Author name: Dwaipayan Pradhan

पुराणोंके लक्षण – श्रीमद्भागवतम् द्वादश स्कन्ध

।।श्रीहरिः।। अथ सप्तमोऽध्याय: अथर्ववेदकी शाखाएँ और पुराणोंके लक्षण सूत उवाच अथर्ववित् सुमन्तुश्च शिष्यमध्यापयत् स्वकाम् ।संहितां सोऽपि पथ्याय वेददर्शाय चोक्तवान् ।।१शौक्लायनिर्ब्रह्मबलिर्मोदोषः पिप्पलायनिः ।वेददर्शस्य शिष्यास्ते पथ्यशिष्यानथो शृणु ।।२कुमुदः शुनको ब्रह्मन् जाजलिश्चाप्यथर्ववित् ।बभ्रुः शिष्योऽथांगिरसः सैन्धवायन एव च ।अधीयेतां संहिते द्वे सावर्ण्याद्यास्तथापरे ।।३नक्षत्रकल्पः शान्तिश्च कश्यपांगिरसादयः ।एते आथर्वणाचार्याः शृणु पौराणिकान् मुने ।।४त्रय्यारुणिः कश्यपश्च सावर्णिरकृतव्रणः ।वैशम्पायन हारीतौ षड् वै पौराणिका इमे […]

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विचारशून्यता

ॐ इन्द्रं॑ मि॒त्रं वरु॑णम॒ग्निमा॑हु॒रथो॑ दि॒व्यः स सु॑प॒र्णो ग॒रुत्मा॑न् ।एकं॒ सद्विप्रा॑ बहु॒धा व॑दन्त्य॒ग्निं य॒मं मा॑त॒रिश्वा॑नमाहुः ॥ ऋग्वेदः १-१६४-४६ ॥ वही एक आदित्य (सूर्य) के महिमाओं को जाननेवाले इन्द्र (सबका ईन्धन), मित्र (विपरीत – द्वन्द – के माध्यम से हितसाधन करनेवाला), वरुण (सङ्कुचित कर सबका संहति करनेवाला), सुपर्ण (अन्तरिक्षमें गतिशील रश्मी – cosmic rays), अग्नि (सवका प्रेरक),

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पदार्थधर्मसंग्रह का विज्ञान – Corrections to the Standard Model

पदार्थधर्मसंग्रह का विज्ञान – मानक प्रतिरूप का त्रुटी दर्शन तथा संशोधन । – श्रीवासुदेव मिश्र। आधुनिक विज्ञानमें क्वांटम क्रोमो-डायनेमिक्स (Quantum Chromo-Dynamics or QCD), मानक प्रतिरूप (Standard Model) का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण और जटिल सिद्धान्त है । मानक प्रतिरूप आधुनिक विज्ञानका श्रेष्ठतम कृतियों में से एक माना जाता है, जो कि सत्य नहीं है ।

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स्वर्ग क्या है ? What is swarga?

स्वर्ग क्या है ? WHAT ARE HEAVEN AND HELL? – Shri Basudeba Mishra What is heaven – SWARGAH (स्वर्गः)? There is no proof that heaven is a material place where God resides. In fact, the term God (देवाः – दिव्यत्येनेनेति, दिवुँ क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुतिमोदमदस्वप्नकान्तिग॒तिषु॑) is not understood properly. It is not a Superman or Super being, as

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गुरुतत्त्वम् ।

– श्रीवासुदेव मिश्र। ॐ सहनाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै ।तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।। गुरु शब्द गॄ नि॒गर॑णे, गॄ वि॒ज्ञाने॑ तथा गॄ शब्दे॑ धातु से निष्पन्न होता है । गिरत्यज्ञानं – अज्ञान का नाश कर, गृणात्युपदिशति धर्म्मं – धर्म-अधर्म को परिभाषित कर विज्ञान (विशिष्ट ज्ञान) का उपदेश करना, तथा गीर्य्यते स्तूयते वा कर्म्माणि – नाम-रूप-कर्म-बान्धवः (स्नेहेन बध्नाति यः – interaction partner)

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