स्यमन्तकोपाख्यान : झूठे कलङ्क से मुक्ति हेतु किस आत्मिक त्याग की आवश्यकता होती है?
आत्म-निरीक्षण और निष्कपट समर्पण
श्रीमद्भागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · दशम स्कन्ध · अध्याय 56–57 · पृष्ठ 721–736
926 शब्द · 5 मिनटका पाठ · 8 श्लोक
श्रीशुक ने परीक्षित से कहा
परमार्थ प्राप्ति और कलङ्क निवारण हेतु
श्रीमद्भागवत महापुराण की कथा सुनते हुए राजा परीक्षित ने पूछा— "हे भगवन! सत्राजित् ने भगवान् श्रीकृष्ण का क्या अपराध किया था? उसे वह स्यमन्तकमणि कहाँ से मिली? और उसने अपनी कन्या उन्हें क्यों दी?"
सत्राजितः स्वतनयां कृष्णाय कृतकिल्बिषः ।
स्यमन्तकेन मणिना स्वयमुद्यम्य दत्तवान् ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! सत्राजित्ने श्रीकृष्णको झूठा कलंक लगाया था । फिर उस अपराधका मार्जन करनेके लिये उसने स्वयं स्यमन्तकमणि सहित अपनी कन्या सत्यभामा भगवान् श्रीकृष्णको सौंप दी ।
श्रीशुक जी बोले— द्वारका में एक बार जब सत्राजित् अपने समृद्ध घर में आया, तो उसके शुभागमन के उपलक्ष्य में मङ्गल-उत्सव मनाया जा रहा था। उसने ब्राह्मणों द्वारा स्यमन्तकमणि को एक देव-मन्दिर में स्थापित करा दिया था। वह मणि प्रतिदिन आठ भार सोना दिया करती थी और जहाँ वह पूजित होकर रहती थी, वहाँ दुर्भिक्ष, महामारी, ग्रहपीडा, सर्पभय या मानसिक-शारीरिक व्यथा जैसी कोई भी अशुभ घटना नहीं होती थी।
दुर्भिक्षमार्यरिष्टानि सर्पाधिव्याधयोऽशुभाः ।
न सन्ति मायिनस्तत्र यत्रास्तेऽभ्यर्चितो मणिः ॥
एक बार भगवान् श्रीकृष्ण ने प्रसङ्गवश कहा— 'सत्राजित्! तुम अपनी मणि राजा उग्रसेन को दे दो।' परन्तु वह इतना अर्थलोलुप और लोभी था कि उसने भगवान् की आज्ञा का उल्लङ्घन कर उसे अस्वीकार कर दिया। सत्राजित् ने तो यह भी कह दिया— 'बहुत सम्भव है श्रीकृष्ण ने ही मेरे भाई को मार डाला हो; क्योंकि वह मणि गले में डालकर वन में गया था।' जब श्रीकृष्ण ने सुना कि यह कलङ्क का टीका उनके सिर लगाया गया है, तब वे धो-बहाने के उद्देश्य से नगर के कुछ सभ्य पुरुषों को साथ लेकर प्रसेन को ढूँढ़ने के लिए वन में गए।
भगवांस्तदुपश्रुत्य दुर्यशो लिप्तमात्मनि ।
माटुं प्रसेनपदवीमन्वपद्यत नागरैः ॥
वहाँ खोजते-खोजते लोगों ने देखा कि घोर जङ्गल में एक सिंह ने प्रसेन और उसके घोड़े को मार डाला है। जब वे लोग सिंह के पैरों के चिह्न देखते हुए आगे बढ़े, तब उन्होंने यह भी देखा कि पर्वत पर एक रीछ ने सिंह को भी मार डाला है। वहाँ उन लोगों के बीच बाहुयुद्ध छिड़ गया। वे वज्र-प्रहार के समान कठोर घूँसों से आपस में अट्ठाईस दिन तक बिना विश्राम किए रात-दिन लड़ते रहे।
अन्त में, श्रीकृष्ण के घूँसों की चोट से जाम्बवान् के शरीर की एक-एक गाँठ टूट-फूट गई और उनका उत्साह समाप्त हो गया। तब उन्होंने विस्मित होकर भगवान् को पहचान लिया। कमलनयन श्रीकृष्ण ने अपने परम कल्याणकारी शीतल कर-कमल को उनके शरीर पर फेरा और प्रेम-गम्भीर वाणी से कहा— 'ऋक्षराज! हम मणि के लिये ही तुम्हारी इस गुफा में आये हैं। इस मणि के द्वारा मैं अपने ऊपर लगे झूठे कलङ्क को मिटाना चाहता हूँ।'
भगवान् के ये वचन सुनकर जाम्बवान् ने बड़े आनन्द से उनकी पूजा करने के लिये अपनी कन्या कुमारी जाम्बवती को मणि सहित उनके चरणों में समर्पित कर दिया। उधर, सत्राजित् दुखी होकर लोगों द्वारा भला-बुरा कहे जाने पर भगवान् की प्राप्ति के लिये महामाया दुर्गादेवी की शरण में गया और उनकी उपासना करने लगा। उसकी उपासना से प्रसन्न होकर देवी प्रकट हुईं और उसी समय श्रीकृष्ण अपनी पत्नी जाम्बवती और मणि के साथ सबको प्रसन्न करते हुए वहाँ उपस्थित हो गए।
आसीत् सत्राजितः सूर्यो भक्तस्य परमः सखा ।
प्रीतस्तस्मै मणिं प्रादात् सूर्यस्तुष्टः स्यमन्तकम् ॥
जब सभी द्वारकावासी भगवान् श्रीकृष्ण को पत्नी के साथ और गले में मणि धारण किए हुए देखकर लौटे, तो वे परमानन्द में मग्न हो गए, मानो कोई मरकर लौट आया हो। तदनन्तर भगवान् ने सत्राजित् को राजसभा में महाराज उग्रसेन के पास बुलवाया और जिस प्रकार मणि प्राप्त हुई थी, वह सब कथा सुनाकर वह मणि सत्राजित् को सौंप दी। सत्राजित् अत्यन्त लज्जित हो गया; उसने मणि तो ले ली, परन्तु उसका मुँह नीचे की ओर लटक गया। अपने अपराध पर उसे बड़ा पश्चात्ताप हो रहा था और वह किसी तरह अपने घर पहुँचा।
स चातिव्रीडितो रत्नं गृहीत्वावाङ्मुखस्ततः ।
अनुतप्यमानो भवनमगमत् स्वेन पाप्मना ॥
तदनन्तर भगवान्ने सत्राजित्को राजसभामें महाराज उग्रसेनके पास बुलवाया और जिस प्रकार मणि प्राप्त हुई थी, वह सब कथा सुनाकर उन्होंने वह मणि सत्राजित्को सौंप दी ॥३८ ॥ सत्राजित् अत्यन्त लज्जित हो गया । मणि तो उसने ले ली, परन्तु उसका मुँह नीचेकी ओर लटक गया । अपने अपराधपर उसे बड़ा पश्चात्ताप हो रहा था, किसी प्रकार वह अपने घर पहुँचा ।
श्रीमद्भागवत महापुराण के इस पावन प्रसङ्ग को श्रीशुकदेव जी महाराज राजा परीक्षित को सुना रहे हैं।
सत्राजित् ने अपने अपराध के निवारण हेतु अपनी सुन्दरी पुत्री सत्यभामा और स्यमन्तकमणि श्रीकृष्ण को सौंप दी। सत्राजित् ने श्रीकृष्ण पर झूठा कलङ्क लगाया था, जिसे दूर करने के लिए उसने यह त्याग किया। श्रीकृष्ण ने उसे समझाते हुए कहा— ‘हम स्यमन्तकमणि न लेंगे। आप सूर्य भगवान के भक्त हैं, इसलिये वह आपके ही पास रहे। हम तो केवल उसके फल के, अर्थात् उससे निकले हुए सोने के अधिकारी हैं। वही आप हमें दे दिया करें।’
किन्तु नियति का खेल देखिए, इस बीच एक महादुष्ट का उदय हुआ। अक्रूर और कृतवर्मा के बहकावे में आकर शतधन्वा नामक पापी ने लोभवश सोते हुए सत्राजित् की हत्या कर दी और मणि लेकर वहाँ से भाग निकला। वह हत्यारा था, जिसकी मृत्यु उसके सिर पर नाच रही थी। जब वह भागा, तो वह चार सौ कोस तक चलने वाले घोड़े पर सवार होकर बड़ी फुर्ती से निकल गया।
अक्रूरे प्रोषितेऽरिष्टान्यासन् वै द्वारकौकसाम् ।
शारीरा मानसास्तापा मुहुर्दैविकभौतिकाः ॥
इत्यंगोपदिशन्त्येके विस्मृत्य प्रागुदाहृतम् ।
मुनिवासनिवासे किं घटेतारिष्टदर्शनम् ॥
जब उन्होंने सुना कि भगवान् श्रीकृष्णने शतधन्वाको मार डाला है, तब वे अत्यन्त भयभीत होकर द्वारकासे भाग खड़े हुए ॥ २९ ॥ परीक्षित्! कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि अक्रूरके द्वारकासे चले जानेपर द्वारकावासियोंको बहुत प्रकारके अनिष्टों और अरिष्टोंका सामना करना पड़ा । दैविक और भौतिक निमित्तोंसे बार- बार वहाँके नागरिकोंको शारीरिक और मानसिक कष्ट सहना पड़ा । परन्तु जो लोग ऐसा कहते हैं, वे पहले कही हुई बातोंको भूल जाते हैं । भला, यह भी कभी सम्भव है कि जिन भगवान् श्रीकृष्णमें समस्त ऋषि - मुनि निवास करते हैं, उनके निवासस्थान द्वारकामें उनके रहते कोई उपद्रव खड़ा हो जाय ।
श्रीकृष्ण ने उस अपराधी का पीछा किया। मिथिलापुरी के निकट एक उपवन में शतधन्वा का घोड़ा गिर पड़ा और वह डर के मारे पैदल ही भागने लगा। वह अत्यन्त भयभीत था। भगवान श्रीकृष्ण भी क्रोधित होकर उसके पीछे दौड़े। जब शतधन्वा पैदल भाग रहा था, तब भगवान ने भी पैदल दौड़कर अपने तीक्ष्ण धार वाले चक्र से उसका सिर उतार लिया। इसके पश्चात श्रीकृष्ण ने उसके वस्त्रों में स्यमन्तकमणि को ढूँढा, परन्तु मणि वहाँ नहीं थी।
थके हुए और व्याकुल होकर श्रीकृष्ण बलरामजी के पास आए और कहा— 'हमने शतधन्वा को व्यर्थ ही मारा, क्योंकि उसके पास स्यमन्तकमणि तो है ही नहीं।' इस समाचार को सुनकर द्वारकावासी भयभीत होकर भाग खड़े हुए। जब श्रीकृष्ण द्वारका लौटे, तो उन्होंने अपने भाई-बन्धुओं के साथ मिलकर सत्राजित् की वे और्ध्वदैहिक क्रियाएँ करवाईं, जिनसे मृतक प्राणी का परलोक सुधरता है।
भीष्मं कृपं सविदुरं गान्धारीं द्रोणमेव च ।
तुल्यदुःखौ च संगम्य हा कष्टमिति होचतुः ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! यद्यपि भगवान् श्रीकृष्णको इस बातका पता था कि लाक्षागृहकी आगसे पाण्डवोंका बाल भी बाँका नहीं हुआ है, तथापि जब उन्होंने सुना कि कुन्ती और पाण्डव जल मरे, तब उस समयका कुल परम्परोचित व्यवहार करनेके लिये वे बलरामजीके साथ हस्तिनापुर गये || १ || वहाँ जाकर भीष्मपितामह, कृपाचार्य, विदुर, गान्धारी और द्रोणाचार्यसे मिलकर उनके साथ समवेदना- सहानुभूति प्रकट की और उन लोगोंसे कहने लगे — ‘ हाय- हाय! यह तो बड़े ही दुःखकी बात हुई '
तदुपरान्त श्रीकृष्ण ने अक्रूरजी को बुलाकर उनसे वह मणि प्राप्त की जो शतधन्वा छोड़ गया था। श्रीकृष्ण ने कहा— ‘हे महाभाग्यवान अक्रूरजी! आप वह मणि दिखाकर हमारे इष्ट-मित्र बलरामजी, सत्यभामा और जाम्बवती का सन्देह दूर कर दीजिए और उनके हृदय में शान्ति का सञ्चार कीजिए।’
यस्त्वेतद् भगवत ईश्वरस्य विष्णो- र्वीर्याढ्यं वृजिनहरं सुमंगलं च ।
आख्यानं पठति शृणोत्यनुस्मरेद् वा दुष्कीर्तिं दुरितमपोह्य याति शान्तिम् ॥
सर्वशक्तिमान् सर्वव्यापक भगवान् श्रीकृष्णके पराक्रमोंसे परिपूर्ण यह आख्यान समस्त पापों, अपराधों और कलंकोंका मार्जन करनेवाला तथा परम मंगलमय है । जो इसे पढ़ता, सुनता अथवा स्मरण करता है, वह सब प्रकारकी अपकीर्ति और पापोंसे छूटकर शान्तिका अनुभव करता है ।
जब श्रीकृष्ण ने इस प्रकार सान्त्वना देकर उन्हें समझाया, तब अक्रूरजी ने वस्त्र में लपेटी हुई सूर्य के समान प्रकाशमान वह मणि निकाली और श्रीकृष्ण को दे दी। भगवान श्रीकृष्ण ने उस स्यमन्तकमणि को अपने जाति-भाइयों को दिखाकर अपना कलङ्क दूर किया और उसे अपने पास रखने में समर्थ होने पर भी पुनः अक्रूरजी को लौटा दिया।
In English
The Story of Satrajit and the Syamantaka Gem
Satrajit owns a powerful gem called Syamantaka, but he accuses Krishna of stealing it after his brother Prasen disappears. Krishna finds the gem in a cave held by Jambavan, marries Jambavati, and returns the jewel to Satrajit, who later gives him his daughter Satyabhama. After Satrajit is killed by Shatadhnu for the gem, Krishna recovers the jewel from Akrura.
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