षष्ठ्युपाख्यान : पुत्रहीनता और शोक के समय ईश्वर से सहायता कैसे प्राप्त करें?
कर्म और भक्ति का फल
श्रीमद्देवीभागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · नवम स्कन्ध · अध्याय 46 · पृष्ठ 580–586
682 शब्द · 4 मिनटका पाठ · 6 श्लोक
नारद ने ब्रह्मण से कहा
भगवती षष्ठी की उत्पत्ति और चरित्र जानने हेतु
हे ब्रह्मन्! हे वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ! नारदजी ने कहा—मैंने अनेक उत्तम देवियों के उत्तम आख्यान सुन लिए हैं; अब आप दूसरी देवियों के चरित्र का वर्णन कीजिये। श्री नारायण बोले—हे विप्र! गये वेदों में तो सभी देवियों के चरित्र अलग-अलग बताए गए हैं, आप इनमें से किसका चरित्र सुनना चाहते हैं? तब नारदजी ने कहा—हे ब्रह्मन्! मैं भगवती षष्ठी, मङ्गलचण्डी और मनसादेवी की उत्पत्ति तथा उनके चरित्र का सार रूप में सुनना चाहता हूँ।
नारदजी बोले—स्वयम्भुव मनु के पुत्र राजा प्रियव्रत थे। वे एक योगिराज थे और सदा तपस्याओं में लीन रहते थे, इस कारण उनका विवाह करने का कोई विचार नहीं था; किन्तु ब्रह्माजी की आज्ञा और उनके प्रयत्न से उन्होंने विवाह कर लिया। विवाह के उपरान्त बहुत समय बीत गया, पर उन्हें कोई सन्तान प्राप्त नहीं हुई। तब महर्षि कश्यप ने उनसे पुत्रेष्टियज्ञ कराया और उनकी भार्या मालिनी को यज्ञचरु प्रदान किया। उस चरु को ग्रहण करते ही रानी मालिनी गर्भवती हुईं और उन्होंने उस दिव्य गर्भ को पूरे बारह वर्षों तक अपने गर्भ में धारण किए रखा।
अन्ततः, एक समय रानी ने एक ऐसे बालक को जन्म दिया जो स्वर्ण के समान कान्ति वाला था, शरीर के समस्त अवयवों से सम्पन्न था, किन्तु वह मृत था और उसकी आँखें उलटी थीं। उस दृश्य को देखकर वहाँ उपस्थित सभी स्त्रियाँ और बान्धव रोने लगे; पुत्र के इस भयानक रूप को देख माता मालिनी स्वयं गहरे शोक में मूर्च्छित होकर गिर पड़ीं।
अ ० ४६ ] नवम श्मशानं च ययौ राजा गृहीत्वा बालकं मुने ।
रुरोद तत्र कान्तारे पुत्रं कृत्वा स्ववक्षसि ॥
राजा प्रियव्रत उस बालक को लेकर श्मशान की ओर चल दिए। एक निर्जन स्थान पर पहुँचकर राजा ने उस मृत बालक को अपने वक्ष से लगा लिया और फूट-फूट कर रुदन करने लगे। उनका पुत्र-शोक इतना दारुण था कि उनका ज्ञान और योग विस्मृत हो गया; वे इतने व्याकुल हुए कि उसी क्षण अपने प्राण त्याग देने को उद्यत हो गए।
नोत्सृजद् बालकं राजा प्राणांस्त्यक्तुं समुद्यतः ।
ज्ञानयोगं विसस्मार पुत्रशोकात्सुदारुणात् ॥
तभी, राजा की दृष्टि एक दिव्य विमान पर पड़ी। उस विमान में एक अत्यन्त कमनीय और मनोहर देवी विराजमान थीं। उनका वर्ण श्वेत चम्पा के समान था, मुखमण्डल पर मन्द-मन्द मुस्कान थी और वे रत्ननिर्मित आभूषणों से अलङ्कृत थीं। वे साक्षात् कृपा की मूर्ति और भक्तों पर अनुग्रह करने हेतु परम आतुर प्रतीत हो रही थीं। उस दिव्य दृश्य को देखकर राजा ने बालक को भूमि पर रखा और अत्यन्त आदरपूर्वक देवी का स्तवन व पूजन किया।
दृष्ट्वा तां पुरतो राजा तुष्टाव परमादरात् ।
चकार पूजनं तस्या विहाय बालकं भुवि ॥
ग्रीष्मकालीन सूर्य के समान तेजस्वी और शान्त स्वभाव वाली उन कार्तिकेयप्रिया भगवती को देखकर राजा प्रियव्रत ने पूछा— "हे सुशोभने! हे कान्ते! हे सुव्रते! हे वरारोहे! समस्त स्त्रियों में परम धन्य और आदरणीय तुम कौन हो? किसकी भार्या हो और किसकी पुत्री हो?"
राजोवाच का त्वं सुशोभने कान्ते कस्य कान्तासि सुव्रते ।
कस्य कन्या वरारोहे धन्या मान्या च योषिताम् ॥
उनका प्रश्न सुनकर जगत् का कल्याण करने वाली भगवती देवसेना कहने लगीं— "मैं मातृकाओं में विख्यात हूँ और स्वामी कार्तिकेय की पतिव्रता भार्या हूँ। मैं प्रकृति का षष्ठांश भाग होने के कारण विश्व में 'षष्ठी' नाम से प्रसिद्ध हूँ। मैं पुत्रहीन को पुत्र, पतिको प्रिय पत्नी, दरिद्रों को धन और कर्म करने वालों को उनके कर्म का फल प्रदान करती हूँ।"
नृपेन्द्रस्य वचः श्रुत्वा जगन्मङ्गलचण्डिका ।
उवाच देवसेना सा देवानां रणकारिणी ॥
देवी ने आगे कहा— "यह सब कर्मों के अधीन है। मनुष्य के सुख, दुःख और पुत्र प्राप्ति का कारण उसका कर्म ही है।" इतना कहते ही देवी ने खेल-खेल में उस मृत बालक को जीवित कर दिया। राजा प्रियव्रत आश्चर्यचकित होकर स्वर्ण जैसी कान्ति वाले उस जीवित बालक को देखने लगे। तभी देवी उस बालक को लेकर आकाश की ओर जाने लगीं।
राजा का कण्ठ सूख गया, वे व्याकुल हो उठे और देवी की स्तुति करने लगे। राजा के इस स्तोत्र से प्रसन्न होकर भगवती षष्ठी ने उन्हें वचन दिया— "यह बालक लाखों मतवाले हाथियों के समान बलवान होगा; यह धनी, गुणवान, शुद्ध और विद्वानों का प्रिय बनेगा। यह समस्त लोकों में यशस्वी होकर सबको सम्पदा प्रदान करेगा।"
मुनिश्रेष्ठ! अब आप सम्पूर्ण शुभ कामनाओंको ५७ प्रदान करनेवाले, सभी प्राणियोंको वांछित फल प्रदान करनेवाले तथा वेदोंमें रहस्यमय रूपसे प्रतिपादित स्तोत्रका श्रवण कीजिये ॥
राजा प्रसन्नचित्त होकर अपने मन्त्रियों के साथ वापस आए और घर आकर उन्होंने सारा वृत्तान्त सुनाया। इस समाचार से सभी नर-नारी अत्यन्त प्रसन्न हुए। राजा ने पुत्र प्राप्ति के उपलक्ष्य में सर्वत्र मङ्गलोत्सव कराया, ब्राह्मणों को धन दिया और भगवती षष्ठी की पूजा शुरू कर दी।
उसी समय से राजा प्रियव्रत प्रत्येक महीने की शुक्लपक्ष षष्ठी तिथि को भगवती का महोत्सव कराने लगे। वे सूतिकागृह में जन्म के छठे और इक्कीसवें दिन, तथा अन्य माङ्गलिक कार्यों में भी देवी की पूजा करने लगे और स्वयं भी इसका प्रचार किया।
In English
The Story of Goddess Shashti and King Priyavrata
King Priyavrata suffers great grief after his wife Malini gives birth to a stillborn son. The goddess Shashti appears in a divine chariot, restores the child to life, and explains her role as a provider of children and prosperity. The king then establishes rituals to worship the goddess every month.
This page answers
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Also written: Shashthyupakhyana, Shashthya, Brahmana, षष्ठ्युपाख्यान