श्रीगणेशाय नमः।

भस्ममाहात्म्य : पाप विनाश और आत्मिक शुद्धि हेतु भस्म का रहस्य क्या है?

भस्म द्वारा पापों का शोधन

श्रीमद्देवीभागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · एकादश स्कन्ध · अध्याय 10 · पृष्ठ 696–699

447 शब्द · 3 मिनटका पाठ · 2 श्लोक

श्रीनारायण ने नारद से कहा

नारद के कौतूहल को शान्त करने हेतु

देवर्षि नारद के मन में एक गहरा कौतूहल जागृत हुआ। उन्होंने श्रीनारायण से जिज्ञासा प्रकट करते हुए पूछा, "हे देव! यह भस्म तीन प्रकार की कैसे है? कृपया मुझे इसका विस्तार से ज्ञान दीजिए।"

श्रीनारायण ने मन्द मुस्कान के साथ उत्तर दिया, "हे देवर्षे! मैं भस्म के उन तीन प्रकारों का वर्णन करूँगा, आप ध्यानपूर्वक सुनिए। यह भस्म महान पापों को नष्ट करने वाली और विपुल कीर्ति प्रदान करने वाली है।"

स्तुति नारद उवाच

त्रिविधत्वं कथं चास्य भस्मनः परिकीर्तितम् ।
एतत्कथय मे देव महत्कौतूहलं मम ॥

त्रिविधत्वं प्रवक्ष्यामि देवर्षे भस्मनः शृणु । महापापक्षयकरं महाकीर्तिकरं परम् ॥ २ । प्रकार नारदजी बोले - हे देव! यह भस्म तीन प्रकारका कैसे कहा गया है? यह मुझे आप बताइये; क्योंकि इस विषयमें मुझे बहुत कौतूहल हो रहा है ।

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · एकादश स्कन्ध · अध्याय 10 · श्लोक 1पृष्ठ 699

श्रीनारायण बोले— "हे ब्रह्मन्! हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ अज्ञान का नाश करने वाले! अग्नि से तैयार किया गया 'गौण' भस्म ज्ञानसाधक है। इस गौण भस्म के भी अनेक प्रकार हैं, उन्हें आप जानिये। समिधा-अग्नि से उत्पन्न भस्म, पचनाग्नि यानी भोजन निर्माण की अग्नि से उत्पन्न भस्म और दावाग्नि से उत्पन्न भस्म— ये तीनों गौण भस्म कहलाती हैं।"

आगे उन्होंने वर्णों के अनुसार नियम बताते हुए कहा— "हे महामुने! समस्त त्रैवर्णिकों (ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य) को अग्निहोत्र-जन्य और विरजाग्नि-जन्य भस्म धारण करनी चाहिए। गृहस्थों के लिए विशेषकर औपासन-अग्नि से उत्पन्न भस्म श्रेष्ठ है, और ब्रह्मचारियों के लिए सात लक्षणों वाली भस्म प्रशस्त है।"

स्तुति

समिधाग्निसे उत्पन्न भस्म लगाना चाहिये ।
शूद्रों को वैदिक ब्राह्मणकी पाकशालामें भोजननिर्माणसे उत्पन्न भस्म तथा अन्य सभी जनोंको दावानलजनित भस्म ॥ ५ लगाना चाहिये ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · एकादश स्कन्ध · अध्याय 10 · श्लोक 2–53पृष्ठ 697

व्रत की विधि समझाते हुए श्रीनारायण ने कहा— "पूर्णिमा तिथि से पूर्व, त्रयोदशी के दिन विधिवत् स्नान करके, सन्ध्या आदि नित्य कर्म करने चाहिए। इसके उपरान्त अपने आचार्य से आज्ञा लेकर उनकी विशिष्ट पूजा करनी चाहिए और उन्हें प्रणाम करना चाहिए। स्वयं श्वेत वस्त्र धारण कर, शुद्ध यज्ञोपवीत पहनकर और श्वेत माला तथा चन्दनादि लगाकर यह सङ्कल्प लेना चाहिए— 'मैं इस शरीर की समाप्ति तक, अथवा बारह वर्ष, छह वर्ष, तीन वर्ष, बारह मास, छह मास, तीन मास, एक मास, बारह दिन, छह दिन, तीन दिन या एक दिन की अवधि के लिए यह व्रत अनुष्ठित करता हूँ'।"

हवन और शुद्धि की प्रक्रिया पर बल देते हुए उन्होंने कहा— "गाय के गोबर का पिण्ड बनाकर उसे पञ्चाक्षर मन्त्र से अभिमन्त्रित कर पुनः अग्नि में रखकर उसका संरक्षण करना चाहिए। उस दिन केवल हविष्यान्न ग्रहण करें। चतुर्दशी को प्रातः काल पूर्वोक्त विधि से समस्त कार्य सम्पन्न करके निराहार रहकर समय व्यतीत करें। तत्पश्चात प्रणव (ॐ) या शिवमन्त्र से सम्पूर्ण शरीर में भस्म का अनुलेपन करना चाहिए और 'त्र्यायुष' सञ्ज्ञा वाले मन्त्र से त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिए। ऐसा करने पर साधक शिवभाव को प्राप्त कर उसका आचरण करता है।"

इस व्रत के महत्व को बताते हुए बोले— "यह पाशुपतव्रत प्रातः, मध्याह्न और सायं तीनों सन्ध्याओं में किया जाना चाहिए। यह भोग और मोक्ष दोनों देने वाला है तथा पशुत्व भाव को दूर कर देता है। अतः पशुत्व का त्याग करके लिङ्गमूर्ति महादेव सदाशिव की पूजा करनी चाहिए। जो मनुष्य भस्म धारण करते हैं, उन्हें महामारी का भय नहीं रहता। यह भस्म शान्ति प्रदान करने वाली, पुष्टिकारक और सिद्धिप्रदायक है। अपनी रक्षा, कल्याण और सर्वविध सम्पदा की समृद्धि के लिए मनुष्यों को भस्म अवश्य धारण करनी चाहिए।"

In English

The Three Types of Sacred Ash and the Pashupata Vrata

Narada asks Shri Narayana about the different types of sacred ash known as bhasma. Shri Narayana explains how various ashes are produced by fire and details the specific rituals, vows, and timing required to perform the Pashupata vrata to attain spiritual benefits.

This page answers

  • What are the three types of bhasma?
  • How is the pashupata vrata performed?
  • Which ash should brahmins wear?
  • What are the benefits of wearing sacred ash?

Also written: Bhasmamahatmya, Bhasma, Shrinarayana, भस्ममाहात्म्य