श्रीगणेशाय नमः।

परिक्षिदुपाख्यान : तपस्वी की गरिमा और आत्मिक अहङ्कार का वास्तविक स्वरूप क्या है?

अहङ्कार का त्याग और वास्तविक तप

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड १ · आदिपर्व → आस्तीकपर्व · अध्याय 40 · पृष्ठ 312–317

638 शब्द · 4 मिनटका पाठ · 5 श्लोक

उग्रश्रवा ने शौनक से कहा

जरत्कारु मुनि के नाम की व्युत्पत्ति और उनके चरित्र पर चर्चा हेतु

शौनकजी ने जिज्ञासावश पूछा— "सूतन्दन! आपने जिन जरत्कारु ऋषिका नाम लिया है, उन महात्मा मुनिके सम्बन्धमें मैं यह सुनना चाहता हूँ कि पृथ्वीपर उनका जरत्कारु नाम क्यों प्रसिद्ध हुआ? जरत्कारु शब्दकी व्युत्पत्ति क्या है? यह आप ठीक-ठीक बताने की कृपा करें।"

शौनक उवाच

जरत्कारुरिति ख्यातो यस्त्वया सूतनन्दन ।
इच्छामि तदहं श्रोतुं ऋषेस्तस्य महात्मनः ॥

किं कारणं जरत्कारोर्नामैतत् प्रथितं भुवि ।
जरत्कारुनिरुक्तिं त्वं यथावद् वक्तुमर्हसि ॥

शौनकजीने पूछा — सूतनन्दन! आपने जिन जरत्कारु ऋषिका नाम लिया है, उन महात्मा मुनिके सम्बन्धमें मैं यह सुनना चाहता हूँ कि पृथ्वीपर उनका जरत्कारु नाम क्यों प्रसिद्ध हुआ? जरत्कारु शब्दकी व्युत्पत्ति क्या है? यह आप ठीक-ठीक बतानेकी कृपा करें ।

महाभारत · आदिपर्व · आस्तीकपर्व · अध्याय 40 · श्लोक 1-2पृष्ठ 313

उग्रश्रवाजी ने उत्तर दिया— "शौनकजी! जरा कहते हैं क्षयको और कारु शब्द दारुणका वाचक है। पहले उनका शरीर कारु अर्थात् खूब हट्टा-कट्टा था। उसे परम बुद्धिमान् महर्षिने धीरे-धीरे तीव्र तपस्याद्वारा क्षीण बना दिया। ब्रह्मन्! इसलिये उनका नाम जरत्कारु पड़ा। वासुकिकी बहिनके भी जरतकारु नाम पड़नेका यही कारण है।" उग्रश्रवाजी के इन वचनों को सुनकर धर्मात्मा शौनक मुस्कुरा उठे और बोले— "तुम्हारी बात उचित है।"

शौनक उवाच

एवमुक्तस्तु धर्मात्मा शौनकः प्राहसत् तदा ।
उग्रश्रवासमामन्त्र्य उपपन्नमिति ब्रुवन् ॥

उग्रश्रवाजीके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा शौनक उस समय खिलखिलाकर हँस पड़े और फिर उग्रश्रवाजीको सम्बोधित करके बोले — ' तुम्हारी बात उचित है '

महाभारत · आदिपर्व · आस्तीकपर्व · अध्याय 40 · श्लोक 5पृष्ठ 313

शौनकजी ने आगे कहा— "सूतपुत्र! आपने पहले जो जरत्कारु नामकी व्युत्पत्ति बतायी है, वह सब मैंने सुन ली। अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि आस्तीक मुनिका जन्म किस प्रकार हुआ?" उग्रश्रवाजी ने पुराणशास्त्र के अनुसार वृत्तान्त सुनाना आरम्भ किया। उन्होंने बताया कि नागराज वासुकि ने एकाग्रचित्त होकर सबको सन्देश दिया था— "मुझे अपनी बहिनका विवाह जरत्कारु मुनिके साथ करना है।" इसके बाद दीर्घकाल बीत गया, किन्तु परम बुद्धिमान् जरत्कारु मुनि कठोर व्रत में लीन रहे। वे ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी थे, जिन्होंने मन और इन्द्रियों को काबू में रखा और कभी स्त्री की अभिलाषा नहीं की। वे नित्य नियमपूर्वक वेदों का स्वाध्याय करते हुए सम्पूर्ण पृथ्वी पर घूमते रहे।

शौनक उवाच

सौतिरुवाच जरेति क्षयमाहुर्वै दारुणं कारुसंज्ञितम् ।
शरीरं कारु तस्यासीत्तत् स धीमाञ्छनैः शनैः ॥

क्षपयामास तीव्रेण तपसेत्यत उच्यते ।
जरत्कारुरिति ब्रह्मन् वासुकेर्भगिनी तथा ॥

उग्रश्रवाजीने कहा— शौनकजी! जरा कहते हैं क्षयको और कारु शब्द दारुणका वाचक है । पहले उनका शरीर कारु अर्थात् खूब हट्टा- कट्टा था । उसे परम बुद्धिमान् महर्षिने धीरे - धीरे तीव्र तपस्याद्वारा क्षीण बना दिया । ब्रह्मन्! इसलिये उनका नाम जरत्कारु पड़ा । वासुकिकी बहिनके भी जरत्कारु नाम पड़नेका यही कारण था ।

महाभारत · आदिपर्व · आस्तीकपर्व · अध्याय 40 · श्लोक 3-4पृष्ठ 313

तदनन्तर इस पृथ्वी पर कौरववंशी राजा परीक्षित राज्य करने लगे। जिस प्रकार उनके पूर्वज महाबाहु पाण्डु शिकार के शौकीन थे, उसी प्रकार राजा परीक्षित भी वराह, तरक्षु और महिष जैसे हिंसक पशुओं का शिकार करते हुए वन में घूमते रहते थे। एक दिन महाराज ने गहन वन में धनुष लेकर एक हिंसक पशु को विद्ध किया और उसका पीछा करने लगे। जैसे भगवान् रुद्र आकाश में मृगशिरा नक्षत्र को बींधकर खोजते हैं, वैसे ही परीक्षित भी घूम रहे थे। राजा द्वारा घायल किया गया वह मृग अचानक अदृश्य हो गया, जो वास्तव में उनके स्वर्गवास का कारण बनने वाला था।

राजा परीक्षित उस मृग का पीछा करते हुए एक मुनि के पास पहुँचे। वे मुनि गौओं के रहने के स्थान में आसन पर बैठे थे और बछड़ों के मुख से निकलने वाले फेन को खा-पीकर तपस्या कर रहे थे। भूख और थकावट से व्याकुल राजा ने अपना धनुष ऊपर उठाए हुए पूछा— "ब्रह्मन्! मैं अभिमन्युका पुत्र राजा परीक्षित हूँ। मेरे बाणोंसे विद्ध होकर एक मृग कहीं भाग निकला है। क्या आपने उसे देखा है?" मुनि मौन व्रत में थे, उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। इस पर कुपित होकर राजा परीक्षित ने धनुष की नोक से एक मृत सर्प उठाकर उन मुनि के कन्धे पर रख दिया। मुनि ने न तो कुछ कहा और न ही कोई प्रतिक्रिया दी। उन्हें इस अवस्था में देखकर राजा ने क्रोध त्याग दिया और मन ही मन पश्चात्ताप करते हुए अपनी राजधानी लौट गए। वे धर्मपरायण मुनि अत्यन्त क्षमाशील थे, उन्होंने राजा के अपमान को सह लिया क्योंकि राजा उनके वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचान सके थे।

मुनि के पुत्र शृङ्गी की तरुणावस्था थी; वे महान तपस्वी थे किन्तु उनमें क्रोध बहुत अधिक था। एक दिन जब शृङ्गी अपने पिता की सेवा करके घर लौट रहे थे, तब उन्हें उनका मित्र कृश मिला। कृश, जो धर्म के लिए कष्ट सहकर दुर्बल हो गया था, उसने हँसते हुए शृङ्गी को उनके पिता के विषय में वह बात बताई जिसे सुनकर शृङ्गी क्रोध से भर गए।

उद्दिश्य पितरं तस्य यच्छ्रुत्वा रोषमाहरत् ।
ऋषिपुत्रेण धर्मार्थे कृशेन द्विजसत्तम ॥

शृंगी उस दिन आचार्यकी आज्ञा लेकर घरको लौट रहा था । रास्तेमें उसका मित्र ऋषिकुमार कृश, जो धर्मके लिये कष्ट उठानेके कारण सदा ही कृश ( दुर्बल ) रहा करता था, खेलता मिला । उसने हँसते - हँसते शृंगी ऋषिको उसके पिताके सम्बन्धमें ऐसी बात बतायी, जिसे सुनते ही वह रोषमें भर गया। द्विजश्रेष्ठ! मुनिकुमार शृंगी क्रोधके आवेशमें आनेपर अत्यन्त तीक्ष्ण ( कठोर) एवं विषके समान विनाशकारी हो जाता था ।

महाभारत · आदिपर्व · आस्तीकपर्व · अध्याय 40 · श्लोक 28पृष्ठ 317

कृश ने कहा— "शृङ्गिन्! तुम बड़े तपस्वी और तेजस्वी बनते हो, किन्तु तुम्हारे पिता अपने कन्धेपर मुर्दा सर्प ढो रहे हैं। अब कभी अपनी तपस्यापर गर्व न करना। हम- जैसे सिद्ध, ब्रह्मवेत्ता तथा तपस्वी ऋषिपुत्र जब कभी बातें करते हों, उस समय तुम वहाँ कुछ न बोलना। कहाँ है तुम्हारा पौरुषका अभिमान, कहाँ गयीं तुम्हारी वे दर्पभरी बातें? जब तुम अपने पिताको मुर्दा ढोते चुपचाप देख रहे हो! तुम्हारे पिताके द्वारा कोई अनुचित कर्म नहीं बना था; इसलिये जैसे मेरे ही पिताका अपमान हुआ हो, उस प्रकार तुम्हारे पिताके तिरस्कारसे मैं अत्यन्त दुःखी हो रहा हूँ।"

कृश उवाच

क्व ते पुरुषमानित्वं क्व ते वाचस्तथाविधाः ।
दर्पजाः पितरं द्रष्टा यस्त्वं शवधरं तथा ॥

कहाँ है तुम्हारा पौरुषका अभिमान, कहाँ गयीं तुम्हारी वे दर्पभरी बातें? जब तुम अपने पिताको मुर्दा ढोते चुपचाप देख रहे हो!

महाभारत · आदिपर्व · आस्तीकपर्व · अध्याय 40 · श्लोक 31पृष्ठ 317

In English

The Origins of Jaratkaru and the Insult to His Son

Ugra-shravas explains that the sage Jaratkaru earned his name by reducing his strong body through intense penance. King Parikshit, while hunting a wounded deer, places a dead snake on the shoulder of the silent sage Shringi's father. Upon hearing of this insult from Krisha, the young ascetic Shringi becomes consumed with anger.

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  • What happened when shringi heard about his father's insult?
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