Author name: Dwaipayan Pradhan

The science of Swarg – वैदिक देव स्वर्गों का विज्ञान

– ईशोपनिषद विज्ञान भाष्य भाग २, पण्डित मोतीलाल शर्म्मा Vaidika science behind the concept of Swarga (swarg). “सप्त वै देवस्वर्गाः” के अनुसार देवस्वर्ग सात भागों में विभक्त हैं। इन सातों देवस्वर्गों की प्रतिष्ठा सूर्य ही है, अतएव सूर्य के लिए- “मध्ये ह संवत्सरस्य स्वर्गो लोकः” (शत. ६ |७|४| ११ ), “स्वर्गो वै लोकः सूर्यो ज्योतिरुत्तमम् […]

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EQUALITY OF SEXES IS MEANINGLESS

शम्भुस्वयम्भुहरयो हरिणेक्षणानां येनाक्रियन्त सततं गृहकुम्भदासाः ।वाचामगोचरचरित्रविचित्रितायतस्मै नमो भगवते मकरध्वजाय । शृङ्गारशतकम् । शम्भु – शिव, महादेव । स्वयम्भु – ब्रह्मा । हरि – विष्णु । हरिणेक्षणा – हरिणवत् मनोहर लोचना पार्वती, सरस्वती, श्री देवी । गृहकुम्भदासाः – गृह कुम्भ जल भारवाहक भृत्य – दास । सततम् – निरन्तरक्रिया, उसके पर्याय । जिसने शिव, ब्रह्मा, विष्णु

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दर्शपूर्णमास का व्यापक विज्ञान

जब तक यह पृथक् पृथक् रहे, तबतक इनकी विश्वनिर्माण सम्बन्धिनी कामना पूरी न हुई । फलतः इन्होंने विचार किया कि ऐसे काम नहीं चल सकता । अपने को परस्पर में मिलकर सृष्टिनिर्माण करना चाहिए। ऐसा ही हुआ । पाञ्चों मिल गये ! मिलने से कामना पूरी होगई । इन की समष्टि कर्मपूर्ति का हेतु बनी, अतएव यह यज्ञ ‘काम’ नाम से प्रसिद्ध हुआ । यही यज्ञ यज्ञ विज्ञानपरिभाषा के अनुसार आगे जाकर ‘दर्शपूर्णमास’ नाम से व्यवहृत हुआ ।

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“ञ” का साधु उच्चारण

“ञ” तालव्य वर्ण है।मुखगुहा में ऊपरी दन्तमूल (दाँतों की जड़ों) के किञ्चित् पीछे का स्थान “तालु” है। इसकी सहायता से उच्चरित वर्ण “तालव्य” कहलाते हैं।इचुयशास्तालव्या:।अर्थात् इ, च-वर्ग, य तथा श तालव्य हैं।अत: इन्हीं की सहायता से “ञ” का उच्चारण किया जा सकता है।

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माया के स्वरूप और भेद – भाग ६

ब्रह्म ह वा इदमग्र असीत् स्ययंभ्वेकमेव । ….. तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य संतप्तस्य ललाटे स्नेहो यदार्द्रमाजायत । तेनानन्दत्तद्ब्रवीन्महद्वै यक्षं सुवेदमविदामह इति । तद्यदब्रवीन्महद्वै यक्षं सुवेदमविदामह इति तस्मात्सुवेदो ऽभवत्तं वा एतं सुवेदं सन्तं स्वेदइत्याचक्षते परोक्षेण … । गोपथब्राह्मणम् । उस स्ययम्भू ब्रह्मने जब सृष्टिकाम हुआ, तो क्रिया की उत्पत्ति हुई । क्रियासे ताप सृष्टि हुआ । अग्नेरापः

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