रुरुडुण्डुभसंवाद : प्रतिज्ञा के वशीभूत होकर क्या किसी का वध करना उचित है?
प्रतिज्ञा और धर्म का विवेक
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड १ · आदिपर्व → पौलोमपर्व · अध्याय 10 · पृष्ठ 190–193
308 शब्द · 2 मिनटका पाठ · 4 श्लोक
सौति ने उग्रश्रवाजी के श्रोता से कहा
महाभारत की कथा सुनाते हुए
उग्रश्रवाजी के श्रोताओं के समक्ष सौति ने यह कथा सुनाई कि किस प्रकार रुरु मुनि और सर्प रूपी डुण्डुभ के बीच संवाद हुआ। घटना का आरम्भ रुरु की उस घोर प्रतिज्ञा से होता है, जब उनकी प्राणों के समान प्यारी पत्नी को एक सर्प ने डँस लिया था। उस सङ्कटपूर्ण क्षण में रुरु ने यह सङ्कल्प लिया था कि भविष्य में वे जिस-जिस सर्प को देखेंगे, उसे अवश्य मार डालेंगे। इसी प्रतिज्ञा के वशीभूत होकर, आज रुरु के सामने डुण्डुभ नामक सर्प आया और उन्होंने उसे मारने का निश्चय किया। रुरु ने क्रोधित स्वर में कहा— 'सर्प! मेरी पत्नी को एक साँपने डँस लिया था, उसी समय मैंने यह घोर प्रतिज्ञा कर ली थी कि जिस-जिस सर्प को देख लूँगा, उसे अवश्य मार डालूँगा। अतः आज तुम्हें अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा।'
रुरु मुनि और डुण्डुभका संवाद रुरुरुवाच मम प्राणसमा भार्या दष्टासीद् भुजगेन ह ।
तत्र मे समयो घोर आत्मनोरग वै कृतः ॥
भुजङ्गं वै सदा हन्यां यं यं पश्येयमित्युत ।
ततोऽहं त्वां जिघांसामि जीवितेनाद्य मोक्ष्यसे ॥
रुरु बोला — सर्प! मेरी प्राणोंके समान प्यारी पत्नीको एक साँपने डँस लिया था । उसी समय मैंने यह घोर प्रतिज्ञा कर ली कि जिस -जिस सर्पको देख लूँगा, उसे - उसे अवश्य मार डालूँगा । उसी प्रतिज्ञाके अनुसार मैं तुम्हें मार डालना चाहता हूँ । अतः आज तुम्हें अपने प्राणोंसे हाथ धोना पड़ेगा ।
परन्तु जैसे ही रुरु ने प्रहार करना चाहा, डुण्डुभ ने उन्हें धर्म का मार्ग दिखाते हुए कहा— 'ब्रह्मन्! वे दूसरे ही साँप हैं जो इस लोक में मनुष्यों को डँसते हैं। साँपों की आकृति मात्र से ही तुम्हें डुण्डुभों को नहीं मारना चाहिए। अहो! आश्चर्य है, बेचारे डुण्डुभ अनर्थ भोगने में तो सब सर्पों के साथ एक हैं; परन्तु उनका स्वभाव दूसरे सर्पों से भिन्न है तथा सुख सबका अलग-अलग है। तुम धर्मज्ञ हो, अतः तुम्हें डुण्डुभों की हिंसा नहीं करनी चाहिए।'
एकानर्थान् पृथगर्थानेकदुःखान् पृथक्सुखान् ।
डुण्डुभान् धर्मविद् भूत्वा न त्वं हिंसितुमर्हसि ॥
अहो! आश्चर्य है, बेचारे डुण्डुभ अनर्थ भोगनेमें सब सर्पोंके साथ एक हैं; परंतु उनका स्वभाव दूसरे सर्पोंसे भिन्न है तथा दुःख भोगनेमें तो वे सब सर्पोंके साथ एक हैं; किंतु सुख सबका अलग- अलग है । तुम धर्मज्ञ हो, अतः तुम्हें डुण्डुभोंकी हिंसा नहीं करनी चाहिये ।
डुण्डुभ के इन वचनों को सुनकर रुरु ठिठक गए। उन्हें लगा जैसे उनके सामने कोई भयभीत ऋषि खड़ा हो, इसलिए उन्होंने उसका वध नहीं किया। रुरु ने शान्ति प्रदान करते हुए पूछा— 'भुजङ्गम! बताओ, इस विकृत सर्प-योनि में पड़े हुए तुम कौन हो?'
उवाच चैनं भगवान् रुरुः संशमयन्निव ।
कामं मां भुजग ब्रूहि कोऽसीमां विक्रियां गतः ॥
इसके सिवा, बड़भागी रुरुने उसे शान्ति प्रदान करते हुए - से कहा- ' भुजंगम! बताओ, इस विकृत ( सर्प ) -योनिमें पड़े हुए तुम कौन हो? '
डुण्डुभ ने उत्तर दिया— 'रुरो! मैं पूर्वजन्म में सहस्रपाद नामक ऋषि था; किन्तु एक ब्राह्मण के शाप से मुझे सर्प-योनि में आना पड़ा है।' यह सुनकर रुरु विस्मित हुए और उन्होंने पूछा— 'भुजगोत्तम! उस ब्राह्मण ने किसलिए कुपित होकर तुम्हें शाप दिया? तुम्हारा यह शरीर अभी कितने समय तक रहेगा?'
अहं पुरा रुरो नाम्ना ऋषिरासं सहस्रपात् ।
सोऽहं शापेन विप्रस्य भुजगत्वमुपागतः ॥
डुण्डुभने कहा — रुरो! मैं पूर्वजन्ममें सहस्रपाद नामक ऋषि था; किंतु एक ब्राह्मणके शापसे मुझे सर्पयोनिमें आना पड़ा है ।
In English
The Sage Ruru and the Serpent Dundubha
After his wife was bitten by a snake, the sage Ruru vowed to kill every serpent he encountered. When Ruru attempted to kill the serpent Dundubha, the snake spoke to him and explained that not all serpents are the same. Dundubha revealed that he was actually a sage named Sahasrapada who was reborn as a snake due to a curse.
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Also written: Rurudundubhasanvada, Ruru, Dundubha, रुरुडुण्डुभसंवाद