श्रीगणेशाय नमः।

स्वधोपाख्यान : पितरों की तृप्ति और श्राद्ध के पूर्ण फल हेतु क्या आवश्यक है?

स्वधा देवी की महिमा

श्रीमद्देवीभागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · नवम स्कन्ध · अध्याय 44 · पृष्ठ 568–571

558 शब्द · 3 मिनटका पाठ · 5 श्लोक

श्रीनारायण ने नारद से कहा

पितरों की तृप्ति और श्राद्धान्न के फल की वृद्धि हेतु

श्रीनारायण बोले— हे नारद! सुनिये, अब मैं स्वधाका उत्तम आख्यान कहूँगा, जो पितरों के लिये तृप्ति-कारक तथा श्राद्धान्न के फल की वृद्धि करने वाला है। जगत् का विधान करने वाले ब्रह्माजी ने सृष्टि के आरम्भ में चार मूर्तिमान तथा तीन तेज: स्वरूप सात पितरों का सृजन किया। उन सातों सुखस्वरूप और मनोहर पितरों को देखकर उन्होंने उनका आहार भी सृजित किया, जिसे श्राद्ध-तर्पणपूर्वक ग्रहण करना था। किन्तु एक समस्या थी— जो ब्राह्मण प्रतिदिन त्रिकाल सन्ध्या, श्राद्ध, तर्पण, बलि और वेदध्वनि नहीं करता, वह विषहीन सर्प के समान है। जो भगवती की सेवा से वञ्चित रहकर भगवान् श्रीहरि को बिना नैवेद्य अर्पण किये ही भोजन ग्रहण करता है, उसका अशौच केवल दाहपर्यन्त बना रहता है और वह कोई भी शुभ कृत्य करने के योग्य नहीं रह जाता।

श्रीनारायण उवाच

स्नान, तर्पण, श्राद्ध, देवपूजन तथा त्रिकाल ३ सन्ध्या - ये ब्राह्मणोंके आह्निक कर्म श्रुतिमें प्रसिद्ध हैं ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 44 · श्लोक 4पृष्ठ 568

ब्रह्माजी द्वारा किए गए श्राद्ध और तर्पण के विधान के बाद भी ब्राह्मण जो पदार्थ अर्पण करते थे, वे पितरगण प्राप्त नहीं कर पा रहे थे। अतः क्षुधा से व्याकुल तथा उदास मन वाले वे सभी पितर ब्रह्माजी की सभा में पहुँचे और जगत् के विधाता को अपनी व्यथा सुनाई। ब्रह्माजी ने उस सङ्कट को समझा और उन्होंने एक अत्यन्त सुन्दर, गुणवती और लक्ष्मी के लक्षणों वाली तुष्टिरूपिणी देवी 'स्वधा' का सृजन किया। ब्रह्माजी ने स्वयं स्वधा देवी को उन सन्तुष्ट पितरों को समर्पित कर दिया और वे ब्रह्मलोक में वापस चले गये। उसी समय ब्रह्माजी ने ब्राह्मणों को यह गोपनीय उपदेश भी प्रदान किया कि— "आप लोगों को अन्त में 'स्वधा' युक्त मन्त्र का उच्चारण करके ही पितरों को कव्य पदार्थ अर्पण करना चाहिये।" तभी से ब्राह्मण लोग उसी क्रम से पितरों को कव्य प्रदान करने लगे, क्योंकि देवताओं के लिये हव्य प्रदान करते समय 'स्वाहा' और पितरों के लिये 'स्वधा' का उच्चारण श्रेष्ठ माना गया है।

भगवती स्वधाके वरदानसे पितरगण, देवता तथा विप्र आदि परम सन्तुष्ट तथा पूर्ण मनोरथवाले हो १७ | गये ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 44 · श्लोक 17पृष्ठ 569

जब स्वधा देवी प्रकट हुईं, तो उन्हें पाकर पितरगण अत्यन्त हर्षित हुए। उस समय पितरों, देवताओं, ब्राह्मणों, मुनियों तथा मनुगणों ने परम आदरपूर्वक शान्तिस्वरूपिणी भगवती स्वधा की पूजा और स्तुति की। हे महामुने! प्राणियों का मङ्गल करने वाली भगवती स्वधा वेदोक्त ध्यान और स्तवन सब जानती हैं, फिर भी लोगों के कल्याणार्थ मैं आपको उनका विधान बताता हूँ। शरत्काल में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मघा नक्षत्र में अथवा श्राद्ध के दिनों में यत्नपूर्वक देवी स्वधा की विधिवत् पूजा करनी चाहिये। जो विप्र अहङ्कारयुक्त बुद्धि से बिना स्वधा पूजन किये श्राद्ध करता है, वह उसका फल प्राप्त नहीं कर पाता। पूजन हेतु शिला अथवा मङ्गलमय कलश पर उनका आवाहन करके 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा' इस मन्त्र से उन्हें पाद्य आदि उपचार अर्पण करना चाहिए।

श्रीनारायण उवाच

नारदजी बोले - वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हे महामुने! मैं भगवती स्वधाकी पूजाका विधान, उनका ध्यान ॥ १ ९ तथा स्तोत्र सुनना चाहता हूँ; यत्नपूर्वक बतलाइये ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 44 · श्लोक 19पृष्ठ 570

हे ब्रह्मपुत्र! अब आप उस पुण्यशाली स्तोत्र को सुनिये, जिसका पाठ पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने किया था। वह स्तोत्र है: "हे देवी! आप पितरों के लिये प्राणतुल्य और ब्राह्मणों के लिये जीवनस्वरूपिणी हैं। आप श्राद्ध की अधिष्ठात्री देवी हैं और श्राद्ध आदि का फल प्रदान करने वाली हैं। आप ॐ स्वस्ति, नमः स्वाहा, स्वधा तथा दक्षिणा रूप में विराजमान हैं। चारों वेदों ने आपकी इन मूर्तियों को अत्यन्त प्रशस्त बताया है।"

हे सुव्रते! आप नित्य, सत्य तथा पुण्यमय ३२ विग्रहवाली हैं ।
आप सृष्टिके समय प्रकट होती हैं तथा प्रलयके समय तिरोहित हो जाती हैं ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 44 · श्लोक 32पृष्ठ 571

जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर इस पवित्र स्तोत्र का श्रवण करता है, उसने मानो सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान कर लिया। यदि मनुष्य 'स्वधा, स्वधा, स्वधा'— इस प्रकार तीन बार स्मरण कर ले, तो वह श्राद्ध, बलिवैश्वदेव तथा तर्पण का फल प्राप्त कर लेता है। जो श्राद्ध के अवसर पर सावधान होकर इस स्तोत्र को सुनता है, वह समस्त फल प्राप्त करता है। हे नारद! इस प्रकार मैंने आपको स्वधा का सम्पूर्ण उपाख्यान कह दिया।

जो मनुष्य त्रिकाल सन्ध्याके समय स्वधा, स्वधा, स्वधा — ऐसा उच्चारण करता है; उसे पुत्रों ३० तथा सद्गुणोंसे सम्पन्न, विनम्र, प्रिय तथा पतिव्रता स्त्री प्राप्त होती है ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 44 · श्लोक 30पृष्ठ 571

In English

The Story of Goddess Swadha

Brahma creates the goddess Swadha to help the ancestors receive offerings made by Brahmins. Before her creation, the ancestors were hungry because they could not access the food offered during rituals. Brahma instructs that offerings must be accompanied by the mantra 'Swadha' to reach them.

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