श्रीगणेशाय नमः।

नृगोपाख्यान : अचेत पाप और अनजाने में हुए अपराध का क्या परिणाम होता है?

अनजाने पाप का गम्भीर फल

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ६ · अनुशासनपर्व → दानधर्मपर्व · अध्याय 70 · पृष्ठ 634–640

929 शब्द · 5 मिनटका पाठ · 9 श्लोक

भीष्म ने पार्थ से कहा

पाप के सूक्ष्म स्वरूप को समझाने हेतु

भीष्मजी कहते हैं— कुरुश्रेष्ठ! इस विषय में श्रेष्ठ पुरुष वह प्रसङ्ग सुनाया करते हैं, जिसके अनुसार एक ब्राह्मण के धन को ले लेने के कारण राजा नृग को महान कष्ट उठाना पड़ा था।

भीष्म उवाच

अत्रैव कीर्त्यते सद्भिर्ब्राह्मणस्वाभिमर्शने ।
नृगेण सुमहत् कृच्छ्रं यदवाप्तं कुरूद्वह ॥

भीष्मजी कहते हैं— कुरुश्रेष्ठ! इस विषयमें श्रेष्ठ पुरुष वह प्रसंग सुनाया करते हैं, जिसके अनुसार एक ब्राह्मणके धनको ले लेनेके कारण राजा नृगको महान् कष्ट उठाना पड़ा था ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 70 · श्लोक 1पृष्ठ 635

पार्थ! हमारे सुनने में आया है कि पूर्वकाल में जब द्वारकापुरी बस रही थी, उसी समय वहाँ घास और लताओं से ढँका हुआ एक विशाल कूप दिखाई दिया। वहाँ रहने वाले यदुवंशी बालक उस कुएँ का जल पीने की इच्छा से बड़े परिश्रम के साथ उस घास-फूस को हटाने के लिए महान प्रयत्न करने लगे। इतने में उस कुएँ के ढँके हुए जल में स्थित हुए एक विशालकाय गिरगिट पर उनकी दृष्टि पड़ी। वे सहस्रों बालक उस गिरगिट को निकालने का यत्न करने लगे। गिरगिट का शरीर एक पर्वत के समान था। बालकों ने उसे रस्सियों और चमड़े की पट्टियों से बाँधकर खींचने के लिये बहुत जोर लगाया, परन्तु वह टस से मस न हुआ। जब बालक उसे निकालने में सफल न हो सके, तब वे भगवान श्रीकृष्ण के पास गये।

भीष्म उवाच

तस्य चोद्धरणे यत्नमकुर्वंस्ते सहस्रशः ॥ ४ ।
प्रग्रहैश्चर्मपट्टैश्च तं बद्ध्वा पर्वतोपमम् ।
नाशक्नुवन् समुद्धर्तुं ततो जग्मुर्जनार्दनम् ॥

फिर तो वे सहस्रों बालक उस गिरगिटको निकालनेका यत्न करने लगे । गिरगिटका शरीर एक पर्वतके समान था । बालकोंने उसे रस्सियों और चमड़ेकी पट्टियोंसे बाँधकर खींचनेके लिये बहुत जोर लगाया परंतु वह टस से मस न हुआ । जब बालक उसे निकालनेमें सफल न हो सके, तब वे भगवान् श्रीकृष्णके पास गये ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 70 · श्लोक 5पृष्ठ 635

उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से निवेदन किया— "भगवन्! एक बहुत बड़ा गिरगिट कुएँ में पड़ा है, जो उस कुएँ के सारे आकाश को घेरकर बैठा है; पर उसे निकालने वाला कोई नहीं है।"

जब भगवान श्रीकृष्ण ने उस विशालकाय जीव को बाहर निकाला, तब उन्होंने अपने पावन हाथ के स्पर्श से राजा नृग का उद्धार कर दिया। इसके बाद उन्होंने उनसे परिचय पूछा। तब राजा ने उन्हें अपना परिचय देते हुए कहा— "प्रभो! पूर्वजन्म में मैं राजा नृग था, जिसने एक सहस्र यज्ञों का अनुष्ठान किया था।"

उनकी ऐसी बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने पूछा— "राजन्! आपने तो सदा पुण्यकर्म ही किया था, पापकर्म कभी नहीं किया, फिर आप ऐसी दुर्गति में कैसे पड़ गये? बताइये, क्यों आपको यह ऐसा कष्ट प्राप्त हुआ?"

राजा नृग ने कहा— "प्रभो! एक अग्निहोत्री ब्राह्मण परदेश चला गया था। उसके पास एक गाय थी, जो एक दिन अपने स्थान से भागकर मेरी गौओं के झुण्ड में आ मिली। उस समय मेरे ग्वालों ने दान के लिये मँगायी गयी एक हजार गौओं में उसकी भी गिनती करा दी और मैंने परलोक में मनोवाञ्छित फल की इच्छा से वह गौ भी एक ब्राह्मण को दे दी।"

शतं सहस्राणि गवां शतं पुनः पुनः शतान्यष्टशतायुतानि ।
त्वया पुरा दत्तमितीह शुश्रुम नृप द्विजेभ्यः क्व नु तद् गतं तव ॥

‘ नरेश्वर! हमने सुना है कि पूर्वकालमें आपने ब्राह्मणोंको पहले एक लाख गौएँ दान कीं । दूसरी बार सौ गौओंका दान किया । तीसरी बार पुनः सौ गौएँ दानमें दीं । फिर चौथी बार आपने गोदानका ऐसा सिलसिला चलाया कि लगातार अस्सी लाख गौओंका दान कर दिया । ( इस प्रकार आपके द्वारा इक्यासी लाख दो सौ गौएँ दानमें दी गयीं । ) आपके उन सब दानोंका पुण्यफल कहाँ चला गया? '

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 70 · श्लोक 9पृष्ठ 636

"कुछ दिनों बाद जब वह ब्राह्मण परदेश से लौटा, तब अपनी गाय ढूँढ़ने लगा। ढूँढ़ते-ढूँढ़ते जब वह गाय उसे दूसरे के घर मिली, तब उस ब्राह्मण ने, जिसकी वह गौ पहले थी, उस दूसरे ब्राह्मण से कहा— 'यह गाय तो मेरी है'।"

"फिर तो वे दोनों आपस में लड़ पड़े और अत्यन्त क्रोध में भरे हुए मेरे पास आये। उनमेंसे एक ने कहा— 'महाराज! यह गौ आपने मुझे दान में दी है।' दूसरे ने कहा— 'महाराज! वास्तव में यह मेरी गाय है। आपने उसे चुरा लिया है'।"

तावुभौ समनुप्राप्तौ विवदन्तौ भृशज्वरौ ।
भवान् दाता भवान् हर्तेत्यथ तौ मामवोचताम् ॥

‘ फिर तो वे दोनों आपसमें लड़ पड़े और अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए मेरे पास आये । उनमेंसे एकने कहा— "महाराज! यह गौ आपने मुझे दानमें दी है ( और यह ब्राह्मण इसे अपनी बता रहा है । ) ” दूसरेने कहा – “महाराज! वास्तवमें यह मेरी गाय है । आपने उसे चुरा लिया है "

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 70 · श्लोक 13पृष्ठ 637

"तब मैंने दान लेने वाले ब्राह्मण से प्रार्थनापूर्वक कहा— 'मैं इस गाय के बदले आपको दस हजार गौएँ देता हूँ (आप इन्हें इनकी गाय वापस दे दीजिये)'। यह सुनकर वह यों बोला— 'महाराज! यह गौ देश-काल के अनुरूप, पूरा दूध देने वाली, सीधी-सादी और अत्यन्त दयालु स्वभाव की है। यह बहुत मीठा दूध देने वाली है। धन्य भाग्य जो यह मेरे घर आयी। यह सदा मेरे ही यहाँ रहे। अपने दूध से यह गौ मेरे मातृहीन शिशु का प्रतिदिन पालन करती है; अतः मैं इसे कदापि नहीं दे सकता'।"

"तब मैंने उन दूसरे ब्राह्मण से याचना की— 'भगवन! उसके बदले में आप मुझसे एक लाख गौएँ ले लीजिये'। मधुसूदन! तब उस ब्राह्मण ने कहा— 'मैं राजाओं का दान नहीं लेता। मैं अपने लिये धन का उपार्जन करने में समर्थ हूँ। मुझे तो शीघ्र मेरी वही गौ ला दीजिये'।"

ब्राह्मण उवाच

न राज्ञां प्रतिगृह्णामि शक्तोऽहं स्वस्य मार्गणे ।
सैव गौर्दीयतां शीघ्रं ममेति मधुसूदन ॥

' मधुसूदन! तब उस ब्राह्मणने कहा- " मैं राजाओंका दान नहीं लेता । मैं अपने लिये धनका उपार्जन करनेमें समर्थ हूँ । मुझे तो शीघ्र मेरी वही गौ ला दीजिये "

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 70 · श्लोक 18पृष्ठ 638

"मैंने उसे सोना, चाँदी, रथ और घोड़े— सब कुछ देना चाहा; परन्तु वह उत्तम ब्राह्मण कुछ न लेकर तत्काल चुपचाप चला गया। इसी बीच में काल की प्रेरणा से मैं मृत्यु को प्राप्त हुआ और पितृलोक में पहुँचकर धर्मराज से मिला।"

"यमराज ने मेरा आदर-सत्कार करके मुझसे यह बात कही— 'राजन्! तुम्हारे पुण्यकर्मों की तो गिनती ही नहीं है। परन्तु अनजान में तुमसे एक पाप भी बन गया है। उस पाप को तुम पीछे भोगो या पहले ही भोग लो, जैसी तुम्हारी इच्छा हो, करो। आपने प्रजा के धन-जन की रक्षा के लिये प्रतिज्ञा की थी; किन्तु उस ब्राह्मण की गाय खो जाने के कारण आपकी वह प्रतिभाग झूठी हो गयी। दूसरी बात यह है कि आपने ब्राह्मण के धन का भूल से अपहरण कर लिया था। इस तरह आपके द्वारा दो तरह का अपराध हो गया है'।"

रक्षितास्मीति चोक्तं ते प्रतिज्ञा चानृता तव ।
ब्राह्मणस्वस्य चादानं द्विविधस्ते व्यतिक्रमः ॥

“ आपने प्रजाके धन -जनकी रक्षाके लिये प्रतिज्ञा की थी; किंतु उस ब्राह्मणकी गाय खो जानेके कारण आपकी वह प्रतिज्ञा झूठी हो गयी । दूसरी बात यह है कि आपने ब्राह्मणके धनका भूलसे अपहरण कर लिया था । इस तरह आपके द्वारा दो तरहका अपराध हो गया है "

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 70 · श्लोक 23पृष्ठ 639

"तब मैंने धर्मराज से कहा— 'प्रभो! मैं पहले पाप ही भोग लूँगा। उसके बाद पुण्य का उपभोग करूँगा।' इतना कहना था कि मैं पृथ्वी पर गिरा।"

पूर्वं कृच्छ्रं चरिष्येऽहं पश्चाच्छुभमिति प्रभो ।
धर्मराजं ब्रुवन्नेवं पतितोऽस्मि महीतले ॥

‘ तब मैंने धर्मराजसे कहा -प्रभो! मैं पहले पाप ही भोग लूँगा । उसके बाद पुण्यका उपभोग करूँगा । इतना कहना था कि मैं पृथ्वीपर गिरा ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 70 · श्लोक 24पृष्ठ 639

"गिरते समय उच्च स्वर से बोलते हुए यमराज की यह बात मेरे कानों में पड़ी— 'महाराज! एक हजार दिव्य वर्ष पूर्ण होने पर तुम्हारे पापकर्म का भोग समाप्त होगा। उस समय जनार्दन भगवान श्रीकृष्ण आकर तुम्हारा उद्धार करेंगे और तुम अपने पुण्यकर्मों के प्रभाव से प्राप्त हुए सनातन लोकों में जाओगे'।"

अश्रौषं पतितश्चाहं यमस्योच्चैः प्रभाषतः ।
वासुदेवः समुद्धर्ता भविता ते जनार्दनः ॥

पूर्णे वर्षसहस्रान्ते क्षीणे कर्मणि दुष्कृते ।
प्राप्स्यसे शाश्वताल्लोँकाञ्जितान् स्वेनैव कर्मणा ॥

‘ गिरते समय उच्चस्वरसे बोलते हुए यमराजकी यह बात मेरे कानोंमें पड़ी — ‘ महाराज! एक हजार दिव्य वर्ष पूर्ण होनेपर तुम्हारे पापकर्मका भोग समाप्त होगा । उस समय जनार्दन भगवान् श्रीकृष्ण आकर तुम्हारा उद्धार करेंगे और तुम अपने पुण्यकर्मोंके प्रभावसे प्राप्त हुए सनातन लोकोंमें जाओगे '

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 70 · श्लोक 25-26पृष्ठ 639

"कुएँ में गिरने पर मैंने देखा, मुझे तिर्यग्योनि (गिरगिट की देह) मिली है और मेरा सिर नीचे की ओर है। इस योनि में भी मेरी पूर्वजन्मों की स्मरणशक्ति ने मेरा साथ नहीं छोड़ा है। श्रीकृष्ण! आज आपने मेरा उद्धार कर दिया। इसमें आपके तपोबल के सिवा और क्या कारण हो सकता है? अब मुझे आज्ञा दीजिये, मैं स्वर्गलोक को जाऊँगा।"

भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें आज्ञा दे दी और वे शत्रुदमन नरेश उन्हें प्रणाम करके दिव्य मार्ग का आश्रय लेकर स्वर्गलोक को चले गये।

भरतश्रेष्ठ! कुरुनन्दन! राजा नृग के स्वर्गलोक को चले जाने पर वसुदेवनन्दन भगवान श्रीकृष्ण ने इस श्लोक का गान किया— 'समझदार मनुष्य को ब्राह्मण के धन का अपहरण नहीं करना चाहिये। चुराया हुआ ब्राह्मण का धन चोर का उसी प्रकार नाश कर देता है, जैसे ब्राह्मण की गौने राजा नृग का सर्वनाश किया था'।"

ब्राह्मणस्वं न हर्तव्यं पुरुषेण विजानता ।
ब्राह्मणस्वं हृतं हन्ति नृगं ब्राह्मणगौरिव ॥

' समझदार मनुष्यको ब्राह्मणके धनका अपहरण नहीं करना चाहिये । चुराया हुआ ब्राह्मणका धन चोरका उसी प्रकार नाश कर देता है, जैसे ब्राह्मणकी गौने राजा नृगका सर्वनाश किया था'

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 70 · श्लोक 31पृष्ठ 640

In English

The Story of King Nruga and the Giant Chameleon

Krishna rescues a giant chameleon from a well, which is revealed to be the soul of King Nruga. Nruga explains that he suffered this fate because he accidentally took property belonging to a Brahmin by giving away a cow that did not belong to him. After Krishna's touch, Nruga is freed from his animal form and ascends to heaven.

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Also written: Nrigopakhyana, Nriga, Yamaraja, नृगोपाख्यान