स्वाहोपाख्यान : यज्ञों में स्वाहा शब्द जोड़ने से क्या सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं?
मन्त्र सिद्धि और स्वाहा शक्ति
श्रीमद्देवीभागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · नवम स्कन्ध · अध्याय 43 · पृष्ठ 563–568
819 शब्द · 5 मिनटका पाठ · 7 श्लोक
श्रीनारायण ने नारद से कहा
ब्रह्मन् द्वारा पूछे गए गूढ़ एवं दुर्लभ आख्यान की जिज्ञासा के कारण
हे मुने! हे महाभाग! हे प्रभो! आप रूप, गुण, यश, तेज और कान्ति में साक्षात् नारायण ही हैं। हे मुने! हे वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ! मैंने आपसे महालक्ष्मी का अत्यन्त अद्भुत उपाख्यान जान लिया, अब आप मुझे कोई दूसरा उपाख्यान बताइये, जो रहस्यमय, अत्यन्त गोपनीय, सबके लिये उपयोगी, पुराणों में अप्रकाशित, धर्मयुक्त तथा वेद-प्रतिपादित हो।
नानाप्रकारमाख्यानमप्रकाश्यं पुराणतः ।
श्रुतं कतिविधं गूढमास्ते ब्रह्मन् सुदुर्लभम् ॥
हे ब्रह्मन्! ऐसे अनेकविध आख्यान हैं, जो पुराणों में वर्णित नहीं हैं। कई प्रकार के आख्यान सुने भी गये हैं, जो अत्यन्त दुर्लभ तथा गूढ़ हैं, उनमें किस सारभूत आख्यान को आप सुनना चाहते हैं? हे महाभाग! आप पहले मुझसे उसे बताइये, तब मैं उसका वर्णन करूँगा।
तेषु यत्सारभूतं च श्रोतुं किं वा त्वमिच्छसि ।
तन्मे ब्रूहि महाभाग पश्चाद्वक्ष्यामि तत्पुनः ॥
हे मुनीश्वर! सभी धार्मिक कर्मों में हवि-प्रदान के समय स्वाहादेवी और श्राद्धकर्म में स्वधादेवी प्रशस्त मानी गयी हैं। यज्ञ आदि कर्मों में दक्षिणादेवी सर्वश्रेष्ठ हैं। हे वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ! मैं आपके मुख से इन्हीं देवियों के चरित्र, अवतार ग्रहण का प्रयोजन तथा महत्त्व सुनना चाहता हूँ, उसे बताइये।
स्वाहा देवी हविर्दाने प्रशस्ता सर्वकर्मसु ।
पितृदाने स्वधा शस्ता दक्षिणा सर्वतो वरा ॥
हे मुने! प्राचीन समय में सृष्टिके प्रारम्भिक काल में देवतागण अपने आहार के लिये ब्रह्मलोक गये। वहाँ पर वे ब्रह्माजी की मनोहर सभामें आये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने अपने आहार के लिये ब्रह्माजी से प्रार्थना की। उनकी बात सुनकर ब्रह्माजी ने उनके लिये आहार की प्रतिज्ञा करके परमेश्वर श्रीहरि की आराधना की।
एतासां चरितं जन्मफलं प्राधान्यमेव च ।
श्रोतुमिच्छामि त्वद्वक्त्राद्वद वेदविदांवर ॥
हे मुनिश्रेष्ठ! ब्राह्मण और क्षत्रिय आदि वर्ण देवताओं के निमित्त भक्तिपूर्वक जो हविदान करते थे, उस प्रदत्त हविको देवगण प्राप्त नहीं कर पाते थे। उसीसे वे सभी देवता दुःखी होकर ब्रह्मसभामें गये और वहाँ जाकर उन्होंने आहार के अभाव की बात बतायी।
तथाकथित स्वाहा देवी का स्वरूप लावण्यमय, रमणीय तथा मनोहर था, उनका मुखमण्डल मन्द-मन्द मुस्कान तथा प्रसन्नता से युक्त था। वे अपने भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये आतुर-सी प्रतीत हो रही थीं। वे ब्रह्मा के सम्मुख उपस्थित होकर कहने लगीं— "हे पद्मयोने! वर माँगो।"
उनका वचन सुनकर ब्रह्माजी आदरपूर्वक उन भगवती से कहने लगे— "बिना अग्निदेव आहुतियों को भस्म करने में समर्थ नहीं हैं। जो मनुष्य मन्त्र अन्त में आपके नाम का उच्चारण करके देवताओं को हवि प्रदान करेगा, उसे देवगण प्रेमपूर्वक ग्रहण करेंगे। हे अम्बिके! सम्पत्स्वरूपिणी तथा श्रीरूपिणी! जाइये, देवता तथा मनुष्य आदि पूजनीय होवें।"
परन्तु ब्रह्माजी की बात सुनकर वे उदास हो गयीं। उन्होंने अपना अभिप्राय व्यक्त करते हुए कहा— "मैं दीर्घकाल तक तपस्या करके भगवान् श्रीकृष्ण की आराधना करूँगी; क्योंकि उनके अतिरिक्त जो कुछ भी है, वह सब स्वप्न की भाँति केवल भ्रम है। शेषनाग सम्पूर्ण विश्व को धारण करते हैं, धर्मराज सभी धर्मनिष्ठ प्राणियों के साक्षी बने हैं, गणेश्वर सभी देवगणों में सबसे पहले पूजे जाते हैं, पूर्वकाल में भगवती मूलप्रकृति सबके द्वारा पूजित हुईं और जिनकी उपासना के प्रभाव से ऋषि तथा मुनिगण पूजित हुए हैं; मैं उन परमेश्वर श्रीकृष्ण के चरण-कमल का संयत होकर प्रेमपूर्वक निरन्तर ध्यान करती हूँ।"
ब्रह्मा श्रुत्वा तु ध्यानेन श्रीकृष्णं शरणं ययौ ।
पूजाञ्चकार प्रकृतेर्ध्यानेनैव तदाज्ञया ॥
स्वाहा ने निर्विकार श्रीकृष्ण का ध्यान करके एक पैर पर खड़े होकर एक लाख वर्ष तक तप किया। तत्पश्चात् उन्हें अपकृत निर्गुण भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन हुए। भगवान् श्रीकृष्ण का अत्यन्त मनोहर रूप देखकर ही वे रूपवती भगवती स्वाहा मूर्च्छित हो गयीं; क्योंकि उन कामुकी देवी ने दीर्घकाल के अनन्तर उन कामेश्वर श्रीकृष्ण को देखा था।
भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वाहादेवी का अभिप्राय समझकर, दीर्घकाल तक तपस्या के कारण अत्यन्त क्षीण देह वाली उन देवी को गोद में बैठाकर कहा— "नाग्नजित की पुत्री के रूप में उत्पन्न होकर तुम नाग्नजिती नाम से विख्यात होओगी। इस समय तुम दाहिका-शक्ति के रूप में अग्निदेव की मनोहर पत्नी बनो। मेरे अनुग्रह से तुम मन्त्रों की अङ्गस्वरूपिणी बनकर सबसे पूजित होओगी। अग्निदेव तुम्हें गृहस्वामिनी बनाकर भक्तिभाव के साथ तुम्हारी पूजा करेंगे और वे परम रमणीया भार्या के रूप में तुम्हारे साथ रमण करेंगे।"
॥ ४५ फलप्राप्तिके निमित्त सम्पूर्ण यज्ञोंके आरम्भिक कालमें शालग्राम अथवा कलशपर यत्नपूर्वक भगवती स्वाहाका विधिवत् पूजन करके यज्ञ करना ॥ ४६ चाहिये ॥
हे नारद! देवी स्वाहा से ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये। इसके बाद ब्रह्मा की आज्ञा से अत्यन्त भयभीत अग्निदेव वहाँ आये। उन्होंने सामवेद में कही गयी ध्यानविधि से उन भगवती जगदम्बिका का ध्यान करके तथा विधिपूर्वक पूजन करके उन्हें परम प्रसन्न किया और मन्त्रोच्चार पूर्वक उनका पाणिग्रहण किया।
अग्निदेव ने अत्यन्त निर्जन स्थान में भगवती स्वाहा के साथ दिव्य एक सौ वर्षों तक रमण किया और उनके तेज से उन्होंने गर्भधारण कर लिया। देवी स्वाहा ने उस गर्भ को दिव्य बारह वर्षों तक धारण किया। तत्पश्चात् उन भगवती स्वाहा ने क्रमशः दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि तथा आहवनीयाग्नि—इन सुन्दर तथा मनोहर पुत्रों को उत्पन्न किया।
तभी से ऋषि, मुनि, ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि मन्त्र के अन्त में 'स्वाहा' शब्द जोड़कर मन्त्रोच्चारण करके अग्नि में हवन करने लगे। जो मनुष्य स्वाहायुक्त प्रशस्त मन्त्र का उच्चारण करता है; मन्त्र के उच्चारण मात्र से उसे सभी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। जिस प्रकार विषरहित सर्प, वेदविहीन ब्राह्मण, पतिसेवाविहीन स्त्री, विद्या से शून्य मनुष्य और फल तथा शाखा से रहित वृक्ष निन्दनीय होता है; उसी प्रकार स्वाहारहित मन्त्र निन्द्य होता है और ऐसे मन्त्र से किया गया हवन फलप्रद नहीं होता।
जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह इस लोक तथा परलोक में सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त कर लेता है। उसका कोई कर्म अपूर्ण नहीं रहता, समस्त कर्म उत्तम फलदायी होते हैं; पुत्रहीन व्यक्ति पुत्रवान् हो जाता है तथा भार्याहीन व्यक्ति पत्नी को प्राप्त कर लेता है और रम्भातुल्य अपनी उस भार्या को प्राप्त करके सुख भोगता है।
श्रीनारायण बोले – हे ब्रह्मन्! हे मुनिश्रेष्ठ! अब मैं भगवतीके सामवेदोक्त ध्यान, स्तोत्र तथा पूजा- - विधानको बता रहा हूँ, आप सावधान होकर सुनिये ॥
In English
The Story of Swaha and Agni
Swaha performs intense penance to worship Krishna. After her meditation, Krishna instructs her to become the wife of Agni so that she may accompany offerings made during sacrifices. Swaha marries Agni and gives birth to three sons: Dakshinagni, Garhapatya, and Ahavaniya.
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