श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 111–120
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 111–120
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इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे श्रीरामोपाख्याने एकादशोऽध्यायः ॥११ ॥
१. नाधिर्व्याधिर्जरा ग्लानिर्दुःख० । २. रामानुचरितं नाम । ३. कल्पकः । ४. मयो । ५. तदादिशत्प्राचीं । १. दश्चन्द्रके ० । २. सर्वत्रोत्तापमावहत्। ३. स्त्रपाणेः । १. युस्ततस्तत्र । २. त्वयाऽऽवृताम्। ३. मण्डलैः ।
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अथ द्वादशोऽध्यायः इक्ष्वाकुवंशके शेष राजाओंका वर्णन श्रीशुक उवाच
कुशस्य चातिथिस्तस्मान्निषधस्तत्सुतो नभः ।
पुण्डरीकोऽथ तत्पुत्रः क्षेमधन्वाभवत्ततः ॥ १
देवानीकस्ततोऽनीहः पारियात्रोऽथ तत्सुतः ।
ततो बलस्थलस्तस्माद् वज्रनाभोऽर्कसंभवः ॥२
खगणस्तत्सुतस्तस्माद् विधृतिश्चाभवत् सुतः ।
ततो हिरण्यनाभोऽभूद् योगाचार्यस्तु जैमिनेः ॥ ३
शिष्यः कौसल्य आध्यात्मं याज्ञवल्क्योऽध्यगाद् यतः ।
योगं महोदयमृषिर्हृदयग्रन्थिभेदकम्२ ॥ ४
पुष्यो हिरण्यनाभस्य ध्रुवसन्धिस्ततोऽभवत् ।
सुदर्शनोऽथाग्निवर्णः शीघ्रस्तस्य मरुः सुतः ॥५
योऽसावास्ते योगसिद्धः कलापग्राममाश्रितः ।
कलेरन्ते सूर्यवंशं नष्टं भावयिता पुनः ॥६
तस्मात् प्रसुश्रुतस्तस्य सन्धिस्तस्याप्यमर्षणः ।
महस्वांस्तत्सुतस्तस्माद् विश्वसाह्वोऽन्वजायत ॥ ७
ततः४ प्रसेनजित् तस्मात् तक्षको भविता पुनः ।
ततो बृहद्बलो यस्तु पित्रा ते समरे हतः ॥८
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! कुशका पुत्र हुआ अतिथि, उसका निषध, निषधका नभ, नभका पुण्डरीक और पुण्डरीकका क्षेमधन्वा || १ || क्षेमधन्वाका देवानीक, देवानीकका अनीह, अनीहका पारियात्र, पारियात्रका बलस्थल और बलस्थलका पुत्र हुआ वज्रनाभ। यह सूर्यका अंश था ॥२ ॥
वज्रनाभसे खगण, खगणसे विधृति और विधृतिसे हिरण्यनाभकी उत्पत्ति हुई । वह जैमिनिका शिष्य और योगाचार्य था || ३ || कोसलदेशवासी याज्ञवल्क्य ऋषिने उसकी शिष्यता स्वीकार करके उससे अध्यात्मयोगकी शिक्षा ग्रहण की थी । वह योग हृदयकी गाँठ काट देनेवाला तथा परम सिद्धि देनेवाला है ॥४ ॥
हिरण्यनाभका पुष्य, पुष्यका ध्रुवसन्धि, ध्रुवसन्धिका सुदर्शन, सुदर्शनका अग्निवर्ण, अग्निवर्णका शीघ्र और शीघ्रका पुत्र हुआ मरु || ५ || मरुने योगसाधनासे सिद्धि प्राप्त कर ली
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और वह इस समय भी कलाप नामक ग्राममें रहता है। कलियुगके अन्तमें सूर्यवंशके नष्ट हो जानेपर वह उसे फिरसे चलायेगा ॥ ६ ॥
मरुसे प्रसुश्रुत, उससे सन्धि और सन्धिसे अमर्षणका जन्म हुआ। अमर्षणका महस्वान् और महस्वान्का विश्वसाह्व ॥७ ॥ विश्वसाह्वका प्रसेनजित्, प्रसेनजित्का तक्षक और
तक्षकका पुत्र बृहद्बल हुआ । परीक्षित्! इसी बृहद्बलको तुम्हारे पिता अभिमन्युने युद्धमें मार डाला था || ८ ||
एते हीक्ष्वाकुभूपाला अतीताः शृण्वनागतान् ।
बृहद्बलस्य भविता पुत्रो नाम बृहद्रणः ॥ ९
उरुक्रियस्ततस्तस्य वत्सवृद्धो भविष्यति ।
प्रतिव्योमस्ततो भानुर्दिवाको वाहिनीपतिः ॥ १०
सहदेवस्ततो वीरो बृहदश्वोऽथ भानुमान् ।
प्रतीकाश्वो भानुमतः सुप्रतीकोऽथ तत्सुतः ॥ ११
भविता मरुदेवोऽथ सुनक्षत्रोऽथ पुष्करः ।
तस्यान्तरिक्षस्तत्पुत्रः सुतपास्तदमित्रजित् ॥१२
बृहद्राजस्तु' तस्यापि बर्हिस्तस्मात् कृतंजयः ।
रणंजयस्तस्य सुतः संजयो भविता ततः ॥ १३
तस्माच्छाक्योऽथ शुद्धोदो लांगलस्तत्सुतः स्मृतः ।
ततः प्रसेनजित् तस्मात् क्षुद्रको भविता ततः ॥१४
रणको भविता तस्मात् सुरथस्तनयस्ततः ।
सुमित्रो नाम निष्ठान्त एते बार्हद्बलान्वयाः ३ ॥१५
इक्ष्वाकूणामयं वंशः सुमित्रान्तो भविष्यति ।
यतस्तं प्राप्य राजानं संस्थां प्राप्स्यति वै कलौ ॥१६
परीक्षित्! इक्ष्वाकुवंशके इतने नरपति हो चुके हैं । अब आनेवालोंके विषयमें सुनो । बृहद्बलका पुत्र होगा बृहद्रण || ९ || बृहद्रणका उरुक्रिय, उसका वत्सवृद्ध, वत्सवृद्धका प्रतिव्योम, प्रतिव्योमका भानु और भानुका पुत्र होगा सेनापति दिवाक ॥१० ॥ दिवाकका वीर
सहदेव, सहदेवका बृहदश्व, बृहदश्वका भानुमान्, भानुमान्का प्रतीकाश्व और प्रतीकाश्वका पुत्र होगा सुप्रतीक ॥ ११ ॥ सुप्रतीकका मरुदेव, मरुदेवका सुनक्षत्र, सुनक्षत्रका पुष्कर, पुष्करका
अन्तरिक्ष, अन्तरिक्षका सुतपा और उसका पुत्र होगा अमित्रजित् ॥१२ ॥ अमित्रजित्से
बृहद्राज, बृहद्राजसे बर्हि, बर्हिसे कृतंजय, कृतंजयसे रणंजय और उससे संजय होगा ॥ १३ ॥
संजयका शाक्य, उसका शुद्धोद और शुद्धोदका लांगल, लांगलका प्रसेनजित् और प्रसेनजित्का पुत्र क्षुद्रक होगा ॥१४ ॥ क्षुद्रकसे रणक, रणकसे सुरथ और सुरथसे इस वंशके
अन्तिम राजा सुमित्रका जन्म होगा । ये सब बृहद्बलके वंशधर होंगे ॥१५ ॥ इक्ष्वाकुका यह
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वंश सुमित्रतक ही रहेगा । क्योंकि सुमित्रके राजा होनेपर कलियुगमें यह वंश समाप्त हो जायगा || १६ || इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे इक्ष्वाकुवंशवर्णनं ४ नाम द्वादशोऽध्यायः ॥१२ ॥
१ - विसृष्टिश्चाभवत्ततः । २. दनम्। ३. तस्मात् प्रश्रुतपुत्रस्तु सन्धि० । ४. प्राचीन प्रतिमें 'ततः पुनः ' यह पूर्वार्ध नहीं है, इसके स्थानपर वर्तमान प्रतिमें आया हुआ ‘ भविता …..मित्रजित्’ यह बारहवाँ श्लोक दिया है, इसमें भी ' मरुदेवो ' के स्थानमें ‘ मनुदेवो ’ पाठ है । १. बृहद्भुजस्तु। २. तस्मात्साध्योऽथ । ३. लाः स्मृताः । ४. वंशानुकथने श्रीरामचरिते ।
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अथ त्रयोदशोऽध्यायः राजा निमिके वंशका वर्णन श्रीशुक उवाच
निमिरिक्ष्वाकुतनयो वसिष्ठमवृतर्त्विजम् ।
आरभ्य सत्रं सोऽप्याह शक्रेण प्राग्वृतोऽस्मि भोः ॥१
तं निर्वर्त्यागमिष्यामि तावन्मां प्रतिपालय ।
तूष्णीमासीद् गृहपतिः सोऽपीन्द्रस्याकरोन्मखम् ॥२
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! इक्ष्वाकुके पुत्र थे निमि । उन्होंने यज्ञ आरम्भ करके महर्षि वसिष्ठको ऋत्विज्के रूपमें वरण किया । वसिष्ठजीने कहा कि ' राजन्! इन्द्र अपने यज्ञके लिये मुझे पहले ही वरण कर चुके हैं || १ || उनका यज्ञ पूरा करके मैं तुम्हारे पास आऊँगा । तबतक तुम मेरी प्रतीक्षा करना । ' यह बात सुनकर राजा निमि चुप हो रहे और वसिष्ठजी इन्द्रका यज्ञ कराने चले गये ॥२ ॥
निमिश्चलमिदं विद्वान् सत्रमारभतात्मवान् ।
ऋत्विग्भिरपरैस्तावन्नागमद् यावता गुरुः ॥३
शिष्यव्यतिक्रमं वीक्ष्य निर्वर्त्य गुरुरागतः ।
अशपत् पतताद् देहो निमेः पण्डितमानिनः ॥४
निमिः प्रतिददौ शापं गुरवेऽधर्मवर्तिने ।
तवापि पतताद् देहो लोभाद् धर्ममजानतः ॥५
इत्युत्ससर्ज स्वं देहं निमिरध्यात्मकोविदः ।
मित्रावरुणयोर्जज्ञे उर्वश्यां प्रपितामहः ॥६
गन्धवस्तुषु तद्देहं निधाय मुनिसत्तमाः ।
समाप्ते सत्रयागेऽथ देवानूचुः समागतान् ॥७
राज्ञो जीवतु देहोऽयं प्रसन्नाः प्रभवो यदि ।
तथेत्युक्ते निमिः प्राह मा भून्मे देहबन्धनम् ॥८
यस्य योगं न वाञ्छन्ति वियोगभयकातराः ।
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भजन्ति चरणाम्भोजं मुनयो हरिमेधसः ॥ ९
देहं नावरुरुत्सेऽहं दुःखशोकभयावहम् ।
सर्वत्रास्य यतो मृत्युर्मत्स्यानामुदके यथा ॥ १०
विचारवान् निमिने यह सोचकर कि जीवन तो क्षणभंगुर है, विलम्ब करना उचित न समझा और यज्ञ प्रारम्भ कर दिया । जबतक गुरु वसिष्ठजी न लौटें, तबतकके लिये उन्होंने दूसरे ऋत्विजोंको वरण कर लिया ॥३ ॥ गुरु वसिष्ठजी जब इन्द्रका यज्ञ सम्पन्न करके लौटे
तो उन्होंने देखा कि उनके शिष्य निमिने तो उनकी बात न मानकर यज्ञ प्रारम्भ कर दिया है । उस समय उन्होंने शाप दिया कि ' निमिको अपनी विचारशीलता और पाण्डित्यका बड़ा घमंड है, इसलिये इसका शरीरपात हो जाय' ॥४ ॥ निमिकी दृष्टिमें गुरु वसिष्ठका यह शाप धर्मके
अनुकूल नहीं, प्रतिकूल था । इसलिये उन्होंने भी शाप दिया कि ' आपने लोभवश अपने धर्मका आदर नहीं किया, इसलिये आपका शरीर भी गिर जाय' || ५ || यह कहकर आत्मविद्यामें निपुण निमिने अपने शरीरका त्याग कर दिया । परीक्षित्! इधर हमारे वृद्ध प्रपितामह वसिष्ठजीने भी अपना शरीर त्यागकर मित्रावरुणके द्वारा उर्वशीके गर्भसे जन्म ग्रहण किया ॥६ ॥ राजा निमिके यज्ञमें आये हुए श्रेष्ठ मुनियोंने राजाके शरीरको सुगन्धित
वस्तुओंमें रख दिया । जब सत्रयागकी समाप्ति हुई और देवतालोग आये, तब उन लोगोंने उनसे प्रार्थना की ॥७ ॥ ' महानुभावो! आपलोग समर्थ हैं। यदि आप प्रसन्न हैं तो राजा
निमिका यह शरीर पुनः जीवित हो उठे । ' देवताओंने कहा -' ऐसा ही हो । ' उस समय निमिने कहा —' मुझे देहका बन्धन नहीं चाहिये || ८ || विचारशील मुनिजन अपनी बुद्धिको पूर्णरूपसे श्रीभगवान्में ही लगा देते हैं और उन्हींके चरणकमलोंका भजन करते हैं । एक- न-एक दिन यह शरीर अवश्य ही छूटेगा - इस भय से भीत होनेके कारण वे इस शरीरका कभी संयोग ही नहीं चाहते; वे तो मुक्त ही होना चाहते हैं || ९ || अतः मैं अब दुःख, शोक और भयके मूल कारण इस शरीरको धारण करना नहीं चाहता । जैसे जलमें मछ्लीके लिये सर्वत्र ही मृत्युके अवसर हैं, वैसे ही इस शरीरके लिये भी सब कहीं मृत्यु- ही - मृत्यु है ' ॥१० ॥
देवा ऊचुः
विदेह उष्यतां कामं लोचनेषु शरीरिणाम् ।
उन्मेषणनिमेषाभ्यां लक्षितोऽध्यात्मसंस्थितः ॥११
अराजकभयं नृपां मन्यमाना महर्षयः ।
देहं ममन्थुः स्म निमेः कुमारः समजायत ॥१२
जन्मना जनकः सोऽभूद् वैदेहस्तु विदेहजः ।
मिथिलो मथनाज्जातो मिथिला येन निर्मिता ॥१३
तस्मादुदावसुस्तस्य पुत्रोऽभून्नन्दिवर्धनः ।
ततः सुकेतुस्तस्यापि देवरातो” महीपते ॥१४
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तस्माद् बृहद्रथस्तस्य महावीर्यः सुधृत्पिता ।
सुधृतेर्धृष्टकेतुर्वै हर्यश्वोऽथ मरुस्ततः ॥१५
मरोः प्रतीपकस्तस्माज्जातः २ कृतिरथो यतः ।
देवमीढस्तस्य सुतो विश्रुतोऽथ महाधृतिः ॥ १६
कृतिरातस्ततस्तस्मान्महारोमाथ तत्सुतः ।
स्वर्णरोमा सुतस्तस्य ह्रस्वरोमा व्यजायत ॥१७
ततः सीरध्वजो जज्ञे यज्ञार्थं कर्षतो महीम् ।
सीता सीराग्रतो जाता तस्मात् सीरध्वजः स्मृतः ॥१८
कुशध्वजस्तस्य पुत्रस्ततो धर्मध्वजो नृपः ।
धर्मध्वजस्य द्वौ पुत्रौ कृतध्वजमितध्वजौ ॥ १ ९
कृतध्वजात् केशिध्वजः खाण्डिक्यस्तु मितध्वजात् ।
कृतध्वजसुतो राजन्नात्मविद्याविशारदः ॥२०
खाण्डिक्यः कर्मतत्त्वज्ञो भीतः केशिध्वजाद्भुतः ।
भानुमांस्तस्य पुत्रोऽभूच्छतद्युम्नस्तु तत्सुतः ॥ २१
देवताओंने कहा— ' मुनियो! राजा निमि बिना शरीरके ही प्राणियोंके नेत्रोंमें अपनी इच्छाके अनुसार निवास करें । वे वहाँ रहकर सूक्ष्मशरीरसे भगवान्का चिन्तन करते रहें । पलक उठने और गिरनेसे उनके अस्तित्वका पता चलता रहेगा ॥११ ॥ इसके बाद महर्षियोंने
यह सोचकर कि ‘ राजाके न रहनेपर लोगोंमें अराजकता फैल जायगी' निमिके शरीरका मन्थन किया । उस मन्थनसे एक कुमार उत्पन्न हुआ ॥१२ ॥ जन्म लेनेके कारण उसका नाम
हुआ जनक । विदेहसे उत्पन्न होनेके कारण ' वैदेह' और मन्थनसे उत्पन्न होनेके कारण उसी
बालकका नाम ‘ मिथिल' हुआ । उसीने मिथिलापुरी बसायी ॥१३ ॥
परीक्षित्! जनकका उदावसु, उसका नन्दिवर्धन, नन्दिवर्धनका सुकेतु, उसका देवरात, देवरातका बृहद्रथ, बृहद्रथका महावीर्य, महावीर्यका सुधृति, सुधृतिका धृष्टकेतु, धृष्टकेतुका हर्यश्व और उसका मरु नामक पुत्र हुआ ॥ १४-१५ ॥ मरुसे प्रतीपक, प्रतीपकसे कृतिरथ, कृतिरथसे देवमीढ, देवमीढसे विश्रुत और विश्रुतसे महाधृतिका जन्म हुआ ॥ १६ ॥ महाधृतिका कृतिरात, कृतिरातका महारोमा, महारोमाका
स्वर्णरोमा और स्वर्णरोमाका पुत्र हुआ ह्रस्वरोमा ॥१७ ॥ इसी ह्रस्वरोमाके पुत्र महाराज
सीरध्वज थे । वे जब यज्ञके लिये धरती जोत रहे थे, तब उनके सीर ( हल ) के अग्रभाग ( फाल ) -से सीताजीकी उत्पत्ति हुई । इसीसे उनका नाम ' सीरध्वज ' पड़ा ॥१८ ॥ सीरध्वजके
कुशध्वज, कुशध्वजके धर्मध्वज और धर्मध्वजके दो पुत्र हुए — कृतध्वज और मितध्वज ॥१९ ॥ कृतध्वजके केशिध्वज और मितध्वजके खाण्डिक्य हुए । परीक्षित्!
केशिध्वज आत्मविद्यामें बड़ा प्रवीण था ॥ २० ॥
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खाण्डिक्य था कर्मकाण्डका मर्मज्ञ । वह केशिध्वजसे भयभीत होकर भाग गया ।
केशिध्वजका पुत्र भानुमान् और भानुमान्का शतद्युम्न था ॥२१ ॥
शुचिस्तत्तनयस्तस्मात् सनद्वाजस्ततोऽभवत् ।
ऊर्ध्वकेतुः सनद्वाजादजोऽथ पुरुजित्सुतः ॥२२
अरिष्टनेमिस्तस्यापि श्रुतायुस्तत्सुपार्श्वकः ।
ततश्चित्ररथो यस्य क्षेमधिर्मिथिलाधिपः ॥२३
तस्मात् समरथस्तस्य सुतः सत्यरथस्ततः ।
आसीदुपगुरुस्तस्मादुपगुप्तोऽग्निसंभवः ॥२४
वस्वनन्तोऽथ तत्पुत्रो युयुधो यत् सुभाषणः ।
श्रुतस्ततो जयस्तस्माद् विजयोऽस्मादृतः सुतः ॥२५
शुनकस्तत्सुतो जज्ञे वीतहव्यो धृतिस्ततः ।
बहुलाश्वो धृतेस्तस्य कृतिरस्य महावशी ॥२६
एते वै मैथिला राजन्नात्मविद्याविशारदाः ।
योगेश्वरप्रसादेन द्वन्द्वैर्मुक्ता गृहेष्वपि ॥ २७
शतद्युम्नसे शुचि, शुचिसे सनद्वाज, सनद्वाजसे ऊर्ध्वकेतु, ऊर्ध्वकेतुसे अज, अजसे पुरुजित्, पुरुजित्से अरिष्टनेमि, अरिष्टनेमिसे श्रुतायु, श्रुतायुसे सुपार्श्वक, सुपार्श्वकसे चित्ररथ और चित्ररथसे मिथिलापति क्षेमधिका जन्म हुआ ॥२२-२३ ॥ क्षेमधिसे समरथ, समरथसे सत्यरथ, सत्यरथसे उपगुरु और उपगुरुसे उपगुप्त नामक पुत्र हुआ । यह अग्निका अंश था ॥२४ ॥ उपगुप्तका वस्वनन्त, वस्वनन्तका युयुध, युयुधका सुभाषण, सुभाषणका श्रुत,
श्रुतका जय, जयका विजय और विजयका ऋत नामक पुत्र हुआ ॥२५ ॥ ऋतका शुनक,
शुनकका वीतहव्य, वीतहव्यका धृति, धृतिका बहुलाश्व, बहुलाश्वका कृति और कृतिका पुत्र हुआ महावशी || २६ ॥ परीक्षित्! ये मिथिलके वंशमें उत्पन्न सभी नरपति ' मैथिल ' कहलाते हैं । ये सब - के - सब आत्मज्ञानसे सम्पन्न एवं गृहस्थाश्रममें रहते हुए भी सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे मुक्त थे । क्यों न हो, याज्ञवल्क्य आदि बड़े - बड़े योगेश्वरोंकी इनपर महान् कृपा जो थी ॥२७ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे निमिवंशानुवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥१३ ॥
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१. तं देहं । २. याश्रयात् । १. रीषो । २. प्रतिरथस्त० । ३. विश्वनाथो मरुत्कृतिः । ४. विरुतस्तत्सुतस्तस्मा० ।
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अथ चतुर्दशोऽध्यायः चन्द्रवंशका वर्णन श्रीशुक उवाच
अथातः श्रूयतां राजन् वंशः सोमस्य पावनः ।
यस्मिन्नैलादयो भूपाः कीर्त्यन्ते पुण्यकीर्तयः ॥१
सहस्रशिरसः पुंसो नाभिह्रदसरोरुहात् ।
जातस्यासीत् सुतो धातुरत्रिः पितृसमो गुणैः ॥ २
तस्य दृग्भ्योऽभवत् पुत्रः सोमोऽमृतमयः किल ।
विप्रौषध्युडुगणानां ब्रह्मणा कल्पितः पतिः ॥३
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! अब मैं तुम्हें चन्द्रमाके पावन वंशका वर्णन सुनाता हूँ । इस वंशमें पुरूरवा आदि बड़े - बड़े पवित्रकीर्ति राजाओंका कीर्तन किया जाता है ॥१ ॥
सहस्रों सिरवाले विराट् पुरुष नारायणके नाभि- सरोवरके कमलसे ब्रह्माजीकी उत्पत्ति हुई। ब्रह्माजीके पुत्र हुए अत्रि । वे अपने गुणोंके कारण ब्रह्माजीके समान ही थे ॥२ ॥ उन्हीं
अत्रिके नेत्रोंसे अमृतमय चन्द्रमाका जन्म हुआ । ब्रह्माजीने चन्द्रमाको ब्राह्मण, ओषधि और नक्षत्रोंका अधिपति बना दिया ॥३ ॥
सोऽयजद् राजसूयेन विजित्य भुवनत्रयम् ।
पत्नीं बृहस्पतेर्दर्पात् तारां नामाहरद् बलात् ॥४
यदा स देवगुरुणा याचितोऽभीक्ष्णशो मदात् ।
नात्यजत् तत्कृते जज्ञे सुरदानवविग्रहः ॥ ५
शुक्रो बृहस्पतेद्वेषादग्रहीत्' सासुरोडुपम् ।
हरो गुरुसुतं स्नेहात् सर्वभूतगणावृतः ॥६
सर्वदेवगणोपेतो महेन्द्रो गुरुमन्वयात् ।
सुरासुरविनाशोऽभूत् समरस्तारकामयः ॥७
निवेदितोऽथांगिरसा सोमं निर्भर्त्स्य विश्वकृत् ।
तारां स्वभर्त्रे प्रायच्छदन्तर्वत्नीमवैत् पतिः ॥८
त्यज त्यजाशु दुष्प्रज्ञे मत्क्षेत्रादाहितं परैः ।