श्रीगणेशाय नमः।

सुदर्शनोपाख्यान : एक गृहस्थ ने धर्म का आश्रय लेकर मृत्यु पर विजय कैसे प्राप्त की?

धर्म द्वारा मृत्यु पर विजय

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ६ · अनुशासनपर्व → दानधर्मपर्व · अध्याय 2 · पृष्ठ 39–52

1,526 शब्द · 8 मिनटका पाठ · 13 श्लोक

भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर से कहा

युधिष्ठिर के धर्म और अर्थयुक्त उपदेश सुनने की जिज्ञासा पर।

युधिष्ठिर ने जिज्ञासा प्रकट करते हुए कहा— "हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, सर्वशास्त्र-विशारद और महाप्राज्ञ पितामह! मैंने इस महत्त्वपूर्ण उपाख्यान को बड़े ध्यान से सुना है। हे नरेश्वर! अब मैं पुनः आपके मुख से कुछ और धर्म तथा अर्थयुक्त उपदेश सुनना चाहता हूँ। आप मुझे विस्तारपूर्वक बताइए कि किस गृहस्थ ने केवल धर्म का आश्रय लेकर मृत्यु पर विजय प्राप्त की? यह सब बातें मुझे यथार्थ रूप से कहिए।"

युधिष्ठिर उवाच

केन मृत्युर्गृहस्थेन धर्ममाश्रित्य निर्जितः ।
इत्येतत् सर्वमाचक्ष्व तत्त्वेनापि च पार्थिव ॥

भूपाल! किस गृहस्थने केवल धर्मका आश्रय लेकर मृत्युपर विजय पायी है? यह सब बातें आप यथार्थरूपसे कहिये ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 2 · श्लोक 3पृष्ठ 40

भीष्म पितामह ने कहा— "हे राजन्! एक गृहस्थ ने जिस प्रकार धर्म का आश्रय लेकर मृत्यु पर विजय प्राप्त की थी, उसके विषय में एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया जाता है। प्रजापति मनु के एक पुत्र हुए, जिनका नाम इक्ष्वाकु था। वे सूर्य के समान तेजस्वी थे और उन्होंने सौ पुत्रों को जन्म दिया। उनमें से दसवें पुत्र का नाम दशाश्व था, जो माहिष्मतीपुरी में राज्य करता था। वह बड़ा ही धर्मात्मा और सत्यपराक्रमी राजा था।"

युधिष्ठिर उवाच

पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
श्रुतं मे महदाख्यानमिदं मतिमतां वर ॥

युधिष्ठिरने कहा- बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ सर्वशास्त्र- विशारद महाप्राज्ञ पितामह! इस महत्त्वपूर्ण उपाख्यानको मैंने बड़े ध्यानसे सुना है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 2 · श्लोक 1पृष्ठ 40

"दशाश्व का पुत्र भी बड़ा धर्मात्मा राजा हुआ, जिसका नाम मदिराश्व था। वह इस भूतल पर मदिराश्व के नाम से विख्यात हुआ और सदा वेद एवं धनुर्वेद के अभ्यास में संलग्न रहता था। मदिराश्व का पुत्र महाभाग, महातेजस्वी और महान धैर्यशाली राजा द्युतिमान हुआ। द्युतिमान का पुत्र परम धर्मात्मा राजा सुवीर हुआ, जो सम्पूर्ण लोकों में विख्यात था। वह कोश से सम्पन्न और देवराज इन्द्र के समान पराक्रमी था। सुवीर का पुत्र दुर्जय नाम से विख्यात हुआ, जो सभी सङ्ग्रामों में शत्रुओं के लिए दुर्जय तथा सम्पूर्ण शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ था। दुर्जय के एक पुत्र हुए जिनका नाम दुर्योधन था। वह इन्द्र के समान कान्तिमान और राजर्षियों में श्रेष्ठ महान राजा था।"

"राजा दुर्योधन के राज्य में इन्द्र सदा उचित मात्रा में वर्षा करते थे। उनका नगर और राज्य रत्न, धन, पशु तथा धान्यों से भरा-पूरा रहता था। उनके राज्य में कहीं भी कोई कृपण, दुर्गतिग्रस्त, रोगी अथवा दुर्बल मनुष्य दिखाई नहीं देता था। वह राजा अत्यन्त उदार, मधुरभाषी, जितेन्द्रिय, दयालु और पराक्रमी था। वह कभी अपनी प्रशंसा नहीं करता था; वह वेद-वेदाङ्गों का विद्वान्, यज्ञकर्ता और सत्यप्रतिज्ञ था।"

यज्वा च दान्तो मेधावी ब्रह्मण्यः सत्यसङ्गरः ।
न चावमन्ता दाता च वेदवेदाङ्गपारगः ॥

राजा दुर्योधन वेद- वेदाङ्गोंका पारङ्गत विद्वान्, यज्ञकर्ता, जितेन्द्रिय, मेधावी, ब्राह्मणभक्त और सत्यप्रतिज्ञ था । वह सबको दान देता और किसीका भी अपमान नहीं करता था ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 2 · श्लोक 17पृष्ठ 42

"एक समय शीतल जल वाली पवित्र देवनदी नर्मदा उस पुरुषसिंह को सम्पूर्ण हृदय से चाहने लगी और उसकी पत्नी बन गई। राजा दुर्योधन और नर्मदा के मिलन से एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसका नाम सुदर्शना था। वह रूप से इतनी सुन्दर थी कि जैसी नारी सुदर्शना थी, वैसी रूपवती स्त्री नारियों में पहले कभी नहीं हुई थी। राजकन्या सुदर्शना पर साक्षात् अग्निदेव आसक्त हो गए। उन्होंने एक ब्राह्मण का रूप धारण किया और राजा से उस कन्या को माँगा। राजा ने यह सोचकर कि यह ब्राह्मण दरिद्र है और मेरे समान वर्ण का भी नहीं है, अपनी पुत्री सुदर्शना को उसके हाथ में देने से मना कर दिया।"

दरिद्रश्चासवर्णश्च ममायमिति पार्थिवः ।
न दित्सति सुतां तस्मै तां विप्राय सुदर्शनाम् ॥

राजा यह सोचकर कि एक तो यह दरिद्र है और दूसरे मेरे समान वर्णका नहीं है, अपनी पुत्री सुदर्शनाको उस ब्राह्मणके हाथमें नहीं देना चाहते थे ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 2 · श्लोक 22पृष्ठ 42

"इस कारण अग्निदेव रुष्ट होकर यज्ञ से अदृश्य हो गए। इससे राजा को बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने व्याकुल होकर ब्राह्मणों से पूछा— 'विप्रवर! मुझसे या आप लोगों से कौन सा ऐसा दुष्कर्म हो गया है जिससे अग्निदेव नष्ट हो गए?' तब उन ब्राह्मणों ने मौन रहकर भगवान् अग्नि की शरण ली। रात के समय भगवान् हव्यवाहन ने अपना तेजस्वी रूप प्रकट किया और उन ब्राह्मणों को दर्शन दिए। उन्होंने कहा— 'मैं दुर्योधन की पुत्री का अपने लिए वरण करता हूँ।' सुबह जब ब्राह्मणों ने यह बात राजा को बताई, तो राजा अत्यन्त हर्षित हुए और उन्होंने ‘तथास्तु’ कहकर प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। उन्होंने कन्या के शुल्क के रूप में प्रार्थना की— 'चित्रभानो! इस नगरी में आपका सदा निवास बना रहे।' अग्निदेव ने कहा— 'एवमस्तु'।"

तमाह भगवानग्निरेवमस्त्विति पार्थिवम् ।
ततः सांनिध्यमद्यापि माहिष्मत्यां विभावसोः ॥

यह सुनकर भगवान् अग्निने राजासे कहा, 'एवमस्तु ( ऐसा ही होगा ) ' । तभीसे आजतक माहिष्मती नगरीमें अग्निदेवका निवास बना हुआ है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 2 · श्लोक 32पृष्ठ 44

"राजा दुर्योधन ने अपनी कन्या को सुन्दर वस्त्रों और आभूषणों से अलङ्कृत करके महात्मा अग्नि के हाथ में सौंप दिया। अग्निदेव ने वेदोक्त विधि से राजकन्या सुदर्शना को वैसे ही ग्रहण किया जैसे यज्ञ में वसुधारा ग्रहण की जाती है। सुदर्शना के रूप और शील को देखकर अग्निदेव अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने उसके गर्भ में अपना अंश रखा। कुछ काल के पश्चात अग्नि के उस पुत्र का नाम सुदर्शन पड़ा। वह चन्द्रमा के समान मनोहर था और उसे बचपन में ही सनातन परब्रह्म का ज्ञान हो गया था।"

"उन दिनों राजा नृग के पितामह ओघवान पृथ्वी पर राज्य करते थे। उनकी एक कन्या थी जिसका नाम ओघवती था। ओघवान ने अपनी उस पुत्री को विद्वान् सुदर्शन को पत्नी बनाने के लिए दे दिया। सुदर्शन ने ओघवती के साथ गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए कुरुक्षेत्र में निवास किया। उस बुद्धिमान सुदर्शन ने एक प्रतिज्ञा कर ली थी— 'मैं गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए ही मृत्यु को जीत लूँगा।' उसने अपनी पत्नी ओघवती से कहा— 'देवि! तुम्हें अतिथि के प्रतिकूल कोई कार्य नहीं करना चाहिए। जिस वस्तु से अतिथि सन्तुष्ट हो, वह तुम्हें सदा देनी चाहिए; यदि सन्तोष के लिए तुम्हें मेरा शरीर भी देना पड़े, तो मन में अन्यथा विचार मत करना। सुन्दरी! अतिथि-सेवा का यह व्रत मेरे हृदय में सदा स्थित है। कल्याणि! निष्पाप! यदि तुम मुझे आदर्श मानती हो, तो मैं घर में रहूँ या कहीं दूर निकल जाऊँ, तुम्हें किसी भी दशा में अतिथि का अनादर नहीं करना चाहिए।'"

गृहस्थश्चावजेष्यामि मृत्युमित्येव स प्रभो ।
प्रतिज्ञामकरोद् धीमान् दीप्ततेजा विशाम्पते ॥

प्रजानाथ! प्रभो! उद्दीप्त तेजवाले उस बुद्धिमान् सुदर्शनने यह प्रतिज्ञा कर ली कि मैं गृहस्थ- धर्मका पालन करते हुए ही मृत्युको जीत लूँगा ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 2 · श्लोक 41पृष्ठ 45

यह कथा युधिष्ठिर के उस प्रश्न पर आधारित है, जिसमें उन्होंने पूछा था कि किस गृहस्थ ने धर्म का आश्रय लेकर मृत्यु पर विजय प्राप्त की थी। भीष्मजी कहते हैं— हे कुन्तीपुत्र!

सुदर्शन के वचन सुनकर ओघवती ने दोनों हाथ जोड़कर और अपना मस्तक झुकाकर कहा— 'कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जो मैं आपकी आज्ञा से किसी कारणवश न कर सकूँ।' उन दिनों गृहस्थ-धर्म में स्थित सुदर्शन को जीतने की इच्छा से मृत्यु सदा उनके पीछे लगी रहती थी। एक दिन जब अग्निपुत्र सुदर्शन समिधा लाने के लिए बाहर चले गए, उसी समय उनके घर पर एक तेजस्वी ब्राह्मण अतिथि आया। उस ब्राह्मण ने ओघवती से कहा— 'वरवर्णिनि! यदि तुम गृहस्थ-सम्मत धर्म को मान्य समझती हो तो आज मैं तुम्हारे द्वारा किया गया आतिथ्य-सत्कार ग्रहण करना चाहता हूँ।'

आतिथ्यं कृतमिच्छामि त्वयाद्य वरवर्णिनि ।
प्रमाणं यदि धर्मस्ते गृहस्थाश्रमसम्मतः ॥

‘ वरवर्णिनि! यदि तुम गृहस्थसम्मत धर्मको मान्य समझती हो तो आज मैं तुम्हारे द्वारा किया गया आतिथ्यसत्कार ग्रहण करना चाहता हूँ ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 2 · श्लोक 50पृष्ठ 46

राजकुमारी ओघवती ने उस ब्राह्मण का पूजन किया, उसे बैठने के लिए आसन दिया और पैर धोने के लिए जल लाकर पूछा— 'विप्रवर! आपको किस वस्तु की आवश्यकता है? मैं आपकी सेवा में क्या भेंट करूँ?' तब उस ब्राह्मण ने राजकुमारी से कहा— 'कल्याणि! मुझे तुमसे ही काम है। तुम निःशङ्क होकर मेरा यह प्रिय कार्य करो। रानी! यदि तुम्हें गृहस्थ-सम्मत धर्म मान्य है तो मुझे अपना शरीर देकर मेरा प्रिय कार्य करना चाहिए।' राजकुमारी ने बार-बार अनुरोध किया कि कोई अन्य वस्तु माँगी जाए, किन्तु उस ब्राह्मण ने उसके शरीर के दान के सिवा और कुछ नहीं माँगा। तब ओघवती ने अपने पति के उन वचनों को याद किया और लजाते हुए कहा— 'अच्छा, आपकी आज्ञा स्वीकार है।'

सा तु राजसुता स्मृत्वा भर्तुर्वचनमादितः ।
तथेति लज्जमाना सा तमुवाच द्विजर्षभम् ॥

तब राजकुमारीने पहले कहे हुए पतिके वचनको याद करके लजाते - लजाते उस द्विजश्रेष्ठसे कहा — ‘ अच्छा, आपकी आज्ञा स्वीकार है '

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 2 · श्लोक 56पृष्ठ 47

जब वह राजकुमारी ब्राह्मण के साथ घर के भीतर गई, तभी सुदर्शन समिधा लेकर लौट आए। मृत्यु क्रूर भावना से उनके पीछे लगी थी, मानो कोई स्नेही बन्धु अपने प्रिय बन्धु के पीछे-पीछे चल रहा हो। आश्रम पहुँचकर सुदर्शन अपनी पत्नी को पुकारने लगे— 'देवि! तुम कहाँ चली गयी? मेरी वह साध्वी पत्नी कहाँ है? वह सुशीला कहाँ चली गयी? मेरी सेवा से बढ़कर कौन गुरुतर कार्य उस पर आ पड़ा? वह पतिव्रता, सत्य बोलने वाली और सदा सरल भाव से रहने वाली है। आज पहले की भाँति मुस्कुराती हुई वह मेरी अगवानी क्यों नहीं कर रही है?'

जिगीषमाणस्तु गृहे तदा मृत्युः सुदर्शनम् ।
पृष्ठतोऽन्वगमद् राजन् रन्ध्रान्वेषी तदा सदा ॥

राजन्! उन दिनों गृहस्थ- धर्ममें स्थित हुए सुदर्शनको जीतनेकी इच्छासे मृत्यु उनका छिद्र खोजती हुई सदा उनके पीछे लगी रहती थी ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 2 · श्लोक 48पृष्ठ 46

तभी भीतर बैठे ब्राह्मण ने उत्तर दिया— 'अग्निकुल! तुम्हें ज्ञात होना चाहिए कि मैं ब्राह्मण हूँ और तुम्हारे घर पर अतिथि के रूप में आया हूँ। तुम्हारी इस पत्नी ने अतिथि सत्कार द्वारा मेरी इच्छा पूर्ण करने का वचन दिया है। मैंने इसे ही वरण कर लिया है। अब यहाँ तुम्हें दूसरा जो कुछ उचित प्रतीत हो, वह कर सकते हो।'

अनेन विधिना सेयं मामर्च्छति शुभानना ।
अनुरूपं यदत्रान्यत् तद् भवान् कर्तुमर्हति ॥

' इसी विधिके अनुसार यह सुमुखी इस समय मेरी सेवामें उपस्थित हुई है । अब यहाँ तुम्हें दूसरा जो कुछ उचित प्रतीत हो, वह कर सकते हो'

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 2 · श्लोक 66पृष्ठ 48

उसी क्षण मृत्यु हाथ में लोह-दण्ड लिए सुदर्शन के पीछे आकर खड़ी हो गई। वह सोचने लगी कि अब तो यह अपनी प्रतिगा तोड़ बैठेगा, इसलिए इसे यहीं मार डालूँगी। परन्तु सुदर्शन मन, वाणी, नेत्र और क्रिया से ईर्ष्या तथा क्रोध का त्याग कर चुके थे। वे हँसते हुए बोले— 'विप्रवर! आपकी सुरत कामनापूर्ण हो। इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता है; क्योंकि घर पर आए हुए अतिथि का पूजन करना गृहस्थ के लिए सबसे बड़ा धर्म है। मेरे प्राण, मेरी पत्नी तथा जो कुछ धन-दौलत है, वह सब मेरी ओर से अतिथियों के लिए निछावर है, ऐसा मैंने व्रत ले रखा है। इस सत्य को सिद्ध करने के लिए मैं स्वयं ही अपने शरीर को छूकर शपथ खाता हूँ— आज मेरी यह वाणी यदि मिथ्या है, तो देवता मुझे जलाकर भस्म कर डालें!'

यथैषा नानृता वाणी मयाद्य समुदीरिता ।
तेन सत्येन मां देवाः पालयन्तु दहन्तु वा ॥

' आज मेरी कही हुई यह वाणी यदि मिथ्या नहीं है तो इस सत्यके प्रभावसे देवता मेरी रक्षा करें, अथवा मिथ्या होनेपर मुझे जलाकर भस्म कर डालें '

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 2 · श्लोक 75पृष्ठ 49

सुदर्शन के इतना कहते ही सम्पूर्ण दिशाओं से आवाज आने लगी— 'तुम्हारा कथन सत्य है। इसमें झूठ का लेश भी नहीं है।' तब वह ब्राह्मण आश्रम से बाहर निकला और वायु की भाँति तीनों लोकों में व्याप्त होकर कहने लगा— 'निष्पाप सुदर्शन! तुम्हारा कल्याण हो। मैं धर्म हूँ और तुम्हारी परीक्षा लेने आया था। तुमने इस मृत्यु को जीत लिया है। पुरुषोत्तम! तीनों लोकों में ऐसी कोई शक्ति नहीं जो तुम्हारी पत्नी की ओर कलुषित भावना से आँख उठाकर देख सके। वह तुम्हारे गुणों और अपने पातिव्रत्य से सुरक्षित है। वह अपने तपोबल से संसार को पवित्र करने के लिए आधी नदी ओघवती बनेगी और आधी तुम्हारी सेवा में रहेगी। तुम भी इसी शरीर से उन दिव्य लोकों में जाओगे क्योंकि तुमने मृत्यु को जीत लिया है।'

एषा हि तपसा स्वेन संयुक्ता ब्रह्मवादिनी ।
पावनार्थं च लोकस्य सरिच्छ्रेष्ठा भविष्यति ॥

अर्धेनौघवती नाम त्वामर्धेनानुयास्यति ।
शरीरेण महाभागा योगो ह्यस्या वशे स्थितः ॥

‘ अपने तपोबलसे युक्त यह ब्रह्मवादिनी नारी संसारको पवित्र करनेके लिये अपने आधे शरीरसे ओघवती नामवाली श्रेष्ठ नदी होगी और आधे शरीरसे यह परम सौभाग्यवती सती तुम्हारी सेवामें रहेगी । योग सदा इसके वशमें रहेगा ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 2 · श्लोक 83-84पृष्ठ 51

भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! इसके बाद इन्द्र स्वयं उत्तम रथ लेकर उनसे मिलने आए। इस प्रकार सुदर्शन ने अतिथि सत्कार के पुण्य से मृत्यु, आत्मा, काल और क्रोध पर विजय प्राप्त की। जो गृहस्थ सुशील अतिथि का सत्कार करता है, वह सौ यज्ञों से भी बढ़कर फल पाता है। यह उत्तम आख्यान धन, यश और आयु प्रदान करने वाला है।

धन्यं यशस्यमायुष्यमिदमाख्यानमुत्तमम् ।
बुभूषताभिमन्तव्यं सर्वदुश्चरितापहम् ॥

यह उत्तम आख्यान धन, यश और आयुकी प्राप्ति करानेवाला है । इससे सब प्रकारके दुष्कर्मोंका नाश हो जाता है, अतः अपनी उन्नति चाहनेवाले पुरुषको सदा ही इसके प्रति आदरबुद्धि रखनी चाहिये ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 2 · श्लोक 95पृष्ठ 52

In English

The Story of Sudarshana and His Victory Over Death

King Duryodhana's daughter Sudarshana marries the fire-born Sudarshana, who vows to honor all guests even at his own expense. When a Brahmin guest demands Sudarshana's body as hospitality, his wife Oghavati complies to uphold her husband's vow. Upon hearing this, Sudarshana joyfully accepts the sacrifice of his guest's request, proving his devotion to dharma and defeating death.

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Also written: Sudarshanopakhyana, Sudarshana, Ikshvaku, Dashashva, Madirashva, Dyutimana, Suvira, Durjaya, Duryodhana, Agnideva, Oghavati, सुदर्शनोपाख्यान