जडभरतचरित : परमेश्वर अपने भक्त की रक्षा कैसे करते हैं?
भक्ति और ईश्वरीय संरक्षण
श्रीमद्भागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 9 · पृष्ठ 985–990
497 शब्द · 3 मिनटका पाठ · 4 श्लोक
श्रीशुक ने परीक्षित से कहा
परमेश्वर द्वारा भक्त की रक्षा का रहस्य समझाने हेतु
श्रीमद्भागवत महापुराण के इस प्रसङ्ग को श्रीशुकदेव जी महाराज राजा परीक्षित को सुना रहे हैं।
कस्यचिद् शमदमतपःस्वाध्यायाध्ययनत्यागसन्तोषतितिक्षा-द्विजवरस्याङ्गिरःप्रवरस्य प्रश्रयविद्यानसूयात्मज्ञानानन्दयुक्तस्यात्मसदृश श्रुतशीलाचाररूपौदार्यगुणा नव सोदर्या अङ्गजा बभूवुर्मिथुनं च यवीयस्यां भार्यायाम् || १ || यस्तु तत्र पुमांस्तं परमभागवतं राजर्षिप्रवरं भरतमुत्सृष्टमृगशरीरं चरमशरीरेण विप्रत्वं गतमाहुः ॥
इन दोनोंमें जो पुरुष था वह परम भागवत राजर्षिशिरोमणि भरत ही थे । वे मृगशरीरका परित्याग करके अन्तिम जन्ममें ब्राह्मण हुए थे - ऐसा महापुरुषोंका कथन है ।
आङ्गिरस गोत्र में शम, दम, तप, स्वाध्याय और वेदाध्ययन जैसे गुणों से सम्पन्न एक श्रेष्ठ ब्राह्मण हुए। उनकी बड़ी पत्नी से नौ पुत्र हुए और छोटी पत्नी से एक पुत्र तथा एक कन्या का जन्म हुआ। उस पुत्र का नाम भरत था, जो पूर्वजन्म में मृग शरीर त्यागकर इस बार ब्राह्मण बने थे। वे भगवान के उन युगल चरणकमलों को हृदय में धारण करते थे, जिनका श्रवण और स्मरण समस्त कर्म-बन्धनों को काट देता है। संसार की दृष्टि में वे स्वयं को पागल, मूर्ख, अन्धे और बहरे के समान दिखाते थे ताकि कोई विघ्न न आए।
स चापि तदु ह पितृसंनिधावे - वासध्रीचीनमिव स्म करोति छन्दांस्यध्यापयिष्यन् सह व्याहतिभिः सप्रणवशिरस्त्रिपदीं सावित्रीं ग्रैष्मवासन्तिकान्मासानधीयानमप्यसमवेतरूपं ग्राहयामास ॥
किन्तु भरतजी तो पिताके सामने ही उनके उपदेशके विरुद्ध आचरण करने लगते थे । पिता चाहते थे कि वर्षाकालमें इसे वेदाध्ययन आरम्भ करा दूँ । किन्तु वसन्त और ग्रीष्म ऋतुके चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ – चार महीनोंतक पढ़ाते रहनेपर भी वे इन्हें व्याहृति और शिरोमन्त्रप्रणवके सहित त्रिपदा गायत्री भी अच्छी तरह याद न करा सके ।
उनके पिता का उनमें बहुत स्नेह था। शास्त्रविधिक अनुसार, 'पिता का कर्तव्य है कि पुत्र को शिक्षा दे', इसलिए उन्होंने भरत का उपनयन-संस्कार किया और उन्हें शौच, आचमन तथा ब्रह्मचर्याश्रम के आवश्यक नियमों की शिक्षा देने का प्रयास किया। किन्तु भरत उनके उपदेशों के विरुद्ध आचरण करते थे। पिता ने उन्हें वर्षाकाल में वेदाध्ययन कराना चाहा, पर वे उन्हें गायत्री मन्त्र भी ठीक से याद न करा सके। वे केवल घर के धन्धों में व्यस्त रहे और स्वयं अपने मुख्य कर्तव्य से असावधान रहे, तभी काल-भगवान ने आक्रमण कर उनका अन्त कर दिया। पिता की मृत्यु के पश्चात उनकी छोटी भार्या अपने दोनों बच्चों को सौतली बहनों के पास छोड़कर सती होकर चली गई। अज्ञानी जनता उन्हें 'अधम ब्राह्मण' कहकर तिरस्कार करती थी। वे भाइयों द्वारा दिए गए चावल की कनी, खली और भूसी को अमृत के समान खाकर अपना जीवन यापन करते थे।
तस्य ह दैवमुक्तस्य पशोः पदवीं तदनुचराः परिधावन्तो निशि निशीथसमये तमसाऽऽवृतायामनधि - गतपशव आकस्मिकेन विधिना केदारान् वीरासनेन मृगवराहादिभ्यः संरक्षमाणमङ्गिरः प्रवर - सुतमपश्यन् ॥
किसी समय डाकुओंके सरदारने, जिसके सामन्त शूद्र जातिके थे, पुत्रकी कामनासे भद्रकालीको मनुष्यकी बलि देनेका संकल्प किया ॥१२ ॥ उसने जो पुरुष - पशु बलि देनेके लिये पकड़ मँगाया था, वह दैववश उसके फंदेसे निकलकर भाग गया । उसे ढूँढ़नेके लिये उसके सेवक चारों ओर दौड़े; किन्तु अँधेरी रातमें आधी रातके समय कहीं उसका पता न लगा । इसी समय दैवयोगसे अकस्मात् उनकी दृष्टि इन आंगिरसगोत्रीय ब्राह्मणकुमारपर पड़ी, जो वीरासनसे बैठे हुए मृग - वराहादि जीवोंसे खेतोंकी रखवाली कर रहे थे ।
इसी बीच, डाकुओं के सरदार वृषलराज ने पुत्र की कामना हेतु भद्रकाली देवी को मनुष्य की बलि देने का सङ्कल्प किया। उस समय एक पुरुष पशु बलि के लिए उनके पास से भाग गया था, जिसे ढूँढ़ने के लिए सेवक भटक रहे थे। तभी आधी रात के अन्धेरे में उनकी दृष्टि खेतों की रखवाली कर रहे इस ब्राह्मण कुमार पर पड़ी। उन्होंने देखा कि यह पशु बड़े अच्छे लक्षणों वाला है और इससे स्वामी का कार्य सिद्ध हो जाएगा। वे उन्हें रस्सियों से बाँधकर चण्डिका के मन्दिर ले आए।
एवं स्वतनुज आत्मन्यनुरागावेशितचित्तः शौचाध्ययनव्रतनियमगुर्वनलशुश्रूषणाद्यौप - कुर्वाणककर्माण्यनभियुक्तान्यपि समनुशिष्टेन भाव्यमित्यसदाग्रहः पुत्रमनुशास्य स्वयं तावदनधिगतमनोरथः कालेनाप्रमत्तेन स्वयं गृह एव प्रमत्त उपसंहृतः || ६ || अथ यवीयसी द्विजसती स्वगर्भजातं मिथुनं सपत्न्या उपन्यस्य स्वयमनुसंस्थया पतिलोकमगात् ॥
उन चोरों ने विधिपूर्वक उनका अभिषेक किया, कोरे वस्त्र पहनाए और आभूषणों तथा तिलक से विभूषित कर भोजन कराया। फिर धूप, दीप, माला और फल आदि उपहारों के साथ मृदङ्ग-ढोल की गूँज के बीच उन्हें भद्रकाली के सामने नीचा सिर करके बैठा दिया। डाकुओं का वह पुरोहित बना लुटेरा देवी-मन्त्रों से अभिमन्त्रित एक तीक्ष्ण खड्ग उठाकर आया ताकि इस नर-पशु के रुधिर से देवी को तृप्त कर सके।
परन्तु, जैसे ही वह क्षण आया, भयङ्कर कुकर्म देखकर देवी भद्रकाली स्वयं प्रकट हुईं और उन्होंने उन पापियों के सिर उड़ा दिए। परमेश्वर ने अपने कालचक्र रूपी श्रेष्ठ शस्त्र से अपने भक्त की रक्षा की। परीक्षित! जिनकी देहाभिमान रूपी हृदय-ग्रन्थि छूट गई है और जो भगवान के चरणों का आश्रय लिए हुए हैं, उनके लिए सिर कटने का अवसर आने पर भी व्याकुल न होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है; क्योंकि परमेश्वर अपने भक्तों की रक्षा हेतु किसी भी रूप में हस्तक्षेप करते हैं।
In English
The Story of Bharat and the Protection by Bhadrakali
Bharat was a Brahmin who lived a simple life focused on devotion while appearing foolish to others. A group of bandits led by Vrishalaraja kidnapped him to use him as a human sacrifice for the goddess Bhadrakali. Before they could kill him, the goddess appeared and killed the bandits to save him.
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