पानीयदानमाहात्म्य : अन्न और जल दान में से श्रेष्ठ कौन सा है?
जलदान की सर्वोच्चता
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ६ · अनुशासनपर्व → दानधर्मपर्व · अध्याय 67 · पृष्ठ 621–624
539 शब्द · 3 मिनटका पाठ · 14 श्लोक
भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा
पाप मुक्ति और अक्षय सुख की प्राप्ति हेतु
युधिष्ठिर ने भीष्म की ओर देखा और अत्यन्त जिज्ञासा के साथ पूछा— "तात! भरतनन्दन! आपने जो दानों का फल बताया है, उसे मैंने सुन लिया। यहाँ अन्नदान की विशेष रूप से प्रशंसा की गई है पितामह! अब मैं जलदान करने से कैसे महान फल की प्राप्ति होती है, इस विषय को मैं विस्तार के साथ सुनना चाहता हूँ।"
श्रुतं दानफलं तात यत् त्वया परिकीर्तितम् ।
अन्नदानं विशेषेण प्रशस्तमिह भारत ॥
युधिष्ठिरने पूछा — तात! भरतनन्दन! आपने जो दानोंका फल बताया है, उसे मैंने सुन लिया । यहाँ अन्नदानकी विशेषरूपसे प्रशंसा की गयी है ।
पानीयदानमेवैतत् कथं चेह महाफलम् ।
इत्येतच्छ्रोतुमिच्छामि विस्तरेण पितामह ॥
पितामह! अब जलदान करनेसे कैसे महान् फलकी प्राप्ति होती है, इस विषयको मैं विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ ।
हन्त ते वर्तयिष्यामि यथावद् भरतर्षभ ।
गदतस्तन्ममाद्येह शृणु सत्यपराक्रम ॥
भीष्मजी कहते हैं - सत्यपराक्रमी भरतश्रेष्ठ! मैं तुम्हें सब कुछ यथार्थ रूपसे बताऊँगा । तुम आज यहाँ मेरे मुँहसे इन सब बातोंको सुनो ।
पानीयदानात् प्रभृति सर्वं वक्ष्यामि तेऽनघ ।
यदन्नं यच्च पानीयं सम्प्रदायाश्नुते नरः ॥
अनघ! जलदानसे लेकर सब प्रकारके दानोंका फल मैं तुम्हें बताऊँगा । मनुष्य अन्न और जलका दान करके जिस फलको पाता है, वह सुनो ।
न तस्मात् परमं दानं किंचिदस्तीति मे मनः ।
अन्नात् प्राणभृतस्तात प्रवर्तन्ते हि सर्वशः ॥
तात! मेरे मनमें यह धारणा है कि अन्न और जलके दानसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है; क्योंकि अन्नसे ही सब प्राणी उत्पन्न होते और जीवन धारण करते हैं ।
तस्मादन्नं परं लोके सर्वलोकेषु कथ्यते ।
अन्नाद् बलं च तेजश्च प्राणिनां वर्धते सदा ॥
सावित्र्या ह्यपि कौन्तेय श्रुतं ते वचनं शुभम् ॥
अन्ने दत्ते नरेणेह प्राणा दत्ता भवन्त्युत ॥
प्राणदानाद्धि परमं न दानमिह विद्यते ।
श्रुतं हि ते महाबाहो लोमशस्यापि तद्वचः ॥
‘ जिस मनुष्यने यहाँ किसीको अन्न दिया है, उसने मानो प्राण दे दिये और प्राणदानसे बढ़कर इस संसारमें दूसरा कोई दान नहीं है। ' महाबाहो! इस विषयमें तुमने लोमशका भी वह वचन सुना ही है ।
प्राणान् दत्त्वा कपोताय यत् प्राप्तं शिबिना पुरा ।
तां गतिं लभते दत्त्वा द्विजस्यान्नं विशाम्पते ॥
प्रजानाथ! पूर्वकालमें राजा शिबिने कबूतरके लिये प्राणदान देकर जो उत्तम गति प्राप्त की थी, ब्राह्मणको अन्न देकर दाता उसी गतिको प्राप्त कर लेता है ।
तस्माद् विशिष्टां गच्छन्ति प्राणदा इति नः श्रुतम् ।
अन्नं वापि प्रभवति पानीयात् कुरुसत्तम ।
नीरजातेन हि विना न किंचित् सम्प्रवर्तते ॥
कुरुश्रेष्ठ! अतः प्राणदान करनेवाले पुरुष श्रेष्ठ गतिको प्राप्त होते हैं - ऐसा हमने सुना है । किंतु अन्न भी जलसे ही पैदा होता है। जलराशिसे उत्पन्न हुए धान्यके बिना कुछ भी नहीं हो सकता ।
नीरजातश्च भगवान् सोमो ग्रहगणेश्वरः ।
अमृतं च सुधा चैव स्वाहा चैव स्वधा तथा ॥
अन्नौषध्यो महाराज वीरुधश्च जलोद्भवाः ।
यतः प्राणभृतां प्राणाः सम्भवन्ति विशाम्पते ॥
महाराज! ग्रहोंके अधिपति भगवान् सोम जलसे ही प्रकट हुए हैं । प्रजानाथ! अमृत, सुधा, स्वाहा, स्वधा, अन्न, ओषधि, तृण और लताएँ भी जलसे उत्पन्न हुई हैं, जिनसे समस्त प्राणियोंके प्राण प्रकट एवं पुष्ट होते हैं ।
देवानाममृतं ह्यन्नं नागानां च सुधा तथा ।
पितॄणां च स्वधा प्रोक्ता पशूनां चापि वीरुधः ॥
देवताओंका अन्न अमृत, नागोंका अन्न सुधा, पितरोंका अन्न स्वधा और पशुओंका अन्न तृण- लता आदि है ।
अन्नमेव मनुष्याणां प्राणानाहुर्मनीषिणः ।
तच्च सर्वं नरव्याघ्र पानीयात् सम्प्रवर्तते ॥
तच्च दद्यान्नरो नित्यं यदीच्छेद् भूतिमात्मनः ॥
धन्यं यशस्यमायुष्यं जलदानमिहोच्यते ।
शत्रूंश्चाप्यधि कौन्तेय सदा तिष्ठति तोयदः ॥
जो मनुष्य अपना कल्याण चाहता है, उसे प्रतिदिन जलदान करना चाहिये । जलदान इस जगत्में धन, यश और आयुकी वृद्धि करनेवाला बताया जाता है । कुन्तीनन्दन! जलदान करनेवाला पुरुष सदा अपने शत्रुओंसे भी ऊपर रहता है ।
इस स्तुतिके श्लोक 1–66 में से आरम्भके 14 यहाँ दिये गये हैं। पूरी स्तुति मूल ग्रन्थमें पढ़ें →
भीष्म ने युधिष्ठिर के प्रश्नों को स्वीकार करते हुए कहा— "सत्यपराक्रमी भरतश्रेष्ठ! मैं तुम्हें सब कुछ यथार्थ रूप से बताऊँगा। तुम आज यहाँ मेरे मुँह से इन सब बातों को सुनो अनघ! जलदान से लेकर सब प्रकार के दानों का फल मैं तुम्हें बताऊँगा। मनुष्य अन्न और जल का दान करके जिस फल को पाता है, वह सुनो।" भीष्म के स्वर में गम्भीरता थी, "तात! मेरे मन में यह धारणा है कि अन्न और जल के दान से बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है; क्योंकि अन्न से ही सब प्राणी उत्पन्न होते हैं और जीवन धारण करते हैं। प्रजापति ने अन्न को ही सबसे उत्तम बताया है क्योंकि अन्न से ही सदा प्राणियों के तेज और बल की वृद्धि होती है।"
भीष्म ने आगे कहा— "कुन्तीनन्दन! तुमने सावित्री के शुभ वचनों को भी सुना है। देवताओं के यज्ञ में जिस हेतु से और जिस प्रकार जो वचन सावित्री ने कहे थे, वे इस प्रकार हैं— 'जिस मनुष्यने यहाँ किसी को अन्न दिया है, उसने मानो प्राण दे दिये।' इस संसार में प्राणदान से बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है। महाबाहो! इस विषय में तुमने लोमश का भी वह वचन सुना ही है, प्रजानाथ! पूर्वकाल में राजा शिबि ने कबूतर के लिये प्राणदान देकर जो उत्तम गति प्राप्त की थी, ब्राह्मण को अन्न देकर दाता उसी गति को प्राप्त कर लेता है। कुरुश्रेष्ठ! अतः प्राणदान करने वाले पुरुष श्रेष्ठ गति को प्राप्त होते हैं, ऐसा हमने सुना है।"
मौन छा गया, फिर भीष्म ने कथा को एक नए सूत्र में पिरोया— "किन्तु अन्न भी जल से ही पैदा होता है। जलराशि से उत्पन्न हुए धान्य के बिना कुछ भी नहीं हो सकता महाराज! ग्रहों के अधिपति भगवान् सोम जल से ही प्रकट हुए हैं। प्रजानाथ! अमृत, सुधा, स्वाहा, स्वधा, अन्न, ओषधि, तृण और लताएँ भी जल से ही उत्पन्न हुई हैं, जिनसे समस्त प्राणियों के प्राण प्रकट एवं पुष्ट होते हैं। देवताओं का अन्न अमृत है, नागों का अन्न सुधा है, पितरों का अन्न स्वधा है और पशुओं का अन्न तृण तथा लताएँ हैं। तस्मात् पानीयदानाद् वै न परं विद्यते क्वचित्— मनीषी पुरुषों ने अन्न को ही मनुष्यों का प्राण बताया है। पुरुषसिंह! सब प्रकार का अन्न जल से ही उत्पन्न होता है; अतः जलदान से बढ़कर दूसरा कोई दान कहीं नहीं है।"
भीष्म ने युधिष्ठिर की ओर देखते हुए कहा— "जो मनुष्य अपना कल्याण चाहता है, उसे प्रतिदिन जलदान करना चाहिए। जलदान इस जगत् में धन, यश और आयु की वृद्धि करने वाला बताया जाता है। कुन्तीनन्दन! जलदान करने वाला पुरुष सदा अपने शत्रुओं से भी ऊपर रहता है। वह इस जगत् में सम्पूर्ण कामनाओं तथा अक्षय कीर्ति को प्राप्त करता है और सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है। मृत्यु के पश्चात् वह अक्षय सुख का भागी होता है। मनु ने कहा है— तोयदो मनुजव्याघ्र स्वर्गं गत्वा महाद्युते। अक्षयान् समवाप्नोति लोकानित्यब्रवीन्मनुः। हे महातेजस्वी पुरुषसिंह! जलदान करने वाला पुरुष स्वर्ग में जाकर वहाँ के अक्षय लोकों पर अधिकार प्राप्त करता है।"
In English
Bhishma explains the importance of donating food and water
Yudhisthira asks Bhishma about the merits of donating water. Bhishma explains that while donating food is like giving life, donating water is even greater because all food and life originate from water. He states that donating water brings wealth, fame, long life, and eternal happiness in heaven.
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