बलदेवचरित्र : अहङ्कार और अधर्म का अन्त कैसे होता है?
धर्म की मर्यादा और दण्ड
श्रीमद्भागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · दशम स्कन्ध · अध्याय 78 · पृष्ठ 905–912
702 शब्द · 4 मिनटका पाठ · 6 श्लोक
श्रीशुकदेव ने परीक्षित से कहा
परम सत्य और धर्म के मार्ग को समझाने हेतु
श्रीशुकदेवजी बोले— हे परीक्षित! जब शिशुपाल, शाल्व और पौण्ड्रक मारे जा चुके थे, तब उनके मित्रों के ऋण को चुकाने के लिए मूर्ख दन्तवक्त्र अकेला ही पैदल युद्धभूमि में आ धमका। वह क्रोध से आग-बबूला हो रहा था और उसके हाथ में एकमात्र शस्त्र गदा थी। परीक्षित! लोग देख रहे थे कि वह इतना शक्तिशाली है कि उसके पैरों की धमक से पृथ्वी हिल रही है। भगवान श्रीकृष्ण ने जब उसे इस प्रकार आते देखा, तो वे झटपट हाथ में गदा लेकर रथ से कूद पड़े और समुद्र के तट की भूमि के ज्वार को रोक देने वाले वेग की तरह उन्होंने उसे रोक दिया।
शिशुपालस्य शाल्वस्य पौण्ड्रकस्यापि दुर्मतिः ।
परलोकगतानां च कुर्वन् पारोक्ष्यसौहृदम् ॥
एकः पदातिः संक्रुद्धो गदापाणिः प्रकम्पयन् ।
पद्भ्यामिमां महाराज महासत्त्वो व्यदृश्यत ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! शिशुपाल, शाल्व और पौण्ड्रकके मारे जानेपर उनकी मित्रताका ऋण चुकानेके लिये मूर्ख दन्तवक्त्र अकेला ही पैदल युद्धभूमिमें आ धमका । वह क्रोधके मारे आग- बबूला हो रहा था । शस्त्रके नामपर उसके हाथमें एकमात्र गदा थी। परन्तु परीक्षित्! लोगोंने देखा, वह इतना शक्तिशाली है कि उसके पैरोंकी धमकसे पृथ्वी हिल रही है ।
घमण्ड में चूर दन्तवक्त्र ने सिंह के समान गरजकर कहा— 'बड़े सौभाग्य और आनन्द की बात है कि आज तुम मेरी आँखों के सामने पड़ गये!' रणभूमि में गदा की चोटें खाकर भी श्रीकृष्ण टस-से-मस नहीं हुए। उन्होंने अपनी बड़ी कौमोदकी गदा सम्भाली और दन्तवक्त्र के वक्ष:स्थल पर प्रहार कर दिया। उस चोट से दन्तवक्त्र का कलेजा फट गया; वह मुँह से खून उगलने लगा, उसके बाल बिखर गए और भुजाएँ-पैर फैलते हुए वह निष्प्राण होकर धरती पर गिर पड़ा। परीक्षित! उसकी मृत्यु के समय उसके शरीर से एक अत्यन्त सूक्ष्म ज्योति निकली और वह विचित्र रीति से श्रीकृष्ण में समा गई।
किरीटयुक्तं पुरुमायिनो हरिः ।
वज्रेण वृत्रस्य यथा पुरन्दरो बभूव हाहेति वचस्तदा नृणाम् ॥
तभी उसका भाई विदूरथ अपने भाई की मृत्यु से शोकाकुल होकर, क्रोध में लम्बी साँसें लेता हुआ हाथ में ढाल-तलवार लेकर श्रीकृष्ण को मार डालने की इच्छा से आया। उस समय देवता और मनुष्य भगवान की विजय के गीत गा रहे थे और अप्सराएँ तथा महानाग उन पर पुष्पों की वर्षा कर रहे थे। जैसे ही वह आगे बढ़ा, योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अपने चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।
एवं योगेश्वरः कृष्णो भगवान् जगदीश्वरः ।
ईयते पशुदृष्टीनां निर्जितो जयतीति सः ॥
उस समय देवता और मनुष्य उनकी स्तुति कर रहे थे । बड़े - बड़े ऋषि- मुनि, सिद्ध -गन्धर्व, विद्याधर और वासुकि आदि महानाग, अप्सराएँ, पितर, यक्ष, किन्नर तथा चारण उनके ऊपर पुष्पोंकी वर्षा करते हुए उनकी विजयके गीत गा रहे थे । भगवान्के प्रवेशके अवसरपर पुरी खूब सजा दी गयी थी और बड़े - बड़े वृष्णिवंशी यादव वीर उनके पीछे - पीछे चल रहे थे ॥१३-१५ ॥ योगेश्वर एवं जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्ण इसी प्रकार अनेकों खेल खेलते रहते हैं । जो पशुओंके समान अविवेकी हैं, वे उन्हें कभी हारते भी देखते हैं । परन्तु वास्तवमें तो वे सदा - सर्वदा विजयी ही हैं ।
इसके पश्चात, तीर्थयात्रा करते हुए भगवान बलराम यमुना और गङ्गा के प्रमुख तीर्थों से होते हुए नैमिषारण्य क्षेत्र में पहुँचे। वहाँ बड़े-बड़े ऋषि महान सत्सङ्ग कर रहे थे। बलराम जी ने ऋषियों का स्वागत किया, पूजन किया और अपने साथियों के साथ आसन ग्रहण किया। तभी उनकी दृष्टि व्यासजी के शिष्य रोमहर्षण पर पड़ी, जो ऊंचे आसन पर बैठे थे।
प्रसार्य केशबाह्वङ्घ्रीन् धरण्यां न्यपतद् व्यसुः ॥
बलरामजी ने देखा कि रोमहर्षण सूत जाति में उत्पन्न होने पर भी उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों से ऊँचे आसन पर बैठे हैं और उनके आने पर न तो उठकर स्वागत किया और न ही हाथ जोड़कर प्रणाम। इस पर बलरामजी को तीव्र क्रोध आ गया। वे कहने लगे— 'यह रोमहर्षण प्रतिलोम जातिक होने पर भी इन श्रेष्ठ ब्राह्मणों से और धर्म के रक्षक हमलोगों से ऊपर बैठा हुआ है, इसलिये यह दुर्बुद्धि मृत्युदण्ड का पात्र है! इसने शास्त्रों का अध्ययन तो किया है, परन्तु इसका अपने मन पर संयम नहीं है। यह विनयी नहीं, उद्दण्ड है। यह जो झूठ-मूठ अपने आप को बड़ा पण्डित मान रहा है, यह सब स्वाँग मात्र है। जो लोग धर्म का चिह्न धारण करते हैं, परन्तु उसका पालन नहीं करते, वे अधिक पापी हैं और मेरे लिये वध करने योग्य हैं।'
इतना कहकर बलरामजी ने अपने हाथ में स्थित कुश की नोक से उन पर प्रहार कर दिया और वे तुरन्त मर गए। सूतजी के मरते ही ऋषि-मुनि व्याकुल होकर हाय-हाय करने लगे। उन्होंने बलरामजी से कहा— 'प्रभो! आपने यह बहुत बड़ा अधर्म किया है। हमने इन्हें ब्राह्मणोचित आसन दिया था और इन्हें शारीरिक कष्ट से रहित आयु दी थी। आपने अनजान में ब्रह्महत्या कर दी है। यदि आप स्वयं अपनी इच्छा से इस पाप का प्रायश्चित्त कर लेंगे, तो इससे लोगों को शिक्षा मिलेगी।'
भगवान बलराम ने कहा— 'मैं लोगों को शिक्षा देने के लिये इस ब्रह्महत्या का प्रायश्चित्त अवश्य करूँगा। आप लोग प्रथम श्रेणी का जो प्रायश्चित्त कहें, मैं उसे स्वीकार करूँगा। आप इस सूत को जो भी वरदान देना चाहते हैं, मुझे बता दें, मैं अपने योगबल से सब सम्पन्न कर दूँगा।'
श्रीभगवानुवाच करिष्ये वधनिर्वेशं लोकानुग्रहकाम्यया ।
नियमः प्रथमे कल्पे यावान् स तु विधीयताम् ॥
ऋषियों ने कहा— 'बलरामजी! वेदों के अनुसार आत्मा ही पुत्र के रूप में उत्पन्न होती है। इसलिए रोमहर्षण के स्थान पर उनका पुत्र आपको पुराणों की कथा सुनाएगा। आप उसे दीर्घायु, इन्द्रिय-शक्ति और बल दे दीजिए।' इसके बाद ऋषियों ने एक अन्य सङ्कट बताया— 'यदुनन्दन! इल्वल का पुत्र बल्वल नामक एक भयङ्कर दानव है, जो यहाँ आकर पीब, खून, विष्ठा और मांस की वर्षा करता है। आप उस पापी को मार डालिये और इसके पश्चात बारह महीनों तक भारतवर्ष की परिक्रमा करते हुए एकाग्रचित्त होकर तीर्थों में स्नान करें, जिससे आपकी शुद्धि हो जाएगी।'
दीर्घमायुर्बतैतस्य सत्त्वमिन्द्रियमेव च ।
आशासितं यत्तद् ब्रूत साधये योगमायया ॥
In English
The Deaths of Dantavakra and Romaharshana
Krishna kills Dantavakra with his mace and later decapitates his brother Viduratha with his Sudarshana Chakra. Balarama then kills a scholar named Romaharshana with a blade of grass after feeling insulted by the man's behavior, leading the sages to prescribe a penance involving the killing of a demon and a pilgrimage.
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