महाभिषोपाख्यान : देवलोक की मर्यादा भङ्ग करने पर क्या दण्ड मिला?
दृष्टिकोण और आत्मसंयम
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड १ · आदिपर्व → सम्भवपर्व · अध्याय 96 · पृष्ठ 713–717
570 शब्द · 3 मिनटका पाठ · 5 श्लोक
वैशम्पायन ने जनमेजय से कहा
राजा के धर्म और कर्मों के रहस्य को समझाने हेतु
वैशम्पायनजी बोले— हे जनमेजय! सुनो, इश्वाकु वंश के उस प्रसङ्ग को, जब राजा महाभिष ने सत्य और पराक्रम के बल पर स्वर्ग लोक प्राप्त किया था। वह राजा एक हजार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञों के पुण्य से इन्द्रदेव को सन्तुष्ट कर स्वर्ग में प्रतिष्ठित हुए थे।
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो राजाऽऽसीत् पृथिवीपतिः ।
महाभिष इति ख्यातः सत्यवाक् सत्यविक्रमः ॥
सोऽश्वमेधसहस्रेण राजसूयशतेन च ।
तोषयामास देवेशं स्वर्गं लेभे ततः प्रभुः ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! इश्वाकु वंशमें उत्पन्न महाभिष नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जो सत्यवादी होनेके साथ ही सत्यपराक्रमी भी थे । उन्होंने एक हजार अश्वमेध और एक सौ राजसूय यज्ञोंद्वारा देवेश्वर इन्द्रको संतुष्ट किया और उन यज्ञोंके पुण्यसे उन शक्तिशाली नरेशने स्वर्गलोग प्राप्त कर लिया ।
एक समय की बात है, ब्रह्माजी की सेवा में समस्त देवता उपस्थित थे। उसी सभा में राजर्षि महाभिष भी विराजमान थे। तभी सरिताओं में श्रेष्ठ गङ्गा, ब्रह्माजी के समीप आईं। अचानक वायु का एक झोंका चला और गङ्गा के शरीर का चाँदनी के समान उज्ज्वल वस्त्र सहसा ऊपर की ओर उठ गया। यह दृश्य देखते ही सब देवताओं ने लज्जावश तुरन्त अपना मुँह नीचे की ओर कर लिया; किन्तु राजर्षि महाभिष निःशङ्क होकर उस देवनदी की ओर देखते ही रह गये।
ततोऽभवन् सुरगणाः सहसावाङ्मुखास्तदा ।
महाभिषस्तु राजर्षिरशङ्को दृष्टवान् नदीम् ॥
यह देख सब देवताओंने तुरंत अपना मुँह नीचेकी ओर कर लिया; किंतु राजर्षि महाभिष निःशंक होकर देवनदीकी ओर देखते ही रह गये ।
यह देखकर भगवान ब्रह्मा क्रोधित हुए और महाभिष को शाप देते हुए बोले— 'दुर्मते! तुम मनुष्यों में जन्म लेकर फिर पुण्य लोकों में आओगे। जिस गङ्गा ने तुम्हारे चित्त को चुरा लिया है, वही मनुष्य लोक में तुम्हारे प्रतिकूल आचरण करेगी।'
ततः कदाचिद् ब्रह्माणमुपासांचक्रिरे सुराः ।
तत्र राजर्षयो ह्यासन् स च राजा महाभिषः ॥
तदनन्तर एक समय सब देवता ब्रह्माजीकी सेवामें उनके समीप बैठे हुए थे । वहाँ बहुत-त- से राजर्षि तथा पूर्वोक्त राजा महाभिष भी उपस्थित थे ।
महाभिष के भविष्य का चिन्तन करते हुए, उन्होंने अन्य तपस्वी राजाओं के बीच विचार किया और अन्ततः महातेजस्वी राजा प्रतीप को ही अपने पिता बनाने के योग्य चुना। दूसरी ओर, महानदी गङ्गा जब राजा महाभिष के धैर्य खोने पर मन-ही-मन उन्हीं का चिन्तन करती हुई लौट रही थीं, तब मार्ग में उन्हें वसु देवता दिखाई दिए। वे स्वर्ग से नीचे गिर रहे थे और मोहाच्छन्न होकर मलिन दिखायी दे रहे थे।
गङ्गा ने रुककर उनसे पूछा— 'महानदी! आप इस दशा में क्यों हैं?'
तब वसुओं ने अत्यन्त विवशता के साथ कहा— 'महानदी! महात्मा वसिष्ठ ने थोड़े से अपराध पर क्रोध में आकर हमें शाप दे दिया है। एक दिन जब हम वसिष्ठ जी की पेड़ों की आड़ में हो रही सन्ध्योपासना में बाधा डाल रहे थे, तब उन्होंने कुपित होकर हमें मनुष्य योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया। उस ब्रह्मवादी महर्षि द्वारा कही गई बात को टाला नहीं जा सकता; अतः हमारी प्रार्थना है कि तुम पृथ्वी पर मानव पत्नी बनकर हम वसुओं को अपने पुत्र रूप में उत्पन्न करो। शुभे! हमें मानुषी स्त्रियों के उदर में प्रवेश न करना पड़े, इसीलिए हमने यह अनुरोध किया है।'
वसुओं की इस करुण प्रार्थना को सुनकर गङ्गाजी 'तथास्तु' कहकर बोलीं— 'हे वसुओं! मर्त्यलोक में ऐसे श्रेष्ठ पुरुष कौन हैं, जो तुम लोगों के पिता होंगे?'
वसुगण ने उत्तर दिया— 'राजा प्रतीप के पुत्र राजा शान्तनु, जो सम्पूर्ण लोक में विख्यात हैं, वही हमारे कर्ता होंगे।'
गङ्गाजी ने कहा— 'निष्पाप देवताओं! जैसा तुम चाहते हो, वैसा ही मेरा भी विचार है। मैं राजा शान्तनु की प्रिय बनूँगी और तुम्हारे इस अभीष्ट कार्य को भी सिद्ध करूँगी।'
गङ्गोवाच ममाप्येवं मतं देवा यथा मां वदतानघाः ।
प्रियं तस्य करिष्यामि युष्माकं चैतदीप्सितम् ॥
गंगाजीने कहा - निष्पाप देवताओ! तुमलोग जैसा कहते हो, वैसा ही मेरा भी विचार है । मैं राजा शान्तनुका प्रिय करूँगी और तुम्हारे इस अभीष्ट कार्यको भी सिद्ध करूँगी ।
तब वसुओं ने एक विशेष शर्त रखी— 'गङ्गे! हम जब तुम्हारे गर्भ से जन्म लें, तब पैदा होते ही हमें अपने जल में फेंक देना, जिससे हमें शीघ्र ही इस मर्त्यलोक से छुटकारा मिल जाए।'
गङ्गाजी ने वचन दिया— 'ठीक है, मैं ऐसा ही करूँगी; परन्तु उस राजा के साथ मेरे पुत्र के लिए किया हुआ सम्बन्ध व्यर्थ न हो जाए, इसलिए उनके लिए एक पुत्र की व्यवस्था भी होनी चाहिए।'
तब वसुगण ने योजना बताते हुए कहा— 'हम सब लोग अपने तेज का एक-एक अष्टमांश देंगे। उस तेज से जो तुम्हारा पुत्र होगा, वह राजा की इच्छा के अनुरूप होगा; किन्तु मर्त्यलोक में उसकी कोई सन्तान नहीं होगी। अतः तुम्हारा वह पुत्र सन्तानहीन होने के साथ अत्यन्त पराक्रमी होगा।'
वसव ऊचुः तुरीयार्धं प्रदास्यामो वीर्यस्यैकैकशो वयम् ।
तेन वीर्येण पुत्रस्ते भविता तस्य चेप्सितः ॥
वसुगण बोले- हम सब लोग अपने तेजका एक-एक अष्टमांश देंगे । उस तेजसे जो तुम्हारा एक पुत्र होगा, वह उस राजाकी इच्छाके अनुरूप होगा ।
इस प्रकार गङ्गाजी के साथ शर्त पूरी कर वसुगण प्रसन्नतापूर्वक अपनी इच्छा के अनुसार चले गये।
In English
The Curse of Mahabhisha and the Pact with the Vasus
King Mahabhisha is cursed by Brahma to live as a human after he stares at Ganga. Meanwhile, the Vasus ask Ganga to bear them as her sons so they can escape a curse from Vasishtha. Ganga agrees to marry King Shantanu and drown her children, provided one son is born from the Vasus' power to ensure she has an heir.
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