त्रिशङ्कपाख्यान : शापित व्यक्ति को पुनः स्वर्ग प्राप्त कैसे हो सकता है?
अहङ्कार और शाप का परिणाम
श्रीमद्देवीभागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · सप्तम स्कन्ध · अध्याय 12 · पृष्ठ 74–80
1,183 शब्द · 6 मिनटका पाठ · 7 श्लोक
व्यास ने राजा जनमेजय से कहा
राजा जनमेजय के प्रश्न का उत्तर देने हेतु।
एक बार राजा अरुण ने अपने पुत्र त्रिशङ्कु का राज्याभिषेक करने का निश्चय किया। उन्होंने वेदशास्त्र के पारगामी विद्वान् और मन्त्रवेत्ता ब्राह्मणों को बुलाया, अभिषेक की समस्त सामग्री एकत्र करवाई और सम्पूर्ण तीर्थों का जल मँगवाया। मन्त्रियों, सामन्तों और नरेशों की उपस्थिति में उस शुभ दिन राजकुमार त्रिशङ्कु को विधिपूर्वक श्रेष्ठ राज्यासन पर आसीन कर दिया गया। इस प्रकार पिता ने पुत्र को राज्य सौंपकर स्वयं अपनी धर्मपत्नी के साथ पवित्र तीसरे आश्रम—वानप्रस्थ को ग्रहण किया और वे वन में गङ्गा के तट पर कठोर तप करने लगे।
वेद - वेदान्तके पारगामी आदरणीय विद्वानोंकी ॥
आयु समाप्त होने पर वे स्वर्ग चले गए, जहाँ देवताओं द्वारा पूजित होकर और इन्द्र के समीप रहकर वे सदा सूर्य की भाँति सुशोभित होने लगे। किन्तु हे राजन्! इस विषय में मुझे संशय है कि शापग्रस्त मनुष्य सिंहासन के योग्य कैसे हो सकता है? सत्यव्रत के दूसरे किस कर्म के प्रभाव से मुनि वसिष्ठ ने उसे अपने शाप से मुक्त कर दिया?
वने त्रिपथगाकूले काले प्राप्ते ययौ इन्द्रासनसमीपस्थो पूर्वं भगवता प्रोक्तं सत्यव्रतो वसिष्ठेन जग्राह भार्यया युतः ।
चचार दुश्चरं तपः ॥
स्वर्गं पूजितस्त्रिदशैरपि ।
रराज रविवत्सदा ॥
राजोवाच कथायोगेन साम्प्रतम् ।
शप्तो दोग्ध्रीवधात्किल ॥
कुपितेन पिशाचत्वं प्रापितो गुरुणा ततः ।
कथं मुक्तः पिशाचत्वादित्येतत्संशयः प्रभो ॥
न सिंहासनयोग्यो हि भवेच्छापसमन्वितः ।
मुनिना मोचितः शापात्केनान्येन च कर्मणा ॥ एतन्मे ब्रूहि विप्रर्षे शापमोक्षणकारणम् ।
आनीतस्तु कथं पित्रा स्वगृहे तादृशाकृतिः ॥
वसिष्ठेन च शप्तोऽसौ सद्य: पैशाचतां गतः ।
दुर्वेषश्चातिदुर्धर्षः सर्वलोकभयङ्करः ॥
यदैवोपासिता देवी भक्त्या सत्यव्रतेन ह ।
तया प्रसन्नया राजन् दिव्यदेहः कृतः क्षणात् ॥
तत्पश्चात् महाराज अरुणने वेदशास्त्र के पारगामी विद्वान् तथा मन्त्रवेत्ता ब्राह्मणोंको बुलाकर अभिषेककी सारी सामग्रियाँ तुरंत एकत्र करायीं और सम्पूर्ण तीर्थोंका जल मँगाकर तथा सभी मन्त्रियों, सामन्तों और नरेशोंको बुलाकर शुभ दिनमें उस राजकुमारको विधिपूर्वक श्रेष्ठ राज्यासनपर आसीन कर दिया ।
व्यासजी बोले— [ हे राजन्! ] मुनि वसिष्ठ के द्वारा शापित वह सत्यव्रत तत्काल पैशाचिकता को प्राप्त हो गया। उसके कारण वह कुरूप, दुर्धर्ष और सभी प्राणियों के लिए भयङ्कर हो गया। किन्तु जब उस सत्यव्रत ने भक्तिपूर्वक भगवती की उपासना की, तब भगवती ने प्रसन्न होकर क्षण भर में उसे दिव्य शरीर दे दिया। भगवती के कृपारूपी अमृत से उसकी पैशाचिकता समाप्त हुई, उसका पाप विनष्ट हुआ और वह अति तेजस्वी बन गया। भगवती की कृपा से वसिष्ठजी भी प्रसन्नचित्त हो गए और उसके पिता अरुण भी प्रेम से परिपूर्ण हो गए। उसी त्रिशङ्कु का पुत्र हरिश्चन्द्र हुआ, जो शास्त्रोक्त शुभ लक्षणों से सम्पन्न और अत्यन्त सुन्दर स्वरूप वाला था।
६६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२ विप्रानाहूय मन्त्रज्ञान्वेदशास्त्रविशारदान् ।
अभिषेकाय सम्भारान् कारयामास सत्वरम् ॥
कुछ समय पश्चात, राजा त्रिशङ्कु ने अपने पुत्र हरिश्चन्द्र को युवराज बनाकर स्वयं मानव शरीर से ही स्वर्ग के सुख भोगने का निश्चय किया। इस हेतु वह मुनि वसिष्ठ के आश्रम गया। वहाँ उसने मुनि को विधिवत प्रणाम कर हाथ जोड़कर अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक कहा— "हे ब्रह्मपुत्र! हे महाभाग! हे सर्वमन्त्र-विशारद! हे तापस! आप प्रसन्नतापूर्वक मेरी प्रार्थना सुनने की कृपा कीजिये। अब स्वर्ग लोक का सुख भोगने की इच्छा मेरे मन में उत्पन्न हुई है। अप्सराओं के साथ रहने, नन्दनवन में क्रीड़ा करने तथा देव-गन्धर्वों के मधुर गीत सुनने आदि दिव्य भोगों को मैं इसी मानव शरीर से भोगना चाहता हूँ। हे मुनिश्रेष्ठ! आप सर्वसमर्थ हैं, अतः मेरा यह कार्य अब पूर्ण कर दीजिये; यज्ञ सम्पन्न कराकर मुझे अत्यन्त दुर्लभ देवलोक की प्राप्ति करा दीजिये।"
सलिलं सर्वतीर्थानां समानाय्य विशांपतिः ।
प्रकृतीश्च समाहूय सामन्तान्भूपतींस्तथा ॥
मुनि वसिष्ठ ने उसे समझाते हुए कहा— "स्वर्ग-लोक में निवास अत्यन्त दुर्लभ है। मरने के पश्चात् ही पुण्य कर्म के प्रभाव से स्वर्ग की प्राप्ति कही गई है। अतः हे सर्वज्ञ! तुम्हारे इस दुर्लभ मनोरथ को पूर्ण करने में मैं डर रहा हूँ। जीवित प्राणी के लिए अप्सराओं के साथ निवास दुर्लभ है। तुम अनेक यज्ञ करो, मृत्यु के अनन्तर तुम स्वर्ग प्राप्त कर लोगे।"
पुण्येऽह्नि विधिवत्तस्मै ददावासनमुत्तमम् ।
अभिषिच्य सुतं राज्ये त्रिशङ्कं विधिवत्पिता ॥
यह सुनकर अत्यन्त उदास मन वाले राजा त्रिशङ्कु ने कुपित होकर मुनि वसिष्ठ से कहा— "हे ब्रह्मन्! यदि आप अभिमानवश मेरा यज्ञ नहीं करायेंगे, तो मैं किसी दूसरे को अपना पुरोहित बनाकर इसी समय यज्ञ करूँगा।"
राजा के इन वचनों को सुनकर मुनि वसिष्ठ क्रोधित हो उठे और उन्होंने शाप देते हुए कहा— "हे दुर्बुद्धि! चाण्डाल हो जाओ! इसी शरीर से तुम अभी नीच योनि को प्राप्त हो जाओ। स्वर्ग को नष्ट करने वाले, सुरभी के वध के दोष से युक्त, विप्र की भार्या का हरण करने वाले तथा धर्ममार्ग को दूषित करने वाले हे पापी! मरने के बाद भी तुम किसी प्रकार स्वर्ग प्राप्त नहीं कर सकते।"
पिताके मृत हो जानेपर धर्मात्मा राजा सत्यव्रत १५ राज्यपर सम्यक् शासन करने लगा ।
वह अनेक प्रकारके यज्ञोंद्वारा देवेश्वरी सनातनी भगवतीकी उपासनामें तत्पर रहने लगा ॥
शाप देते ही राजा का शरीर गजवर्ण जैसा धूमिल हो गया। उसके शरीर पर धारण किए हुए दिव्य पीताम्बर कृष्ण वर्ण के हो गए और पत्थर से लगा हुआ सुगन्धित चन्दन दुर्गन्धयुक्त हो गया। अपना वह कलङ्कित शरीर देखकर राजा त्रिशङ्कु अत्यन्त दुखी हुआ और वह घर वापस जाने के स्थान पर जङ्गल की ओर चल दिया।
व्यासजी ने कहा— हे राजन्! अपने पुत्र का राज्याभिषेक करके राजा त्रिशङ्कु का चित्त बहुत प्रसन्न हुआ और वे वहीं जङ्गल में कल्याणकारिणी भगवती जगदम्बा का ध्यान करते हुए समय व्यतीत करने लगे।
परन्तु, उस कलङ्कित देह के बोझ से त्रिशङ्कु का मन व्याकुल था। उनके मन में विचार आया— "जीने की अपेक्षा मर जाना ही अच्छा है! अतः अब मैं विष खाकर, जलाशय में कूदकर या गले में फाँसी लगाकर देह त्याग दूँ, अथवा विधिवत् प्रज्वलित अग्नि में अपने देह को जला डालूँ या फिर अनशन करके अपने इन कलङ्कित प्राणों का त्याग कर दूँ।"
तभी उनके भीतर एक दूसरा विचार कौंधा। उन्होंने स्वयं से कहा— "नहीं! आत्महत्या करने से मुझे निश्चय ही जन्म-जन्मान्तर में पुनः चाण्डाल होना पड़ेगा और इस आत्महत्या के दोष के परिणामस्वरूप मैं शाप से कभी मुक्त नहीं हो सकूँगा। इस समय मुझे किसी भी स्थिति में आत्महत्या नहीं करनी चाहिए, अपितु वन में रहकर मुझे अपने द्वारा किए गए कर्म का फल इसी शरीर से भोग लेना चाहिए; क्योंकि भोगने से ही प्रारब्ध कर्मों का क्षय होता है, अन्यथा इनका क्षय नहीं होता। इसलिए अब यहीं पर साधुजनों की सेवा करते हुए मुझे अपने शुभ तथा अशुभ कर्मों का फल भोग लेना चाहिए। इस प्रकार वन में रहते हुए मैं अपने कर्मों का क्षय अवश्य करूँगा और सम्भव है कि भाग्यवश किसी साधुजन से मिलने का अवसर भी प्राप्त हो जाए।"
अतः हे राजन्! अब आप सारी चिन्ता छोड़कर अपने राज्य वापस लौट चलिये ।
वहाँ सभी मन्त्रीगण ॥ ५४ तथा प्रजाजन आपकी सेवा करेंगे ॥
ऐसा सोचकर राजा त्रिशङ्कु अपना नगर छोड़कर गङ्गा के तट पर चले गए और वहीं अत्यधिक चिन्ता में डूबे रहने लगे। उधर, दूसरी ओर जब राजा हरिश्चन्द्र को अपने पिता के शाप का कारण ज्ञात हुआ, तो वे अत्यन्त दुखी हुए। उन्होंने अपने मन्त्रियों को पिता त्रिशङ्कु के पास भेजा।
वे मन्त्री वहाँ पहुँचे और श्वास ले रहे चाण्डाल की आकृति वाले राजा त्रिशङ्कु को प्रणाम करके विनम्रतापूर्वक बोले— "हे राजन्! आपके पुत्र हरिश्चन्द्र की आज्ञा से हम यहाँ आए हुए हैं। आप लोगों को हमें अपना मन्त्री समझिये। हे महाराज! आपके पुत्र युवराज हरिश्चन्द्र ने हमसे जो कहा है, उसे आप सुन लीजिये— 'आप लोग मेरे पिता राजा त्रिशङ्कु को सम्मानपूर्वक यहाँ ले आइये।' हम लोग भी गुरु वसिष्ठ को प्रसन्न करेंगे, जिससे वे आपके ऊपर दया करें। प्रसन्न हो जाने पर वे महान तेजस्वी आपका कष्ट अवश्य दूर कर देंगे। हे राजन्! आपके पुत्र ने इस प्रकार कहा है, अतः अब शीघ्रतापूर्वक अपने घर लौट चलने की कृपा कीजिये।"
परन्तु राजा त्रिशङ्कु के मन में घर लौटने का कोई विचार नहीं था। उन्होंने मन्त्रियों से कहा— "हे सचिवगण! आप लोग नगर को लौट जाइये और वहाँ जाकर हरिश्चन्द्र से मेरे ये शब्द कह दीजिये— 'हे पुत्र! मैं नहीं आऊँगा। तुम अनेकविध यज्ञों द्वारा ब्राह्मणों का सम्मान करते हुए तथा देवताओं की पूजा करते हुए सदा सावधान होकर राज्य करो।' महात्माओं द्वारा सर्वथा निन्दित इस चाण्डाल-वेश से अब मैं अयोध्या नहीं जाऊँगा। आप सभी लोग यहाँ से शीघ्र लौट जाइये और वहाँ जाकर मेरे महाबली पुत्र हरिश्चन्द्र को सिंहासन पर बिठाकर मेरी आज्ञा से राज्य के समस्त कार्य कीजिये।"
त्रिशङ्कु के इन उपदेशों को सुनकर सभी मन्त्री अत्यधिक दुखी होकर रोने लगे। उन्होंने राजा को प्रणाम किया और वानप्रस्थ आश्रम में जीवन व्यतीत करने वाले उन त्रिशङ्कु के पास से लौट आए। अयोध्या पहुँचकर उन मन्त्रियों ने शुभ दिन में हरिश्चन्द्र के मस्तक पर विधिपूर्वक उनका राज्याभिषेक कर दिया।
राजा त्रिशङ्कु की आज्ञा से सचिवों द्वारा राज्याभिषिक्त होकर, तेजस्वी तथा धर्मपरायण हरिश्चन्द्र अपने पिता का निरन्तर स्मरण करते हुए राज्य करने लगे।
In English
The Story of King Trishanku and His Son Harishchandra
After King Trishanku asks Sage Vasishtha to help him enter heaven while still alive, the sage curses him to become a Chandala. Trishanku lives in exile by the Ganges, while his son Harishchandra is crowned king of Ayodhya.
This page answers
- Why did vasishtha curse trishanku?
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- What happened to harishchandra after trishanku left?
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