श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1151–1160

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1151–1160

पृष्ठ 1151

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देशकी रक्षा करता है । उसके कारण हमें शत्रुराज्यों तथा हिंसक प्राणियोंसे कभी भय नहीं होता ॥ ३–५ ॥

वेतनं तस्य विहितं शालिवाहस्य भोजनम् ।

महिषौ पुरुषश्चैको यस्तदादाय गच्छति ॥ ६ ॥

उसके लिये कर नियत किया गया है— बीस खारी अगहनीके चावलका भात, दो भैंसे और एक मनुष्य, जो वह सब सामान लेकर उसके पास जाता है ॥ ६ ॥

एकैकश्चापि पुरुषस्तत् प्रयच्छति भोजनम् ।

स वारो बहुभिर्वर्षैर्भवत्यसुकरो नरैः ॥ ७ ॥

प्रत्येक गृहस्थ अपनी बारी आनेपर उसे भोजन देता है । यद्यपि यहब बहुत वर्षोंके बाद आती है, तथापि लोगोंके लिये उसकी पूर्ति बहुत कठिन होती है ॥ ७ ॥

तद्विमोक्षाय ये केचिद् यतन्ति पुरुषाः क्वचित् ।

सपुत्रदारांस्तान् हत्वा तद् रक्षो भक्षयत्युत ॥ ८ ॥

जो कोई पुरुष कभी उससे छूटनेका प्रयत्न करते हैं, वह राक्षस उन्हें पुत्र और स्त्रीसहित मारकर खा जाता है ॥ ८ ॥

वेकीयगृहे राजा नायं नयमिहास्थितः ।

उपायं तं न कुरुते यत्नादपि स मन्दधीः ।

अनामयं जनस्यास्य येन स्यादद्य शाश्वतम् ॥ ९ ॥

वास्तवमें जो यहाँका राजा है, वह वेत्रकीयगृह नामक स्थानमें रहता है । परंतु वह न्यायके मार्गपर नहीं चलता । वह मन्दबुद्धि राजा यत्न करके भी ऐसा कोई उपाय नहीं करता, जिससे सदाके लिये प्रजाका संकट दूर हो जाय ॥ ९ ॥

एतदर्हा वयं नूनं वसामो दुर्बलस्य ये ।

विषये नित्यवास्तव्याः कुराजानमुपाश्रिताः ॥ १० ॥

निश्चय ही हमलोग ऐसा ही दुःख भोगनेके योग्य हैं; क्योंकि इस दुर्बल राजाके राज्यमें निवास करते हैं, यहाँके नित्य निवासी हो गये हैं और इस दुष्ट राजाके आश्रयमें रहते हैं ॥ १० ॥

ब्राह्मणाः कस्य वक्तव्याः कस्य वाच्छन्दचारिणः ।

गुणैरेते हि वत्स्यन्ति कामगाः पक्षिणो यथा ॥ ११ ॥

ब्राह्मणोंको कौन आदेश दे सकता है अथवा वे किसके अधीन रह सकते हैं । ये तो इच्छानुसार विचरनेवाले पक्षियोंकी भाँति देश या राजाके गुण देखकर ही कहीं भी निवास करते हैं ॥ ११ ॥

राजानं प्रथमं विन्देत् ततो भार्यां ततो धनम् ।

त्रयस्य संचयेनास्य ज्ञातीन् पुत्रांश्च तारयेत् ॥ १२ ॥

पृष्ठ 1152

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नीति कहती है, पहले अच्छे राजाको प्राप्त करे । उसके बाद पत्नीकी और फिर धनकी उपलब्धि करे । इन तीनोंके संग्रहद्वारा अपने जाति- भाइयों तथा पुत्रोंको संकटसे बचाये ॥ १२ ॥

विपरीतं मया चेदं त्रयं सर्वमुपार्जितम् ।

तदिमामापदं प्राप्य भृशं तप्यामहे वयम् ॥ १३ ॥

मैंने इन तीनोंका विपरीत ढंगसे उपार्जन किया है ( अर्थात् दुष्ट राजाके राज्यमें निवास किया, कुराज्यमें विवाह किया और विवाहके पश्चात् धन नहीं कमाया ); इसलिये इस विपत्तिमें पड़कर हमलोग भारी कष्ट पा रहे हैं ॥ १३ ॥

सोऽयमस्माननुप्राप्तो वारः कुलविनाशनः ।

भोजनं पुरुषश्चैकः प्रदेयं वेतनं मया ॥ १४ ॥

वही आज हमारी बारी आयी है, जो समूचे कुलका विनाश करनेवाली है । मुझे उस राक्षसको करके रूपमें नियत भोजन और एक पुरुषकी बलि देनी पड़ेगी ॥ १४ ॥

न च मे विद्यते वित्तं संक्रेतुं पुरुषं क्वचित् ।

सुहृज्जनं प्रदातुं च न शक्ष्यामि कदाचन ॥ १५ ॥

मेरे पास धन नहीं है, जिससे कहींसे किसी पुरुषको खरीद लाऊँ । अपने सुहृदों एवं सगे- सम्बन्धियोंको तो मैं कदापि उस राक्षसके हाथमें नहीं दे सकूँगा ॥ १५ ॥

गतिं चैव न पश्यामि तस्मान्मोक्षाय रक्षसः ।

सोऽहं दुःखार्णवे मग्नो महत्यसुकरे भृशम् ॥ १६ ॥

उस निशाचरसे छूटनेका कोई उपाय मुझे नहीं दिखायी देता; अतः मैं अत्यन्त दुस्तर दुःखके महासागरमें डूबा हुआ हूँ ॥ १६ ॥

सहैवैतैर्गमिष्यामि बान्धवैरद्य राक्षसम् ।

ततो नः सहितान् क्षुद्रः सर्वानेवोपभोक्ष्यति ॥ १७ ॥

अब इन बान्धवजनोंके साथ ही मैं राक्षसके पास जाऊँगा; फिर वह नीच निशाचर एक ही साथ हम सबको खा जायगा ॥ १७ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि कुन्तीप्रश्ने एकोनषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत बकवधपर्वमें कुन्तीप्रश्नविषयक एक सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५९ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १ ९ श्लोक हैं )

पृष्ठ 1153

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षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः कुन्ती और ब्राह्मणकी बातचीत कुन्त्युवाच

न विषादस्त्वया कार्यो भयादस्मात् कथंचन ।

उपायः परिदृष्टोऽत्र तस्मान्मोक्षाय रक्षसः ॥ १ ॥

कुन्ती बोली – ब्रह्मन्! आपको अपने ऊपर आये हुए इस भयसे किसी प्रकार विषाद नहीं करना चाहिये । इस परिस्थितिमें उस राक्षससे छूटनेका उपाय मेरी समझमें आ गया ॥ १ ॥

एकस्तव सुतो बालः कन्या चैका तपस्विनी ।

न चैतयोस्तथा पत्न्या गमनं तव रोचये ॥ २ ॥

आपके तो एक ही नन्हा सा पुत्र और एक ही तपस्विनी कन्या है, अतः इन दोनोंका तथा आपकी पत्नीका भी वहाँ जाना मुझे अच्छा नहीं लगता ॥ २ ॥

मम पञ्च सुता ब्रह्मंस्तेषामेको गमिष्यति ।

त्वदर्थं बलिमादाय तस्य पापस्य रक्षसः ॥ ३ ॥

पृष्ठ 1154

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कुन्तीद्वारा ब्राह्मण - दम्पतिको सान्त्वना बकासुरपर भीमका प्रहार

पृष्ठ 1155

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विप्रवर! मेरे पाँच पुत्र हैं, उनमेंसे एक आपके लिये उस पापी राक्षसकी बलि-सामग्री लेकर चला जायगा ॥ ३ ॥

ब्राह्मणउवाच

नाहमेतत् करिष्यामि जीवितार्थी कथंचन ।

ब्राह्मणस्यातिथेश्चैव स्वार्थ प्राणान् वियोजयन् ॥ ४ ॥

ब्राह्मणने कहा- मैं अपने जीवनकी रक्षाके लिये किसी तरह ऐसा नहीं करूँगा । एक तो ब्राह्मण, दूसरे अतिथिके प्राणोंका नाश मैं अपने तुच्छ स्वार्थके लिये कराऊँ! यह कदापि सम्भव नहीं है ॥ ४ ॥

न त्वेतदकुलीनासु नाधर्मिष्ठासु विद्यते ।

यद् ब्राह्मणार्थं विसृजेदात्मानमपि चात्मजम् ॥ ॥

ऐसा निन्दनीय कार्य नीच और अधर्मी जनतामें भी नहीं देखा जाता । उचित तो यह है कि ब्राह्मणके लिये स्वयं अपनेको और अपने पुत्रको भी निछावर कर दे ॥ ५ ॥

आत्मनस्तु मया श्रेयो बोद्धव्यमिति रोचते ।

ब्रह्मवध्याऽऽत्मवध्या वा श्रेयानात्मवधो मम ॥ ६ ॥

ब्रह्मवध्या परं पापं निष्कृतिर्नात्र विद्यते ।

अबुद्धिपूर्वं कृत्वापि वरमात्मवधो मम ॥ ७ ॥

इसीमें मुझे अपना कल्याण समझना चाहिये तथा यही मुझे अच्छा लगता है । ब्रह्महत्या और आत्महत्यामें मुझे आत्महत्या ही श्रेष्ठ जान पड़ती है । ब्रह्महत्या बहुत बड़ा पाप है । इस जगत्में उससे छूटनेका कोई उपाय नहीं है । अनजानमें भी ब्रह्महत्या करनेकी अपेक्षा मेरी दृष्टिमें आत्महत्या कर लेना अच्छा है ॥ ६-७ ॥

न त्वहं वधमाकाङ्क्षे स्वयमेवात्मनः शुभे ।

परैः कृते वधे पापं न किंचिन्मयि विद्यते ॥ ८ ॥

कल्याणि! मैं स्वयं तो आत्महत्याकी इच्छा करता नहीं; परंतु यदि दूसरोंने मेरा वध कर दिया तो उसके लिये मुझे कोई पाप नहीं लगेगा ॥ ८ ॥

अभिसंधिकृते तस्मिन् ब्राह्मणस्य वधे मया ।

निष्कृतिं न प्रपश्यामि नृशंसं क्षुद्रमेव च ॥ ९ ॥

आगतस्य गृहं त्यागस्तथैव शरणार्थिनः ।

याचमानस्य च वधो नृशंसो गर्हितो बुधैः ॥ १० ॥

यदि मैंने जान - बूझकर ब्राह्मणका वध करा दिया तो वह बड़ा ही नीच और क्रूरतापूर्ण कर्म होगा । उससे छुटकारा पानेका कोई उपाय मुझे नहीं सूझता । घरपर आये हुए तथा शरणार्थीका त्याग और अपनी रक्षाके लिये याचना करनेवालेका वध -यह विद्वानोंकी रायमें अत्यन्त क्रूर एवं निन्दित कर्म है ॥ ९-१० ॥

पृष्ठ 1156

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कुर्यान्न निन्दितं कर्म न नृशंसं कथंचन ।

इति पूर्वे महात्मान आपद्धर्मविदो विदुः ॥ ११ ॥

श्रेयांस्तु सहदारस्य विनाशोऽद्य मम स्वयम् ।

ब्राह्मणस्य वधं नाहमनुमंस्ये कदाचन ॥ १२ ॥

आपद्धर्मके ज्ञाता प्राचीन महात्माओंने कहा है कि किसी प्रकार भी क्रूर एवं निन्दित कर्म नहीं करना चाहिये । अतः आज अपनी पत्नीके साथ स्वयं मेरा विनाश हो जाय, यह श्रेष्ठ है; किंतु ब्राह्मणवधकी अनुमति मैं कदापि नहीं दे सकता ॥ ११-१२ ॥ कुन्त्युवाच

ममाप्येषा मतिर्ब्रह्मन् विप्रा रक्ष्या इति स्थिरा ।

न चाप्यनिष्टः पुत्रो मे यदि पुत्रशतं भवेत् ॥ १३ ॥

न चासौ राक्षसः शक्तो मम पुत्रविनाशने ।

वीर्यवान् मन्त्रसिद्धश्च तेजस्वी च सुतो मम ॥। १४ ॥

- कुन्ती बोली – ब्रह्मन्! मेरा भी यह स्थिर विचार है कि ब्राह्मणोंकी रक्षा करनी चाहिये । यों तो मुझे भी अपना कोई पुत्र अप्रिय नहीं है, चाहे मेरे सौ पुत्र ही क्यों न हों । किंतु वह राक्षस मेरे पुत्रका विनाश करनेमें समर्थ नहीं है; क्योंकि मेरा पुत्र पराक्रमी, मन्त्रसिद्ध और तेजस्वी है ॥ १३-१४ ॥

राक्षसाय च तत् सर्वं प्रापयिष्यति भोजनम् ।

मोक्षयिष्यति चात्मानमिति मे निश्चिता मतिः ॥ १५ ॥

मेरा यह निश्चित विश्वास है कि वह सारा भोजन राक्षसके पास पहुँचा देगा और उससे अपने - आपको भी छुड़ा लेगा ॥ १५ ॥

समागताश्च वीरेण दृष्टपूर्वाश्च राक्षसाः ।

बलवन्तो महाकाया निहताश्चाप्यनेकशः ॥ १६ ॥

मैंने पहले भी बहुत - से बलवान् और विशालकाय राक्षस देखे हैं, जो मेरे वीर पुत्रसे भिड़कर अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे हैं ॥ १६ ॥

न त्विदं केषुचिद् ब्रह्मन् व्याहर्तव्यं कथंचन विद्यार्थिनो हि मे पुत्रान् विप्रकुर्युः कुतूहलात् ॥ १७ ॥

परंतु ब्रह्मन्! आपको किसीसे भी किसी तरह यह बात कहनी नहीं चाहिये । नहीं तो लोग मन्त्र सीखनेके लोभसे कौतूहलवश मेरे पुत्रोंको तंग करेंगे ॥ १७ ॥

गुरुणा चाननुज्ञातो ग्राहयेद् यत् सुतो मम ।

न स कुर्यात् तथा कार्यं विद्ययेति सतां मतम् ॥ १८ ॥

और यदि मेरा पुत्र गुरुकी आज्ञा लिये बिना अपना मन्त्र किसीको सिखा देगा तो वह सीखनेवाला मनुष्य उस मन्त्रसे वैसा कार्य नहीं कर सकेगा, जैसा मेरा पुत्र कर लेता है । इस

पृष्ठ 1157

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विषयमें साधु पुरुषोंका ऐसा ही मत है ॥ १८ ॥

एवमुक्तस्तु पृथया स विप्रो भार्यया सह ।

हृष्टः सम्पूजयामास तद्वाक्यममृतोपमम् ॥ १ ९ ॥

कुन्तीदेवीके यों कहनेपर पत्नीसहित वह ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुआ और उसने कुन्तीके अमृत- तुल्य जीवनदायक मधुर वचनोंकी बड़ी प्रशंसा की ॥ १ ९ ॥

ततः कुन्ती च विप्रश्च सहितावनिलात्मजम् ।

तमब्रूतां कुरुष्वेति स तथेत्यब्रवीच्च तौ ॥ २० ॥

तदनन्तर कुन्ती और ब्राह्मणने मिलकर वायु- नन्दन भीमसेनसे कहा – ' तुम यह काम कर दो । ' भीमसेनने उन दोनोंसे ' तथास्तु ' कहा ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि भीमबकवधाङ्गीकारे षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत बकवधपर्वमें भीमके द्वारा बकवधकी स्वीकृतिविषयक एक सौ साठवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १६० ॥

पृष्ठ 1158

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एकषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः भीमसेनको राक्षसके पास भेजनेके विषयमें युधिष्ठिर और कुन्तीकी बातचीत वैशम्पायन उवाच

करिष्य इति भीमेन प्रतिज्ञातेऽथ भारत ।

आजग्मुस्ते ततः सर्वे भैक्षमादाय पाण्डवाः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! जब भीमसेनने यह प्रतिज्ञा कर ली कि ‘ मैं इस कार्यको पूरा करूंगा ', उसी समय पूर्वोक्त सब पाण्डव भिक्षा लेकर वहाँ आये ॥ १ ॥

आकारेणैव तं ज्ञात्वा पाण्डुपुत्रो युधिष्ठिरः ।

रहः समुपविश्यैकस्ततः पप्रच्छ मातरम् ॥ २ ॥

पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने भीमसेनकी आकृतिसे ही समझ लिया कि आज ये कुछ करनेवाले हैं; फिर उन्होंने एकान्तमें अकेले बैठकर मातासे पूछा ॥ २ ॥

युधिष्ठिर उवाच

किं चिकीर्षत्ययं कर्म भीमो भीमपराक्रमः ।

भवत्यनुमते कच्चित् स्वयं वा कर्तुमिच्छति ॥ ३ ॥

युधिष्ठिर बोले- माँ! ये भयंकर पराक्रमी भीमसेन कौन- सा कार्य करना चाहते हैं? वे आपकी रायसे अथवा स्वयं ही कुछ करनेको उतारू हो रहे हैं? ॥ ३ ॥

कुन्त्युवाच

ममैव वचनादेष करिष्यति परंतपः ।

ब्राह्मणार्थे महत् कृत्यं मोक्षाय नगरस्य च ॥ ४ ॥

कुन्तीने कहा- बेटा! शत्रुओंको संतप्त करनेवाला भीमसेन मेरी ही आज्ञासे ब्राह्मणके हितके लिये तथा सम्पूर्ण नगरको संकटसे छुड़ानेके लिये आज एक महान् कार्य करेगा ॥ ४ ॥

युधिष्ठिर उवाच

किमिदं साहसं तीक्ष्णं भवत्या दुष्करं कृतम् ।

परित्यागं हि पुत्रस्य न प्रशंसन्ति साधवः ॥ ५ ॥

युधिष्ठिरने कहा - माँ! आपने यह असह्य और दुष्कर साहस क्यों किया? साधु पुरुष अपने पुत्रके परित्यागको अच्छा नहीं बताते ॥ ५ ॥

कथं परसुतस्यार्थे स्वसुतं त्यक्तुमिच्छसि ।

पृष्ठ 1159

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लोकवेदविरुद्धं हि पुत्रत्यागात् कृतं त्वया ॥ ६ ॥

दूसरेके बेटेके लिये आप अपने पुत्रको क्यों त्याग देना चाहती हैं? पुत्रका त्याग करके आपने लोक और वेद दोनोंके विरुद्ध कार्य किया है ॥ ६ ॥

यस्य बाहू समाश्रित्य सुखं सर्वे शयामहे ।

राज्यं चापहृतं क्षुद्रैराजिहीर्षामहे पुनः ॥ ७ ॥

जिसके बाहुबलका भरोसा करके हम सब लोग सुखसे सोते हैं और नीच शत्रुओंने जिस राज्यको हड़प लिया है, उसको पुनः वापस लेना चाहते हैं, ॥ ७ ॥

यस्य दुर्योधनो वीर्यं चिन्तयन्नमितौजसः ।

न शेते रजनीः सर्वा दुःखाच्छकुनिना सह ॥ ८ ॥

जिस अमिततेजस्वी वीरके पराक्रमका चिन्तन करके शकुनिसहित दुर्योधनको दुःखके मारे सारी रात नींद नहीं आती थी, ॥ ८ ॥

यस्य वीरस्य वीर्येण मुक्ता जतुगृहाद् वयम् ।

अन्येभ्यश्चैव पापेभ्यो निहतश्च पुरोचनः ॥ ९ ॥

जिस वीरके बलसे हमलोग लाक्षागृह तथा दूसरे दूसरे पापपूर्ण अत्याचारोंसे बच पाये और दुष्ट पुरोचन भी मारा गया, ॥ ९ ॥

यस्य वीर्यं समाश्रित्य वसुपूर्णां वसुन्धराम् ।

इमां मन्यामहे प्राप्तां निहत्य धृतराष्ट्रजान् ॥ १० ॥

तस्य व्यवसितस्त्यागो बुद्धिमास्थाय कां त्वया ।

कच्चिन्नु दुःखैर्बुद्धिस्ते विलुप्ता गतचेतसः ॥ ११ ॥

जिसके बल - पराक्रमका आश्रय लेकर हमलोग धृतराष्ट्रपुत्रोंको मारकर धन - धान्यसे सम्पन्न इस ( सम्पूर्ण) पृथ्वीको अपने अधिकारमें आयी हुई ही मानते हैं, उस बलवान् पुत्रके त्यागका निश्चय आपने किस बुद्धिसे किया है? क्या आप अनेक दुःखोंके कारण अपनी चेतना खो बैठी हैं? आपकी बुद्धि लुप्त हो गयी है ॥ १०-११ ॥ कुन्त्युवाच

युधिष्ठिर न संतापस्त्वया कार्यो वृकोदरे ।

न चायं बुद्धिदौर्बल्याद् व्यवसायः कृतो मया ॥ १२ ॥

कुन्तीने कहा – युधिष्ठिर! तुम्हें भीमसेनके लिये चिन्ता नहीं करनी चाहिये । मैंने जो यह निश्चय किया है, वह बुद्धिकी दुर्बलतासे नहीं किया है ॥ १२ ॥

इह विप्रस्य भवने वयं पुत्र सुखोषिताः ।

अज्ञाता धार्तराष्ट्राणां सत्कृता वीतमन्यवः ॥ १३ ॥

तस्य प्रतिक्रिया पार्थ मयेयं प्रसमीक्षिता ।

एतावानेव पुरुषः कृतं यस्मिन् न नश्यति ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1160

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बेटा! हमलोग यहाँ इस ब्राह्मणके घरमें बड़े सुखसे रहे हैं । धृतराष्ट्रके पुत्रोंको हमारी कानों- कान खबर नहीं होने पायी है । इस घरमें हमारा इतना सत्कार हुआ है कि हमने अपने पिछले दुःख और क्रोधको भुला दिया है । पार्थ! ब्राह्मणके इस उपकारसे उऋण होनेका यही एक उपाय मुझे दिखायी दिया । मनुष्य वही है, जिसके प्रति किया हुआ उपकार नष्ट न हो ( जो उपकारको भुला न दे ) ॥ १३-१४ ॥ यावच्च कुर्यादन्योऽस्य कुर्याद् बहुगुणं ततः ।

दृष्ट्वा भीमस्य विक्रान्तं तदा जतुगृहे महत् ।

हिडिम्बस्य वधाच्चैवं विश्वासो मे वृकोदरे ॥ १५ ॥

दूसरा मनुष्य उसके लिये जितना उपकार करे, उससे कई गुना अधिक प्रत्युपकार स्वयं उसके प्रति करना चाहिये । मैंने उस दिन लाक्षागृहमें भीमसेनका महान् पराक्रम देखा तथा हिडिम्बवधकी घटना भी मेरी आँखोंके सामने हुई । इससे भीमसेनपर मेरा पूरा विश्वास हो गया है ॥ १५ ॥

बाह्वोर्बलं हि भीमस्य नागायुतसमं महत् ।

येन यूयं गजप्रख्या निर्व्यूढा वारणावतात् ॥ १६ ॥

भीमका महान् बाहुबल दस हजार हाथियोंके समान है, जिससे वह हाथीके समान बलशाली तुम सब भाइयोंको वारणावत नगरसे ढोकर लाया है ॥ १६ ॥

वृकोदरेण सदृशो बलेनान्यो न विद्यते ।

योऽभ्युदीयाद् युधि श्रेष्ठमपि वज्रधरं स्वयम् ॥ १७ ॥

भीमसेनके समान बलवान् दूसरा कोई नहीं है । वह युद्धमें सर्वश्रेष्ठ वज्रपाणि इन्द्रका भी सामना कर सकता है ॥ १७ ॥

जातमात्रः पुरा चैव ममाङ्कात् पतितो गिरौ ।

शरीरगौरवादस्य शिला गात्रैर्विचूर्णिता ॥ १८ ॥

पहलेकी बात है, जब वह नवजात शिशुके रूपमें था, उसी समय मेरी गोदसे छूटकर पर्वतके शिखरपर गिर पड़ा था । जिस चट्टानपर यह गिरा, वह इसके शरीरकी गुरुताके कारण चूर- चूर हो गयी थी ॥ १८ ॥

तदहं प्रज्ञया ज्ञात्वा बलं भीमस्य पाण्डव ।

प्रतिकार्ये च विप्रस्य ततः कृतवती मतिम् ॥ १ ९ ॥

अतः पाण्डुनन्दन! मैंने भीमसेनके बलको अपनी बुद्धिसे भलीभाँति समझकर तब ब्राह्मणके शत्रुरूपी राक्षससे बदला लेनेका निश्चय किया है ॥ १ ९ ॥

नेदं लोभान्न चाज्ञानान्न च मोहाद् विनिश्चितम् ।

बुद्धिपूर्वं तु धर्मस्य व्यवसायः कृतो मया ॥ २० ॥

मैंने न लोभसे, न अज्ञानसे और न मोहसे ऐसा विचार किया है, अपितु बुद्धिके द्वारा खूब सोच- समझकर विशुद्ध धर्मानुकूल निश्चय किया है ॥ २० ॥