वामनावतारचरित : एक असुर को स्वर्ग से भी श्रेष्ठ राज्य कैसे प्राप्त हुआ?
अनन्य भक्ति और कृपा
श्रीमद्भागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · अष्टम स्कन्ध · अध्याय 23 · पृष्ठ 1595–1601
674 शब्द · 4 मिनटका पाठ · 5 श्लोक
श्रीशुक ने परीक्षित से कहा
परम गति की प्राप्ति हेतु
श्रीशुक कहते हैं— हे परीक्षित! जब भगवान् ने इस प्रकार कहा, तो साधुओं के आदरणीय महानुभाव दैत्यराज बलि के नेत्रों में आँसू छलक आए। प्रेम के उद्रेक से उनका गला भर आया। वे हाथ जोड़कर गद्गद वाणी से भगवान् से कहने लगे— "प्रभो! मैंने तो आपको पूरा प्रणाम भी नहीं किया, केवल प्रणाम करने मात्र की चेष्टा भर की। उसी से मुझे वह फल मिला, जो आपके चरणों के शरणागत भक्तों को प्राप्त होता है। बड़े-बड़े लोकपाल और देवताओं पर आपने जो कृपा कभी नहीं की, वह मुझ-जैसे नीच असुर को सहज ही प्राप्त हो गई।"
नित्यं द्रष्टासि मां तत्र गदापाणिमवस्थितम् ।
मद्दर्शनमहाह्लादध्वस्तकर्मनिबन्धनः ॥
श्रीभगवान्ने कहा- बेटा प्रह्लाद! तुम्हारा कल्याण हो । अब तुम भी सुतल लोकमें जाओ । वहाँ अपने पौत्र बलिके साथ आनन्दपूर्वक रहो और जाति - बन्धुओंको सुखी करो || ९ || वहाँ तुम मुझे नित्य ही गदा हाथमें लिये खड़ा देखोगे । मेरे दर्शनके परमानन्दमें मग्न रहनेके कारण तुम्हारे सारे कर्मबन्धन नष्ट हो जायँगे ।
भगवान् ने बलि को सुतललोक का राज्य प्रदान करते हुए कहा— "महाराज इन्द्रसेन! तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम अपने भाई-बन्धुओं के साथ उस सुतललोक में जाओ जिसे स्वर्ग के देवता भी चाहते रहते हैं। मैं तुम्हें वह स्थान दे रहा हूँ, जो बड़े-बड़े देवताओं को भी बड़ी कठिनाई से प्राप्त होता है। वहाँ रहने वाले लोग मेरी कृपादृष्टिका अनुभव करते हैं; इसलिए उन्हें शारीरिक अथवा मानसिक रोग, थकावट, तन्द्रा, बाहरी या भीतरी शत्रुओं से पराजय और किसी प्रकार के विघ्नों का सामना नहीं करना पड़ता। बड़े-बड़े लोकपाल भी अब तुम्हें पराजित नहीं कर सकेंगे! जो दैत्य तुम्हारी आज्ञा का उल्लङ्घन करेंगे, मेरा चक्र उनके टुकड़े-टुकड़े कर देगा। मैं तुम्हारी, तुम्हारे अनुचरों की और भोगसामग्री की भी सब प्रकार के विघ्नों से रक्षा करूँगा। वीर बलि! तुम मुझे वहाँ सदा-सर्वदा अपने पास ही देखोगे। दानव और दैत्यों के संसर्ग से तुम्हारा जो कुछ आसुरभाव होगा, वह मेरे प्रभाव से तुरन्त दब जाएगा और नष्ट हो जाएगा।"
ब्रह्मन् संतनु शिष्यस्य कर्मच्छिद्रं वितन्वतः ।
यत् तत् कर्मसु वैषम्यं ब्रह्मदृष्टं समं भवेत् ॥
जब प्रह्लाद ने देखा कि उनके वंशधर पौत्र राजा बलि बन्धन से छूट गए और उन्हें भगवान् का कृपा प्रसाद प्राप्त हो गया, तो वे भक्ति-भाव से भर गए। उन्होंने भगवान् की इस प्रकार स्तुति की— "आप सर्वज्ञ, सर्वात्मा और समादर्शी हैं। आपने अपनी योगमाया से खेल-ही-खेल में त्रिभुवन की रचना कर दी। आपका स्वभाव कल्प-वृक्ष के समान है; क्योंकि आप अपने भक्तों से अत्यन्त प्रेम करते हैं। हम लोग तो जन्म से ही खल और कुमार्गगामी हैं, हम पर आपकी ऐसी अनुग्रहपूर्ण दृष्टि कैसे हो गई, जो आप हमारे द्वारपाल ही बन गए?" भगवान् ने कहा— "बेटा प्रह्लाद! तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम भी सुतल लोक में जाओ। वहाँ अपने पौत्र बलिके साथ आनन्दपूर्वक रहो और जाति-बन्धुओं को सुखी करो। वहाँ तुम मुझे नित्य ही गदा हाथ में लिये खड़ा देखोगे। मेरे दर्शन के परमानन्द में मग्न रहने के कारण तुम्हारे सारे कर्म-बन्धन नष्ट हो जाएँगे।" यह आज्ञा सुनकर प्रह्लाद ने हाथ जोड़कर भगवान् का आदेश मस्तक पर चढ़ाया। उन्होंने बलिके साथ आदिपुरुष भगवान् की परिक्रमा की, उन्हें प्रणाम किया और उनसे अनुमति लेकर सुतल लोक की यात्रा की।
एवं बलेर्महीं राजन् भिक्षित्वा वामनो हरिः ।
ददौ भ्रात्रे महेन्द्राय त्रिदिवं यत् परैर्हृतम् ॥
उसी समय भगवान् श्रीहरि ब्रह्मवादी ऋत्विजों की सभा में बैठे हुए शुक्राचार्यजी से बोले— "ब्रह्मन्! आपका शिष्य यज्ञ कर रहा था। उसमें जो त्रुटि रह गयी है, उसे आप पूर्ण कर दीजिये; क्योंकि कर्म करने में जो कुछ भूल-चूक हो जाती है, वह ब्राह्मणों की कृपादृष्टि से सुधर जाती है।" शुक्राचार्यजी ने कहा— "भगवन्! जिसने अपना समस्त कर्म समर्पित करके आपकी पूजा की है, उसके कर्म में कोई त्रुटि कैसे रह सकती है? आपका नाम सारी त्रुटियों को पूर्ण कर देता है; तथापि अनन्त! जब आप स्वयं कह रहे हैं, तब मैं आपकी आज्ञा का अवश्य पालन करूँगा।" शुक्राचार्यजी ने भगवान् की आज्ञा स्वीकार कर दूसरे ब्रह्मर्षियों के साथ मिलकर बलि के यज्ञ में जो कमी रह गयी थी, उसे पूर्ण किया।
य इदं देवदेवस्य हरेरद्भुतकर्मणः ।
अवतारानुचरितं शृण्वन् याति परां गतिम् ॥
वामन भगवान् ने बलि से पृथ्वी की भिक्षा माँगी और इस प्रकार स्वर्ग का राज्य इन्द्र को दे दिया। इसके बाद प्रजापतियों के स्वामी ब्रह्माजी ने देवर्षि, पितर, मनु, दक्ष, भृगु, अङ्गिरा, सनत्कुमार और शङ्करजी के साथ समस्त लोक और लोकपालों के स्वामी के पद पर वामन भगवान् का अभिषेक कर दिया। सभी देवताओं और ऋषियों ने मिलकर वामन भगवान् को उपेन्द्र का पद दिया। इन्द्र ने भगवान् को विमान पर अग्रिम स्थान देकर अपने साथ स्वर्ग ले गए। त्रिभुवन के राजा बने इन्द्र को सर्वश्रेष्ठ ऐश्वर्य प्राप्त हुआ और वे निर्भय होकर आनन्दोत्सव मनाने लगे। ब्रह्मा, शङ्कर, सनत्कुमार, भृगु आदि मुनि, पितर और समस्त देवगण भगवान् के इस परम अद्भुत कर्म का गान करते हुए अपने-अपने लोक को चले गये।
तथापि वदतो भूमन् करिष्याम्यनुशासनम् ।
एतच्छ्रेयः परं पुंसां यत् तवाज्ञानुपालनम् ॥
तथापि अनन्त! जब आप स्वयं कह रहे हैं, तब मैं आपकी आज्ञाका अवश्य पालन करूँगा । मनुष्यके लिये सबसे बड़ा कल्याणका साधन यही है कि वह आपकी आज्ञाका पालन करे ।
In English
The Rewards of King Bali and the Rise of Indra
Lord Vishnu grants King Bali the kingdom of Sutala, promising to protect him and his subjects from all harm. Prahlada rejoices in this grace before departing for Sutala to join his grandson. Meanwhile, Shukracharya completes the rituals of Bali's sacrifice, and Vamana ascends to become the ruler of the three worlds, leading to Indra reclaiming his position.
This page answers
- What did vishnu promise to king bali regarding sutala?
- How did prahlada react to bali receiving divine grace?
- What did shukracharya do to complete bali's sacrifice?
- Who became the ruler of the three worlds after vamana's actions?
Also written: Vamanavataracharita, Vamanavatara, Bhagavana, Bali, Prahlada, Shukracharya, Indra, Brahma, Shiva, Lakshmi, वामनावतारचरित