श्रीगणेशाय नमः।

देवीचरित्र : अखण्ड राज्य और मोक्ष की प्राप्ति कैसे सम्भव है?

वाग्भव मन्त्र और तप का फल

श्रीमद्देवीभागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · दशम स्कन्ध · अध्याय 9 · पृष्ठ 634–637

540 शब्द · 3 मिनटका पाठ · 1 श्लोक

श्रीनारायण ने नारद से कहा

जगदम्बा के अद्भुत माहात्म्य का वर्णन करते हुए

श्रीनारायण बोले— हे नारद! अब आप अथातः श्रूयतां चित्रं देवीमाहात्म्यमुत्तमम्। जगदम्बा का अद्भुत और उत्तम माहात्म्य है। अङ्गपुत्र चाक्षुष मनु ने जिस तरह से श्रेष्ठ राज्य प्राप्त किया था, उसे सुनिए।

राजा अङ्ग के पुत्र चाक्षुष मनु छठे मनु हुए। वे अपने वैभव को बढ़ाने हेतु ब्रह्मर्षि सुपुलह की शरण में गए और अत्यन्त विनयपूर्वक बोले— "हे स्वामिन्! मुझ सेवक को ऐसी शिक्षा दीजिये; जिससे मैं 'श्री' प्राप्त कर सकूँ, पृथ्वी पर मेरा अखण्ड आधिपत्य हो जाए, मेरी भुजाओं में अप्रतिहत बल हो जाए, मैं अस्त्र-शस्त्र के प्रयोग में निपुण और समर्थ हो जाऊँ, मेरी सन्तानें चिरकाल तक जीवित रहें, मैं अखण्डित उत्तम आयु वाला होऊँ तथा आपके उपदेश से अन्त में मुझे मोक्ष प्राप्त हो जाए।"

जब चाक्षुष मनु के ये वचन मुनि पुलह के कान में पड़े, तब उन्होंने कहा— "हे राजन्! कानों को महान् सुख प्रदान करने वाली मेरी बात सुनिए। देवी की आराधना सबसे बढ़कर है। इस समय आप कल्याणी जगदम्बा की उपासना कीजिये, उन्हीं के अनुग्रह से आपको यह सब सुलभ हो जाएगा।" चाक्षुष मनु ने जिज्ञासावश पूछा— "उन देवी की परम पावन आराधना का स्वरूप क्या है और उसे किस प्रकार करना चाहिए? इसे आप मेरे ऊपर दया करके बतायें।"

श्रीनारायण उवाच

चैत्रवंशसमुद्भूतो राजा स्वारोचिषेऽन्तरे सुरथो नाम विख्यातो महाबलपराक्रमः जाते हैं ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · दशम स्कन्ध · अध्याय 9 · श्लोक 1पृष्ठ 637

मुनि पुलह ने विस्तार से समझाया— "हे राजन्! इस वाग्भव बीज मन्त्र से बढ़कर अन्य कोई बीज-मन्त्र नहीं है। इस मन्त्र के जप से ब्रह्माजी महाबली तथा सृष्टि करने की क्षमता वाले बने, भगवान विष्णु सृष्टिपालक कहलाए और भगवान शङ्कर जगत् का संहार करने वाले हुए। इन्हीं का आश्रय लेकर अन्यान्य लोकपाल भी बल और वीर्य से सम्पन्न हुए हैं।" देवी ने स्वयं कहा था— "दत्तं मन्वन्तरस्यास्य राज्यं राजन्यसत्तम। पुत्रा महाबलास्ते च भविष्यन्ति गुणाधिकाः॥" अर्थात् हे राजन! मैंने तुम्हें इस मन्वन्तर का राज्य दे दिया है; तुम्हारे पुत्र भी अत्यन्त गुणवान और महान बलशाली होंगे। तुम शीघ्र ही महान समृद्धि प्राप्त कर लोगे।

मुनि के उपदेश पाकर चाक्षुष मनु विरजा नदी के तट पर तपस्या करने के लिए पहुँच गए। वे ऐश्वर्यशाली राजा अब जीर्ण-शीर्ण पत्तों के आहार पर रहकर भगवती के 'वाग्भव' बीज मन्त्र के जप में निरन्तर रत हो गए। उनका तप अत्यन्त कठिन था— प्रथम वर्ष उन्होंने केवल पत्तों का आहार लिया, दूसरे वर्ष केवल जल पीकर रहे और तीसरे वर्ष केवल वायु का आहार करते हुए वे एक ठूँठ वृक्ष की भाँति अविचल स्थित रहे। इस प्रकार बारह वर्षों तक निरन्तर जप करते हुए राजा चाक्षुष की बुद्धि परम पवित्र हो गई।

तभी उस एकान्त में जगन्माता परमेश्वरी भगवती साक्षात् प्रकट हुईं। किसी से भी पराभूत न होने वाली वह तेजस्विनी सर्वदेवमयी भगवती अत्यन्त प्रसन्न होकर ललित वाणी में बोलीं— "हे पृथ्वीपाल! तुमने अपने मन में जो भी श्रेष्ठ वर सोचा हो, उसे बताओ; तुम्हारे तप से मैं सन्तुष्ट हूँ, मैं उसे अवश्य दूँगी।"

चाक्षुष मनु ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की— "हे देवी! मैं प्रार्थना कर रहा हूँ कि आप मुझे इस मन्वन्तर से सम्बन्धित राज्य प्रदान करें।" देवी ने उन्हें वरदान देते हुए कहा— "हे नृपश्रेष्ठ! इस मन्वन्तर का राज्य मैंने तुम्हें दे दिया। तुम्हारे पुत्र भी अत्यधिक गुणवान तथा महान बलशाली होंगे। तुम्हारा राज्य निष्कण्टक होगा तथा अन्त में तुम्हें निश्चित रूप से मोक्ष मिलेगा।"

इस प्रकार देवी उन्हें उत्तम वर प्रदान करके शीघ्र ही अन्तर्धान हो गईं। चाक्षुष मनु अपने पुत्रों सहित सार्वभौम सुखों से सम्पन्न हुए और अन्त में देवी के परम धाम को प्राप्त हुए।

In English

The Story of Chakshusha Manu and the Goddess

King Chakshusha Manu seeks the guidance of the sage Pulaha to gain power, prosperity, and salvation. Following the sage's advice, Manu performs twelve years of intense penance while chanting the Vagbhava mantra. The Goddess Jagdamba appears to him and grants him his kingdom and the promise that his sons will be powerful.

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