श्रीगणेशाय नमः।

कुन्तीप्रश्न : असहनीय विपत्ति और कुल-विनाश से बचने का मार्ग क्या है?

कर्म और निर्णय की प्रधानता

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड १ · आदिपर्व → बकवधपर्व · अध्याय 159 · पृष्ठ 1149–1152

547 शब्द · 3 मिनटका पाठ · 4 श्लोक

कुन्ती से कहा गया

ब्राह्मणों के दुःख का कारण जानने की कुन्ती की इच्छा पर

सूत ने कुन्ती को यह कथा सुनाई, जब कुन्ती ने ब्राह्मणों से उनके दुःख का कारण जानने की इच्छा प्रकट की थी।

कुन्तीके पूछनेपर ब्राह्मणका उनसे अपने दुःखका कारण बताना कुन्त्युवाच कुतोमूलमिदं दुःखं ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतः ।
विदित्वाप्यपकर्षेयं शक्यं चेदपकर्षितुम् ॥

कुन्तीने पूछा— ब्रह्मन्! आपलोगोंके इस दुःखका कारण क्या है? मैं यह ठीक- ठीक जानना चाहती हूँ। उसे जानकर यदि मिटाया जा सकेगा तो मिटानेकी चेष्टा करूँगी ।

महाभारत · आदिपर्व · बकवधपर्व · अध्याय 159 · श्लोक 1पृष्ठ 1150

कुन्ती ने उन ब्राह्मणों की ओर देखते हुए पूछा— "ब्रह्मन्! आपलोगों के इस दुःख का कारण क्या है? मैं यह ठीक-ठीक जानना चाहती हूँ। उसे जानकर यदि मिटाया जा सकेगा तो मैं मिटाने की चेष्टा करूँगी।"

ब्राह्मण उवाच

उपपन्नं सतामेतद् यद् ब्रवीषि तपोधने ।
न तु दुःखमिदं शक्यं मानुषेण व्यपोहितुम् ॥

ब्राह्मणने कहा — तपोधने! आप जो कुछ कह रही हैं, वह आप जैसे सज्जनोंके अनुरूप ही है; परंतु हमारे इस दुःखको मनुष्य नहीं मिटा सकता ।

महाभारत · आदिपर्व · बकवधपर्व · अध्याय 159 · श्लोक 2पृष्ठ 1150

ब्राह्मण ने कुन्ती की ओर देखा और कहा— "तपोधने! आप जो कुछ कह रही हैं, वह आप जैसे सज्जनों के अनुरूप ही है; परन्तु हमारे इस दुःख को मनुष्य नहीं मिटा सकता। हमारे बीच एक भयङ्कर हिंसाप्रिय नरभक्षी राक्षस रहता है, जिसका नाम 'बक' है। वह अत्यन्त बलवान है और वही इस जनपद तथा नगर का स्वामी है। वह खोटी बुद्धिवाला मनुष्यभक्षी राक्षस मनुष्यों के ही मांस से पुष्ट हुआ है। उस दुरात्मा नरभक्षी निशाचर द्वारा प्रतिदिन खायी जाती हुई यह नगरी अनाथ हो रही है; इसे कोई रक्षक या स्वामी नहीं मिल रहा है। वह शक्तिशाली असुरराज सदा इस जनपद, नगर और देश की रक्षा करता है। उसके कारण हमें शत्रु-राज्यों तथा हिंसक प्राणियों से कभी भय नहीं होता।"

ब्राह्मण ने आगे बताया कि उस राक्षस के लिए कर नियत किया गया है— बीस खारी अगहनी के चावल का भात, दो भैंसे और एक मनुष्य। प्रत्येक गृहस्थ अपनी बारी आने पर उसे भोजन देता है। यद्यपि यह बहुत वर्षों के बाद आती है, तथापि लोगों के लिये उसकी पूर्ति बहुत कठिन होती है। जो कोई पुरुष कभी उससे छूटने का प्रयत्न करता है, वह राक्षस उन्हें पुत्र और स्त्री सहित मारकर खा जाता है। वास्तव में जो यहाँ का राजा है, वह वेत्रकीयगृह नामक स्थान में रहता है; परन्तु वह न्याय के मार्ग पर नहीं चलता। वह मन्दबुद्धि राजा यत्न करके भी ऐसा कोई उपाय नहीं करता जिससे सदा के लिये प्रजा का सङ्कट दूर हो जाए। निश्चय ही हम लोग ऐसा ही दुःख भोगने के योग्य हैं, क्योंकि इस दुर्बल राजा के राज्य में निवास करते हैं और इस दुष्ट राजा के आश्रय में रहते हैं। ब्राह्मणों को कौन आदेश दे सकता है अथवा वे किसके अधीन रह सकते हैं? ये तो इच्छानुसार विचरने वाले पक्षियों की भाँति देश या राजा के गुण देखकर ही कहीं भी निवास करते हैं। नीति कहती है कि पहले अच्छे राजा को प्राप्त करे, उसके बाद पत्नी की और फिर धन की उपलब्धि करे; इन तीनों के सङ्ग्रह द्वारा अपने जाति, भाइयों तथा पुत्रों को सङ्कट से बचाए। परन्तु मैंने इन तीनों का विपरीत ढङ्ग से उपार्जन किया है— मैंने दुष्ट राजा के राज्य में निवास किया, कुराज्य में विवाह किया और विवाह के पश्चात् धन नहीं कमाया; इसलिये इस विपत्ति में पड़कर हम लोग भारी कष्ट पा रहे हैं।"

विपरीतं मया चेदं त्रयं सर्वमुपार्जितम् ।
तदिमामापदं प्राप्य भृशं तप्यामहे वयम् ॥

मैंने इन तीनोंका विपरीत ढंगसे उपार्जन किया है ( अर्थात् दुष्ट राजाके राज्यमें निवास किया, कुराज्यमें विवाह किया और विवाहके पश्चात् धन नहीं कमाया ); इसलिये इस विपत्तिमें पड़कर हमलोग भारी कष्ट पा रहे हैं ।

महाभारत · आदिपर्व · बकवधपर्व · अध्याय 159 · श्लोक 13पृष्ठ 1152

ब्राह्मण की आँखों में गहरा शोक था। उसने आगे कहा— "आज हमारी बारी आयी है, जो समूचे कुल का विनाश करने वाली है। मुझे उस राक्षस को करके रूप में नियत भोजन और एक पुरुष की बलि देनी पड़ेगी। मेरे पास धन नहीं है जिससे कहीं से किसी पुरुष को खरीद लाऊँ; अपने सुहृदों एवं सगे-सम्बन्धियों को तो मैं कदापि उस राक्षस के हाथ में नहीं दे सकूँगा। उस निशाचर से छूटने का कोई उपाय मुझे नहीं दीखता; अतः मैं अत्यन्त दुस्तर दुःख के महासागर में डूबा हुआ हूँ। अब मैं इन बान्धवजनों के साथ ही राक्षस के पास जाऊँगा; फिर वह नीच निशाचर एक ही साथ हम सबको खा जाएगा।"

सोऽयमस्माननुप्राप्तो वारः कुलविनाशनः ।
भोजनं पुरुषश्चैकः प्रदेयं वेतनं मया ॥

वही आज हमारी बारी आयी है, जो समूचे कुलका विनाश करनेवाली है । मुझे उस राक्षसको करके रूपमें नियत भोजन और एक पुरुषकी बलि देनी पड़ेगी ।

महाभारत · आदिपर्व · बकवधपर्व · अध्याय 159 · श्लोक 14पृष्ठ 1152

In English

The Terror of the Demon Bak

A Brahmin explains to Kunti that his community is suffering under a man-eating demon named Bak. The demon demands a regular tribute consisting of rice, two buffaloes, and one human being. The Brahmin laments that because he lives under an ineffective king, he must now sacrifice himself and his family to the monster.

This page answers

  • Who is the demon bak?
  • What is the tribute required by bak?
  • Why are the people suffering in this kingdom?
  • What does the brahmin have to give to the demon?

Also written: Kuntiprashna, Kunti, कुन्तीप्रश्न