श्रीलक्ष्म्युपाख्यान : देवताओं के ऐश्वर्य और लक्ष्मी का वैभव क्यों लुप्त हो गया?
लक्ष्मी प्राप्ति का धर्म-मर्म
श्रीमद्देवीभागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · नवम स्कन्ध · अध्याय 41 · पृष्ठ 551–557
1,126 शब्द · 6 मिनटका पाठ · 9 श्लोक
नारद ने श्रीहरि (विष्णु) से कहा
नारद ने श्रीहरि को लक्ष्मी के प्राकट्य और उनके स्वभाव की कथा सुनाई।
तत्वज्ञानी बृहस्पति ने देवराज इन्द्र को हृदय से लगाकर और उन्हें शुभ आशीर्वाद देकर कहा— "हे देवराज! जिनकी आज्ञा से इस जगत् की सृष्टि हुई है, उन भगवान् नारायण की आप आराधना कीजिये। वे त्रिलोकी में विधाता के भी विधाता हैं, पालन करने वाले के भी पालक, सृष्टि करने वाले के भी स्रष्टा और संहार करने वाले के भी संहारक हैं। जो मनुष्य इस संसार में घोर विपत्ति के समय भगवान् मधुसूदन का स्मरण करता है, उसके लिये उस विपत्ति में भी सम्पत्ति उत्पन्न हो जाती है।"
भगवान् श्रीहरि का ध्यान करके देवराज इन्द्र बृहस्पतिको आगे करके सम्पूर्ण देवताओं के साथ ब्रह्मा की सभा में गए। इन्द्र समेत सभी देवताओं ने गुरु बृहस्पति के साथ शीघ्र ही ब्रह्मलोक पहुँचकर पद्मयोनि ब्रह्माजी के दर्शन किए और उन्हें प्रणाम किया। तत्पश्चात् देवगुरु बृहस्पति ने ब्रह्माजी को सारा वृत्तान्त सुनाया। उसे सुनकर ब्रह्माजी हँसे और इन्द्र से कहने लगे— "वह अहङ्कारयुक्त कैसे हो सकता है? पिता के दोष, नाना के दोष और गुरु के दोष— इन्हीं तीन दोषों से ही मनुष्य भगवान् श्रीहरि का द्रोही हो जाता है। मैं, शिव, शेषनाग, विष्णु, धर्म, महाविराट् तथा तुम सब लोग जिनके अंश हैं; उन्हीं भगवान् श्रीकृष्ण के पवित्र पुष्प का तुमने अपमान कर दिया है। शङ्करजी ने जिस पुष्प से भगवान् श्रीहरि के चरणकमल की पूजा की थी, वही पुष्प मुनि दुर्वासा ने तुम्हें प्रदान किया था; किन्तु तुमने दैववश उसका तिरस्कार कर दिया। तुम तो दैव के द्वारा ठग लिये गये हो। प्रारब्ध सबसे अधिक बलशाली होता है। भाग्यहीन तथा मूर्ख व्यक्ति की रक्षा करने में कौन समर्थ है? श्रीकृष्ण को अर्पित किए जाने वाले पुष्प का तुम्हारे द्वारा त्याग किये जाने के कारण भगवती श्रीदेवी कोप करके इस समय तुम्हारे पास से चली गयी हैं। अतः तुम इसी समय मेरे तथा गुरु बृहस्पतिके साथ वैकुण्ठ चलो। मेरे वर के प्रभाव से वहाँ पर लक्ष्मीकान्त भगवान् श्रीहरि की सेवा करके तुम लक्ष्मी को पुनः प्राप्त कर लोगे।"
जहाँ शंखध्वनि नहीं होती, तुलसी नहीं रहतीं, ३० शिवकी पूजा नहीं होती तथा ब्राह्मणोंको भोजन नहीं कराया जाता, वहाँ लक्ष्मी नहीं रहतीं ॥
ब्रह्माजी के अनुगामी सभी देवता गङ्गा सहित भक्तिभाव से युक्त होकर प्रभु के पास विराजमान थे। उन प्रभु को देखकर देवताओं ने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और नेत्रों में आँसू भरकर परमेश्वर की स्तुति की। तत्पश्चात् स्वयं ब्रह्माजी ने हाथ जोड़कर भगवान् श्रीहरि से सारा वृत्तान्त कहा। अपने अधिकार से वञ्चित सभी देवता उस समय रो रहे थे। भगवान् श्रीहरि ने देखा कि सभी देवगण विपत्ति से ग्रस्त, भय से व्याकुल, रत्न तथा आभूषण से विहीन और निस्तेज हैं। उन्हें इस प्रकार कष्ट से व्याकुल देखकर प्रभु कहने लगे— "हे ब्रह्मन्! हे देवगण! आप लोग मत डरिये। मेरे रहते आपलोगों को किस बात का भय है? मैं आपलोगों को परम ऐश्वर्य की वृद्धि करने वाली स्थिर लक्ष्मी प्रदान करूँगा। किन्तु मेरी कुछ समयोचित बात सुनिये; जो हितकर, सत्य और सुखकारी है। अनन्त ब्रह्माण्डों में रहने वाले सभी प्राणी मेरे अधीन रहते हैं, वैसे ही मैं भी अपने भक्तों के अधीन रहता हूँ। मेरा अनियन्त्रित भक्त जिस पर रुष्ट होता है, मैं लक्ष्मी के साथ उसके घर कभी नहीं ठहरता— यह निश्चित है। भगवान् शङ्कर के अंश से उत्पन्न ऋषि दुर्वासा महान् वैष्णव हैं और उन्होंने तुम्हें शाप दे दिया है, अतः मैं आपलोगों के घर से लक्ष्मी सहित चला आया हूँ। जहाँ मेरी तथा मेरे भक्तों की निन्दा होती है, वहाँ से महालक्ष्मी अत्यन्त रुष्ट होकर चली जाती हैं।"
विप्राणां सेवनं यत्र तेषां च भोजनं शुभम् ।
अर्चनं सर्वदेवानां तत्र पद्ममुखी सती ॥
प्रभु ने आगे कहा— "जो व्यक्ति मेरे नाम का तथा अपनी कन्या का विक्रय करता है, जिसके यहाँ अतिथि भोजन नहीं करता, जो ब्राह्मण वेश्या का पुत्र है, जो शूद्रों का श्राद्धान्न खाता है या जो ब्राह्मण अशुद्ध हृदयवाला, क्रूर और दूसरों की निन्दा करने वाला होता है, उसके घर से भगवती लक्ष्मी चली जाती हैं।"
हे नारद! ब्रह्माजी ने इन्द्र को उन दोषों के बारे में विस्तार से बताया जिनके कारण लक्ष्मी जी रुष्ट होकर चली जाती हैं। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति नखों से व्यर्थ तृण तोड़ता है या भूमि कुरेदता रहता है, जिसके यहाँ ब्राह्मण निराश होकर लौट जाता है, जो सूर्योदय के समय भोजन करता है या दिन में शयन और मैथुन करता है, वह भी लक्ष्मी को नहीं पा सकता। जो आचारहीन है, शूद्रों से दान लेने वाला है, दीक्षा से विहीन और मूर्ख है; जो अल्पज्ञ है, भीगे पैर या नग्न होकर सोता है और वाचाल की भाँति निरन्तर बोलता रहता है; जो अपने सिर पर तेल लगाकर दूसरे के अङ्ग को स्पर्श करता है या स्वयं के अङ्गों को बाजे की तरह बजाता है—ऐसे व्यक्ति से रुष्ट होकर वे साध्वी लक्ष्मी चली जाती हैं। जो व्रत-उपवास और सन्ध्या-वन्दन नहीं करता, सदा अपवित्र रहता है और भगवान् विष्णु की भक्ति से रहित है, उसके घर से मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं। जो ब्राह्मणों की निन्दा करता है, उनसे द्वेष रखता है और जीवों की हिंसा करता है, उससे वे दूर चली जाती हैं। किन्तु हे मुने! जहाँ भगवान् विष्णु की पूजा होती है, उनका गुणगान होता है, जहाँ शङ्खध्वनि होती है, शालग्रामशिला और तुलसीदल की सेवा-वन्दना होती है, वहाँ वे लक्ष्मी सर्वदा निवास करती हैं। जहाँ ब्राह्मणों की सेवा होती है और देवताओं की पूजा होती है, वहाँ कमल के समान मुखवाली साध्वी लक्ष्मी विराजमान रहती हैं।
देवैः स्तुता पूजिता च ब्रह्मणा शङ्करेण च ।
ददौ दृष्टिं सुरगृहे ब्रह्मशापविमोचनात् ॥
ब्रह्माजी ने इन्द्र को मार्ग बताते हुए कहा कि हे कमलोद्भव! आप समुद्र-मन्थन करके उससे प्रकट होने वाली लक्ष्मी को देवताओं को सौंप दीजिये। यह कहकर लक्ष्मीपति भगवान् श्रीहरि अपने अन्तःपुर में चले गये। इससे पूर्व उन्होंने क्षीरसागर में रहने वाली लक्ष्मी जी से कहा— "हे लक्ष्मी! तुम मेरी एक कला के रूप में क्षीरसागर में जन्म ग्रहण करो।"
इत्युक्त्वा च सुरान्सर्वान् रमामाह रमापतिः ।
क्षीरोदसागरे जन्म कलयाकलयेति च ॥
इसके पश्चात, देवताओं और असुरों ने मिलकर मन्दराचल पर्वत और शेषनाग की सहायता से समुद्र-मन्थन किया। उस महामन्थन के परिणामस्वरूप धन्वन्तरि, अमृत, उच्चैःश्रवा नामक अश्व और अनेक प्रकार के रत्न प्राप्त हुए; जिसमें हाथियों में रत्नस्वरूप ऐरावत भी शामिल था। इसके साथ ही सुदर्शन चक्र और वनमाला भी प्रकट हुई। तब विष्णुपरायणा साध्वी लक्ष्मी ने वह वनमाला क्षीरसागर में शयन करने वाले मनोहर सर्वेश्वर श्रीविष्णु को समर्पित कर दी।
वनमालां ददौ सा च क्षीरोदशायिने मुने ।
सर्वेश्वराय रम्याय विष्णवे वैष्णवी सती ॥
मन्थन के उपरान्त, जब देवताओं ने भगवती की पूजा और स्तुति की, तब लक्ष्मी जी ने देवताओं के भवन पर अपनी कृपादृष्टि डाली। उस वरदान और कृपा से देवता मुनि दुर्वासा के शाप से मुक्त हो गये और उन्होंने दैत्यों द्वारा अधिकृत किये गये अपने राज्य को पुनः प्राप्त कर लिया।
अ ० ४१ ] नवम शिवलिङ्गार्चनं यत्र तस्य चोत्कीर्तनं शुभम् ।
दुर्गार्चनं तद्गुणाश्च तत्र पद्मनिवासिनी ॥
इस प्रकार मैंने लक्ष्मी का अत्यन्त उत्तम और सारभूत उपाख्यान आपसे कह दिया। अब आप क्या सुनना चाहते हैं?
इत्युक्त्वा तां जगन्नाथो ब्रह्माणं पुनराह च ।
मथित्वा सागरं लक्ष्मीं देवेभ्यो देहि पद्मज ॥
हे प्रभो! मैंने भगवान् श्रीहरि के कल्याणप्रद गुण, उनका उत्तम ज्ञान और भगवती लक्ष्मी का अभीष्ट उपाख्यान सुना। अब आप उन देवी के ध्यान और स्तोत्र के विषय में बताइये।
इत्युक्त्वा कमलाकान्तो जगामान्तः पुरं मुने ।
देवाश्चिरेण कालेन ययुः क्षीरोदसागरम् ॥
इन्द्र ने ब्रह्माजी तथा अपने गुरु बृहस्पति द्वारा निर्दिष्ट विधान के अनुसार परम ऐश्वर्यमयी भगवती महालक्ष्मी का आवाहन करके उनकी पूजा की। उस पावन स्थल पर अनेक मुनि, ब्राह्मण, गुरु बृहस्पति, श्रीहरि, देवगण और ज्ञानानन्द भगवान् शिव विराजमान थे। इन्द्र ने पारिजात के चन्दन-चर्चित पुष्प लेकर, उसी ध्यान द्वारा लक्ष्मी जी का पूजन किया जो भगवान् श्रीहरि ने सामवेद के अनुसार बताया था। मैं वही ध्यान तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो...
मन्थानं मन्दरं कृत्वा कूर्मं कृत्वा च भाजनम् ।
कृत्वा शेषं मन्थपाशं ममन्थुरसुराः सुराः ॥
In English
The Churning of the Ocean and the Return of Lakshmi
After Indra rejects a flower given by Durvasa, Lakshmi leaves him and the gods. To regain her, the gods and demons perform the churning of the ocean, resulting in the appearance of Lakshmi and other treasures.
This page answers
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- How did the gods get lakshmi back?
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