श्रीगणेशाय नमः।

आपवोपाख्यान : वसुओं को मनुष्य योनि में जन्म क्यों लेना पड़ा?

अहङ्कार और मर्यादाहीनता का पतन

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड १ · आदिपर्व → सम्भवपर्व · अध्याय 99 · पृष्ठ 728–735

707 शब्द · 4 मिनटका पाठ · 6 श्लोक

गङ्गा ने शान्तनु से कहा

राजा की जिज्ञासा शान्त करने हेतु।

राजा शान्तनु ने गङ्गा की ओर देखते हुए जिज्ञासा से पूछा— "देवि! ये आपव नाम के महात्मा कौन हैं? और वसुओं का क्या अपराध था, जिससे उन्हें आपके दिए हुए इस पुत्र ने मनुष्य लोक में निवास करना पड़ा? वे वसु तो समस्त लोकों के अधीश्वर हैं, वे कैसे मनुष्य योनि में उत्पन्न हुए? यह सब मुझे बताओ!"

महर्षि वसिष्ठद्वारा वसुओंको शाप प्राप्त होनेकी कथा शान्तनुरुवाच आपवो नाम को न्वेष वसूनां किं च दुष्कृतम् ।
यस्याभिशापात् ते सर्वे मानुषीं योनिमागताः ॥

शान्तनुने पूछा — देवि! ये आपव नामके महात्मा कौन हैं? और वसुओंका क्या अपराध था, जिससे आपवके शापसे उन सबको मनुष्य योनिमें आना पड़ा ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 99 · श्लोक 1पृष्ठ 729

गङ्गा देवी ने शान्त भाव से राजा की ओर देखा और बोलीं— "भरतश्रेष्ठ! पूर्वकाल में वरुण ने जिन्हें पुत्र रूप में प्राप्त किया था, वे वसिष्ठ नामक मुनि ही 'आपव' नाम से विख्यात हैं। गिरिराज मेरु के पार्श्व भाग में उनका पवित्र आश्रम है, जो मृगों और पक्षियों से भरा रहता है। सभी ऋतुओं में विकसित होने वाले फूल उस आश्रम की शोभा बढ़ाते हैं। उस वन में स्वादिष्ट फल, मूल और जल की सुलभता थी और पुण्यवानों में श्रेष्ठ वरुणनन्दन महर्षि वसिष्ठ उसी में तपस्या करते थे।"

वैशम्पायन उवाच

तस्याश्रमपदं पुण्यं मृगपक्षिसमन्वितम् ।
मेरोः पार्श्वे नगेन्द्रस्य सर्वर्तुकुसुमावृतम् ॥

गिरिराज मेरुके पार्श्वभागमें उनका पवित्र आश्रम है; जो मृग और पक्षियोंसे भरा रहता है । सभी ऋतुओंमें विकसित होनेवाले फूल उस आश्रमकी शोभा बढ़ाते हैं ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 99 · श्लोक 6पृष्ठ 729

"महाराज! दक्ष प्रजापतिकी पुत्री देवी सुरभि ने कश्यपजी के सहवास से एक गौ को जन्म दिया था। वह गौ सम्पूर्ण जगत् पर अनुग्रह करने के लिए प्रकट हुई थी और समस्त कामनाओं को देने वाली थी। वरुणपुत्र वसिष्ठ ने उस गौ को अपनी होमधेनु के रूप में प्राप्त किया था। वह गौ मुनियों द्वारा सेवित उस पवित्र एवं रमणीय तपोवन में रहती हुई सब ओर निर्भय होकर चरती थी।"

"एक समय की बात है, जब वे वसु अपनी स्त्रियों के साथ उस वन में चारों ओर विचरने और रमणीय पर्वतों में रमण करने लगे। उन वसुओं में से एक की सुन्दरी पत्नी ने उस गौ को देखा। उस दिव्य गौ को देखकर वह आश्चर्यचकित हो उठी। उसके पति द्यो ने गाय के रूप और गुणों का वर्णन करते हुए अपनी पत्नी से कहा— 'यह कजरारे नेत्रों वाली उत्तम गौ दिव्य है! यह उन वरुणनन्दन महर्षि वसिष्ठ की गाय है। जो मनुष्य इसका स्वादिष्ट दूध पी लेगा, वह दस हजार वर्षों तक जीवित रहेगा और उतने समय तक उसकी युवावस्था स्थिर रहेगी।'"

"उस देवी ने अपने तेजस्वी पति से कहा— 'प्राणनाथ! मनुष्य लोक में मेरी एक सखी है, जिसका नाम जितवती है। वह सुन्दरता और युवावस्था से सुशोभित है और सत्यप्रतिज्ञ राजर्षि उशीनर की पुत्री है। मेरी बड़ी इच्छा है कि मैं इस गाय को बछड़े सहित ले आऊँ ताकि इसकी सखी उसका दूध पीकर मनुष्य लोक में अकेली ही जरावस्था एवं रोग-व्याधि से बची रहे। आप निन्दारहित हैं, मेरे इस मनोरथ को पूर्ण कीजिये। मेरे लिए इससे बढ़कर प्रिय दूसरी वस्तु नहीं है।'"

आनयस्वामरश्रेष्ठ त्वरितं पुण्यवर्धन ।
यावदस्याः पयः पीत्वा सा सखी मम मानद ॥

मानुषेषु भवत्वेका जरारोगविवर्जिता ।
एतन्मम महाभाग कर्तुमर्हस्यनिन्दित ॥

' सुरश्रेष्ठ! आप पुण्यकी वृद्धि करनेवाले हैं । इस गायको शीघ्र ले आइये । मानद! जिससे इसका दूध पीकर मेरी वह सखी मनुष्यलोकमें अकेली ही जरावस्था एवं रोग-व्याधिसे बची रहे । महाभाग! आप निन्दारहित हैं; मेरे इस मनोरथको पूर्ण कीजिये ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 99 · श्लोक 24-25पृष्ठ 732

"अपनी पत्नी की इच्छा सुनकर द्यो नामक वसु ने पृथु आदि भाइयों की सहायता से उस गौ का अपहरण कर लिया। वे भूल गए कि यह मुनि वसिष्ठ का तपोवन है और उनके क्रोध के प्रभाव से उनका स्वर्ग से पतन हो जाएगा। कुछ समय बाद जब वरुणनन्दन वसिष्ठ फल-मूल लेकर आश्रम आए, तो उन्हें वह गाय बछड़े सहित दिखाई नहीं दी। वे पूरे वन में खोजने लगे, पर वह उन्हें कहीं न मिली। तब उन्होंने दिव्य दृष्टि से देखा और जान गए कि वसुओं ने उनका अपहरण किया है।"

ज्ञात्वा तथापनीतां तां वसुभिर्दिव्यदर्शनः ।
ययौ क्रोधवशं सद्यः शशाप च वसूंस्तदा ॥

तब उन्होंने दिव्य दृष्टिसे देखा और यह जान गये कि वसुओंने उसका अपहरण किया है । फिर तो वे क्रोधके वशीभूत हो गये और तत्काल वसुओंको शाप दे दिया—

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 99 · श्लोक 31पृष्ठ 732

"क्रोध के वशीभूत होकर मुनि वसिष्ठ ने तत्काल घोषणा की— 'वसुओं ने मेरी कामधेनु गाय का अपहरण किया है, इसलिए वे सब मनुष्य योनि में जन्म लेंगे!'"

"शाप पाकर जब वसु पुनः महर्षि के आश्रम आए और उन्हें प्रसन्न करने की चेष्टा की, तब वसिष्ठ जी ने कहा— 'मैंने तुम सबको शाप दे दिया है; परन्तु तुम लोग प्रति वर्ष एक-एक करके इस शाप से मुक्त हो जाओगे। किन्तु यह द्यो, जिसके कारण तुम सबको शाप मिला है, वह मनुष्य लोक में दीर्घकाल तक निवास करेगा। मैं अपने क्रोध में कहे गए वचनों को असत्य नहीं करना चाहता। यह द्यो सन्तान उत्पन्न नहीं करेगा और धर्मात्मा तथा शास्त्रों में निपुण विद्वान् होकर स्त्री-सम्बन्धी भोगों का परित्याग कर देगा।'"

भविष्यति च धर्मात्मा सर्वशास्त्रविशारदः ।
पितुः प्रियहिते युक्तः स्त्रीभोगान् वर्जयिष्यति ॥

‘ और धर्मात्मा तथा सब शास्त्रोंमें निपुण विद्वान् होंगे; पिताके प्रिय एवं हितमें तत्पर रहकर स्त्री- सम्बन्धी भोगोंका परित्याग कर देंगे '

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 99 · श्लोक 41पृष्ठ 734

"तब वे सभी वसु एकत्र होकर मेरे पास आए और उन्होंने मुझसे याचना की— 'गङ्गे! हम ज्यों-ज्यों जन्म लें, तुम स्वयं हमें अपने जल में डाल देना।' मैंने उनकी यह याचना पूर्ण की। हे भारत! यह एकमात्र द्यो ही महर्षि के शाप से दीर्घकाल तक मनुष्य लोक में रहेगा।"

अयं शापादृषेस्तस्य एक एव नृपोत्तम ।
द्यौ राजन् मानुषे लोके चिरं वत्स्यति भारत ॥

भारत! नृपश्रेष्ठ! यह एकमात्र द्यो ही महर्षिके शापसे दीर्घकालतक मनुष्यलोकमें निवास करेगा ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 99 · श्लोक 45पृष्ठ 734

इतना कहकर गङ्गा देवी उस नवजात शिशु को साथ लेकर वहीं अन्तर्धान हो गईं। उस बालक का नाम देवव्रत हुआ, जिसे कुछ लोग गाङ्गेय भी कहते थे। द्यु नामक वसु शान्तनु के पुत्र होकर गुणों में उनसे भी बढ़ गए, जबकि इधर शान्तनु शोक से व्याकुल होकर अपने नगर लौट गए।

In English

The Curse of Sage Vasista on the Vasus

The Vasu named Dya and his brothers steal a divine cow from the sage Vasista. Because of this theft, Vasista curses all the Vasus to be born as humans, with Dya remaining on earth for a long time. Ganga takes the newborn child away after these events.

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  • Who is the sage vasista?
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Also written: Apavopakhyana, Apava, Shantanu, Ganga, Varuna, Daksha, Surabhi, Dyo, Jitavati, Prithu, Vasu, Vasishtha, आपवोपाख्यान