चित्राङ्गदोपाख्यान : अहङ्कार किस प्रकार एक पराक्रमी योद्धा का पतन कर देता है?
अहङ्कार और शक्ति का विनाश
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड १ · आदिपर्व → सम्भवपर्व · अध्याय 101 · पृष्ठ 756–759
404 शब्द · 3 मिनटका पाठ · 4 श्लोक
वैशम्पायन ने राजा जनमेजय से कहा
राजा को धर्म और राजनीति की शिक्षा देने हेतु
वैशम्पायन जी बोले— हे राजन! सत्यवती चेदिराज वसुकी की पुत्री थीं और निषादराज ने उनका पालन-पोषण किया था। यह जानकर राजा शान्तनु ने उनके साथ शास्त्रीय विधि से विवाह किया। विवाह के पश्चात उस रूपवती कन्या को राजा ने अपने महल में रखा। कुछ काल व्यतीत होने पर सत्यवती के गर्भ से शान्तनु का बुद्धिमान पुत्र वीर चित्राङ्गद उत्पन्न हुआ, जो बड़ा ही पराक्रमी तथा समस्त पुरुषों में श्रेष्ठ था। तत्पश्चात महापराक्रमी और शक्तिशाली राजा शान्तनु ने दूसरे पुत्र महान धनुर्धर राजा विचित्रवीर्य को जन्म दिया। किन्तु नियति का खेल देखिए, नरश्रेष्ठ विचित्रवीर्य अभी यौवन को प्राप्त भी नहीं हुए थे कि बुद्धिमान महाराज शान्तनु की मृत्यु हो गई।
अप्राप्तवति तस्मिंस्तु यौवनं पुरुषर्षभे ।
स राजा शान्तनुर्धीमान् कालधर्ममुपेयिवान् ॥
नरश्रेष्ठ विचित्रवीर्य अभी यौवनको प्राप्त भी नहीं हुए थे कि बुद्धिमान् महाराज शान्तनुकी मृत्यु हो गयी ।
चित्राङ्गद अपने शौर्य के घमण्ड में इतना चूर था कि वह सभी राजाओं का तिरस्कार करने लगा। उसके भीतर ऐसा अहङ्कार था कि वह किसी भी मनुष्य को अपने समान नहीं मानता था; उसका यह तिरस्कार केवल मनुष्यों तक सीमित न रहा, वह देवताओं तथा असुरों पर भी आक्षेप करने लगा। तभी एक दिन, उन्हीं के समान नाम वाला महाबली गन्धर्वराज चित्राङ्गद उनके समीप आया। गन्धर्व ने चुनौती देते हुए कहा— "राजकुमार! तुम मेरे सदृश नाम धारण करते हो, अतः मुझे युद्ध का अवसर दो और यदि यह न कर सको तो अपना दूसरा नाम रख लो। मैं तुमसे युद्ध करना चाहता हूँ। मेरे नाम द्वारा व्यर्थ पुकारा जाने वाला मनुष्य मेरे सामने से सकुशल नहीं जा सकता।"
तं क्षिपन्तं सुरांश्चैव मनुष्यानसुरांस्तथा ।
गन्धर्वराजो बलवांस्तुल्यनामाभ्ययात् तदा ॥
मनुष्योंपर ही नहीं, वे देवताओं तथा असुरोंपर भी आक्षेप करते थे । तब एक दिन उन्हींके समान नामवाला महाबली गन्धर्वराज चित्रांगद उनके पास आया ।
इसके पश्चात कुरुक्षेत्र की भूमि पर एक भीषण सङ्ग्राम छिड़ गया। सरस्वती नदी के तट पर गन्धर्वराज और कुरुराज चित्राङ्गद के बीच महायुद्ध हुआ। दोनों ही पक्ष अत्यन्त बलवान थे। अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा से व्याप्त उस घमासान युद्ध में तीन वर्षों तक सङ्घर्ष चलता रहा। वह युद्ध इतना भयानक था कि उसमें माया में बढ़े-चढ़े हुए गन्धर्व ने वीर चित्राङ्गद का वध कर डाला। शत्रुओं का दमन करने वाले उस नरश्रेष्ठ चित्राङ्गद को मारकर, युद्ध समाप्त करके वह गन्धर्व स्वर्गलोक चला गया।
तस्मिन् विमर्दे तुमुले शस्त्रवर्षसमाकुले ।
मायाधिकोऽवधीद् वीरं गन्धर्वः कुरुसत्तमम् ॥
तदनन्तर उसके साथ कुरुक्षेत्रमें राजा चित्रांगदका बड़ा भारी युद्ध हुआ। गन्धर्वराज और कुरुराज दोनों ही बड़े बलवान् थे । उनमें सरस्वती नदीके तटपर तीन वर्षोंतक युद्ध होता रहा । अस्त्र- शस्त्रोंकी वर्षासे व्याप्त उस घमासान युद्धमें मायामें बढ़े - चढ़े हुए गन्धर्वने कुरुश्रेष्ठ वीर चित्रांगदका वध कर डाला ।
जब उन महान तेजस्वी पुरुषसिंह चित्राङ्गद के मारे जाने का समाचार मिला, तब शान्तनुनन्दन भीष्म ने उनके प्रेतकर्म सम्पन्न करवाए। विचित्रवीर्य अभी बालक थे और युवावस्था में नहीं पहुँचे थे, फिर भी महाबाहु भीष्म ने उन्हें कुरुदेश के राज्य पर अभिषिक्त कर दिया। महाराज जनमेजय! उसके पश्चात विचित्रवीर्य भीष्म की आज्ञा के अधीन रहकर अपने बाप-दादों के राज्य का शासन करने लगे। शान्तनुनन्दन भीष्म धर्म एवं राजनीति आदि शास्त्रों में अत्यन्त कुशल थे; अतः राजा विचित्रवीर्य धर्मपूर्वक उनका सम्मान करते थे और भीष्म जी भी इस अल्पवयस्क नरेश की सब प्रकार से रक्षा करते थे।
विचित्रवीर्यः स तदा भीष्मस्य वचने स्थितः ।
अन्वशासन्महाराज पितृपैतामहं पदम् ॥
महाराज जनमेजय! तब विचित्रवीर्य भीष्मजीकी आज्ञाके अधीन रहकर अपने बाप-दादोंके राज्यका शासन करने लगे ।
In English
The Death of Chitrangada and the Coronation of Vichitravirya
King Shantanu married Satyavati, and they had two sons named Chitrangada and Vichitravirya. Chitrangada was killed in a three-year battle by a Gandharva king who shared his name. Following this death, Bhishma crowned the young Vichitravirya as the king of Kuru.
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