सुरभ्युपाख्यान : सृष्टि की उत्पत्ति और जीव नियन्त्रण का रहस्य क्या है?
परम शक्ति और सृजन
श्रीमद्देवीभागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · नवम स्कन्ध · अध्याय 49 · पृष्ठ 604–607
732 शब्द · 4 मिनटका पाठ · 7 श्लोक
श्रीनारायण ने नारद से कहा
मुक्ति और परम रहस्य के ज्ञान हेतु
श्रीनारायण बोले— [हे नारद!] वे देवी सुरभि गोलोक में प्रकट हुईं। वे गौओं की अधिष्ठात्री देवी, गौओं की आदिस्वरूपिणी, गौओं की जननी तथा गौओं में प्रधान हैं। मैं सभी गौओं की आदिसृष्टिस्वरूपा उन सुरभिके चरित्र का वर्णन कर रहा हूँ, आप ध्यानपूर्वक सुनिये।
श्रुतं सर्वमुपाख्यानं प्रकृतीनां यथातथम् ।
यच्छ्रुत्वा मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥
अधुना श्रोतुमिच्छामि रहस्यं वेदगोपितम् ।
राधायाश्चैव दुर्गाया विधानं श्रुतिचोदितम् ॥
नारदजी बोले -A – [ हे भगवन्! ] मूलप्रकृतिरूपा देवियोंका सारा आख्यान मैंने यथार्थरूपमें सुन लिया, जिसका श्रवण करके प्राणी जन्म - मरणरूपी भवबन्धनसे मुक्त हो जाता है । अब मैं भगवती राधा तथा दुर्गाका वेदगोपित रहस्य तथा वेदोक्त पूजा - - विधान सुनना चाहता हूँ ।
पूर्वकाल में वृन्दावन में सुरभिका प्रादुर्भाव हुआ था। एक समय की बात है, गोपाङ्गनाओं से घिरे हुए परम कौतुकी राधिकापति श्रीकृष्ण राधा के साथ पुनीत वृन्दावन में गये हुए थे। वहाँ वे एकान्त में क्रीडापूर्वक विहार करने लगे, तभी सहसा उन स्वेच्छामय प्रभु को दुग्धपान की इच्छा हो गयी। उसी समय उन्होंने अपने वामभाग से लीलापूर्वक बछड़े सहित दुग्धवती सुरभि गौ को प्रकट कर दिया; उस बछड़े का नाम मनोरथ था। भगवान श्रीकृष्ण ने सुरभि से दुहे गये उस स्वादिष्ट दूध को स्वयं पीने लगे। तभी पात्र के गिरकर फूट जाने से चारों ओर सौ योजन की लम्बाई तथा चौड़ाई वाला एक विशाल दूध का सरोवर हो गया—यही सरोवर गोलोक में क्षीरसरोवर नाम से प्रसिद्ध है। उस वापी के घाट आदि पूर्णरूपसे श्रेष्ठ रत्नों से निर्मित थे। भगवान श्रीकृष्ण की इच्छा से उसी समय सहसा लाखों-करोड़ों कामधेनु गौएँ प्रकट हो गयीं। वहाँ जितने गोप थे, वे सभी उस सुरभिके रोमकूपों से प्रकट हुए थे। तत्पश्चात् उन गौओं की असङ्ख्य सन्तानें उत्पन्न हो गयीं। इस प्रकार उस सुरभिसे गायों की सृष्टि कही गयी है; उसीसे यह जगत् व्याप्त है।
ससृजे सुरभिं देवीं लीलया वामपार्श्वतः ।
वत्सयुक्तां दुग्धवतीं वत्सो नाम मनोरथः ॥ दृष्ट्वा सवत्सां श्रीदामा नवभाण्डे दुदोह च ।
क्षीरं सुधातिरिक्तं च जन्ममृत्युजराहरम् ॥ नारदजी बोले – हे ब्रह्मन्! गोलोकसे जो सुरभिदेवी आयी थीं, वे कौन थीं? मैं ध्यानपूर्वक १ उनका जन्मचरित्र सुनना चाहता हूँ ॥
मुने! पूर्वकाल में भगवान श्रीकृष्ण ने देवी सुरभिकी पूजा की थी, उसी समय से तीनों लोकों में उस सुरभिकी दुर्लभ पूजा का प्रचार हो गया। दीपावली के दूसरे दिन भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा से देवी सुरभि पूजित हुई थीं—यह मैंने धर्मदेव के मुखसे सुना है। हे महाभाग! अब मैं आपको देवी सुरभिका वेदोक्त ध्यान, स्तोत्र, मूलमन्त्र तथा जो-जो पूजा का विधिक्रम है, उसे बता रहा हूँ, ध्यानपूर्वक सुनिये। 'ॐ सुरभ्यै नमः' — यह उनका षडक्षर मन्त्र है। एक लाख जप करने पर यह मन्त्र सिद्ध होकर भक्तों के लिये कल्पवृक्ष तुल्य हो जाता है।
महिमा वर्णितोऽतीव भवता परयोर्द्वयोः ।
श्रुत्वा तं तद्गतं चेतो न कस्य स्यान्मुनीश्वर ॥
देवी सुरभिका ध्यान यजुर्वेद में वर्णित है। उनकी पूजा सब प्रकार से ऋद्धि, वृद्धि, मुक्ति तथा समस्त अभीष्ट प्रदान करनेवाली है। ध्यान इस प्रकार है— 'लक्ष्मीस्वरूपा, परमा, राधा की सहचरी, गौओं की अधिष्ठात्री देवी, गौओं की आदिस्वरूपिणी, गौओं की जननी, पवित्ररूपिणी, पावन, भक्तों के सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण करनेवाली तथा जिनसे सम्पूर्ण जगत् पावन बना हुआ है—उन पराभगवती सुरभिकी मैं आराधना करता हूँ।'
ययोरंशो जगत्सर्वं यन्नियम्यं चराचरम् ।
ययोर्भक्त्या भवेन्मुक्तिस्तद्विधानं वदाधुना ॥
एक समय की बात है, वाराहकल्प में भगवान विष्णु की माया से देवी सुरभि ने तीनों लोकों में दूध देना बन्द कर दिया, जिससे समस्त देवता आदि चिन्तित हो गये। वे ब्रह्मलोक में जाकर ब्रह्माजी की स्तुति करने लगे। ब्रह्माजी की आज्ञा पाकर इन्द्र सुरभिकी स्तुति करने लगे।
शृणु नारद वक्ष्यामि रहस्यं श्रुतिचोदितम् ।
यन्न कस्यापि चाख्यातं सारात्सारं परात्परम् ॥
इन्द्र बोले— "देवी को नमस्कार है, महादेवी सुरभिको बार-बार नमस्कार है। हे जगदम्बिके! गौओं की बीजस्वरूपिणी आपको नमस्कार है। हे परादेवि! सभी प्राणियों के लिये कल्पवृक्षस्वरूपिणी, दुग्ध देनेवाली, धन प्रदान करनेवाली तथा बुद्धि देनेवाली आपको बार-बार नमस्कार है। शुभा, सुभद्रा तथा गोप्रदा को बार-बार नमस्कार है। यश, कीति तथा धर्म प्रदान करनेवाली भगवती सुरभिको बार-बार नमस्कार है।"
श्रुत्वा परस्मै नो वाच्यं यतोऽतीव रहस्यकम् ।
मूलप्रकृतिरूपिण्याः संविदो जगदुद्भवे ॥
इस स्तोत्र को सुनते ही जगज्जननी सनातनी देवी सुरभि सन्तुष्ट तथा प्रसन्न होकर उस ब्रह्मलोक में प्रकट हो गयीं। देवराज इन्द्र को दुर्लभ वाञ्छित वर प्रदान करके वे गोलोक को चली गयीं और देवता आदि अपने-अपने स्थान को चले गये। उसके बाद विश्व सहसा दुग्ध से परिपूर्ण हो गया। दुग्ध होनेसे घृत का प्राचुर्य हो गया और उससे यज्ञ होने लगा, जिससे देवताओं को सन्तुष्टि होने लगी।
प्रादुर्भूतं शक्तियुग्मं प्राणबुद्ध्यधिदैवतम् ।
जीवानां चैव सर्वेषां नियन्तृप्रेरकं सदा ॥
नारदजी बोले— [हे भगवन्!] मूलप्रकृतिरूपा देवियों का सारा आख्यान मैंने यथार्थरूप में सुन लिया, जिसका श्रवण करके प्राणी जन्म-मरणरूपी भवबन्धन से मुक्त हो जाता है। अब मैं भगवती राधा तथा दुर्गा का वेदगोपित रहस्य तथा वेदोक्त पूजा-विधान सुनना चाहता हूँ। हे मुनीश्वर! आपने इन दोनों पराशक्तियों की अद्भुत महिमा बतायी, उसे सुनकर भला किस पुरुष का मन उनमें लीन नहीं हो जायगा? यह सम्पूर्ण जगत् जिनका अंश है, चलाचर विश्व जिनसे नियन्त्रित है तथा जिनकी भक्ति से प्राणियों की मुक्ति हो जाती है, उन देवियों के पूजा-विधान के विषय में अब आप मुझे बताइये।
श्रीनारायण बोले— हे नारद! सुनिये, मैं वह वेदवर्णित परम सारस्वरूप तथा परात्पर रहस्य आपको बता रहा हूँ, जिसे मैंने किसी को भी नहीं बताया है। इसे सुनकर आप किसी दूसरे से मत कहियेगा; क्योंकि यह परम गोपनीय है। ज्ञानमयी भगवती से प्राण तथा बुद्धिकी अधिष्ठात्री देवियों के रूप में दो शक्तियाँ प्रकट हुईं। श्रीराधा भगवान श्रीकृष्ण के प्राणों की तथा श्रीदुर्गा उनकी बुद्धिकी अधिष्ठात्री देवी हैं। वे शक्तियाँ ही सम्पूर्ण जीवों को सदा नियन्त्रित तथा प्रेरित करती हैं; विराट् आदि चराचर सहित सम्पूर्ण जगत् उन्हीं शक्तियों के अधीन है।
In English
The Story of Goddess Surabhi
Krishna manifests the cow goddess Surabhi and her calf Manorath in Vrindavan, creating a vast milk lake. The text describes how Surabhi provides for all living beings and how Indra prayed to her when milk production ceased in the three worlds.
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