ऽजामिलोपाख्यान : क्या पापियों के लिए पूर्ण मुक्ति सम्भव है?
नाम-सङ्कीर्तन द्वारा पाप-नाश
श्रीमद्भागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1–2 · पृष्ठ 1098–1120
2,079 शब्द · 11 मिनटका पाठ · 18 श्लोक
श्रीशुकदेव ने राजा परीक्षित से कहा
पाप और प्रायश्चित्त की जिज्ञासा के निवारण हेतु
श्रीमद्भागवत महापुराण के इस पावन प्रसङ्ग में श्रीशुकदेव जी राजा परीक्षित को भगवान के स्वरूपों और संसार की स्थिति का वर्णन कर रहे हैं।
प्रवृत्तिलक्षणश्चैव त्रैगुण्यविषयो मुने ।
योऽसावलीनप्रकृतेर्गुणसर्गः पुनः पुनः ॥
मुनिवर! इसके सिवा आपने उस प्रवृत्तिमार्गका भी ( तृतीय स्कन्धमें ) भलीभाँति वर्णन किया है, जिससे त्रिगुणमय स्वर्ग आदि लोकोंकी प्राप्ति होती है और प्रकृतिका सम्बन्ध न छूटनेके कारण जीवोंको बार - बार जन्म - मृत्यु के चक्कर आना पड़ता है ।
श्रीशुकदेव जी ने कहा— "हे परीक्षित! मनुष्य मन, वाणी और शरीर से पाप करता है। यदि वह उन पापों का इसी जन्म में प्रायश्चित्त न कर ले, तो मरने के बाद उसे अवश्य ही उन भयङ्कर यातनापूर्ण नरकों में जाना पड़ता है, जिनका वर्णन मैंने तुम्हें पहले सुनाया है। इसलिए बड़ी सावधानी और सजगता के साथ रोग एवं मृत्यु के पहले ही शीघ्र से शीघ्र अपने पापों की गुरुता और लघुता पर विचार करके उनका प्रायश्चित्त कर डालना चाहिए; जैसे एक मर्मज्ञ चिकित्सक रोगों का कारण जानकर झटपट उनकी चिकित्सा कर डालता है।"
अजामिलोपाख्यानका प्रारम्भ राजोवाच निवृत्तिमार्गः कथित आदौ भगवता यथा ।
क्रमयोगोपलब्धेन ब्रह्मणा यदसंसृतिः ॥
राजा परीक्षित्ने कहा— भगवन्! आप पहले ( द्वितीय स्कन्धमें ) निवृत्तिमार्गका वर्णन कर चुके हैं तथा यह बतला चुके हैं कि उसके द्वारा अर्चिरादि मार्गसे जीव क्रमशः ब्रह्मलोकमें पहुँचता है और फिर ब्रह्माके साथ मुक्त हो जाता है ।
राजा परीक्षित ने जिज्ञासावश पूछा— "भगवन! मनुष्य राजदण्ड और समाजदण्ड जैसे लौकिक दण्डों से तो डरता है, पर पाप उसके लिए शत्रु होने के बावजूद वह बार-बार उन्हीं पापवासनाओं में प्रवृत्त हो जाता है। ऐसी अवस्था में उसके पापों का प्रायश्चित्त कैसे सम्भव है? कभी तो वह प्रायश्चित्त करके छुटकारा पा लेता है, पर फिर वही कर्म करने लगता है। मुझे तो ऐसा लगता है कि जैसे स्नान करने के बाद हाथी पर पुनः धूल डाल देने से उसका स्नान व्यर्थ हो जाता है, वैसे ही मनुष्य का यह प्रायश्चित्त भी व्यर्थ है।"
अधर्मलक्षणा नाना नरकाश्चानुवर्णिताः ।
मन्वन्तरश्च व्याख्यात आद्यः स्वायम्भुवो यतः ॥
आपने यह भी बतलाया कि अधर्म करनेसे अनेक नरकोंकी प्राप्ति होती है और ( पाँचवें स्कन्धमें ) उनका विस्तारसे वर्णन भी किया । ( चौथे स्कन्धमें ) आपने उस प्रथम मन्वन्तरका वर्णन किया, जिसके अधिपति स्वायम्भुव मनु थे ।
श्रीशुकदेव जी ने उत्तर दिया— "वस्तुतः कर्म के द्वारा ही कर्म का निर्बीज नाश नहीं हो सकता, क्योंकि अज्ञान रहते पापवासनाएँ मिटती नहीं हैं। सच्चा प्रायश्चित्त तो तत्त्वज्ञान ही है। जो पुरुष नियमों का पालन करता है, वह धीरे-धीरे कल्याणप्रद तत्त्वज्ञान प्राप्त करने में समर्थ होता है। जैसे बाँसों के झुरमुट में लगी आग उन्हें जला डालती है, वैसे ही धर्मज्ञ और श्रद्धावान धीर पुरुष तपस्या, ब्रह्मचर्य, इन्द्रियदमन, मन की स्थिरता, दान, सत्य, पवित्रता तथा यम-नियम जैसे नौ साधनों से बड़े-से-बड़े पापों को भी नष्ट कर देते हैं।
गीता मया तव नृपाद्भुतमीश्वरस्य स्थूलं वपुः सकलजीवनिकायधाम ॥
यतिको चाहिये कि भगवान्के स्थूल और सूक्ष्म दोनों प्रकारके रूपोंका श्रवण करके पहले स्थूलरूपमें चित्तको स्थिर करे, फिर धीरे - धीरे वहाँसे हटाकर उसे सूक्ष्ममें लगा दे ॥३९ ॥ परीक्षित्! मैंने तुमसे पृथ्वी, उसके अन्तर्गत द्वीप, वर्ष, नदी, पर्वत, आकाश, समुद्र, पाताल, दिशा, नरक, ज्योतिर्गण और लोकोंकी स्थितिका वर्णन किया । यही भगवान्का अति अद्भुत स्थूलरूप है, जो समस्त जीवसमुदायका आश्रय है ।
परन्तु हे परीक्षित! भगवान की शरण में रहने वाले भक्तजन, जो बिरले ही होते हैं, केवल भक्तिके द्वारा अपने सारे पाप उसी प्रकार भस्म कर देते हैं, जैसे सूर्य कुहरे को मिटा देता है। शराब से भरे घड़े को नदियाँ पवित्र नहीं कर सकतीं, वैसे ही बड़े-बड़े प्रायश्चित्त भी भगवद्विमुख मनुष्य को पवित्र करने में असमर्थ हैं। जिन्होंने अपने मन रूपी मधुकर को भगवान श्रीकृष्ण के चरणारविन्द के मकरन्द का पान करा दिया, उन्होंने सारे प्रायश्चित्त कर लिए। ऐसे लोग स्वप्न में भी यमराज और उनके पाशधारी दूतों को नहीं देखते, फिर नरक की तो बात ही क्या है!"
अधुनेह महाभाग यथैव नरकान्नरः ।
नानोग्रयातनान्नेयात्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥
तदुपरान्त श्रीशुकदेव जी ने कहा— "इस विषय में महात्मालोग एक प्राचीन इतिहास कहा करते हैं, जिसमें भगवान विष्णु और यमराज के दूतों का संवाद है। तुम इसे सुनो। कान्यकुब्ज नगर में अजामिल नाम का एक दासीपति ब्राह्मण रहता था। दासी के संसर्ग से दूषित होने के कारण उसका सदाचार नष्ट हो चुका था। वह किसी का धन छीन लेता या चोरी करके अपना कुटुम्ब पालता था और दूसरे प्राणियों को बहुत सताता था।
नाश्नतः पथ्यमेवान्नं व्याधयोऽभिभवन्ति हि ।
एवं नियमकृद्राजन् शनैः क्षेमाय कल्पते ॥
जो पुरुष केवल सुपथ्यका ही सेवन करता है, उसे रोग अपने वशमें नहीं कर सकते । वैसे ही परीक्षित्! जो पुरुष नियमोंका पालन करता है, वह धीरे - धीरे पापवासनाओंसे मुक्त हो कल्याणप्रद तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेमें समर्थ होता है ।
इसी प्रकार वह वहाँ रहकर दासी के बच्चों का लालन-पालन करता रहा और उसकी आयु का बड़ा भाग— अट्ठासी वर्ष बीत गया। वृद्ध अजामिल के दस पुत्र थे, जिनमें सबसे छोटे का नाम 'नारायण' था। माँ-बाप उससे बहुत प्रेम करते थे। अजामिल ने अत्यधिक मोह के कारण अपना सम्पूर्ण हृदय अपने बच्चे नारायण को सौंप दिया था। वह बालक की तोतली बोली और बालसुलभ खेल देखकर फूला नहीं समाता था।
न तथा ह्यघवान् राजन् पूयेत तप आदिभिः ।
यथा कृष्णार्पितप्राणस्तत्पूरुषनिषेवया ॥
जब मृत्यु अजामिल के सिर पर आ पहुँची, तब उसके हाथ में फाँसी थी, मुँह टेढ़ा-मेढ़ा हो रहा था और शरीर के रोएँ खड़े हो गए थे। उस समय बालक नारायण कुछ दूरी पर खेल रहा था। यमदूतों को देखकर अजामिल अत्यन्त व्याकुल हो गया और उसने बहुत ऊँचे स्वर से पुकारा— 'नारायण!'
बन्द्यक्षकैतवैश्चोर्यैर्गर्हितां वृत्तिमास्थितः ।
बिभ्रत्कुटुम्बमशुचिर्यातयामास देहिनः ॥
भगवान के पार्षदों ने देखा कि यह मरते समय हमारे स्वामी भगवान नारायण का नाम ले रहा है, उनके नाम का कीर्तन कर रहा है; अतः वे बड़े वेगसे वहाँ आ पहुँचे। उस समय यमराज के दूत अजामिल के शरीर से उसके सूक्ष्म शरीर को खींच रहे थे, परन्तु विष्णुदूतों ने उन्हें बलपूर्वक रोक दिया।"
विकर्षतोऽन्तर्हृदयाद्दासीपतिमजामिलम् ।
यमप्रेष्यान् विष्णुदूता वारयामासुरोजसा ॥
श्रीशुकदेवजी बोले— हे राजन! जब यमदूतों ने अजामिल को पकड़ने के लिए आगे कदम बढ़ाए, तब भगवान् नारायण के आज्ञाकारी पार्षदों ने उन्हें रोक लिया। उन पार्षदों ने मेघ के समान गम्भीर वाणी में यमदूतों से प्रश्न किया— "हे यमदूतो! यदि तुम लोग सचमुच धर्मराज के आज्ञाकारी हो, तो हमें धर्म का लक्षण और उसका तत्त्व सुनाओ। दण्ड किस प्रकार दिया जाता है? दण्ड का पात्र कौन है? क्या मनुष्यों में सभी पापाचारी दण्डनीय हैं अथवा उनमें से कुछ ही?"
सूर्योऽग्निः खं मरुद्गावः सोमः सन्ध्याहनी दिशः ।
कंर कुः कालो धर्म इति ह्येते दैह्यस्य साक्षिणः ॥
यमदूतों ने उत्तर दिया— "वेद ही भगवान् के स्वरूप हैं। वे उनके स्वाभाविक श्वास-प्रश्वास और स्वयम्प्रकाश ज्ञान हैं। वेद ही जगत के समस्त पदार्थों का विभाजन करते हैं। जीव अपने शरीर और मनोवृत्तियों से जितने कर्म करता है, सूर्य, अग्नि, आकाश, वायु, इन्द्रियाँ, चन्द्रमा, सन्ध्या, रात, दिन, दिशाएँ, जल, पृथ्वी, काल और धर्म— ये सभी उसके साक्षी रहते हैं। इनके द्वारा अधर्म का पता चल जाता है और तब दण्ड के पात्र का निर्णय होता है। पापकर्म करने वाले सभी मनुष्य अपने-अपने कर्मों के अनुसार दण्डनीय होते हैं।"
यमदूतों ने आगे कहा— "निष्पाप पुरुषोंो! जो प्राणी कर्म करते हैं, उनका गुणों से सम्बन्ध रहता ही है; इसीलिए सभी से कुछ पाप और कुछ पुण्य होते ही हैं। देहवान होकर कोई भी पुरुष कर्म किए बिना रह नहीं सकता। इस लोक में मनुष्य जिस प्रकार का और जितना अधर्म या धर्म करता है, परलोक में उसका उतना और वैसा ही फल भोगता है। वर्तमान जन्म के पाप-पुण्य ही भूत और भविष्य के जन्मों का अनुमान करा देते हैं। हमारे स्वामी अजन्मा भगवान् सर्वज्ञ यमराज सबके अन्तःकरणों में विराजमान हैं; वे मन से ही सबके पूर्व और भावी स्वरूप देख लेते हैं।"
यमदूतों ने समझाया— "जैसे सोया हुआ अज्ञानी पुरुष स्वप्न में कल्पित शरीर को ही अपना वास्तविक शरीर समझ लेता है और जागने वाले शरीर को भूल जाता है, वैसे ही जीव भी अपने पूर्व जन्मों की याद भूल जाता है। कोई भी जीव बिना कर्म किए एक क्षण भी नहीं रह सकता; प्रकृति के गुण उसे विवश कर कर्म कराते हैं। जीव अपने पूर्व जन्मों के संस्कारों के अनुसार स्थूल और सूक्ष्म शरीर प्राप्त करता है। प्रकृतिका संसर्ग होने से ही पुरुष स्वयं को वास्तविक स्वरूप के विपरीत लिङ्ग का मान बैठा है, परन्तु यह विपर्यय भगवान् के भजन से शीघ्र ही दूर हो जाता है।"
एष प्रकृतिसङ्गेन पुरुषस्य विपर्ययः ।
आसीत् स एव नचिरादीशसङ्गाद्विलीयते ॥
है ॥ ५२ ॥ कोई शरीरधारी जीव बिना कर्म किये कभी एक क्षण भी नहीं रह सकता । प्रत्येक प्राणीके स्वाभाविक गुण बलपूर्वक विवश करके उससे कर्म कराते हैं ॥ ५३ ॥ जीव अपने पूर्वजन्मोंके पाप - पुण्यमय संस्कारोंके अनुसार स्थूल और सूक्ष्म शरीर प्राप्त करता है । उसकी स्वाभाविक एवं प्रबल वासनाएँ कभी उसे माताके - जैसा ( स्त्रीरूप ) बना देती हैं, तो कभी पिताके - जैसा ( पुरुषरूप ) ॥५४ ॥ प्रकृतिका संसर्ग होनेसे ही पुरुष अपनेको अपने वास्तविक स्वरूपके विपरीत लिंगशरीर मान बैठा है । यह विपर्यय भगवान्के भजनसे शीघ्र ही दूर हो जाता है ।
यमदूतों ने अजामिल की स्थिति बताते हुए कहा— "देवताओ! आप जानते ही हैं कि यह अजामिल बड़ा शास्त्रज्ञ था। शील, सदाचार और सद्गुणों का खजाना था; वह ब्रह्मचारी, विनयी, जितेन्द्रिय, सत्यनिष्ठ और पवित्र भी था। उसने गुरु, अग्नि, अतिथि और वृद्ध पुरुषों की सेवा की थी और उसमें अहङ्कार नहीं था। वह समस्त प्राणियों का हित चाहता था। परन्तु एक दिन, जब वह अपने पिता के आदेशानुसार वन से फल-फूल और समिधा लेकर लौट रहा था, तब उसने देखा कि एक भ्रष्ट शूद्र, जो बहुत कामी और निर्लज्ज है, शराब पीकर एक वेश्या के साथ विहार कर रहा है। वह वेश्या भी नशे में मदहोश थी और अर्द्धनग्न अवस्था में थी।"
दृष्ट्वा तां कामलिप्तेन बाहुना परिरम्भिताम् ।
जगाम हृच्छयवशं सहसैव विमोहितः ॥
एक दिन यह ब्राह्मण अपने पिताके आदेशानुसार वनमें गया और वहाँसे फल - फूल, समिधा तथा कुश लेकर घरके लिये लौटा ॥ ५८ ॥ लौटते समय इसने देखा कि एक भ्रष्ट शूद्र, जो बहुत कामी और निर्लज्ज है, शराब पीकर किसी वेश्याके साथ विहार कर रहा है । वेश्या भी शराब पीकर मतवाली हो रही है । नशेके कारण उसकी आँखें नाच रही हैं, वह अर्द्धनग्न अवस्थामें हो रही है । वह शूद्र उस वेश्याके साथ कभी गाता, कभी हँसता और कभी तरह-तरहकी चेष्टाएँ करके उसे प्रसन्न करता है ॥ ५ ९ -६० ॥ निष्पाप पुरुषो! शूद्रकी भुजाओंमें अंगरागादि कामोद्दीपक वस्तुएँ लगी हुई थीं और वह उनसे उस कुलटाका आलिंगन कर रहा था । अजामिल उन्हें इस अवस्थामें देखकर सहसा मोहित और कामके वश हो गया ।
यमदूतों ने आगे कहा— "उस शूद्र की भुजाओं में अङ्गरागादि कामोद्दीपक वस्तुएँ लगी थीं और वह उस कुलटा को आलिङ्गन कर रहा था। अजामिल उन्हें देखकर सहसा मोहित हो गया। उसकी सदाचार और शास्त्रसम्बन्धी चेतना नष्ट हो गई। वह मन ही मन उसी वेश्या का चिन्तन करने लगा और अपने धर्म से विमुख हो गया। उसने अपनी कुलीन पत्नी का परित्याग कर दिया और उस वेश्या को प्रसन्न करने के लिए अपने पिता की सारी सम्पत्ति लुटा दी। वह कुबुद्धि न्याय और अन्याय, जहाँ भी धन मिलता, वहीं से उठा लाता था ताकि उस वेश्या के कुटुम्ब का पालन कर सके। उसने शास्त्रों की आज्ञा का उल्लङ्घन किया और लम्बे समय तक उस वेश्या के मल-समान अपवित्र अन्न से अपना जीवन व्यतीत किया। उसका सारा जीवन पापमय है और उसने अब तक कोई प्रायश्चित्त नहीं किया है। इसलिए हम इस पापी को दण्डपाणि भगवान् यमराज के पास ले जाएँगे।"
तत एनं दण्डपाणेः सकाशं कृतकिल्बिषम् ।
ष्यामो ऽकृतनिर्वेशं यत्र दण्डेन शुद्ध्यति ॥
इस पापीने शास्त्राज्ञाका उल्लंघन करके स्वच्छन्द आचरण किया है । यह सत्पुरुषोंके द्वारा निन्दित है । इसने बहुत दिनोंतक वेश्याके मल - समान अपवित्र अन्नसे अपना जीवन व्यतीत किया है, इसका सारा जीवन ही पापमय है ॥ ६७ ॥ इसने अबतक अपने पापोंका कोई प्रायश्चित्त भी नहीं किया है । इसलिये अब हम इस पापीको दण्डपाणि भगवान् यमराजके पास ले जायँगे । वहाँ यह अपने पापोंका दण्ड भोगकर शुद्ध हो जायगा ।
यह सुनकर भगवान् के नीतिनिपुण पार्षदों ने कहा— "हे यमदूतो! यह बड़े आश्चर्य और खेद की बात है कि धर्मज्ञों की सभामें अधर्म प्रवेश कर रहा है, जहाँ निरपराध व्यक्तियों को व्यर्थ ही दण्ड दिया जाता है। यदि रक्षक और परोपकारी शासक ही प्रजा के प्रति विषमता का व्यवहार करें, तो प्रजा किसकी शरण लेगी? लोग साधारण पशुओं के समान धर्म-अधर्म न जानकर सत्पुरुषों पर विश्वास कर लेते हैं, परन्तु वही दयालु सत्पुरुष जो प्राणियों के विश्वासपात्र हैं, वे अज्ञानी जीवों के साथ ऐसा विश्वासघात कैसे कर सकते हैं?"
पार्षदों ने अन्त में कहा— "यमदूतो! इसने कोटि-कोटि जन्मों की पाप-राशिका पूरा-पूरा प्रायश्चित्त कर लिया है; क्योंकि इसने विवश होकर ही सही, भगवान् के परम कल्याणमय नाम का उच्चारण तो किया है। चाहे जैसा भी बड़ा पापी हो, उसके लिए सबसे बड़ा प्रायश्चित्त यही है कि भगवान् के नामों का उच्चारण किया जाए। भगवन्नामों के उच्चारण से मनुष्य की बुद्धि भगवान् के गुण और लीला में रम जाती है। बड़े-बड़े ब्रह्मवादी ऋषियों ने अनेक कठिन प्रायश्चित्त बताए हैं, परन्तु उन व्रतों से पापी की वैसी जड़से शुद्धि नहीं होती, जैसी भगवान् के नामों और उनके गुणों के ज्ञान से होती है।"
अयं हि कृतनिर्वेशो जन्मकोट्यंहसामपि ।
यद् व्याजहार विवशो नाम स्वस्त्ययनं हरेः ॥
यमदूतो! इसने कोटि - कोटि जन्मोंकी पाप - राशिका पूरा - पूरा प्रायश्चित्त कर लिया है । क्योंकि इसने विवश होकर ही सही, भगवान्के परम कल्याणमय ( मोक्षप्रद ) नामका उच्चारण तो किया है ।
श्रीशुकदेव जी बोले— "हे राजन्! यदि कोई प्रायश्चित्त करने के बाद भी पुनः कुमार्ग में दौड़ पड़े, तो समझ लेना कि वह प्रायश्चित्त पूर्ण नहीं था। पापकर्मों और वासनाओं की जड़ को उखाड़ने के लिए केवल भगवान् के गुणों का गान ही श्रेष्ठ है, क्योंकि इससे चित्त सर्वथा शुद्ध हो जाता है। यमदूतो! तुम लोग अजामिल को मत ले जाओ; इसने मरते समय भगवान् के नाम का उच्चारण कर अपने समस्त पापों का प्रायश्चित्त कर लिया है।"
जैसे ईंधन में अग्नि का स्पर्श होने पर वह भस्म हो जाती है, वैसे ही जान-बूझकर या अनजाने में भगवान् के नामों का सङ्कीर्तन करने से मनुष्य के सारे पाप भस्म हो जाते हैं। जैसे कोई शक्तिशाली अमृत पी ले, तो वह उसे अमर बना देता है, चाहे उसने उसका गुण न जाना हो; वैसे ही भगवान् का नाम अपना फल देकर ही रहता है।
यथागदं वीर्यतममुपयुक्तं यदृच्छया ।
अजानतोऽप्यात्मगुणं कुर्यान्मन्त्रोऽप्युदाहृतः ॥
जैसे कोई परम शक्तिशाली अमृतको उसका गुण न जानकर अनजानमें पी ले तो भी वह अवश्य ही पीनेवालेको अमर बना देता है, वैसे ही अनजानमें उच्चारण करनेपर भी भगवान्का नाम * अपना फल देकर ही रहता है ( वस्तुशक्ति श्रद्धाकी अपेक्षा नहीं करती )
श्रीशुकदेव जी कहते हैं— "हे परीक्षित! उन भगवान् के पार्षदों ने भागवत-धर्म का निर्णय सुना दिया और अजामिल को यमदूतों के पाश से छुड़ाकर मृत्यु के मुख से बचा लिया। जब यमदूतों ने यह सब देखा, तो वे यमराज के पास गए और उन्हें सारा वृत्तान्त सुनाया। अजामिल उस पाश से छूटकर निर्भय और स्वस्थ हो गया। उसने उन सुन्दर सिद्धों को देखकर सिर झुकाकर प्रणाम किया।"
द्विजः पाशाद्विनिर्मुक्तो गतभीः प्रकृतिं गतः ।
ववन्दे शिरसा विष्णोः किङ्करान् दर्शनोत्सवः ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- राजन्! इस प्रकार भगवान्के पार्षदोंने भागवत - धर्मका पूरा-पूरा निर्णय सुना दिया और अजामिलको यमदूतोंके पाशसे छुड़ाकर मृत्युके मुखसे बचा लिया ॥२० ॥ प्रिय परीक्षित्! पार्षदोंकी यह बात सुनकर यमदूत यमराजके पास गये और उन्हें यह सारा वृत्तान्त ज्यों - का - त्यों सुना दिया ॥ २१ ॥ अजामिल यमदूतोंके फंदेसे छूटकर निर्भय और स्वस्थ हो गया । उसने भगवान्के पार्षदोंके दर्शनजनित आनन्दमें मग्न होकर उन्हें सिर झुकाकर प्रणाम किया ।
अजामिल स्वयं विस्मित था। वह सोचने लगा— "मैंने अभी जो अद्भुत दृश्य देखा, क्या यह स्वप्न है? अभी-अभी वे मुझे फन्दों में फँसाकर पृथ्वी के नीचे ले जा रहे थे, परन्तु ये चार अत्यन्त सुन्दर सिद्ध आए और मुझे छुड़ा लिया! वे कहाँ चले गये?" उसने मन ही मन कहा— "यद्यपि मैं महापापी हूँ, फिर भी शायद पूर्वजन्मों में शुभकर्म किये होंगे, तभी तो इन श्रेष्ठ देवताओं के दर्शन हुए। यदि पुण्य न होते, तो मरने के समय मेरी जीभ भगवान् के मनोमोहक नाम का उच्चारण कैसे कर पाती?"
उसने अपने जीवन पर विचार किया— "मैंने अपने कुल में कलङ्क लगा दिया! अपनी सती पत्नी और बूढ़े-तपस्वी माता-पिता का परित्याग कर दिया। मैं कितना नीच और कृतघ्न हूँ! मैं अब निश्चित ही उन भयानक नरकों में गिरूँगा जहाँ धर्मघाती पुरुष यातना भोगते हैं।" फिर उसने आत्मबोध किया— "अज्ञानवश मैंने इस शरीर के लिए कामनाएँ कीं और उन्हीं का फल यह बन्धन है। अब मैं इस माया को काटकर समस्त प्राणियों का हित करूँगा, संयम से रहूँगा और अपनी बुद्धि को भगवान् में लगाऊँगा।"
मनः पुनर्धावति चेदसत्पथे ।
तत्कर्मनिर्हारमभीप्सतां हरे-र्गुणानुवादः खलु सत्त्वभावनः ॥
यदि प्रायश्चित्त करनेके बाद भी मन फिरसे कुमार्गमें - पापकी ओर दौड़े, तो वह चरम सीमाका – पूरा - पूरा प्रायश्चित्त नहीं है । इसलिये जो लोग ऐसा प्रायश्चित्त करना चाहें कि जिससे पापकर्मों और वासनाओंकी जड़ ही उखड़ जाय, उन्हें भगवान्के गुणोंका ही गान करना चाहिये; क्योंकि उससे चित्त सर्वथा शुद्ध हो जाता है ।
उस सत्सङ्ग ने अजामिल के हृदय में संसार के प्रति तीव्र वैराग्य जगा दिया। वह तुरन्त हरद्वार चला गया और वहाँ एक देवस्थान के मन्दिर में आसन लेकर बैठ गया। उसने योग मार्ग का आश्रय लिया, अपनी इन्द्रियों को विषयों से हटाकर मन को बुद्धि में मिला दिया और आत्म-चिन्तन द्वारा अपनी बुद्धि को परब्रह्म में जोड़ दिया।
जब उसकी बुद्धि त्रिगुणमयी प्रकृति से ऊपर उठकर भगवान् के स्वरूप में स्थित हुई, तब उसने देखा कि उसके सामने वही चारों पार्षद खड़े हैं। अजामि ने सिर झुकाकर उन्हें नमस्कार किया। उस तीर्थस्थान में गङ्गा तट पर उसने अपना शरीर त्याग दिया और तत्काल भगवान् के पार्षदों का स्वरूप प्राप्त कर लिया।
साकं विहायसा विप्रो महापुरुषकिङ्करैः ।
हैमं विमानमारुह्य ययौ यत्र श्रियः पतिः ॥
इस प्रकार जब अजामिलकी बुद्धि त्रिगुणमयी प्रकृतिसे ऊपर उठकर भगवान्के स्वरूपमें स्थित हो गयी, तब उन्होंने देखा कि उनके सामने वे ही चारों पार्षद, जिन्हें उन्होंने पहले देखा था, खड़े हैं । अजामिलने सिर झुकाकर उन्हें नमस्कार किया ॥४२ ॥ उनका दर्शन पानेके बाद उन्होंने उस तीर्थस्थानमें गंगाके तटपर अपना शरीर त्याग दिया और तत्काल भगवान्के पार्षदोंका स्वरूप प्राप्त कर लिया ॥४३ ॥ अजामिल भगवान्के पार्षदोंके साथ स्वर्णमय विमानपर आरूढ़ होकर आकाशमार्गसे भगवान् लक्ष्मीपतिके निवासस्थान वैकुण्ठको चले गये ।
अजामिल भगवान् के पार्षदों के साथ एक स्वर्णमय विमान पर आरूढ़ होकर आकाश मार्ग से वैकुण्ठ की ओर चल पड़ा। केवल एक 'नारायण' नाम के उच्चारण ने उसके समस्त पापों को भस्म कर दिया था।
श्रीशुकदेव जी बोले— "हे परीक्षित! जो लोग संसार-बन्धन से मुक्त होना चाहते हैं, उनके लिए भगवान् के नाम से बढ़कर कोई साधन नहीं है। यह इतिहास अत्यन्त गोपनीय और पाप-नाशक है। जो श्रद्धा से इसका श्रवण करता है, वह कभी नरक नहीं जाता। देखो, अजामिल जैसे पापी ने मृत्यु के समय केवल पुत्र के बहाने भगवान् का नाम लिया और उसे वैकुण्ठ मिल गया! जो लोग श्रद्धा से नाम जपते हैं, उनकी तो बात ही क्या है!"
In English
The Story of Ajamila and the Power of God's Name
Shukadeva explains to King Parikshit that true atonement comes from devotion rather than rituals. He tells the story of a man named Ajamila who fell into sin after seeing a woman, but was saved from the messengers of death because he called out the name of Lord Narayana while dying.
This page answers
- How did ajamila escape the yamadutas?
- What is the best way to atone for sins according to shukadeva?
- Why did the messengers of yama stop taking ajamila?
- How did ajamila's life change after his encounter with the divine messengers?
Also written: Jamilopakhyana, Jamila, Ajamila, Narayana, Yamaduta, Vishnuduta, Shrishukadeva, Veshya, Yamaraja, ऽजामिलोपाख्यान