श्रीगणेशाय नमः।

ऐलोपाख्यान : पुरूरवा ने उर्वशीलोक प्राप्त करने हेतु किस कठिन साधना का मार्ग चुना?

तप और आत्म-मन्थन

श्रीमद्भागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · नवम स्कन्ध · अध्याय 14 · पृष्ठ 118–127

1,033 शब्द · 6 मिनटका पाठ · 9 श्लोक

परीक्षित से कहा गया

वंश की उत्पत्ति और पुरूरवा के तप की महिमा बताने हेतु

श्रीमद्भागवत महापुराण के इस पावन प्रसङ्ग में, जब शुकदेव जी परीक्षित से चन्द्रमा के पवित्र वंश का वर्णन करते हैं, तो वे कहते हैं—"हे परीक्षित! अब मैं तुम्हें चन्द्रमा के पावन वंश का वर्णन सुनाता हूँ।"

श्रीशुक उवाच

अथातः श्रूयतां राजन् वंशः सोमस्य पावनः ।
यस्मिन्नैलादयो भूपाः कीर्त्यन्ते पुण्यकीर्तयः ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! अब मैं तुम्हें चन्द्रमाके पावन वंशका वर्णन सुनाता हूँ । इस वंशमें पुरूरवा आदि बड़े - बड़े पवित्रकीर्ति राजाओंका कीर्तन किया जाता है ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 1पृष्ठ 120

इस वंश की उत्पत्ति की कथा अत्यन्त विलक्षण है। सहस्रों सिर वाले विराट पुरुष नारायण के नाभि-सरोवर के कमल से ब्रह्माजी उत्पन्न हुए। ब्रह्माजी के पुत्र अत्रि हुए, जो अपने गुणों के कारण ब्रह्माजी के समान ही थे। उन्हीं अत्रिके नेत्रों से अमृतमय चन्द्रमा का जन्म हुआ। ब्रह्माजी ने चन्द्रमा को ब्राह्मण, ओषधि और नक्षत्रों का अधिपति बना दिया।

एते वै मैथिला राजन्नात्मविद्याविशारदाः ।
योगेश्वरप्रसादेन द्वन्द्वैर्मुक्ता गृहेष्वपि ॥

था ॥२४ ॥ उपगुप्तका वस्वनन्त, वस्वनन्तका युयुध, युयुधका सुभाषण, सुभाषणका श्रुत, श्रुतका जय, जयका विजय और विजयका ऋत नामक पुत्र हुआ ॥२५ ॥ ऋतका शुनक, शुनकका वीतहव्य, वीतहव्यका धृति, धृतिका बहुलाश्व, बहुलाश्वका कृति और कृतिका पुत्र हुआ महावशी || २६ ॥ परीक्षित्! ये मिथिलके वंशमें उत्पन्न सभी नरपति ' मैथिल ' कहलाते हैं । ये सब - के - सब आत्मज्ञानसे सम्पन्न एवं गृहस्थाश्रममें रहते हुए भी सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे मुक्त थे । क्यों न हो, याज्ञवल्क्य आदि बड़े - बड़े योगेश्वरोंकी इनपर महान् कृपा जो थी ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 27पृष्ठ 118

किन्तु इस वंश में एक घोर सङ्ग्राम छिड़ गया। चन्द्रमा अपनी पत्नी को लौटाने के लिए बार-बार याचना करते रहे, परन्तु वे इतने मतवाले हो गए थे कि उन्होंने किसी प्रकार उनकी पत्नी को नहीं लौटाया। इस परिस्थिति में देवता और दानव आपस में लड़ने लगे—'यह तुम्हारा नहीं, मेरा है!' शुक्राचार्यजी ने बृहस्पतिजी के द्वेष से असुरों का पक्ष लिया, जबकि महादेवजी ने स्नेहवश अपने विद्यागुरु अङ्गिराजी के पुत्र बृहस्पतिजी का पक्ष लिया। देवराज इन्द्र ने भी समस्त देवताओं के साथ अपने गुरु बृहस्पतिजी का ही पक्ष लिया।

शुचिस्तत्तनयस्तस्मात् सनद्वाजस्ततोऽभवत् ।
ऊर्ध्वकेतुः सनद्वाजादजोऽथ पुरुजित्सुतः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 22पृष्ठ 118

इस घोर सङ्ग्राम का केंद्र तारा थी। ऋषियों और देवताओं ने तारा से पूछा—'यह किसका लड़का है?' परन्तु तारा ने लज्जावश कोई उत्तर नहीं दिया। तब ब्रह्माजी ने उसे एकान्त में बुलाकर समझाया। तब तारा ने धीरे से कहा—'चन्द्रमा का।' इस प्रकार चन्द्रमा ने उस बालक को ले लिया, जिसका नाम ब्रह्माजी ने 'बुध' रखा क्योंकि उसकी बुद्धि बड़ी गम्भीर थी।

अरिष्टनेमिस्तस्यापि श्रुतायुस्तत्सुपार्श्वकः ।
ततश्चित्ररथो यस्य क्षेमधिर्मिथिलाधिपः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 23पृष्ठ 118

इसी बुध के गर्भ से पुरूरवा का जन्म हुआ। एक दिन इन्द्र की सभा में देवर्षि नारदजी जब पुरूरवा के रूप, गुण और पराक्रम का गान कर रहे थे, तब उर्वशी के हृदय में कामभाव का उदय हुआ। वह पुरुषशिरोमणि पुरूरवा के पास चली आयी। उर्वशी को देखकर राजा पुरूरवा के नेत्र हर्ष से खिल उठे, उनके शरीर में रोमाञ्च आ गया। उन्होंने बड़ी मीमी वाणी से कहा—"सुन्दरी! तुम्हारा स्वागत है। बैठो, मैं तुम्हारी क्या सेवा करूँ? तुम मेरे साथ विहार करो और हम दोनों का यह विहार अनन्त काल तक चलता रहे।"

ततः पुरूरवा जज्ञे इलायां य उदाहृतः ।
तस्य रूपगुणौदार्यशीलद्रविणविक्रमान् ॥

श्रुत्वोर्वशीन्द्रभवने गीयमानान् सुरर्षिणा ।
तदन्तिकमुपेयाय देवी स्मरशरार्दिता ॥

परीक्षित्! बुधके द्वारा इलाके गर्भसे पुरूरवाका जन्म हुआ । इसका वर्णन मैं पहले ही कर चुका हूँ। एक दिन इन्द्रकी सभामें देवर्षि नारदजी पुरूरवाके रूप, गुण, उदारता, शील-स्वभाव, धन - सम्पत्ति और पराक्रमका गान कर रहे थे । उन्हें सुनकर उर्वशीके हृदयमें कामभावका उदय हो आया और उससे पीड़ित होकर वह देवांगना पुरूरवाके पास चली आयी ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 15-16पृष्ठ 122

उर्वशी ने उत्तर दिया—"राजन्! आप सौन्दर्य के मूर्तिमान स्वरूप हैं। भला, ऐसी कौन कामिनी है जिसकी दृष्टि और मन आपमें आसक्त न हो जाय? मैं आपके साथ अवश्य विहार करूँगी, परन्तु मेरे प्रेमी महाराज! मेरी एक शर्त है। मैं आपको धरोहर के रूप में भेड़ के दो बच्चे सौंपती हूँ। आप इनकी रक्षा करना। मैं केवल घी खाऊँगी और मैथुन के अतिरिक्त और किसी भी समय आपको वस्त्रहीन न देख सकूँ।" पुरूरवा ने 'ठीक है' कहकर उसकी शर्त स्वीकार कर ली।

श्रीशुक उवाच

सहस्रशिरसः पुंसो नाभिह्रदसरोरुहात् ।
जातस्यासीत् सुतो धातुरत्रिः पितृसमो गुणैः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 2पृष्ठ 120

किन्तु नियति को कुछ और ही मञ्जूर था। आधी रात के घोर अन्धकार में गन्धर्व वहाँ आए और उर्वशी की उन भेड़ों को, जिन्हें उसने धरोहर रखा था, चुराकर चले गए। जब उर्वशी ने उन भेड़ों की 'बें-बें' सुनी, तो वह क्रोध से भर उठी और कहने लगी—"अरे, इस कायर को अपना स्वामी बनाकर मैं तो मारी गयी! यह नपुंसक अपनेको बड़ा वीर मानता है। यह मेरे भेड़ों को भी नहीं बचा सका। देखो तो सही, यह दिन में तो मर्द बनता है और रात में स्त्रियों की तरह डरकर सोया रहता है!"

श्रीशुक उवाच

तस्य दृग्भ्योऽभवत् पुत्रः सोमोऽमृतमयः किल ।
विप्रौषध्युडुगणानां ब्रह्मणा कल्पितः पतिः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 3पृष्ठ 120

उर्वशी के इन वचन-बाणों ने राजा पुरूरवा को भीतर तक बींध दिया। क्रोधित होकर वे हाथ में तलवार लेकर वस्त्रहीन अवस्था में ही उस ओर दौड़ पड़े। गन्धर्वों ने राजा को आते देख भेड़ों को वहीं छोड़ दिया और बिजली की तरह चमकने लगे। जब राजा भेड़ों को लेकर लौटे, तब उर्वशी ने उन्हें उस प्रकाश में वस्त्रहीन अवस्था में देख लिया और उसी क्षण उसे छोड़कर चली गयी।

नाहं त्वां भस्मसात् कुर्यां स्त्रियं सान्तानिकः सति ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 9पृष्ठ 121

राजा पुरूरवा विरह में उन्मत्त होकर पृथ्वी पर भटकने लगे। एक दिन कुरुक्षेत्र में सरस्वती नदी के तट पर उन्होंने उर्वशी को अपनी पाँच सखियों के साथ देखा। वे व्याकुल होकर बोले—"प्रिये! तनिक ठहर जाओ। एक बार मेरी बात मान लो। निष्ठुरे! अब आज तो मुझे सुखी किये बिना मत जाओ। क्षणभर ठहर जाओ; आओ हम दोनों कुछ बातें कर लें। देवि! अब इस शरीर पर तुम्हारा कृपा-प्रसाद नहीं रहा, जिससे तुमने इसे दूर फेंक दिया है। मेरा यह सुन्दर शरीर अभी ढेर हुआ जाता है और तुम्हारे देखते-देखते इसे भेड़िये और गीध खा जायेंगे।"

उर्वशी ने अत्यन्त निर्दयता से कहा—"राजन्! तुम पुरुष हो, इस प्रकार मत मरो। देखो, सचमुच ये भेड़िये तुम्हें खा न जायें! स्त्रियों की किसी के साथ मित्रता नहीं हुआ करती। स्त्रियों का हृदय और भेड़ियों का हृदय बिलकुल एक जैसा होता है। स्त्रियाँ निर्दय होती हैं, क्रूरता तो उनमें स्वाभाविक है। तनिक सी बात में चिढ़ जाती हैं और अपने सुख के लिये बड़े-बड़े साहस के काम कर बैठती हैं। थोड़े से स्वार्थ के लिये विश्वास दिलाकर अपने पति और भाई तक को मार डालती हैं। अतः तुम धीरज धरो। प्रति एक वर्ष के बाद एक रात तुम मेरे साथ रहोगे, तब तुम्हारे और भी सन्तानें होंगी।"

जब उर्वशी गर्भवती हुई, तब पुरूरवा अपनी राजधानी लौट आए। एक वर्ष पश्चात जब वे पुनः वहाँ गए, तब उर्वशी एक वीर पुत्र की माता बन चुकी थी। उर्वशी के मिलने से उन्हें बड़ा सुख मिला और वे एक रात उसके साथ रहे। विदा होते समय पुरूरवा अत्यन्त दीन हो गए। उर्वशी ने उनसे कहा—"तुम इन गन्धर्वों की स्तुति करो, ये चाहें तो तुम्हें मुझे दे सकते हैं।"

राजा ने जब गन्धर्वों की स्तुति की, तो प्रसन्न होकर उन्होंने राजा को एक अग्निस्थाली दी। विरह में व्याकुल पुरूरवा उस पात्र को हृदय से लगाकर एक वन से दूसरे वन घूमते रहे। जब उन्हें होश आया, तब वे उस स्थाली को वन में छोड़कर अपने महल लौट आए और उर्वशी का ध्यान करने लगे।

अन्ततः, त्रेतायुग के प्रारम्भ में, पुरूरवा उसी स्थान पर गए जहाँ उन्होंने वह अग्निस्थाली छोड़ी थी। वहाँ एक शमी वृक्ष के गर्भ में पीपल का वृक्ष उग आया था। उन्होंने उससे दो अरणियाँ (मन्थनकाष्ठ) बनाईं। उर्वशीलोक की कामना रखते हुए उन्होंने एक अरणिका उर्वशी, दूसरी पुरूरवा और बीच के काष्ठ को पुत्र रूप से चिन्तन करते हुए मन्त्रों से मन्थन किया।

उनके मन्थन से 'जातवेदा' नाम का अग्नि प्रकट हुआ। राजा पुरूरवा ने उस अग्नि को तीन भागों—आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि में विभक्त करके पुत्र रूप से स्वीकार कर लिया। फिर उन्होंने उर्वशीलोक की इच्छा से उन तीनों अग्नियों द्वारा सर्वदेवस्वरूप इन्द्रियातीत यज्ञपति भगवान श्रीहरि का यजन किया:

पुरूरवस एवासीत् त्रयी त्रेतामुखे नृप ।
अग्निना प्रजया राजा लोकं गान्धर्वमेयिवान् ॥

परीक्षित्! त्रेताके पूर्व सत्ययुगमें एकमात्र प्रणव ( ॐकार) ही वेद था । सारे वेद- शास्त्र उसीके अन्तर्भूत थे । देवता थे एकमात्र नारायण; और कोई न था । अग्नि भी तीन नहीं, केवल एक था और वर्ण भी केवल एक ' हंस' ही था ॥ ४८ ॥ परीक्षित्! त्रेताके प्रारम्भमें पुरूरवासे ही वेदत्रयी और अग्नित्रयीका आविर्भाव हुआ । राजा पुरूरवाने अग्निको सन्तानरूपसे स्वीकार करके गन्धर्वलोककी प्राप्ति की ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 14 · श्लोक 49पृष्ठ 127

*तेनायजत यज्ञेशं भगवन्तमधोक्षजम् ।* *उर्वशीलोकमन्विच्छन् सर्वदेवमयं हरिम् ॥*

इस प्रकार पुरूरवा ने अग्नि के माध्यम से गन्धर्वलोक की प्राप्ति की।

In English

The Story of Pururava and Urvashi

Pururava falls in love with the celestial nymph Urvashi, but she leaves him after he fails to protect her sheep from Gandharvas. After a long period of separation and suffering, Pururva performs a specific fire ritual to reunite with her.

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  • How was the lunar dynasty created?
  • What were the conditions urvashi set for pururava?
  • Why did urvashi leave pururava?
  • How did pururava reach the realm of the gandharvas?

Also written: Ailopakhyana, Aila, Pururava, Urvashi, Chandrama, Tara, Brahma, Indra, Angira, Brihaspati, Shukra, ऐलोपाख्यान