श्रीगणेशाय नमः।

धर्मध्वजसुतातुलस्युपाख्यान : परमेश्वर की अनन्य प्रियतमा बनने के लिए क्या आवश्यक है?

तपस्या और भक्ति का समर्पण

श्रीमद्देवीभागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · नवम स्कन्ध · अध्याय 17 · पृष्ठ 401–405

644 शब्द · 4 मिनटका पाठ · 4 श्लोक

श्रीनारायण ने नारद से कहा

परम सत्य और दिव्य प्रेम की प्राप्ति का मार्ग बताने हेतु

श्रीनारायण बोले— हे नारद! अब मैं आपको राजा धर्मध्वज की कन्या का आख्यान सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनिए।

श्रीनारायण उवाच

धर्मध्वजस्य पत्नी माधवीति च विश्रुता ।
नृपेण सार्धं सारामे रेमे च गन्धमादने ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 17 · श्लोक 1पृष्ठ 401

राजा धर्मध्वज की पत्नी माधवी नाम से प्रसिद्ध थी। वह राजा के साथ गन्धमादन पर्वत पर एक सुरम्य उपवन में विहार करती थी। वहाँ पुष्प और चन्दन से सुगन्धित शय्या पर अपने समस्त अङ्गों को चन्दन से सुसज्जित कर, रत्नाभरणों से विभूषित होकर वह स्त्रीरत्नस्वरूपिणी सर्वाङ्गसुन्दरी अपने रसिक पति के साथ कामोपभोग में लगी रहती थी। रतिक्रीड़ा के विज्ञ वे दोनों कभी भी भोग से विरत नहीं होते थे; इस प्रकार उनके दिव्य सौ वर्ष व्यतीत हो गए, किन्तु उन्हें दिन-रात का भी ज्ञान नहीं रहा। तदनन्तर राजा के हृदय में कुछ ज्ञान का उदय होने पर वे भोग से विरत हो गए, किन्तु वह कामासक्त सुन्दरी पूर्ण रूप से तृप्त नहीं हुई। दैवयोग से उसने शीघ्र ही गर्भ धारण कर लिया और वह गर्भ सौ वर्षों तक रहा।

श्रीनारायण उवाच

दधार गर्भं सा सद्यो दैवादब्दशतं सती ।
श्रीगर्भा श्रीयुता सा च सम्बभूव दिने दिने ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 17 · श्लोक 6पृष्ठ 401

अन्ततः कार्तिक पूर्णिमा की तिथि में, शुक्रवार के शुभ दिन, शुभ योग और शुभ लग्न के अत्यन्त उत्तम मुहूर्त में, उस माधवी ने लक्ष्मी की अंशस्वरूपिणी एक मनोहर कन्या को जन्म दिया। वह पीत चम्पक के वर्ण के समान आभा वाली थी और इतनी अनुपम सुन्दरी कि सभी स्त्री-पुरुष उसकी तुलना करने में असमर्थ थे; इसीलिए विद्वान् उसे तुलसी नाम से पुकारते हैं। पृथ्वी पर आते ही वह प्रकृतिदेवी जैसी योग्य स्त्री हो गई। उसने बीस हजार वर्षों तक फल और जल, तीस हजार वर्षों तक पत्तों और चालीस हजार वर्षों तक केवल वायु के आहार पर रहकर एक पैर पर स्थित होकर कठिन तपस्या की। उसके पश्चात वह दस हजार वर्षों तक निराहार रही।

श्रीनारायण उवाच

कार्तिकीपूर्णिमायां तु सितवारे च पाद्मज ।
सुषाव सा च पद्मांशां पद्मिनीं तां मनोहराम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 17 · श्लोक 8पृष्ठ 401

तपस्या में लीन उस कृशोदरी को देखकर ब्रह्माजी उसे वर प्रदान करने हेतु उत्तम बदरिकाश्रम आए। हंस पर विराजमान चतुर्मुख ब्रह्मा को देखकर तुलसी ने उन्हें प्रणाम किया। जगत् की सृष्टि करने वाले ब्रह्मा बोले— "हे तुलसी! हरिकी भक्ति, हरिकी दासता और अजरता-अमरता; इनमें से जो भी तुम्हारे मन में अभीष्ट हो, उसे माँग लो।"

श्रीनारायण उवाच

शय्यां रतिकरीं कृत्वा पुष्पचन्दनचर्चिताम् ।
चन्दनालिप्तसर्वाङ्गीं पुष्पचन्दनवायुना ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 17 · श्लोक 2पृष्ठ 401

तुलसी ने अपनी बात कहते हुए कहा— "सब कुछ जानने वाले आप ब्रह्मा के समक्ष मुझे अब लाज ही क्या है? मैं पूर्वजन्म में तुलसी नाम की गोपी थी और गोलोक में निवास करती थी। मैं भगवान श्रीकृष्ण की प्रिया, उनकी अनुचरी और उनकी प्रेयसी सखी के रूप में प्रतिष्ठित थी। मुझे यह वर दीजिए।"

ब्रह्माजी बोले— "हे सुन्दरी! भगवान श्रीकृष्ण के अंशस्वरूप सुदामा नामक गोपी ने भी इस समय भारतवर्ष में जन्म लिया है। वह राधा के शाप से दनुवंश में उत्पन्न हुआ है और शङ्खचूड़ नाम से विख्यात है; उसके समान तीनों लोकों में कोई नहीं है। उसे पूर्वजन्म की सभी बातें स्मरण हैं। हे शोभने! अब इस जन्म में तुम उसी सुदामा की पत्नी बनोगी और बाद में शान्तस्वरूप भगवान नारायण का पतिरूप में वरण करोगी। तुम उनके साथ स्वेच्छापूर्वक निरन्तर विहार करोगी।"

ब्रह्माजी की वाणी सुनकर तुलसी का चित्त प्रफुल्लित हो गया। उसने पुनः ब्रह्माजी को प्रणाम किया और कहा— "हे प्रभो! मैं अभी भी गोविन्द से अतृप्त हूँ। मैं तो उन गोविन्द की आज्ञामात्र से ही चतुर्भुज श्रीहरि के लिये प्रार्थना कर रही हूँ। अब तो मैं आपकी कृपा से उन अत्यन्त दुर्लभ गोविन्द को निश्चित रूप से प्राप्त कर लूँगी। हे प्रभो! साथ ही आप मुझे राधा के भय से भी मुक्त कर दीजिए।"

तुलसी ने आगे कहा कि वह राधा के समान ही गोविन्द की प्रेयसी हो जाएगी और राधिका उनके गुप्त प्रेम को जान नहीं पाएँगी। तब ब्रह्माजी ने देवी तुलसी को भगवती राधा का षोडशाक्षर मन्त्र, स्तोत्र, उत्तम कवच, समस्त पूजा-विधान और पुरश्चर्या का विधि क्रम बताकर उत्तम शुभाशीर्वाद प्रदान किया।

तत्पश्चात् तुलसी ने उस विधि से भगवती राधा का पूजन किया। उनकी कृपा से तुलसी देवी लक्ष्मी के समान सिद्ध हो गई और प्रसन्न होने के कारण उसके तपस्या जनित सभी कष्ट दूर हो गए; क्योंकि फल की प्राप्ति होने पर मनुष्यों का दुःख उत्तम सुख में परिणत हो जाता है। तदनन्तर भोजन-पानादि करके तथा सन्तुष्ट होकर उस तुलसी ने पुष्प-चन्दन से चर्चित मनोहर शय्या पर शयन किया।

In English

The Story of Tulsi and her Devotion to Krishna

Madhavi gives birth to a daughter named Tulsi after a hundred-year pregnancy. After performing intense penance, Tulsi meets Brahma, who reveals that she will marry Sudama (Shankhachuda) in this life and later join Lord Narayana. To ensure her union with Govinda, Tulsi performs specific rituals dedicated to Radha.

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