देवता, गन्धर्व और अप्सराएँ ऊर्ध्वलोकमें स्थित शिवलिंगकी ही पूजा करती हैं । इस प्रकार शिवलिंगकी पूजा होनेपर भक्तवत्सल भगवान् महेश्वर बड़े प्रसन्न होते हैं और प्रसन्नचित्त होकर वे भक्तोंको सुख देते हैं ॥ १७-१८ ॥
एष एव श्मशानेषु देवो वसति निर्दहन् ।
यजन्ते ते जनास्तत्र वीरस्थाननिषेविणः ॥ १ ९ ॥
ये ही भगवान् शंकर अग्निरूपसे शवको दग्ध करते हुए श्मशानभूमिमें निवास करते हैं । जो लोग वहाँ उनकी पूजा करते हैं, उन्हें वीरोंको प्राप्त होनेवाले उत्तम लोक प्राप्त होते हैं ॥ १ ९ ॥
विषयस्थः शरीरेषु स मृत्युः प्राणिनामिह ।
स च वायुः शरीरेषु प्राणापानशरीरिणाम् ॥ २० ॥
वे प्राणियोंके शरीरोंमें रहनेवाले और उनके मृत्युरूप हैं तथा वे ही प्राण- अपान आदि वायुके रूपसे देहके भीतर निवास करते हैं ॥ २० ॥
तस्य घोराणि रूपाणि दीप्तानि च बहूनि च ।
लोके यान्यस्य पूज्यन्ते विप्रास्तानि विदुर्बुधाः ॥ २१ ॥
उनके बहुत - से भयंकर एवं उद्दीप्त रूप हैं, जिनकी जगत्में पूजा होती है । विद्वान् ब्राह्मण ही उन सब रूपोंको जानते हैं ॥ २१ ॥
नामधेयानि देवेषु बहून्यस्य यथार्थवत् ।
निरुच्यन्ते महत्त्वाच्च विभुत्वात् कर्मभिस्तथा ॥ २२ ॥
उनकी महत्ता, व्यापकता तथा दिव्य कर्मोंके अनुसार देवताओंमें उनके बहुत - से यथार्थ नाम प्रचलित हैं ॥ २२ ॥
वेदे चास्य विदुर्विप्राः शतरुद्रीयमुत्तमम् ।
व्यासेनोक्तं च यच्चापि उपस्थानं महात्मनः ॥ २३ ॥
वेदके शतरुद्रिय प्रकरणमें उनके सैकड़ों उत्तम नाम हैं, जिन्हें वेदवेत्ता ब्राह्मण जानते हैं । महर्षि व्यासने भी उन महात्मा शिवका उपस्थान ( स्तवन ) बताया है ॥ २३ ॥
प्रदाता सर्वलोकानां विश्वं चाप्युच्यते महत् ।
ज्येष्ठभूतं वदन्त्येनं ब्राह्मणा ऋषयोऽपरे ॥ २४ ॥
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ये सम्पूर्ण लोकोंको उनकी अभीष्ट वस्तु देनेवाले हैं । यह महान् विश्व उन्हींका स्वरूप बताया गया है । ब्राह्मण और ऋषि उन्हें सबसे ज्येष्ठ कहते हैं ॥ २४ ॥
प्रथमो ह्येष देवानां मुखादग्निमजीजनत् ।
ग्रहैर्बहुविधैः प्राणान् संरुद्धानुत्सृजत्यपि ॥ २५ ॥
वे देवताओंमें प्रधान हैं, उन्होंने अपने मुखसे अग्निको उत्पन्न किया है । वे नाना प्रकारकी ग्रह - बाधाओंसे ग्रस्त प्राणियोंको दुःखसे छुटकारा दिलाते हैं ॥ २५ ॥
विमुञ्चति न पुण्यात्मा शरण्यः शरणागतान् ।
आयुरारोग्यमैश्वर्यं वित्तं कामांश्च पुष्कलान् ॥ २६ ॥
स ददाति मनुष्येभ्यः स एवाक्षिपते पुनः । पुण्यात्मा और शरणागतवत्सल तो वे इतने हैं कि शरणमें आये हुए किसी प्राणीका त्याग नहीं करते । वे ही मनुष्योंको आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, धन और सम्पूर्ण कामनाएँ प्रदान करते हैं और वे ही पुनः उन्हें छीन लेते हैं ॥ २६३ ॥
शक्रादिषु च देवेषु तस्यैश्वर्यमिहोच्यते ॥ २७ ॥
स एव व्यापृतो नित्यं त्रैलोक्यस्य शुभाशुभे । इन्द्र आदि देवताओंके पास उन्हींका दिया हुआ ऐश्वर्य बताया जाता है । तीनों लोकोंके शुभाशुभ कर्मोंका फल देनेके लिये वे ही सदा तत्पर रहते हैं ॥ २७३ ॥
ऐश्वर्याच्चैव कामानामीश्वरः पुनरुच्यते ॥ २८ ॥
महेश्वरश्च लोकानां महतामीश्वरश्च सः । समस्त कामनाओंके अधीश्वर होनेके कारण उन्हें ' ईश्वर' कहते हैं और महान् लोकोंके ईश्वर होनेके कारण उनका नाम ' महेश्वर' हुआ है ॥ २८३ ॥
बहुभिर्विविधै रूपैर्विश्वं व्याप्तमिदं जगत् ।
तस्य देवस्य यद् वक्त्रं समुद्रे वडवामुखम् ॥ २ ९ ॥
उन्होंने नाना प्रकारके बहुसंख्यक रूपोंद्वारा इस सम्पूर्ण लोकको व्याप्त कर रखा है । उन महादेवजीका जो मुख है, वही समुद्रमें वडवानल है ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि महेश्वरमाहात्म्यं नाम एकषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें महेश्वरमाहात्म्य नामक एक सौ इकसठवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १६१ ॥
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द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः धर्मके विषयमें आगम प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु- असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तवति वाक्यं तु कृष्णे देवकिनन्दने ।
भीष्मं शान्तनवं भूयः पर्यपृच्छद् युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके इस प्रकार उपदेश देनेपर युधिष्ठिरने शान्तनुनन्दन भीष्मसे पुनः प्रश्न किया- ॥ १ ॥
निर्णये वा महाबुद्धे सर्वधर्मविदां वर ।
प्रत्यक्षमागमो वेति किं तयोः कारणं भवेत् ॥ २ ॥
‘ सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ महाबुद्धिमान् पितामह! धार्मिक विषयका निर्णय करनेके लिये प्रत्यक्ष प्रमाणका आश्रय लेना चाहिये या आगमका । इन दोनोंमेंसे कौन-सा प्रमाण सिद्धान्त - निर्णयमें मुख्य कारण होता है? ' ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
नास्त्यत्र संशयः कश्चिदिति मे वर्तते मतिः ।
शृणु वक्ष्यामि ते प्राज्ञ सम्यक् त्वं मेऽनुपृच्छसि ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा – बुद्धिमान् नरेश! तुमने ठीक प्रश्न किया है । इसका उत्तर देता हूँ, सुनो । मेरा तो ऐसा विचार है कि इस विषयमें कहीं कोई संशय है ही नहीं ॥ ३ ॥
संशयः सुगमस्तत्र दुर्गमस्तस्य निर्णयः ।
दृष्टं श्रुतमनन्तं हि यत्र संशयदर्शनम् ॥ ४ ॥
धार्मिक विषयोंमें संदेह उपस्थित करना सुगम है, किंतु उसका निर्णय करना बहुत कठिन होता है । प्रत्यक्ष और आगम दोनोंका ही कोई अन्त नहीं है । दोनोंमें ही संदेह खड़े होते हैं ॥ ४ ॥
प्रत्यक्षं कारणं दृष्ट्वा हैतुकाः प्राज्ञमानिनः ।
नास्तीत्येवं व्यवस्यन्ति सत्यं संशयमेव च ॥ ५ ॥
अपनेको बुद्धिमान् माननेवाले हेतुवादी तार्किक प्रत्यक्ष कारणकी ओर ही दृष्टि रखकर परोक्षवस्तुका अभाव मानते हैं । सत्य होनेपर भी उसके अस्तित्वमें संदेह करते हैं ॥ ५ ॥
तदयुक्तं व्यवस्यन्ति बालाः पण्डितमानिनः ।
अथ चेन्मन्यसे चैकं कारणं किं भवेदिति ॥ ६ ॥
शक्यं दीर्घेण कालेन युक्तेनातन्द्रितेन च ।
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प्राणयात्रामनेकां च कल्पमानेन भारत ॥ ७ ॥
तत्परेणैव नान्येन शक्यं ह्येतस्य दर्शनम् । किंतु वे बालक हैं । अहंकारवश अपनेको पण्डित मानते हैं । अतः वे जो पूर्वोक्त निश्चय करते हैं, वह असंगत है । ( आकाशमें नीलिमा प्रत्यक्ष दिखायी देनेपर ही वह मिथ्या ही है, अतः केवल प्रत्यक्षके बलसे सत्यका निर्णय नहीं किया जा सकता । धर्म, ईश्वर और परलोक आदिके विषयमें शास्त्र-प्रमाण ही श्रेष्ठ है; क्योंकि अन्य प्रमाणोंकी वहाँतक पहुँच नहीं हो सकती ) यदि कहो कि एकमात्र ब्रह्म जगत्का कारण कैसे हो सकता है तो इसका उत्तर यह है कि मनुष्य आलस्य छोड़कर दीर्घकालतक योगका अभ्यास करे और तत्त्वका साक्षात्कार करनेके लिये निरन्तर प्रयत्नशील बना रहे । अपने जीवनका अनेक उपायसे निर्वाह करे । इस तरह सदा यत्नशील रहनेवाला पुरुष ही इस तत्त्वका दर्शन कर सकता है, दूसरा कोई नहीं ॥ ६-७ ॥ हेतूनामन्तमासाद्य विपुलं ज्ञानमुत्तमम् ॥ ८ ॥
ज्योतिः सर्वस्य लोकस्य विपुलं प्रतिपद्यते ।
न त्वेव गमनं राजन् हेतुतो गमनं तथा ।
अग्राह्यमनिबद्धं च वाचा सम्परिवर्जयेत् ॥ ९ ॥
जब सारे तर्क समाप्त हो जाते हैं तभी उत्तम ज्ञानकी प्राप्ति होती है । वह ज्ञान ही सम्पूर्ण जगत्के लिये उत्तम ज्योति है । राजन्! कोरे तर्कसे जो ज्ञान होता है, वह वास्तवमें ज्ञान नहीं है; अतः उसको प्रामाणिक नहीं मानना चाहिये । जिसका वेदके द्वारा प्रतिपादन नहीं किया गया हो, उस ज्ञानका परित्याग कर देना ही उचित है ॥ ८ - ९ ॥ युधिष्ठिर उवाच
प्रत्यक्षं लोकतः सिद्धिर्लोकश्चागमपूर्वकः ।
शिष्टाचारो बहुविधस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १० ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! प्रत्यक्ष प्रमाण, जो लोकमें प्रसिद्ध है; अनुमान, आगम और भाँति- भाँतिके शिष्टाचार ये बहुत से प्रमाण उपलब्ध होते हैं । इनमें कौन - सा प्रबल है, यह बतानेकी कृपा कीजिये ॥ १० ॥
भीष्म उवाच
धर्मस्य हियमाणस्य बलवद्भिर्दुरात्मभिः ।
संस्था यत्नैरपि कृता कालेन प्रतिभिद्यते ॥ ११ ॥
भीष्मजीने कहा- बेटा! जब बलवान् पुरुष दुराचारी होकर धर्मको हानि पहुँचाने लगते हैं, तब साधारण मनुष्योंद्वारा यत्नपूर्वक की हुई रक्षाकी व्यवस्था भी कुछ समय भंग हो जाती है ॥ ११ ॥
अधर्मो धर्मरूपेण तृणैः कूप इवावृतः ।
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ततस्तैर्भिद्यते वृत्तं शृणु चैव युधिष्ठिर ॥ १२ ॥
फिर तो घास- फूससे ढके हुए कूएँकी भाँति अधर्म ही धर्मका चोला पहनकर सामने आता है । युधिष्ठिर! उस अवस्थामें वे दुराचारी मनुष्य शिष्टाचारकी मर्यादा तोड़ डालते हैं । तुम इस विषयको ध्यान देकर सुनो ॥ १२ ॥
अवृत्ता ये तु भिन्दन्ति श्रुतित्यागपरायणाः ।
धर्मविद्वेषिणो मन्दा इत्युक्तस्तेषु संशयः ॥ १३ ॥
जो आचारहीन हैं, वेद - शास्त्रोंका त्याग करनेवाले हैं, वे धर्मद्रोही मन्दबुद्धि मानव सज्जनोंद्वारा स्थापित धर्म और आचारकी मर्यादा भंग कर देते हैं । इस प्रकार प्रत्यक्ष, अनुमान और शिष्टाचार– इन तीनोंमें संदेह बताया गया है ( अतः वे अविश्वसनीय हैं ) ॥ १३ ॥
अतृप्यन्तस्तु साधूनां य एवागमबुद्धयः ।
परमित्येव संतुष्टास्तानुपास्व च पृच्छ च ॥ १४ ॥
कामार्थौ पृष्ठतः कृत्वा लोभमोहानुसारिणौ ।
धर्म इत्येव सम्बुद्धास्तानुपास्व च पृच्छ च ॥ १५ ॥
ऐसी स्थितिमें जो साधुसंगके लिये नित्य उत्कण्ठित रहते हों— उससे कभी तृप्त न होते हों, जिनकी बुद्धि आगम प्रमाणको ही श्रेष्ठ मानती हो, जो सदा संतुष्ट रहते तथा लोभ-मोहका अनुसरण करनेवाले अर्थ और कामकी उपेक्षा करके धर्मको ही उत्तम समझते हों, ऐसे महापुरुषोंकी सेवामें रहो और उनसे अपना संदेह पूछो ॥ १४-१५ ॥
न तेषां भिद्यते वृत्तं यज्ञाः स्वाध्यायकर्म च ।
आचारः कारणं चैव धर्मश्चैकस्त्रयं पुनः ॥ १६ ॥
उन संतोंके सदाचार, यज्ञ और स्वाध्याय आदि शुभ कर्मोंके अनुष्ठानमें कभी बाधा नहीं पड़ती । उनमें आचार, उसको बतानेवाले वेद--शास्त्र तथा धर्म–इन तीनोंकी एकता होती है ॥ १६ ॥
युधिष्ठिरउवाच
पुनरेव हि मे बुद्धिः संशये परिमुह्यति ।
अपारे मार्गमाणस्य परं तीरमपश्यतः ॥ १७ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! मेरी बुद्धि संशयके अपार समुद्रमें डूब रही है । मैं इसके पार जाना चाहता हूँ, किंतु ढूँढ़नेपर भी मुझे इसका कोई किनारा नहीं दिखायी देता ॥ १७ ॥
वेदः प्रत्यक्षमाचारः प्रमाणं तत्त्रयं यदि ।
पृथक्त्वं लभ्यते चैषां धर्मश्चैकस्त्रयं कथम् ॥ १८ ॥
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यदि प्रत्यक्ष, आगम और शिष्टाचार– ये तीनों ही प्रमाण हैं तो इनकी तो पृथक् - पृथक् उपलब्धि हो रही है और धर्म एक है; फिर ये तीनों कैसे धर्म हो सकते हैं? ॥ १८ ॥
भीष्म उवाच
धर्मस्य ह्रियमाणस्य बलवद्भिर्दुरात्मभिः ।
यद्येवं मन्यसे राजंस्त्रिधा धर्मविचारणा ॥ १ ९ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! प्रबल दुरात्माओं द्वारा जिसे हानि पहुँचायी जाती है, उस धर्मका स्वरूप यदि तुम इस तरह प्रमाण- भेदसे तीन प्रकारका मानते हो तो तुम्हारा यह विचार ठीक नहीं है । वास्तवमें धर्म एक ही है, जिसपर तीन प्रकारसे विचार किया जाता है -तीनों प्रमाणोंद्वारा उसकी समीक्षा की जाती है ॥ १ ९ ॥
एक एवेति जानीहि त्रिधा धर्मस्य दर्शनम् ।
पृथक्त्वे च न मे बुद्धिस्त्रयाणामपि वै तथा ॥ २० ॥
यह निश्चय समझो कि धर्म एक ही है । तीनों प्रमाणोंद्वारा एक ही धर्मका दर्शन होता है । मैं यह नहीं मानता कि ये तीनों प्रमाण भिन्न - भिन्न धर्मका प्रतिपादन करते हैं ॥ २० ॥
उक्तो मार्गस्त्रयाणां च तत्तथैव समाचर ।
जिज्ञासा न तु कर्तव्या धर्मस्य परितर्कणात् ॥ २१ ॥
उक्त तीनों प्रमाणोंके द्वारा जो धर्ममय मार्ग बताया गया है, उसीपर चलते रहो । तर्कका सहारा लेकर धर्मकी जिज्ञासा करना कदापि उचित नहीं है ॥ २१ ॥
सदैव भरतश्रेष्ठ मा तेऽभूदत्र संशयः ।
अन्धो जड इवाशङ्की यद् ब्रवीमि तदाचर ॥ २२ ॥
भरतश्रेष्ठ! मेरी इस बातमें तुम्हें कभी संदेह नहीं होना चाहिये । मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे अन्धों और गूँगोंकी तरह बिना किसी शंकाके मानकर उसके अनुसार आचरण करो ॥ २२ ॥
अहिंसा सत्यमक्रोधो दानमेतच्चतुष्टयम् ।
अजातशत्रो सेवस्व धर्म एष सनातनः ॥ २३ ॥
अजातशत्रो! अंहिसा, सत्य, अक्रोध और दान– इन चारोंका सदा सेवन करो । यह सनातन धर्म है ॥ २३ ॥
ब्राह्मणेषु च वृत्तिर्या पितृपैतामहोचिता ।
तामन्वेहि महाबाहो धर्मस्यैते हि देशिकाः ॥ २४ ॥
महाबाहो! तुम्हारे पिता -पितामह आदिने ब्राह्मणोंके साथ जैसा बर्ताव किया है, उसीका तुम भी अनुसरण करो; क्योंकि ब्राह्मण धर्मके उपदेशक हैं ॥ २४ ॥
प्रमाणमप्रमाणं वै यः कुर्यादबुधो जनः ।
न स प्रमाणतामह विवादजननो हि सः ॥ २५ ॥
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जो मूर्ख मनुष्य प्रमाणको भी अप्रमाण बनाता है, उसकी बातको प्रामाणिक नहीं मानना चाहिये; क्योंकि वह केवल विवाद करनेवाला है ॥ २५ ॥
ब्राह्मणानेव सेवस्व सत्कृत्य बहुमन्य च ।
एतेष्वेव त्विमे लोकाः कृत्स्ना इति निबोध तान् ॥ २६ ॥
तुम ब्राह्मणोंका ही विशेष आदर- सत्कार करके उनकी सेवामें लगे रहो और यह जान लो कि ये सम्पूर्ण लोक ब्राह्मणोंके ही आधारपर टिके हुए हैं ॥ २६ ॥
युधिष्ठिर उवाच
ये च धर्ममसूयन्ते ये चैनं पर्युपासते ।
ब्रवीतु मे भवानेतत् क्व ते गच्छन्ति तादृशाः ॥ २७ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! जो मनुष्य धर्मकी निन्दा करते हैं और जो धर्मका आचरण करते हैं, वे किन लोकोंमें जाते हैं? आप इस विषयका वर्णन कीजिये ॥ २७ ॥
भीष्म उवाच
रजसा तमसा चैव समवस्तीर्णचेतसः ।
नरकं प्रतिपद्यन्ते धर्मविद्वेषिणो जनाः ॥ २८ ॥
= भीष्मजीने कहा – युधिष्ठिर! जो मनुष्य रजोगुण और तमोगुणसे मलिन चित्त होनेके कारण धर्मसे द्रोह करते हैं, वे नरकमें पड़ते हैं ॥ २८ ॥
ये तु धर्मं महाराज सततं पर्युपासते ।
सत्यार्जवपराः सन्तस्ते वै स्वर्गभुजो नराः ॥ २ ९ ॥
महाराज! जो सत्य और सरलतामें तत्पर होकर सदा धर्मका पालन करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोकका सुख भोगते हैं ॥ २ ९ ॥
धर्म एव गतिस्तेषामाचार्योपासनाद् भवेत् ।
देवलोकं प्रपद्यन्ते ये धर्मं पर्युपासते ॥ ३० ॥
आचार्यकी सेवा करनेसे मनुष्योंको एकमात्र धर्मका ही सहारा रहता है और जो धर्मकी उपासना करते हैं, वे देवलोकमें जाते हैं ॥ ३० ॥
मनुष्या यदि वा देवाः शरीरमुपताप्य वै ।
धर्मिणः सुखमेधन्ते लोभद्वेषविवर्जिताः ॥ ३१ ॥
मनुष्य हों या देवता, जो शरीरको कष्ट देकर भी धर्माचरणमें लगे रहते हैं तथा लोभ और द्वेषका त्याग कर देते हैं, वे सुखी होते हैं ॥ ३१ ॥
प्रथमं ब्रह्मणः पुत्रं धर्ममाहुर्मनीषिणः ।
धर्मिणः पर्युपासन्ते फलं पक्वमिवाशयः ॥ ३२ ॥
मनीषी पुरुष धर्मको ही ब्रह्माजीका ज्येष्ठ पुत्र कहते हैं । जैसे खानेवालोंका मन पके हुए फलको अधिक पसंद करता है, उसी प्रकार धर्मनिष्ठ पुरुष धर्मकी ही उपासना करते
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हैं ॥ ३२ ॥
युधिष्ठिरउवाच
असतां कीदृशं रूपं साधवः किं च कुर्वते ।
ब्रवीतु मे भवानेतत् सन्तोऽसन्तश्च कीदृशाः ॥ ३३ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! असाधु पुरुषोंका रूप कैसा होता है? साधु पुरुष कौन-सा कर्म करते हैं? साधु और असाधु कैसे होते हैं? आप यह बात मुझे बताइये ॥ ३३ ॥
भीष्म उवाच
दुराचाराश्च दुर्धर्षा दुर्मुखाश्चाप्यसाधवः ।
साधवः शीलसम्पन्नाः शिष्टाचारस्य लक्षणम् ॥ ३४ ॥
भीष्मजीने कहा - युधिष्ठिर! असाधु या दुष्ट पुरुष दुराचारी, दुर्धर्ष ( उद्दण्ड) और दुर्मुख ( कटुवचन बोलनेवाले) होते हैं तथा साधु पुरुष सुशील हुआ करते हैं। अब शिष्टाचारका लक्षण बताया जाता है ॥ ३४ ॥
राजमार्गे गवां मध्ये धान्यमध्ये च धर्मिणः ।
नोपसेवन्ति राजेन्द्र सर्गं मूत्रपुरीषयोः ॥ ३५ ॥
धर्मात्मा पुरुष सड़कपर, गौओंके बीचमें तथा खेतमें लगे हुए धान्यके भीतर मल-मूत्रका त्याग नहीं करते हैं ॥ ३५ ॥
पञ्चानामशनं दत्त्वा शेषमश्नन्ति साधवः ।
न जल्पन्ति च भुञ्जाना न निद्रान्त्यार्द्रपाणयः ॥ ३६ ॥
साधु पुरुष देवता, पितर, भूत, अतिथि और कुटुम्बी - इन पाँचोंको भोजन देकर शेष अन्नका स्वयं आहार करते हैं । वे खाते समय बातचीत नहीं करते तथा भीगे हाथ लिये शयन नहीं करते हैं ॥ ३६ ॥
चित्रभानुमनड्वाहं देवं गोष्ठं चतुष्पथम् ।
ब्राह्मणं धार्मिकं वृद्धं ये कुर्वन्ति प्रदक्षिणम् ॥ ३७ ॥
वृद्धानां भारतप्तानां स्त्रीणां चक्रधरस्य च ।
ब्राह्मणानां गवां राज्ञां पन्थानं ददते च ये ॥ ३८ ॥
जो लोग अग्नि, वृषभ, देवता, गोशाला, चौराहा, ब्राह्मण, धार्मिक और वृद्ध पुरुषोंको दाहिने करके चलते हैं, जो बड़े - बूढ़ों, भारसे पीड़ित हुए मनुष्यों, स्त्रियों, जमींदार, ब्राह्मण, गौ तथा राजाको सामनेसे आते देखकर जानेके लिये मार्ग दे देते हैं, वे सब साधु पुरुष हैं ॥ ३७-३८ ॥
अतिथीनां च सर्वेषां प्रेष्याणां स्वजनस्य च ।
तथा शरणकामानां गोप्ता स्यात् स्वागतप्रदः ॥ ३ ९ ॥
सायंप्रातर्मनुष्याणामशनं देवनिर्मितम् ।