श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 31–40

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 31–40

पृष्ठ 31

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इसलिये इस सर्पको तुम जीवित छोड़ दो ॥ ३१ ॥

लुब्धक उवाच वृत्रं हत्वा देवराट् श्रेष्ठभाग् वै यज्ञं हत्वा भागमवाप चैव । शूली देवो देववृत्तं चर त्वं क्षिप्रं सर्पं जहि मा भूत् ते विशङ्का ॥ ३२ ॥

व्याधने कहा- देवि! वृत्रासुरका वध करके देवराज इन्द्र श्रेष्ठ पदके भागी हुए और त्रिशूलधारी रुद्रदेवने दक्षके यज्ञका विध्वंस करके उसमें अपने लिये भाग प्राप्त किया । तुम भी देवताओंद्वारा किये गये इस बर्तावका ही पालन करो । इस सर्पको शीघ्र ही मार डालो । इस कार्यमें तुम्हें शंका नहीं करनी चाहिये ॥ ३२ ॥

भीष्म उवाच

असकृत् प्रोच्यमानापि गौतमी भुजगं प्रति ।

लुब्धकेन महाभागा पापे नैवाकरोन्मतिम् ॥ ३३ ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! व्याधके बार- बार कहने और उकसानेपर भी महाभागा गौतमीने सर्पको मारनेका विचार नहीं किया ॥ ३३ ॥

ईषदुच्छ्वसमानस्तु कृच्छ्रात् संस्तभ्य पन्नगः ।

उत्ससर्ज गिरं मन्दां मानुषीं पाशपीडितः ॥ ३४ ॥

उस समय बन्धनसे पीड़ित होकर धीरे- धीरे साँस लेता हुआ वह साँप बड़ी कठिनाईसे अपनेको सँभालकर मन्दस्वरसे मनुष्यकी वाणीमें बोला ॥ ३४ ॥

सर्पउवाच

को न्वर्जुनक दोषोऽत्र विद्यते मम बालिश ।

अस्वतन्त्रं हि मां मृत्युर्विवशं यदचूचुदत् ॥ ३५ ॥

सर्पने कहा — ओ नादान अर्जुनक! इसमें मेरा क्या दोष है? मैं तो पराधीन हूँ । मृत्युने मुझे विवश करके इस कार्यके लिये प्रेरित किया था ॥ ३५ ॥

तस्यायं वचनाद् दष्टो न कोपेन न काम्यया ।

तस्य तत्किल्बिषं लुब्ध विद्यते यदि किल्बिषम् ॥ ३६ ॥

उसके कहनेसे ही मैंने इस बालकको हँसा है, क्रोधसे और कामनासे नहीं । व्याध! यदि इसमें कुछ अपराध है तो वह मेरा नहीं, मृत्युका है ॥ ३६ ॥

लुब्धक उवाच

यद्यन्यवशगेनेदं कृतं ते पन्नगाशुभम् ।

कारणं वै त्वमप्यत्र तस्मात् त्वमपि किल्बिषी ॥ ३७ ॥

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व्याधने कहा — ओ सर्प! यद्यपि तूने दूसरेके अधीन होकर यह पाप किया है तथापि तू भी तो इसमें कारण है ही; इसलिये तू भी अपराधी है ॥ ३७ ॥

मृत्पात्रस्य क्रियायां हि दण्डचक्रादयो यथा ।

कारणत्वे प्रकल्प्यन्ते तथा त्वमपि पन्नग ॥ ३८ ॥

सर्प! जैसे मिट्टीका बर्तन बनाते समय दण्ड और चाक आदिको भी उसमें कारण माना जाता है, उसी प्रकार तू भी इस बालकके वधमें कारण है ॥ ३८ ॥

किल्बिषी चापि मे वध्यः किल्बिषी चासि पन्नग ।

आत्मानं कारणं ह्यत्र त्वमाख्यासि भुजङ्गम ॥ ३ ९ ॥

भुजंगम! जो भी अपराधी हो, वह मेरे लिये वध्य है; पन्नग! तू भी अपराधी है ही; क्योंकि तू स्वयं अपने आपको इसके वधमें कारण बताता है ॥ ३ ९ ॥ सर्पउवाच

सर्व एते ह्यस्ववशा दण्डचक्रादयो यथा ।

तथाहमपि तस्मान्मे नैष दोषो मतस्तव ॥ ४० ॥

सर्पने कहा — व्याध! जैसे मिट्टीका बर्तन बनानेमें ये दण्ड- चक्र आदि सभी कारण पराधीन होते हैं, उसी प्रकार मैं भी मृत्युके अधीन हूँ। इसलिये तुमने जो मुझपर दोष लगाया है, वह ठीक नहीं है ॥ ४० ॥

अथवा मतमेतत्ते तेऽप्यन्योन्यप्रयोजकाः ।

कार्यकारणसंदेहो भवत्यन्योन्यचोदनात् ॥ ४१ ॥

अथवा यदि तुम्हारा यह मत हो कि ये दण्ड- चक्र आदि भी एक- दूसरेके प्रयोजक होते हैं; इसलिये कारण हैं ही । किंतु ऐसा माननेसे एक- दूसरेको प्रेरणा देनेवाला होनेके कारण कार्य- कारणभावके निर्णयमें संदेह हो जाता है ॥ ४१ ॥

एवं सति न दोषो मे नास्मि वध्यो न किल्बिषी ।

किल्विषं समवाये स्यान्मन्यसे यदि किल्बिषम् ॥ ४२ ॥

ऐसी दशामें न तो मेरा कोई दोष है और न मैं वध्य अथवा अपराधी ही हूँ । यदि तुम किसीका अपराध समझते हो तो वह सारे कारणोंके समूहपर ही लागू होता है ॥ ४२ ॥

लुब्धक उवाच

कारणं यदि न स्याद् वै न कर्ता स्यास्त्वमप्युत ।

विनाशकारणं त्वं च तस्माद् वध्योऽसि मे मतः ॥ ४३ ॥

व्याधने कहा — सर्प! यदि मान भी लें कि तू अपराधका न तो कारण है और न कर्ता ही है तो भी इस बालककी मृत्यु तो तेरे ही कारण हुई है, इसलिये मैं तुझे मारने योग्य समझता हूँ ॥ ४३ ॥

असत्यपि कृते कार्ये नेह पन्नग लिप्यते ।

पृष्ठ 33

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तस्मान्नात्रैव हेतुः स्याद् वध्यः किं बहु भाषसे ॥ ४४ ॥

सर्प! तेरे मतके अनुसार यदि दुष्टतापूर्ण कार्य करके भी कर्ता उस दोषसे लिप्त नहीं होता है, तब तो चोर या हत्यारे आदि जो अपने अपराधोंके कारण राजाओंके यहाँ वध्य होते हैं, उन्हें भी वास्तवमें अपराधी या दोषका भागी नहीं होना चाहिये । ( फिर तो पाप और उसका दण्ड भी व्यर्थ ही होगा) अतः तू क्यों बहुत बकवाद कर रहा है ॥ सर्पउवाच

कार्याभावे क्रिया न स्यात् सत्यसत्यपि कारणे ।

तस्मात् समेऽस्मिन् हेतौ मे वाच्यो हेतुर्विशेषतः ॥ ४५ ॥

यद्यहं कारणत्वेन मतो लुब्धक तत्त्वतः ।

अन्यः प्रयोगे स्यादत्र किल्बिषी जन्तुनाशने ॥ ४६ ॥

सर्पने कहा — व्याध! प्रयोजक ( प्रेरक ) कर्ता रहे या न रहे, प्रयोज्य कर्ताके बिना क्रिया नहीं होती; इसलिये यहाँ यद्यपि हमलोग (मैं और मृत्यु) समानरूपसे हेतु हैं; तो भी प्रयोजक होनेके कारण मृत्युपर ही विशेषरूपसे यह अपराध लगाया जा सकता है । यदि तुम मुझे इस बालककी मृत्युका वस्तुतः कारण मानते हो तो यह तुम्हारी भूल है । वास्तवमें विचार करनेपर प्रेरणा करनेके कारण दूसरा ही ( मृत्यु ही) अपराधी सिद्ध होगा; क्योंकि वही प्राणियोंके विनाशमें अपराधी है ॥ ४५-४६ ॥ लुब्धक उवाच

वध्यस्त्वं मम दुर्बुद्धे बालघाती नृशंसकृत् ।

भाषसे किं बहु पुनर्वध्यः सन् पन्नगाधम ॥ ४७ ॥

व्याधने कहा - खोटी बुद्धिवाले नीच सर्प! तू बालहत्यारा और क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाला है; अतः निश्चय ही मेरे हाथसे वधके योग्य है । तू वध्य होकर भी अपनेको निर्दोष सिद्ध करनेके लिये क्यों बहुत बातें बना रहा है? ॥ ४७ ॥

सर्पउवाच

यथा हवींषि जुह्वाना मखे वै लुब्धकर्त्विजः ।

न फलं प्राप्नुवन्त्यत्र फलयोगे तथा ह्यहम् ॥ ४८ ॥

सर्पने कहा — व्याध! जैसे यजमानके यहाँ यज्ञमें ऋत्विज् लोग अग्निमें आहुति डालते हैं; किंतु उसका फल उन्हें नहीं मिलता । इसी प्रकार इस अपराधके फल या दण्डको भोगनेमें मुझे नहीं सम्मिलित करना चाहिये ( क्योंकि वास्तवमें मृत्यु ही अपराधी है ) ॥ ४८ ॥

भीष्म उवाच तथा ब्रुवति तस्मिंस्तु पन्नगे मृत्युचोदिते ।

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आजगाम ततो मृत्युः पन्नगं चाब्रवीदिदम् ॥ ४ ९ ॥ भीष्मजी कहते हैं – राजन्! मृत्युकी प्रेरणासे बालकको हँसनेवाला सर्प जब बारंबार अपनेको निर्दोष और मृत्युको दोषी बताने लगा तब मृत्यु देवता भी वहाँ आ पहुँचा और सर्पसे इस प्रकार बोला ॥ ४ ९ ॥ मृत्युरुवाच

प्रचोदितोऽहं कालेन पन्नग त्वामचूचुदम् ।

विनाशहेतुर्नास्य त्वमहं न प्राणिनः शिशोः ॥ ५० ॥

मृत्युने कहा - सर्प! कालसे प्रेरित होकर ही मैंने तुझे इस बालकको डँसनेके लिये प्रेरणा दी थी; अतः इस शिशुप्राणीके विनाशमें न तो तू कारण है और न मैं ही कारण हूँ ॥ ५० ॥

यथा वायुर्जलधरान् विकर्षति ततस्ततः ।

तद्वज्जलदवत् सर्प कालस्याहं वशानुगः ॥ ५१ ॥

सर्प! जैसे हवा बादलोंको इधर- उधर उड़ा ले जाती है, उन बादलोंकी ही भाँति मैं भी कालके वशमें हूँ ॥ ५१ ॥

सात्त्विका राजसाश्चैव तामसा ये च केचन ।

भावाः कालात्मकाः सर्वे प्रवर्तन्ते ह जन्तुषु ॥ ५२ ॥

सात्त्विक, राजस और तामस जितने भी भाव हैं, वे सब कालात्मक हैं और कालकी ही प्रेरणासे प्राणियोंको प्राप्त होते हैं ॥ ५२ ॥

जङ्गमाः स्थावराश्चैव दिवि वा यदि वा भुवि ।

सर्वे कालात्मकाः सर्प कालात्मकमिदं जगत् ॥ ५३ ॥

सर्प! पृथ्वी अथवा स्वर्गलोकमें जितने भी स्थावर-जङ्गम पदार्थ हैं, वे सभी कालके अधीन हैं । यह सारा जगत् ही कालस्वरूप है ॥ ५३ ॥

प्रवृत्तयश्च लोकेऽस्मिंस्तथैव च निवृत्तयः ।

तासां विकृतयो याश्च सर्वं कालात्मकं स्मृतम् ॥ ५४ ॥

इस लोकमें जितने प्रकारकी प्रवृत्ति- निवृत्ति तथा उनकी विकृतियाँ ( फल) हैं, ये सब कालके ही स्वरूप हैं ॥ ५४ ॥

आदित्यश्चन्द्रमा विष्णुरापो वायुः शतक्रतुः ।

अग्निःखं पृथिवी मित्रः पर्जन्यो वसवोऽदितिः ॥ ५५ ॥

सरितः सागराश्चैव भावाभावौ च पन्नग ।

सर्वे कालेन सृज्यन्ते ह्रियन्ते च पुनः पुनः ॥ ५६ ॥

पन्नग! सूर्य, चन्द्रमा, जल, वायु, इन्द्र, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, मित्र, पर्जन्य, वसु, -अदिति, नदी, समुद्र तथा भाव और अभाव – ये सभी कालके द्वारा ही रचे जाते हैं और

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काल ही इनका संहार कर देता है ॥

एवं ज्ञात्वा कथं मां त्वं सदोषं सर्प मन्यसे ।

अथ चैवंगते दोषे मयि त्वमपि दोषवान् ॥ ५७ ॥

सर्प! यह सब जानकर भी तुम मुझे कैसे दोषी मानते हो? और यदि ऐसी स्थितिमें भी मुझपर दोषारोपण हो सकता है, तब तो तू भी दोषी ही है ॥ सर्पउवाच

निर्दोषं दोषवन्तं वा न त्वां मृत्यो ब्रवीम्यहम् ।

त्वयाहं चोदित इति ब्रवीम्येतावदेव तु ॥ ५८ ॥

सर्पने कहा- मृत्यो! मैं तुम्हें न तो निर्दोष बताता हूँ और न दोषी ही । मैं तो इतना ही कह रहा हूँ कि इस बालकको डँसनेके लिये तूने ही मुझे प्रेरित किया था ॥ ५८ ॥

यदि काले तु दोषोऽस्ति यदि तत्रापि नेष्यते ।

दोषो नैव परीक्ष्यो मे न ह्यत्राधिकृता वयम् ॥ ५ ९ ॥

इस विषयमें यदि कालका दोष है अथवा यदि वह भी निर्दोष है तो हो, मुझे किसीके दोषकी जाँच नहीं करनी है और जाँच करनेका मुझे कोई अधिकार भी नहीं है ॥ ५ ९ ॥

निर्मोक्षस्त्वस्य दोषस्य मया कार्या यथा तथा ।

मृत्योरपि न दोषः स्यादिति मेऽत्र प्रयोजनम् ॥ ६० ॥

परंतु मेरे ऊपर जो दोष लगाया गया है, उसका निवारण तो मुझे जैसे - तैसे करना ही है । मेरे कहनेका यह प्रयोजन नहीं है कि मृत्युका भी दोष सिद्ध हो जाय ॥ ६० ॥

भीष्म उवाच

सर्पोऽथार्जुनकं प्राह श्रुतं ते मृत्युभाषितम् ।

नानागसं मां पाशेन संतापयितुमर्हसि ॥ ६१ ॥

भीष्मजी कहते हैं — युधिष्ठिर! तदनन्तर सर्पने अर्जुनकसे कहा — ' तुमने मृत्युकी बात तो सुन ली न? अब मुझ निरपराधको बन्धनमें बाँधकर कष्ट देना तुम्हारे लिये उचित नहीं है ॥ ६१ ॥

लुब्धक उवाच

मृत्योः श्रुतं मे वचनं तव चैव भुजङ्गम ।

नैव तावददोषत्वं भवति त्वयि पन्नग ॥ ६२ ॥

व्याधने कहा – पन्नग! मैंने मृत्युकी और तेरी- दोनोंकी बातें सुन लीं; किंतु भुजंगम! इससे तेरी निर्दोषता नहीं सिद्ध हो रही है ॥ ६२ ॥

मृत्युस्त्वं चैव हेतुर्हि बालस्यास्य विनाशने ।

उभयं कारणं मन्ये न कारणमकारणम् ॥ ६३ ॥

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इस बालकके विनाशमें तू और मृत्यु – दोनों ही कारण हो; अतः मैं दोनोंको ही कारण या अपराधी मानता हूँ, किसी एकको अपराधी या निरपराध नहीं मानता ॥ ६३ ॥

धिङ्मृत्युं च दुरात्मानं क्रूरं दुःखकरं सताम् ।

त्वां चैवाहं वधिष्यामि पापं पापस्य कारणम् ॥ ६४ ॥

श्रेष्ठ पुरुषोंको दुःख देनेवाले इस क्रूर एवं दुरात्मा मृत्युको धिक्कार है और तू तो इस पापका कारण है ही; इसलिये तुझ पापात्माका वध मैं अवश्य करूँगा ॥ ६४ ॥

मृत्युरुवाच

विवशौ कालवशगावावां निर्दिष्टकारिणौ ।

नावां दोषेण गन्तव्यौ यदि सम्यक् प्रपश्यसि ॥ ६५ ॥

मृत्युने कहा - व्याध! हम दोनों कालके अधीन होनेके कारण विवश हैं । हम तो केवल उसके आदेशका पालनमात्र करते हैं । यदि तुम अच्छी तरह विचार करोगे तो हमलोगोंपर दोषारोपण नहीं करोगे ॥ लुब्धक उवाच

युवामुभौ कालवशौ यदि मे मृत्युपन्नगौ ।

हर्षक्रोधौ यथा स्यातामेतदिच्छामि वेदितुम् ॥ ६६ ॥

व्याधने कहा— मृत्यु और सर्प! यदि तुम दोनों कालके अधीन हो तो मुझ तटस्थ व्यक्तिको परोपकारीके प्रति हर्ष और दूसरोंका अपकार करनेवाले तुम दोनोंपर क्रोध क्यों होता है, यह मैं जानना चाहता हूँ ॥ ६६ ॥

मृत्युरुवाच

या काचिदेव चेष्टा स्यात् सर्वा कालप्रचोदिता ।

पूर्वमेवैतदुक्तं हि मया लुब्धक कालतः ॥ ६७ ॥

मृत्युने कहा - व्याध! जगत्में जो कोई भी चेष्टा हो रही है, वह सब कालकी प्रेरणासे ही होती है । यह बात मैंने तुमसे पहले ही बता दी है ॥ ६७ ॥

तस्मादुभौ कालवशावावां निर्दिष्टकारिणौ ।

नावां दोषेण गन्तव्यौ त्वया लुब्धक कर्हिचित् ॥ ६८ ॥

अतः व्याध! हम दोनोंको कालके अधीन और कालके ही आदेशका पालक समझकर तुम्हें कभी हमारे ऊपर दोषारोपण नहीं करना चाहिये ॥ ६८ ॥

भीष्म उवाच

अथोपगम्य कालस्तु तस्मिन् धर्मार्थसंशये ।

अब्रवीत् पन्नगं मृत्युं लुब्धं चार्जुनकं तथा ॥ ६ ९ ॥

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भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! तदनन्तर धार्मिक विषयमें संदेह उपस्थित होनेपर काल भी वहाँ आ पहुँचा; तथा सर्प, मृत्यु एवं अर्जुनक व्याधसे इस प्रकार बोला ॥ ६ ९ ॥ कालउवाच

न ह्यहं नाप्ययं मृत्युर्नायं लुब्धक पन्नगः ।

किल्बिषी जन्तुमरणे न वयं हि प्रयोजकाः ॥ ७० ॥

कालने कहा — व्याध! न तो मैं, न यह मृत्यु और न यह सर्प ही इस जीवकी मृत्युमें अपराधी हैं । हमलोग किसीकी मृत्युमें प्रेरक या प्रयोजक भी नहीं हैं ॥ ७० ॥

अकरोद् यदयं कर्म तन्नोऽर्जुनक चोदकम् ।

विनाशहेतुर्नान्योऽस्य वध्यतेऽयं स्वकर्मणा ॥ ७१ ॥

अर्जुनक! इस बालकने जो कर्म किया है वही इसकी मृत्युमें प्रेरक हुआ है, दूसरा कोई

इसके विनाशका कारण नहीं है । यह जीव अपने कर्मसे ही मरता है ॥ ७१ ॥

यदनेन कृतं कर्म तेनायं निधनं गतः ।

विनाशहेतुः कर्मास्य सर्वे कर्मवशा वयम् ॥ ७२ ॥

इस बालकने जो कर्म किया है, उसीसे यह मृत्युको प्राप्त हुआ है । इसका कर्म ही

इसके विनाशका कारण है । हम सब लोग कर्मके ही अधीन हैं ॥ ७२ ॥

कर्मदायादवाँल्लोकः कर्मसम्बन्धलक्षणः ।

कर्माणि चोदयन्तीह यथान्योन्यं तथा वयम् ॥ ७३ ॥

संसारमें कर्म ही मनुष्योंका पुत्र -पौत्रके समान अनुगमन करनेवाला है । कर्म ही दुःख-सुखके सम्बन्धका सूचक है । इस जगत् में कर्म ही जैसे परस्पर एक- दूसरेको प्रेरित करते हैं, वैसे ही हम भी कर्मोंसे ही प्रेरित हुए हैं ॥ ७३ ॥

यथा मृत्पिण्डतः कर्ता कुरुते यद् यदिच्छति ।

एवमात्मकृतं कर्म मानवः प्रतिपद्यते ॥ ७४ ॥

जैसे कुम्हार मिट्टीके लोंदेसे जो- जो बर्तन चाहता है वही बना लेता है । उसी प्रकार मनुष्य अपने किये हुए कर्मके अनुसार ही सब कुछ पाता है ॥ ७४ ॥

यथा च्छायातपौ नित्यं सुसम्बद्धौ निरन्तरम् ।

तथा कर्म च कर्ता च सम्बद्धावात्मकर्मभिः ॥ ७५ ॥

जैसे धूप और छाया दोनों नित्य-निरन्तर एक- दूसरे से मिले रहते हैं, उसी प्रकार कर्म और कर्ता दोनों अपने कर्मानुसार एक- दूसरे से सम्बद्ध होते हैं ॥ ७५ ॥

एवं नाहं न वै मृत्युने सर्पो न तथा भवान् ।

न चेयं ब्राह्मणी वृद्धा शिशुरेवात्र कारणम् ॥ ७६ ॥

इस प्रकार विचार करनेसे न मैं, न मृत्यु, न सर्प, न तुम ( व्याध) और न यह बूढ़ी ब्राह्मणी ही इस बालककी मृत्युमें कारण है । यह शिशु स्वयं ही कर्मके अनुसार अपनी

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मृत्युमें कारण हुआ है ॥ ७६ ॥

तस्मिंस्तथा ब्रुवाणे तु ब्राह्मणी गौतमी नृप ।

स्वकर्मप्रत्ययाँल्लोकान् मत्वार्जुनकमब्रवीत् ॥ ७७ ॥

नरेश्वर! कालके इस प्रकार कहनेपर गौतमी ब्राह्मणीको यह निश्चय हो गया कि

मनुष्यको अपने कर्मोंके अनुसार ही फल मिलता है । फिर वह अर्जुनकसे बोली ॥

गौतम्युवाच

नैव कालो न भुजगो न मृत्युरिह कारणम् ।

स्वकर्मभिरयं बालः कालेन निधनं गतः ॥ ७८ ॥

गौतमीने कहा – व्याध! न यह काल, न सर्प और न मृत्यु ही यहाँ कारण हैं । यह बालक अपने कर्मोंसे ही प्रेरित हो कालके द्वारा विनाशको प्राप्त हुआ है ॥ ७८ ॥

मया च तत् कृतं कर्म येनायं मे मृतः सुतः ।

यातु कालस्तथा मृत्युर्मुञ्चार्जुनक पन्नगम् ॥ ७९ ॥

अर्जुनक! मैंने भी वैसा कर्म किया था जिससे मेरा पुत्र मर गया है । अतः काल और मृत्यु अपने - अपने स्थानको पधारें; और तू इस सर्पको छोड़ दे ॥ ७ ९ ॥ भीष्म उवाच

ततो यथागतं जग्मुर्मृत्युः कालोऽथ पन्नगः ।

अभूद् विशोकोऽर्जुनको विशोका चैव गौतमी ॥ ८० ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर काल, मृत्यु और सर्प जैसे आये थे वैसे ही चले गये; और अर्जुनक तथा गौतमी ब्राह्मणीका भी शोक दूर हो गया ॥

एतत् श्रुत्वा शमं गच्छ मा भूः शोकपरो नृप ।

स्वकर्मप्रत्ययाँल्लोकान् सर्वे गच्छन्ति वै नृप ॥ ८१ ॥

नरेश्वर! इस उपाख्यानको सुनकर तुम शान्ति धारण करो, शोकमें न पड़ो । सब मनुष्य अपने- अपने कर्मोंके अनुसार प्राप्त होनेवाले लोकोंमें ही जाते हैं ॥

नैव त्वया कृतं कर्म नापि दुर्योधनेन वै ।

कालेनैतत् कृतं विद्धि निहता येन पार्थिवाः ॥ ८२ ॥

तुमने या दुर्योधनने कुछ नहीं किया है । कालकी ही यह सारी करतूत समझो, जिससे समस्त भूपाल मारे गये हैं ॥ ८२ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्येतद् वचनं श्रुत्व बभूव विगतज्वरः ।

युधिष्ठिरो महातेजाः पप्रच्छेदं च धर्मवित् ॥ ८३ ॥

पृष्ठ 39

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वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! भीष्मकी यह बात सुनकर महातेजस्वी धर्मज्ञ राजा युधिष्ठिरकी चिन्ता दूर हो गयी; तथा उन्होंने पुनः इस प्रकार प्रश्न किया ॥ ८३ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गौतमीलुब्धकव्यालमृत्युकालसंवादे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गौतमीब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालका संवादविषयक पहला अध्याय पूराहुआ ॥ १ ॥

Fard

पृष्ठ 40

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द्वितीयोऽध्यायः प्रजापति मनुके वंशका वर्णन, अग्निपुत्र सुदर्शनका अतिथिसत्काररूपी धर्मके पालनसे मृत्युपर विजय पाना युधिष्ठिर उवाच

पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।

श्रुतं मे महदाख्यानमिदं मतिमतां वर ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने कहा- बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ सर्वशास्त्र- विशारद महाप्राज्ञ पितामह! इस महत्त्वपूर्ण उपाख्यानको मैंने बड़े ध्यानसे सुना है ॥ १ ॥

भूयस्तु श्रोतुमिच्छामि धर्मार्थसहितं नृप ।

कथ्यमानं त्वया किञ्चित् तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ २ ॥

नरेश्वर! अब मैं पुनः आपके मुखसे कुछ और धर्म तथा अर्थयुक्त उपदेश सुनना चाहता हूँ, अतः आप मुझे इस विषयको विस्तारपूर्वक बताइये ॥ २ ॥

केन मृत्युर्गृहस्थेन धर्ममाश्रित्य निर्जितः ।

इत्येतत् सर्वमाचक्ष्व तत्त्वेनापि च पार्थिव ॥ ३ ॥

भूपाल! किस गृहस्थने केवल धर्मका आश्रय लेकर मृत्युपर विजय पायी है? यह सब बातें आप यथार्थरूपसे कहिये ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

यथा मृत्युर्गृहस्थेन धर्ममाश्रित्य निर्जितः ॥ ४ ॥

भीष्मजीने कहा — राजन्! एक गृहस्थने जिस प्रकार धर्मका आश्रय लेकर मृत्युपर विजय पायी थी, उसके विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ ४ ॥

मनोः प्रजापते राजन्निक्ष्वाकुरभवत् सुतः ।

तस्य पुत्रशतं जज्ञे नृपतेः सूर्यवर्चसः ॥ ५ ॥

नरेश्वर! प्रजापति मनुके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम था इक्ष्वाकु । राजा इक्ष्वाकु सूर्यके समान तेजस्वी थे । उन्होंने सौ पुत्रोंको जन्म दिया ॥ ५ ॥

दशमस्तस्य पुत्रस्तु दशाश्वो नाम भारत ।

माहिष्मत्यामभूद् राजा धर्मात्मा सत्यविक्रमः ॥ ६ ॥

भारत! उनमेंसे दसवें पुत्रका नाम दशाश्व था जो माहिष्मतीपुरीमें राज्य करता था । वह बड़ा ही धर्मात्मा और सत्यपराक्रमी था ॥ ६ ॥

दशाश्वस्य सुतस्त्वासीद् राजा परमधार्मिकः ।