और्वोपाख्यान : क्रोध की अग्नि से उत्पन्न विनाशकारी प्रतिज्ञा को कैसे शान्त किया जाए?
क्रोध का दमन और लोक-कल्याण
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड १ · आदिपर्व · अध्याय 177–180 · पृष्ठ 1263–1280
1,776 शब्द · 9 मिनटका पाठ · 16 श्लोक
गन्धर्व ने अर्जुन से कहा
परमपिता के वध और भृगुवंश के संहार की कथा सुनाने हेतु
गन्धर्व अर्जुन से कहते हैं— तदनन्तर वसिष्ठजी के आश्रम में रहती हुई अदृश्यन्ती ने शक्ति के वंश को बढ़ाने वाले एक पुत्र को जन्म दिया। वह बालक मानो दूसरे शक्ति ही हो; उसने गर्भ में आकर परासु (मरने की इच्छा वाले) वसिष्ठ मुनि को पुनः जीवित रहने के लिए उत्साहित किया था, इसीलिए वह लोक में 'पराशर' के नाम से विख्यात हुआ। धर्मात्मा पराशर मुनि वसिष्ठजी को ही अपना पिता मानते थे और जन्म से ही उनके प्रति पितृभाव रखते थे।
आश्रमस्था ततः पुत्रमदृश्यन्ती व्यजायत ।
शक्तेः कुलकरं राजन् द्वितीयमिव शक्तिनम् ॥
गन्धर्व कहता है — अर्जुन! तदनन्तर ( वसिष्ठजीके ) आश्रममें रहती हुई अदृश्यन्तीने शक्तिके वंशको बढ़ानेवाले एक पुत्रको जन्म दिया, मानो उस बालकके रूपमें दूसरे शक्ति ही हों ।
परन्तप कुन्तीकुमार! एक दिन ब्रह्मर्षि पराशर ने अपनी माता अदृश्यन्ती के सामने ही वसिष्ठजी को 'तात' कहकर पुकारा। बेटे के मुख से परिपूर्ण अर्थ का बोधक वह मधुर वचन सुनकर अदृश्यन्ती के नेत्रों में आँसू भर आए और वह बोली— "बेटा! ये तुम्हारे पिता के भी पिता हैं। तुम इन्हें 'तात-तात' कहकर न पुकारो। वत्स! तुम्हारे पिता को तो वन के भीतर राक्षस खा गया। अनघ! तुम जिन्हें तात मानते हो, ये तुम्हारे तात नहीं हैं; ये तो तुम्हारे यशस्वी पिता के भी पूजनीय पिता हैं।"
मन्यसे यं तु तातेति नैष तातस्तवानघ ।
आर्य एष पिता तस्य पितुस्तव यशस्विनः ॥
‘ अनघ! तुम जिन्हें तात मानते हो, ये तुम्हारे तात नहीं हैं । ये तो तुम्हारे यशस्वी पिताके भी पूजनीय पिता हैं '
वसिष्ठजी ने उनके मन का यह निश्चय जान लिया। वे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ महातपस्वी और तात्त्विक बुद्धि वाले थे। उन्होंने पराशर को रोकने का प्रयास किया। वसिष्ठजी ने कहा— "वत्स! इस पृथ्वी पर कृतवीर्य नाम से प्रसिद्ध एक राजा थे। वे नृपश्रेष्ठ, वेदज्ञ और भृगुवंशियों के यजमान थे। उन महाराज ने सोमयज्ञ करके अपने अन्त में भार्गवों को विपुल धन-धान्य देकर सन्तुष्ट किया था। उनके स्वर्गवासी हो जाने पर उनके वंशजों को धन की आवश्यकता पड़ी। यह जानकर कुछ राजपुत्र भार्गवों के पास याचक बनकर गए। उस समय कुछ भृगुवंशियों ने क्षत्रियों से भय समझकर अपना धन उन्हें दे दिया और कुछने अन्य कारणों से उन्हें धन प्रदान किया।"
परासुः स यतस्तेन वसिष्ठः स्थापितो मुनिः ।
गर्भस्थेन ततो लोके पराशर इति स्मृतः ॥
उस बालकने गर्भमें आकर परासु ( मरनेकी इच्छावाले ) वसिष्ठ मुनिको पुनः जीवित रहनेके लिये उत्साहित किया था; इसलिये वह लोकमें ' पराशर' के नामसे विख्यात हुआ ।
वसिष्ठजी आगे बोले— "तात! तदनन्तर किसी क्षत्रिय ने अकस्मात् धरती खोदते-खोदते एक भृगुवंशी के घर में गड़ा हुआ धन पा लिया। तब सभी श्रेष्ठ क्षत्रियों ने एकत्र होकर उस धन को देखा और क्रोध में भरकर शरण में आए हुए भृगुवंशियों का अपमान किया। उन महान धनुर्धरों ने समस्त भार्गवों को तीखे बाणों से मारकर यमलोक पहुँचा दिया। इस प्रकार भृगुवंश का उच्छेद आरम्भ होने पर उनकी पत्नियाँ भय के मारे हिमालय की दुर्गम कन्दराओं में छिप गईं। उनमें से एक स्त्री ने अपने महान तेजस्वी गर्भ को भय के मारे एक ओर की जाँघ को चीरकर उसमें रख लिया। उस वामोरु ने अपने पति के वंश की वृद्धि के लिए ऐसा साहस किया था।"
अवमन्य ततः क्रोधाद् भृगूंस्ताञ्छरणागतान् ।
निजघ्नुः परमेष्वासाः सर्वांस्तान् निशितैः शरैः ॥
फिर तो उन्होंने क्रोधमें भरकर शरणमें आये हुए भृगुवंशियोंका भी अपमान किया । उन महान् धनुर्धर वीरोंने ( वहाँ आये हुए ) समस्त भार्गवोंको तीखे बाणोंसे मारकर यमलोक पहुँचा दिया ।
"उस गर्भ का समाचार जानकर एक ब्राह्मणी डर गई और उसने शीघ्र ही जाकर क्षत्रियों को खबर पहुँचा दी। वे क्षत्रिय उस गर्भ की हत्या करने हेतु वहाँ पहुँचे, जहाँ वह ब्राह्मणी अपने तेज से प्रकाशित हो रही थी। उसी समय उस ब्राह्मणी का वह गर्भस्थ शिशु जाँघ फाड़कर बाहर निकल आया। बाहर निकलते ही दोपहर के प्रचण्ड सूर्य की भाँति उस तेजस्वी शिशु ने उन क्षत्रियों की आँखों की ज्योति छीन ली। वे अन्धे होकर पर्वत के बीहड़ स्थानों में भटकने लगे। वे क्षत्रिय बुझी हुई लपटों वाली आग के समान दुःख से आतुर और अचेत होकर बोले— 'देवि! यदि आपकी कृपा हो तो नेत्र पाकर यह दल अब लौट जाएगा, थोड़ी देर विश्राम करके हम चले जाएँगे। शोभने! तुम अपने पुत्र के साथ हम पर प्रसन्न हो जाओ और पुनः नूतन दृष्टि देकर हमारी रक्षा करो'।"
ऊचुश्चैनां महाभागां क्षत्रियास्ते विचेतसः ।
ज्योतिः प्रहीणा दुःखार्ताः शान्तार्चिष इवाग्नयः ॥
भगवत्याः प्रसादेन गच्छेत् क्षत्रं सचक्षुषम् ।
उपारम्य च गच्छेम सहिताः पापकर्मिणः ॥
वे क्षत्रिय उस समय आँखकी ज्योतिसे वंचित हो बुझी हुई लपटोंवाली आगके समान अत्यन्त दुःखसे आतुर एवं अचेत हो रहे थे । अतः वे उस महान् सौभाग्यशालिनी देवीसे इस प्रकार बोले — ‘ देवि! यदि आपकी कृपा हो तो नेत्र पाकर यह क्षत्रियोंका दल अब लौट जायगा, थोड़ी देर विश्राम करके हम सभी पापाचारी यहाँसे साथ ही चले जायँगे '
ब्राह्मणी ने कहा— "पुत्रो! मैंने तुम्हारी दृष्टि नहीं ली है; मुझे तुम पर क्रोध भी नहीं है। परन्तु मेरी जाँघ से पैदा हुआ यह भृगुवंशी बालक निश्चय ही तुम्हारे ऊपर आज कुपित हुआ है। यह स्पष्ट जान पड़ता है कि इस महात्मा शिशु ने तुम लोगों द्वारा मारे गए अपने बन्धु-बान्धवों का स्मरण करके क्रोधवश तुम्हारी आँखें ले ली हैं। जब से तुम लोग भृगुवंशियों के गर्भस्थ बालकों की भी हत्या करने लगे, तब से मैंने इस गर्भ को सौ वर्षों तक अपनी जाँघ में छिपाकर रखा था। भृगुकुल का पुनः प्रिय करने की इच्छा से छहों अङ्गों सहित सम्पूर्ण वेद इस बालक को गर्भ में ही प्राप्त हो गए। यह बालक अपने पिता के वध से कुपित होकर तुम्हारी आँखें ले आया है। इसलिए तुम मेरे इस उत्तम पुत्र और्व से ही याचना करो। वह तुम्हारे नतमस्तक होने से प्रसन्न होकर तुम्हारी खोयी हुई दृष्टि दे देगा।"
तमेव यूयं याचध्वमौर्वं मम सुतोत्तमम् ।
अयं वः प्रणिपातेन तुष्टो दृष्टीः प्रमोक्ष्यति ॥
इसलिये तुमलोग मेरे इस उत्तम पुत्र और्वसे ही याचना करो । यह तुमलोगोंके नतमस्तक होनेसे संतुष्ट होकर पुनः तुम्हारी खोयी हुई नेत्रोंकी ज्योति दे देगा ।
वसिष्ठजी कहते हैं— ब्राह्मणी के कहने पर उन क्षत्रियों ने और्व को प्रणाम कर कहा— "आप प्रसन्न होइये।" तब और्व ने अपने तप के प्रभाव से उन्हें नेत्रों की ज्योति दे दी। वह साधु शिरोमणि मुनि अपनी माता का ऊरु भेदकर उत्पन्न हुए थे, इसीलिए लोक में 'और्व' कहलाए। अपनी आँखें पाकर क्षत्रिय लौट गए, किन्तु भृगुवंशी और्व मुनि ने समस्त लोकों के पराभव का निश्चय कर लिया। उन्होंने अपने पितरों के सम्मान और बदला लेने के लिए उग्र तपस्या द्वारा देवता, असुर और मनुष्यों सहित समस्त लोकों को सन्तप्त कर दिया।
चक्षूंषि प्रतिलब्ध्वा च प्रतिजग्मुस्ततो नृपाः ।
भार्गवस्तु मुनिर्मेने सर्वलोकपराभवम् ॥
तदनन्तर अपनी खोयी हुई आँखें पाकर वे क्षत्रियलोग लौट गये; इधर भृगुवंशी और्व मुनिने सम्पूर्ण लोकोंके पराभवका विचार किया ।
तदनन्तर सभी पितरों ने और्व की वह उग्र तपस्या देखी और पितृलोक से आकर बोले— "बेटा और्व! तुम्हारी उग्र तपस्या का प्रभाव हमने देख लिया। अब अपना क्रोध रोको और सम्पूर्ण लोकों पर प्रसन्न हो जाओ। यह न समझना कि जब क्षत्रियलोग हिंसा कर रहे थे, तब हम भृगुवंशी ब्राह्मण अशमर्थ होने के कारण चुपचाप सह रहे थे। जब हमारी आयु बहुत बढ़ गई और मृत्यु नहीं आई, तब हमने स्वयं क्षत्रियों से वध कराने की इच्छा की। किसी भृगुवंशी ने जो धन गाड़ा था, वह भी वैर बढ़ाने के लिए ही किया गया था ताकि क्षत्रिय कुपित हो जाएँ। यदि स्वर्ग की इच्छा थी तो हमें कुबेर ने प्रचुर धनराशि दी थी। आत्महत्या करने वाला पुरुष शुभ लोक नहीं पाता, इसलिए हमने सोच-विचार कर यह उपाय निकाला। वत्स! तुम जो यह करना चाहते हो, वह हमें प्रिय नहीं है। सम्पूर्ण लोकों का पराभव बहुत बड़ा पाप है, अतः अपना मन रोक लो।"
न चैतन्नः प्रियं तात यदिदं कर्तुमिच्छसि ।
नियच्छेदं मनः पापात् सर्वलोकपराभवात् ॥
वत्स! तुम जो यह ( सब ) करना चाहते हो, वह भी हमें प्रिय नहीं है । सम्पूर्ण लोकोंका पराभव बहुत बड़ा पाप है, अतः उधरसे मनको रोको ।
वसिष्ठ मुनि ने पराशर की उग्रता को शान्त करने के लिए और्व की कथा सुनाई। उन्होंने कहा— "तात! क्षत्रियों को न मारो। बेटा! भू आदि सात लोकों का भी संहार न करो। यह जो क्रोध उत्पन्न हुआ है, वह तुम्हारे तपस्याजनित तेज को दूषित करने वाला है, अतः इसी को मारो।"
परन्तु और्व का क्रोध शान्त होने के बजाय और प्रज्वलित हो उठा। उसने पितरों से कहा— "पितरो! मैंने क्रोधवश उस समय जो सम्पूर्ण लोकों के विनाश की प्रतिज्ञा कर ली थी, वह झूठी नहीं होनी चाहिए। जिसका क्रोध और प्रतिज्ञा निष्फल होते हों, ऐसा बनने की मेरी इच्छा नहीं है। यदि मेरा क्रोध सफल नहीं हुआ तो वह मुझको उसी प्रकार जला देगा, जैसे आग अरणी काष्ठ को जला देती है। मैं जिन दिनों माता की एक जाँघ में गर्भ-शय्या पर सोता था, उन दिनों क्षत्रियों द्वारा भार्गवों का वध होने पर माताओं का करुण क्रन्दन मुझे स्पष्ट सुनाई देता था। इन नीच क्षत्रियों ने जब गर्भ के बच्चों तक के सिर काट-काटकर संसार में भृगुवंशी ब्राह्मणों का संहार आरम्भ कर दिया, तब मुझमें क्रोध का आवेश हुआ। जिनकी कोख भरी हुई थी, वे मेरी माताएँ और पितृगण भी भय के मारे समस्त लोकों में भागते फिरे; किन्तु उन्हें कहीं भी शरण नहीं मिली। जब भार्गवों की पत्नियों का कोई भी रक्षक नहीं मिला, तब मेरी इस कल्याणमयी माता ने मुझे अपनी एक जाँघ में छिपाकर रखा था।
वृथारोषप्रतिज्ञो वै नाहं भवितुमुत्सहे ।
अनिस्तीर्णो हि मां रोषो देहेदग्निरिवारणिम् ॥
जिसका क्रोध और प्रतिज्ञा निष्फल होते हों, ऐसा बननेकी मेरी इच्छा नहीं है । यदि मेरा क्रोध सफल नहीं हुआ तो वह मुझको उसी प्रकार जला देगा, जैसे आग अरणी काष्ठको जला देती है ।
मैं यह भी जानता हूँ कि आप लोग समस्त जगत् का हित चाहने वाले हैं। अतः शक्तिशाली पितरो! आप लोग ऐसा करें जिससे इन लोकों का और मेरा भी कल्याण हो।"
तब पितरों ने और्व को समझाते हुए कहा— "और्व! तुम्हारे क्रोध से उत्पन्न हुई जो यह अग्नि सब लोकों को अपना ग्रास बनाना चाहती है, उसे तुम जल में छोड़ दो, तुम्हारा कल्याण हो; क्योंकि सभी लोक जल में प्रतिष्ठित हैं। समस्त रस जल के परिणाम हैं और सम्पूर्ण जगत् भी जल का ही परिणाम माना गया है। अतः द्विजश्रेष्ठ! तुम अपनी इस क्रोधाग्नि को जल में ही छोड़ दो।"
मा वधीः क्षत्रियांस्तात न लोकान् सप्त पुत्रक ।
दूषयन्तं तपस्तेजः क्रोधमुत्पतितं जहि ॥
तात! क्षत्रियोंको न मारो । बेटा! भू आदि सात लोकोंका भी संहार न करो । यह जो क्रोध उत्पन्न हुआ है, वह ( तुम्हारे ) तपस्याजनित तेजको दूषित करनेवाला है, अतः इसीको मारो ।
पितरों ने आगे कहा— "अनघ! ऐसा करने से तुम्हारी प्रतिज्ञा भी सच्ची हो जाएगी और देवताओंसहित समस्त लोक भी नष्ट नहीं होंगे।"
राजभिश्चेश्वरैश्चैव यदि वै पितरो मम ।
शक्तैर्न शकितास्त्रातुमिष्टं मत्वेह जीवितम् ॥
अत एषामहं क्रुद्धो लोकानामीश्वरो ह्यहम् ।
भवतां च वचो नालमहं समभिवर्तितुम् ॥
इस लोकमें अपना जीवन सबको प्रिय है, यह समझकर सबका शासन करनेवाले राजालोग सामर्थ्य होते हुए भी मेरे पिताओंकी रक्षा न कर सके, इसीलिये मैं भी इन सब लोकोंपर कुपित हुआ हूँ । मुझमें इन्हें दण्ड देनेकी शक्ति है । अतः ( इस विषयमें) मैं आपलोगोंका वचन माननेमें असमर्थ हूँ ।
वसिष्ठ जी कहते हैं कि तब और्व ने अपनी उस क्रोधाग्नि को समुद्र में डाल दिया। आज भी वह अग्नि एक बहुत बड़ी घोड़ी के मुख जैसी आकृति धारण करके महासागर के जल का पान करती रहती है। वह बड़वा अपने मुख से वही आग उगलती हुई महासागर का जल पीती रहती है।
गन्धर्व कहता है— अर्जुन! महात्मा वसिष्ठ के इन वचनों को सुनकर ब्रह्मर्षि पराशर ने अपने क्रोध को समस्त लोकों के पराभव से रोक लिया। उन्होंने राक्षस सत्र का अनुष्ठान प्रारम्भ किया। उस विस्तृत यज्ञ में अपने पिता शक्ति के वध का बार-बार चिन्तन करते हुए महामुनि पराशर ने राक्षस जाति के बूढ़ों तथा बालकों को भी जलाना आरम्भ कर दिया। उस समय महर्षि वसिष्ठ ने सोचा कि इसकी दूसरी प्रतिज्ञा को न रोकें, पर उन्हें राक्षसों के वध से नहीं रोका।
न हि तं वारयामास वसिष्ठो रक्षसां वधात् ।
द्वितीयामस्य मा भाक्षं प्रतिज्ञामिति निश्चयात् ॥
उस समय महर्षि वसिष्ठने यह सोचकर कि इसकी दूसरी प्रतिज्ञाको न तोनँ, उन्हें राक्षसोंके वधसे नहीं रोका ।
उस सत्र में तीन प्रज्वलित अग्नियों के समक्ष महामुनि पराशर चौथे अग्नि के समान प्रकाशित हो रहे थे। जैसे ही उन्होंने यज्ञसामग्री का हवन आरम्भ किया, उसका तेज सम्पूर्ण आकाश को इस प्रकार आलोकित करने लगा जैसे वर्षा बीतने पर सूर्य की प्रभा दे देती है। वसिष्ठ आदि मुनियों को वहाँ पराशर दूसरे सूर्य के समान जान पड़े।
तदनन्तर उदारबुद्धि महर्षि अत्रि, इस यज्ञ को समाप्त कराने के उद्देश्य से पराशर के पास आए। उनके पश्चात पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और महाक्रतु ने भी राक्षसों के जीवन की रक्षा हेतु वहाँ पदार्पण किया। राक्षसों का विनाश देखकर महर्षि पुलस्त्य ने पराशर से कहा—
तथा पुलस्त्यः पुलहः क्रतुश्चैव महाक्रतुः ।
तत्राजग्मुरमित्रघ्न रक्षसां जीवितेप्सया ॥
शत्रुओंका नाश करनेवाले अर्जुन! उसी प्रकार पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और महाक्रतुने भी राक्षसोंके जीवनकी रक्षाके लिये वहाँ पदार्पण किया ।
"तात! तुम्हारे इस यज्ञ में क्या कोई विघ्न पड़ा है? बेटा! तुम्हारे पिता की हत्या के विषय में कुछ भी न जानने वाले इन निर्दोष राक्षसों का वध करके क्या तुम्हें प्रसन्नता होती है? वत्स! मेरी सन्ततिका तुम्हें इस प्रकार उच्छेद नहीं करनी चाहिए। तात! यह हिंसा तपस्वी ब्राह्मणों का धर्म कभी नहीं मानी गई। पराशर! शान्त रहना ही श्रेष्ठ धर्म है, अतः उसी का आचरण करो। तुम श्रेष्ठ ब्राह्मण होकर भी यह पापकर्म करते हो? तुम्हारे पिता शक्ति धर्म के ज्ञाता थे, तुम्हें उनकी मर्यादा का उल्लङ्घन नहीं करना चाहिए।
प्रजोच्छेदमिमं मह्यं न हि कर्तुं त्वमर्हसि ।
नैष तात द्विजातीनां धर्मो दृष्टस्तपस्विनाम् ॥
‘ वत्स! मेरी संततिका तुम्हें इस प्रकार उच्छेद नहीं करना चाहिये । तात! यह हिंसा तपस्वी ब्राह्मणोंका धर्म कभी नहीं मानी गयी ।
वसिष्ठकुलभूषण! शक्ति के शाप से ही वह दुर्घटना हुई थी। वे अपने ही अपराध से इस लोक को छोड़कर स्वर्गवासी हुए हैं; इसमें राक्षसों का कोई दोष नहीं है। मुने! कोई भी राक्षस उन्हें खा नहीं सकता था। अपने ही शाप से उन्हें उस समय अपनी मृत्यु देखनी पड़ी। महामुने! वसिष्ठजी के शक्ति से छोटे जो पुत्र थे, वे सभी देवताओं के साथ प्रसन्नतापूर्वक सुख भोग रहे हैं। तुम्हारे पितामह वसिष्ठजी को ये सब बातें विदित हैं। तेजस्वी राक्षसों के विनाश के लिए आयोजित इस यज्ञ में तुम भी निमित्त मात्र हो; वास्तव में यह सब उन्हीं के पूर्वकर्मों का फल है। अतः अब इस यज्ञ को छोड़ दो। तुम्हारा कल्याण हो।"
शापाद्धि शक्तेर्वासिष्ठ तदा तदुपपादितम् ।
आत्मजेन स दोषेण शक्तिर्नीत इतो दिवम् ॥
वसिष्ठकुलभूषण! शक्तिके शापसे ही उस समय वैसी दुर्घटना हो गयी थी । वे अपने ही अपराधसे इस लोकको छोड़कर स्वर्गवासी हुए हैं (इसमें राक्षसोंका कोई दोष नहीं है )
पुलस्त्य और वसिष्ठ जी के इन वचनों को सुनकर महामुनि पराशर ने उसी समय यज्ञ को समाप्त कर दिया। उन्होंने राक्षसों के विनाश के लिए सञ्चित की गई उस अग्नि को उत्तर दिशा में हिमालय के पास के विशाल वन में छोड़ दिया। वह अग्नि आज भी वहाँ प्रत्येक पर्व के अवसर पर राक्षसों, वृक्षों और पत्थरों को जलाती हुई देखी जाती है।
स तत्राद्यापि रक्षांसि वृक्षानश्मन एव च ।
भक्षयन् दृश्यते वह्निः सदा पर्वणि पर्वणि ॥
वह अग्नि आज भी वहाँ सदा प्रत्येक पर्वके अवसरपर राक्षसों, वृक्षों और पत्थरोंको जलाती हुई देखी जाती है ।
In English
The Stories of Aurva and Parashara
Vasishtha tells Arjuna about the sage Aurva, who was born from his mother's thigh to protect the Bhrigu lineage, and how he used his anger to consume the oceans. He also explains how the sage Parashara controlled his rage against demons by listening to the wisdom of other sages.
This page answers
- How was aurva born?
- Why did the kshatriyas lose their sight?
- What happened to the fire of aurva?
- Why did parashara perform the rakshasa satra sacrifice?
- How did pulastya stop parashara?
Also written: Aurvopakhyana, Aurva, Vasishtha, Parashara, Adrishyanti, Shakti, Pulastya, Atri, Vishvamitra, और्वोपाख्यान