श्रीगणेशाय नमः।

तारकवधोपाख्यान : अजेय कहे जाने वाले तारकासुर का वध कैसे सम्भव हुआ?

दिव्य शक्ति और समर्पण

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ६ · अनुशासनपर्व → दानधर्मपर्व · अध्याय 86 · पृष्ठ 756–761

827 शब्द · 5 मिनटका पाठ · 7 श्लोक

भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा

सुवर्ण दान की महिमा और परशुराम के उदाहरण हेतु

युधिष्ठिर ने पूछा— "पितामह! सुवर्ण का विधिपूर्वक दान करने से जो वेदोक्त फल प्राप्त होते हैं, आपने उनका विस्तारपूर्वक वर्णन किया और सुवर्ण की उत्पत्ति का कारण भी बताया। अब मुझे यह बताइये कि वह तारकासुर कैसे मारा गया? पृथ्वीनाथ! आपने पहले कहा है कि वह देवताओं के लिये अवध्य था, फिर उसकी मृत्यु कैसे हुई? कृपया इसे विस्तारपूर्वक बताइये।"

भीष्म बोले— "राजेन्द्र! जब गङ्गाजी ने अग्नि द्वारा स्थापित किये हुए उस गर्भ को त्याग दिया, तब देवताओं और ऋषियों का बना-बनाया काम बिगड़ते की स्थिति में आ गया। उस कठिन समय में उन्होंने उस गर्भ के भरण-पोषण के लिये छहों कृत्तिकाओं को प्रेरित किया; क्योंकि देवाङ्गनाओं में दूसरी कोई स्त्री अग्नि एवं रुद्र के उस तेज का भरण-पोषण करने में समर्थ नहीं थी और ये कृत्तिकाएँ अपनी शक्ति से उस गर्भ को भलीभाँति धारण कर पोषण कर सकती थीं। अपने तेज के स्थापन और उत्तम वीर्य के ग्रहण द्वारा गर्भ धारण करने के कारण अग्निदेव उन छहों कृत्तिकाओं पर बहुत प्रसन्न हुए।"

षण्णां तासां ततः प्रीतः पावको गर्भधारणात् ।
स्वेन तेजोविसर्गेण वीर्येण परमेण च ॥

अपने तेजके स्थापन और उत्तम वीर्यके ग्रहणद्वारा गर्भ धारण करनेके कारण अग्निदेव उन छहों कृत्तिकाओंपर बहुत प्रसन्न हुए ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 86 · श्लोक 7पृष्ठ 758

"उन छहों कृत्तिकाओं ने अग्नि के उस गर्भ का पोषण किया। अग्निका वह सारा तेज छः मार्गों से उनके भीतर स्थापित हो चुका था। गर्भ में जब वह महामना कुमार बढ़ने लगा, तब उसके तेज से उनका सारा अङ्ग व्याप्त हो जाने के कारण वे कृत्तिकाएँ कहीं चैन नहीं पाती थीं। तदनन्तर, तेज से व्याप्त अङ्ग वाली उन समस्त कृत्तिकाओं ने प्रसवकाल उपस्थित होने पर एक साथ ही उस गर्भ को उत्पन्न किया। छह अधिष्ठानों में पला हुआ वह गर्भ जब उत्पन्न होकर एकत्व को प्राप्त हो गया, तब सुवर्ण के समीप स्थित हुए उस बालक को पृथ्वी ने ग्रहण किया।"

ततस्तं षडधिष्ठानं गर्भमेकत्वमागतम् ।
पृथिवी प्रतिजग्राह कार्तस्वरसमीपतः ॥

छः अधिष्ठानोंमें पला हुआ वह गर्भ जब उत्पन्न होकर एकत्वको प्राप्त हो गया, तब सुवर्णके समीप स्थित हुए उस बालकको पृथ्वीने ग्रहण किया ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 86 · श्लोक 11पृष्ठ 758

"वह कान्तिमान शिशु अग्निके समान प्रकाशित हो रहा था। उसके शरीर की आकृति दिव्य थी और वह देखने में बहुत ही प्रिय जान पड़ता था। वह दिव्य सरकण्डे के वन में जन्म ग्रहण करके दिनोंदिन बढ़ने लगा। कृत्तिकाओं ने देखा कि वह बालक अपनी कान्ति से सूर्य के समान प्रकाशित हो रहा है; इससे उनके हृदय में स्नेह उमड़ आया और वे सौहार्दवश अपने स्तनों का दूध पिलाकर उसका पोषण करने लगीं। इसी से चराचर प्राणियों सहित त्रिलोकी में वह कार्तिकेय के नाम से प्रसिद्ध हुआ। स्कन्दन (स्खलन) के कारण वह 'स्कन्द' कहलाया और गुहाओं में वास करने से 'गुह' नाम से विख्यात हुआ।"

"तदनन्तर तैंतीस देवता, दसों दिशाएँ, दिक्पाल, रुद्र, धाता, विष्णु, यम, पूषा, अर्यमा, भग, अंश, मित्र, साध्य, वसु, वासव (इन्द्र), अश्विनीकुमार, जल (वरुण), वायु, आकाश, चन्द्रमा, नक्षत्र, ग्रहगण, रवि तथा दूसरे-दूसरे विभिन्न प्राणी जो देवताओं के आश्रित थे, सब उस अद्भुत अग्निपुत्र 'कुमार' को देखने के लिये वहाँ आये। ऋषियों ने उसकी स्तुति की और गन्धर्वों ने उसका यश गाया। ब्राह्मणों के प्रेमी उस कुमार के छः मुख, बारह नेत्र, बारह भुजाएँ और मोटे कन्धे थे; उसकी कान्ति अग्नि तथा सूर्य के समान थी। वह सरकण्डों के झुरमुट में सो रहा था। उसे देखकर ऋषियों सहित देवताओं को बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ और उन्हें विश्वास हो गया कि अब तारकासुर मारा जाएगा। तदनन्तर सब देवता उन्हें उनकी प्रिय वस्तुएँ भेंट करने लगे।"

स्तुति

पीनांसं द्वादशभुजं पावकादित्यवर्चसम् ।
शयानं शरगुल्मस्थं दृष्ट्वा देवाः सहर्षिभिः ॥

लेभिरे परमं हर्षं मेनिरे चासुरं हतम् ।
ततो देवाः प्रियाण्यस्य सर्व एव समाहरन् ॥

ऋषियोंने स्तुति की और गन्धर्वोंने उनका यश गाया । ब्राह्मणोंके प्रेमी उस कुमारके छः मुख, बारह नेत्र, बारह भुजाएँ, मोटे कंधे और अग्नि तथा सूर्यके समान कान्ति थी । वे सरकण्डोंके झुरमुटमें सो रहे थे । उन्हें देखकर ऋषियोंसहित देवताओंको बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ और यह विश्वास हो गया कि अब तारकासुर मारा जायगा । तदनन्तर सब देवता उन्हें उनकी प्रिय वस्तुएँ भेंट करने लगे ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 86 · श्लोक 18-20पृष्ठ 759

"पक्षियों ने खेल-कूद में लगे कुमार को खिलौने दिये; गरुड़ ने विचित्र पङ्खों से सुशोभित अपना पुत्र मयूर भेंट किया। राक्षसोंने उसे उपहार रूप में सूअर और भैंसा दिये। गरुड़ के भाई अरुण ने अग्नि के समान लाल वर्ण वाला एक मुर्गा भेंट किया। चन्द्रमा ने भेंड़ा दिया, सूर्य ने मनोहर कान्ति प्रदान की और गोमाता सुरभि देवी ने एक लाख गौएँ प्रदान कीं। छागमग्निर्गुणोपेत मिला पुष्प-फलम्... सुधन्वा शकटं चैव रथं च अमितकूबरम्... श्वापदांश्च बहून् घोरांश्छत्राणि विविधानि च। वरुण ने वरुणलोक के अनेक सुन्दर एवं दिव्य हाथी दिये। देवराज इन्द्र ने सिंह, व्याघ्र, हाथी, अन्यान् पक्षी, बहुत से भयानक हिंसक जीव तथा नाना प्रकार के छत्र भेंट किये।"

क्रीडतः क्रीडनीयानि ददुः पक्षिगणाश्च ह ।
सुपर्णोऽस्य ददौ पुत्रं मयूरं चित्रबर्हिणम् ॥

पक्षियोंने खेल- कूदमें लगे हुए कुमारको खिलौने दिये, गरुडने विचित्र पंखोंसे सुशोभित अपना पुत्र मयूर भेंट किया ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 86 · श्लोक 21पृष्ठ 759

"राक्षसों और असुरों का समुदाय उन शक्तिशाली कुमार के अनुगामी हो गये। उन्हें बढ़ते देख तारकासुर ने युद्ध के लिये ललकारा; परन्तु अनेक उपाय करके भी वह उन प्रभावशाली कुमार को मारने में सफल न हो सका। देवताओं ने गुहावासी कुमार की पूजा करके उनका सेनापतिके पद पर अभिषेक किया और तारकासुर ने देवताओं पर जो अत्याचार किया था, सो कह सुनाया। महावीर्य और प्रतापी स्कन्द ने अपनी अमोघ शक्ति से तारकासुर का वध कर दिया। खेल-खेल में ही जब उन अग्निकुल के कुमार द्वारा तारकासुर मार डाला गया, तब ऐश्वर्यशाली देवेन्द्र पुनः देवताओं के राज्य पर प्रतिष्ठित किये गये। प्रतापी स्कन्द सेनापतिके पद पर रहकर बड़ी शोभा पाने लगे; वे देवताओं के ईश्वर तथा संरक्षक थे और भगवान् शङ्कर का सदा ही हित किया करते थे।"

स सेनापतिरेवाथ बभौ स्कन्दः प्रतापवान् ।
ईशो गोप्ता च देवानां प्रियकृच्छङ्करस्य च ॥

प्रतापी स्कन्द सेनापतिके ही पदपर रहकर बड़ी शोभा पाने लगे । वे देवताओंके ईश्वर तथा संरक्षक थे और भगवान् शंकरका सदा ही हित किया करते थे ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 86 · श्लोक 31पृष्ठ 761

"ये अग्निपुत्र भगवान् स्कन्द सुवर्णमय विग्रह धारण करते हैं। वे नित्य कुमारावस्था में ही रहकर देवताओं के सेनापति पद पर प्रतिष्ठित हुए हैं। सुवर्ण कार्तिकेयजी के साथ ही उत्पन्न हुआ है और अग्निका उत्कृष्ट तेज माना गया है; इसलिये वह मङ्गलमय, अक्षय एवं उत्तम रत्न है। कुरुनन्दन! नरेश्वर! इस प्रकार पूर्वकाल में वसिष्ठ जी ने परशुराम को यह सारा प्रसङ्ग एवं सुवर्ण की उत्पत्ति और माहात्म्य सुनाया था। अतः तुम स्वर्णदान के लिये प्रयत्न करो।"

एवं रामाय कौरव्य वसिष्ठोऽकथयत् पुरा ।
तस्मात् सुवर्णदानाय प्रयतस्व नराधिप ॥

कुरुनन्दन! नरेश्वर! इस प्रकार पूर्वकालमें वसिष्ठजीने परशुरामको यह सारा प्रसंग एवं सुवर्णकी उत्पत्ति और माहात्म्य सुनाया था। अतः तुम स्वर्णदानके लिये प्रयत्न करो ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 86 · श्लोक 34पृष्ठ 761

"परसुरामजी सुवर्ण का दान करके सब पापों से मुक्त हो गये और स्वर्ग में उस महान् स्थान को प्राप्त हुए जो दूसरे मनुष्यों के लिये सर्वथा दुर्लभ है।"

रामः सुवर्णं दत्त्वा हि विमुक्तः सर्वकिल्बिषैः ।
त्रिविष्टपे महत् स्थानमवापासुलभं नरैः ॥

परशुरामजी सुवर्णका दान करके सब पापोंसे मुक्त हो गये और स्वर्गमें उस महान् स्थानको प्राप्त हुए जो दूसरे मनुष्योंके लिये सर्वथा दुर्लभ है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 86 · श्लोक 35पृष्ठ 761

In English

The Birth and Victory of Skanda

The six Krittikas nurture the divine child of Agni and Rudra, who grows up to be known as Skanda. After receiving gifts from various gods and creatures, Skanda becomes the leader of the gods' army and kills the demon Tarakasura. This victory restores Indra to his throne.

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  • How was skanda born?
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  • How did skanda kill tarakasura?
  • What gifts did the gods give to skanda?
  • Why is skanda called guha?

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