हरिश्चन्द्रोपाख्यान : पुत्र-मोह के बन्धन से मुक्त होकर आत्मज्ञान कैसे प्राप्त होता है?
अहङ्कार का त्याग और आत्मबोध
श्रीमद्भागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · नवम स्कन्ध · अध्याय 7 · पृष्ठ 71–77
453 शब्द · 3 मिनटका पाठ · 4 श्लोक
श्रीशुकदेव ने परीक्षित से कहा
राजा को आत्मज्ञान की प्राप्ति हेतु प्रेरित करने के लिए
श्रीशुकदेव जी ने परीक्षित से कहा— हे राजन! राजा हरिश्चन्द्र की कथा सुनने के लिए मैं आपको सुनाता हूँ।
तत्र तप्त्वा तपस्तीक्ष्णमात्मकर्शनमात्मवान् ।
सहैवाग्निभिरात्मानं युयोज परमात्मनि ॥
जब राजा हरिश्चन्द्र पुत्रहीन थे, तब वे पुत्र प्राप्ति हेतु वरुणदेव की शरण में गए। वरुणदेव ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और उन्हें रोहित नामक पुत्र प्रदान किया। किन्तु जैसे-जैसे समय बीतता गया, पुत्र-प्रेम की फाँसी ने हरिश्चन्द्र के हृदय को जकड़ लिया। जब भी वरुणदेव यज्ञ हेतु पशु भेजने का आग्रह करते, हरिश्चन्द्र समय टालने लगते। वरुणदेव कहते— 'जब इस पशु के दाँत उग आएँगे, तब यह यज्ञ के योग्य हो जाएगा।' इस पर हरिश्चन्द्र तर्क देते— 'वरुणजी महाराज! क्षत्रियपशु तब यज्ञ के योग्य होता है जब वह कवच धारण करने लगे।' वे जो-जो समय बताते, वरुणदेव उसी की बाट देखते रहे।
गन्धर्वानवधीत् तत्र वध्यान् वै विष्णुशत्तिधृक् ।
नागाल्लब्धवरः सर्पादभयं स्मरतामिदम् ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! मैं वर्णन कर चुका हूँ कि मान्धाताके पुत्रोंमें सबसे श्रेष्ठ अम्बरीष थे । उनके दादा युवनाश्वने उन्हें पुत्ररूपमें स्वीकार कर लिया । उनका पुत्र हुआ यौवनाश्व और यौवनाश्वका हारीत । मान्धाताके वंशमें ये तीन अवान्तर गोत्रोंके प्रवर्तक हुए ॥१ ॥ नागोंने अपनी बहिन नर्मदाका विवाह पुरुकुत्ससे कर दिया था । नागराज वासुकिकी आज्ञासे नर्मदा अपने पतिको रसातलमें ले गयी || २ || वहाँ भगवान्की शक्तिसे सम्पन्न होकर पुरुकुत्सने वध करनेयोग्य गन्धर्वोंको मार डाला । इसपर नागराजने प्रसन्न होकर पुरुकुत्सको वर दिया कि जो इस प्रसंगका स्मरण करेगा, वह सर्पोंसे निर्भय हो जायगा ।
इधर रोहित को जब पता चला कि उसके पिताजी उसे ही बलिदान करना चाहते हैं, तो वह अपने प्राणों की रक्षा हेतु हाथ में धनुष लेकर वन की ओर भाग गया। कुछ समय पश्चात उसे ज्ञात हुआ कि वरुणदेव ने रुष्ट होकर उसके पिता पर आक्रमण किया है, जिसके कारण वे महोदर रोग से पीड़ित हो रहे हैं। रोहित नगर लौटने ही वाला था कि इन्द्र ने आकर उसे रोक लिया। इन्द्र ने कहा— 'बेटा रोहित! यज्ञपशु बनकर मरने की अपेक्षा तो पवित्र तीर्थ और क्षेत्रों का सेवन करते हुए पृथ्वी में विचरना ही अच्छा है।' इन्द्र की बात मानकर वह एक वर्ष तक और वन में रहा। इस प्रकार छह वर्षों तक रोहित वन में ही रहा। अन्ततः सातवें वर्ष जब वह नगर लौटने लगा, तब उसने अजीगर्त से उनके मझले पुत्र शुनःशेप को मोल लिया और उसे यज्ञपशु बनाने के लिये अपने पिता को सौंपकर उनके चरणों में नमस्कार किया।
मुक्तोदरोऽयजद् देवान् वरुणादीन् महत्कथः ।
विश्वामित्रोऽभवत् तस्मिन् होता चाध्वर्युरात्मवान् ॥
जमदग्निरभूद् ब्रह्मा वसिष्ठोऽयास्यसामगः ।
तस्मै तुष्टो ददाविन्द्रः शातकौम्भमयं रथम् ॥
देते ॥१९ ॥ इस प्रकार छः वर्षतक रोहित वनमें ही रहा । सातवें वर्ष जब वह अपने नगरको लौटने लगा, तब उसने अजीगर्तसे उनके मझले पुत्र शुनःशेपको मोल ले लिया और उसे यज्ञपशु बनानेके लिये अपने पिताको सौंपकर उनके चरणोंमें नमस्कार किया । तब परम यशस्वी एवं श्रेष्ठ चरित्रवाले राजा हरिश्चन्द्रने महोदर रोगसे छूटकर पुरुषमेध यज्ञद्वारा वरुण आदि देवताओंका यजन किया । उस यज्ञमें विश्वामित्रजी होता हुए। परम संयमी जमदग्निने अध्वर्युका काम किया । वसिष्ठजी ब्रह्मा बने और अयास्य मुनि सामगान करनेवाले उद्गाता बने । उस समय इन्द्रने प्रसन्न होकर हरिश्चन्द्रको एक सोनेका रथ दिया था ।
जब शुनःशेप घर आया, तब परम यशस्वी राजा हरिश्चन्द्र ने महोदर रोग से मुक्ति पाकर वरुण आदि देवताओं के लिए पुरुषमेध यज्ञ सम्पन्न किया। उस महान यज्ञ में विश्वामित्रजी उपस्थित थे और परम संयमी जमदग्नि ने अध्वर्यु का कार्य किया; वसिष्ठजी ब्रह्मा बने और अयास्य मुनि उद्गाता बने। इस अवसर पर इन्द्र ने प्रसन्न होकर हरिश्चन्द्र को एक सोने का रथ भी दिया।
त्रैशंकवो हरिश्चन्द्रो विश्वामित्रवसिष्ठयोः ।
यन्निमित्तमभूद् युद्धं पक्षिणोर्बहुवार्षिकम् ॥
यज्ञ के उपरान्त, राजा ने आत्मज्ञान की ओर कदम बढ़ाए। उन्होंने अपने मन को पृथ्वी में, पृथ्वी को जल में, जल को तेज में, तेज को वायु में और वायु को आकाश में स्थिर किया। फिर आकाश को अहङ्कार में लीन कर दिया। उसके पश्चात अहङ्कार को महत्तत्त्व में लीन करके उन्होंने ज्ञान-कला का ध्यान किया और उससे अपने अज्ञान को भस्म कर दिया। अन्त में, निर्वाण सुख की अनुभूति होने पर उन्होंने उस ज्ञान-कला का भी परित्याग कर दिया और समस्त बन्धनों से मुक्त होकर वे अपने उस स्वरूप में स्थित हो गए, जो न तो किसी प्रकार से बताया जा सकता है और न उसके सम्बन्ध में कोई अनुमान ही किया जा सकता है।
In English
The Story of King Harishchandra and his son Rohit
King Harishchandra receives a son named Rohit from Varuna, but delays the required animal sacrifice for the ritual. This causes Harishchandra to fall ill, leading Rohit to live in the forest for six years until he returns with Shunahshepa to serve as the sacrifice instead. After the ritual is completed, Harishchandra achieves spiritual liberation.
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