श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1031–1040

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1031–1040

पृष्ठ 1031

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भ्रातृत्वं त्वं पुरस्कृत्य वरं वरय भारत ।

यदि तावन्मया क्षुद्रा गत्वा वारणसाह्वयम् ॥ ९ ॥

धार्तराष्ट्रा निहन्तव्या यावदेतत् करोम्यहम् ।

शिलया नगरं वापि मर्दितव्यं मया यदि ॥ १० ॥

बद्ध्वा दुर्योधनं चाद्य आनयामि तवान्तिकम् ।

यावदेतत् करोम्यद्य कामं तव महाबल ॥ ११ ॥

' भारत! तुम मुझे अपना बड़ा भाई समझकर कोई वर माँगो । यदि तुम्हारी इच्छा हो कि मैं हस्तिनापुरमें जाकर तुच्छ धृतराष्ट्र- पुत्रोंको मार डालूँ तो मैं यह भी कर सकता हूँ अथवा यदि तुम चाहो कि मैं पत्थरोंकी वर्षासे सारे नगरको रौंदकर धूलमें मिला दूँ अथवा दुर्योधनको बाँधकर अभी तुम्हारे पास ला दूँ तो यह भी कर सकता हूँ । महाबली वीर! तुम्हारी जो इच्छा हो, वही पूर्ण कर दूँगा' ॥ ९ –११ ॥ वैशम्पायन उवाच

भीमसेनस्तु तद् वाक्यं श्रुत्वा तस्य महात्मनः ।

प्रत्युवाच हनूमन्तं प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ १२ ॥

कृतमेव त्वया सर्वं मम वानरपुङ्गव ।

स्वस्ति तेऽस्तु महाबाहो कामये त्वां प्रसीद मे ॥ १३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! महात्मा हनुमान्जीका यह वचन सुनकर भीमसेनने हर्षोल्लासपूर्ण हृदयसे हनुमानजीको इस प्रकार उत्तर दिया – ‘ वानरशिरोमणे! आपने मेरा यह सब कार्य कर दिया । आपका कल्याण हो । महाबाहो! अब आपसे मेरी इतनी ही कामना है कि आप मुझपर प्रसन्न रहिये – मुझपर आपकी कृपा बनी रहे ॥ १२-१३ ॥ सनाथाः पाण्डवाः सर्वे त्वया नाथेन वीर्यवन् तवैव तेजसा सर्वान् विजेष्यामो वयं परान् ॥ १४ ॥

‘ शक्तिशाली वीर! आप जैसे नाथ ( संरक्षक ) को पाकर सब पाण्डव सनाथ हो गये ।

आपके ही प्रभावसे हमलोग अपने सब शत्रुओंको जीत लेंगे' ॥ १४ ॥

एवमुक्तस्तु हनुमान् भीमसेनमभाषत ।

भ्रातृत्वात् सौहृदाच्चैव करिष्यामि प्रियं तव ॥ १५ ॥

भीमसेनके ऐसा कहनेपर हनुमानजीने उनसे कहा– ' तुम मेरे भाई और सुहृद् हो, इसलिये मैं तुम्हारा प्रिय अवश्य करूँगा' ॥ १५ ॥

चमूं विगाह्य शत्रूणां शरशक्तिसमाकुलाम् ।

यदा सिंहरवं वीर करिष्यसि महाबल ॥ १६ ॥

तदाहं बृंहयिष्यामि स्वरवेण रवं तव ।

पृष्ठ 1032

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विजयस्य ध्वजस्थश्च नादान् मोक्ष्यामि दारुणान् ॥ १७ ॥

शत्रूणां ये प्राणहराः सुखं येन हनिष्यथ ।

एवमाभाष्य हनुमांस्तदा पाण्डवनन्दनम् ॥ १८ ॥

मार्गमाख्याय भीमाय तत्रैवान्तरधीयत ॥ १ ९ ॥

‘ महाबली वीर! जब तुम बाण और शक्तिके आघातसे व्याकुल हुई शत्रुओंकी सेनामें घुसकर सिंहनाद करोगे, उस समय मैं अपनी गर्जनासे तुम्हारे उस सिंहनादको और बढ़ा दूँगा । उसके सिवा अर्जुनकी ध्वजापर बैठकर मैं ऐसी भीषण गर्जना करूँगा, जो शत्रुओंके प्राणोंको हरनेवाली होगी, जिससे तुमलोग उन्हें सुगमतासे मार सकोगे । ' पाण्डवोंका आनन्द बढ़ानेवाले भीमसेनसे ऐसा कहकर हनुमानजीने उन्हें जानेके लिये मार्ग बता दिया और स्वयं वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ १६ – १ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गन्धमादनप्रवेशे हनुमद्भीमसंवादे एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५१ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें गन्धमादन पर्वतपर हनुमान्जी और भीमसेनका संवादविषयक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५१ ॥

पृष्ठ 1033

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द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः भीमसेनका सौगन्धिक वनमें पहुँचना वैशम्पायन उवाच

गते तस्मिन् हरिवरे भीमोऽपि बलिनां वरः ।

तेन मार्गेण विपुलं व्यचरद् गन्धमादनम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! उन कपिप्रवर हनुमान्जीके चले जानेपर बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमसेन भी उनके बताये हुए मार्गसे विशाल गन्धमादन पर्वतपर विचरने लगे ॥ १ ॥

अनुस्मरन् वपुस्तस्य श्रियं चाप्रतिमां भुवि ।

माहात्म्यमनुभावं च स्मरन् दाशरथेर्ययौ ॥ २ ॥

मार्गमें वे हनुमान्जीके उस अद्भुत विशाल विग्रह और अनुपम शोभाका तथा दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजीके अलौकिक माहात्म्य एवं प्रभावका बारंबार स्मरण करते जाते थे ॥ २ ॥

स तानि रमणीयानि वनान्युपवनानि च ।

विलोकयामास तदा सौगन्धिकवनेप्सया ॥ ३ ॥

फुल्लद्रुमविचित्राणि सरांसि सरितस्तथा ।

नानाकुसुमचित्राणि पुष्पितानि वनानि च ॥ ४ ॥

सौगन्धिक वनको प्राप्त करनेकी इच्छासे उन्होंने उस समय वहाँके सभी रमणीय वनों और उपवनोंका अवलोकन किया । विकसित वृक्षोंके कारण विचित्र शोभा धारण करनेवाले कितने ही सरोवर और सरिताओंपर दृष्टिपात किया तथा अनेक प्रकारके कुसुमोंसे अद्भुत प्रतीत होनेवाले खिले फूलोंसे युक्त काननोंका भी निरीक्षण किया ॥ ३-४ ॥

मत्तवारणयूथानि पङ्कक्लिन्नानि भारत ।

वर्षतामिव मेघानां वृन्दानि ददृशे तदा ॥ ५ ॥

भारत! उस समय बहते हुए मदके पंकसे भीगे मतवाले गजराजोंके अनेकानेक यूथ वर्षा करनेवाले मेघोंके समूहके समान दिखलायी देते थे ॥ ५ ॥

हरिणैश्चपलापाङ्गैर्हरिणीसहितैर्वनम् ।

सशष्पकवलैः श्रीमान् पथि दृष्ट्वा द्रुतं ययौ ॥ ६ ॥

शोभाशाली भीमसेन मुँहमें हरी घासका कौर लिये हुए चंचल नेत्रोंवाले हरिणों और हरिणियोंसे युक्त उस वनकी शोभा देखते हुए बड़े वेगसे चले जा रहे थे ॥ ६ ॥

महिषैश्च वराहैश्च शार्दूलैश्च निषेवितम् ।

व्यपेतभीर्गिरिं शौर्याद् भीमसेनो व्यगाहत ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1034

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उन्होंने अपनी अद्भुत शूरतासे निर्भय होकर भैंसों, वराहों और सिंहोंसे सेवित गहन वनमें प्रवेश किया ॥ ७ ॥

कुसुमानन्तगन्धैश्च ताम्रपल्लवकोमलैः ।

याच्यमान इवारण्ये द्रुमैर्मारुतकम्पितैः ॥ ८ ॥

फूलोंकी अनन्त सुगन्धसे वासित तथा लाल- लाल पल्लवोंके कारण कोमल प्रतीत होनेवाले वृक्ष हवाके वेगसे हिल-हिलकर मानो उस वनमें भीमसेनसे याचना कर रहे थे ॥ ८ ॥

कृतपद्माञ्जलिपुटा मत्तषट्पदसेविताः ।

प्रियतीर्थवना मार्गे पद्मिनीः समतिक्रमन् ॥ ९ ॥

मार्गमें उन्हें अनेक ऐसी पुष्करिणियोंको लाँघना पड़ा, जिनके घाट और वन देखनेमें बहुत प्रिय लगते थे । मतवाले भ्रमर उनका सेवन करते थे तथा वे सम्पुटित कमलकोषोंसे अलंकृत हो ऐसी जान पड़ती थीं, मानो उन्होंने कमलोंकी अंजलि बाँध रखी थी ॥ ९ ॥

मज्जमानमनोदृष्टिः फुल्लेषु गिरिसानुषु ।

द्रौपदीवाक्यपाथेयो भीमः शीघ्रतरं ययौ ॥ १० ॥

भीमसेनका मन और उनके नेत्र कुसुमोंसे अलंकृत पर्वतीय शिखरोंपर लगे थे । द्रौपदीका अनुरोधपूर्ण वचन ही उनके लिये पाथेय था और इस अवस्थामें वे अत्यन्त शीघ्रतापूर्वक चले जा रहे थे ॥ १० ॥

परिवृत्तेऽहनि ततः प्रकीर्णहरिणे वने ।

काञ्चनैर्विमलैः पद्मैर्ददर्श विपुलां नदीम् ॥ ११ ॥

दिन बीतते - बीतते भीमसेनने एक वनमें जहाँ चारों ओर बहुत - से हरिण विचर रहे थे, सुन्दर सुवर्णमय कमलोंसे सुशोभित विशाल नदी देखी ॥ ११ ॥

हंसकारण्डवयुतां चक्रवाकोपशोभिताम् ।

रचितामिव तस्याद्रेर्मालां विमलपङ्कजाम् ॥ १२ ॥

उसमें हंस और कारण्डव आदि जलपक्षी निवास करते थे । चक्रवाक उसकी शोभा बढ़ाते थे । वह नदी क्या थी उस पर्वतके लिये स्वच्छ सुन्दर कमलोंकी माला- सी रची गयी थी ॥ १२ ॥

तस्यां नद्यां महासत्त्वः सौगन्धिकवनं महत् ।

अपश्यत् प्रीतिजननं बालार्कसदृशद्युति ॥ १३ ।

महान् धैर्य और उत्साहसे सम्पन्न वीरवर भीमसेनने उसी नदीमें विशाल सौगन्धिक वन देखा, जो उनकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला था । उस वनमें प्रभातकालीन सूर्यकी भाँति प्रभा फैल रही थी ॥ १३ ॥

तद् दृष्ट्वा लब्धकामः स मनसा पाण्डुनन्दनः ।

वनवासपरिक्लिष्टां जगाम मनसा प्रियाम् ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1035

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उस वनको देखकर पाण्डुनन्दन भीमने मन- ही - मन यह अनुभव किया कि मेरा मनोरथ पूर्ण हो गया । फिर उन्हें वनवासके क्लेशोंसे पीड़ित अपनी प्रियतमा द्रौपदीकी याद आ गयी ॥ १४ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौगन्धिकाहरणे द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५२ ॥

इस प्रकारश्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें सौगन्धिक कमलको लानेसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५२ ॥

पृष्ठ 1036

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त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः क्रोधवश नामक राक्षसोंका भीमसेनसे सरोवरके निकट आनेका कारण पूछना वैशम्पायन उवाच

स गत्वा नलिनीं रम्यां राक्षसैरभिरक्षिताम् ।

कैलासशिखराभ्याशे ददर्श शुभकाननाम् ॥ १ ॥

कुबेरभवनाभ्याशे जातां पर्वतनिर्झरैः ।

सुरम्यां विपुलच्छायां नानाद्रुमलताकुलाम् ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! इस प्रकार आगे बढ़नेपर भीमसेनने कैलास पर्वतके निकट कुबेरभवनके समीप एक रमणीय सरोवर देखा, जिसके आस - पास सुन्दर वनस्थली शोभा पा रही थी । बहुत- से राक्षस उसकी रक्षाके लिये नियुक्त थे । वह सरोवर पर्वतीय झरनोंके जलसे भरा था । वह देखनेमें बहुत ही सुन्दर, घनी छायासे सुशोभित तथा अनेक प्रकारके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त था ॥ १-२ ॥

हरिताम्बुजसंच्छन्नां दिव्यां कनकपुष्कराम् ।

नानापक्षिजनाकीर्णां सूपतीर्थामकर्दमाम् ॥ ३ ॥

हरे रंगके कमलोंसे वह दिव्य सरोवर ढका हुआ था । उसमें सुवर्णमय कमल खिले थे । वह नाना प्रकारके पक्षियोंसे युक्त था । उसका किनारा बहुत सुन्दर था और उसमें कीचड़

नहीं था ॥। ३ ॥

अतीवरम्यां सुजलां जातां पर्वतसानुषु ।

विचित्रभूतां लोकस्य शुभामद्भुतदर्शनाम् ॥ ४ ॥

वह सरोवर अत्यन्त रमणीय, सुन्दर जलसे परिपूर्ण, पर्वतीय शिखरोंके झरनोंसे उत्पन्न, देखनेमें विचित्र, लोकके लिये मंगलकारक तथा अद्भुत दृश्यसे सुशोभित था ॥ ४ ॥

तत्रामृतरसं शीतं लघु कुन्तीसुतः शुभम् ।

ददर्श विमलं तोयं पिबंश्च बहु पाण्डवः ॥ ५ ॥

उस सरोवरमें कुन्तीकुमार पाण्डुपुत्र भीमने अमृतके समान स्वादिष्ट, शीतल, हलका, शुभकारक और निर्मल जल देखा तथा उसे भरपेट पीया ॥ ५ ॥

तां तु पुष्करिणीं रम्यां दिव्यसौगन्धिकावृताम् ।

जातरूपमयैः पद्मैश्छन्नां परमगन्धिभिः ॥ ६ ॥

वैदूर्यवरनालैश्च बहुचित्रैर्मनोरमैः ।

हंसकारण्डवोद्भूतैः सृजद्भिरमलं रजः ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1037

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वह सरोवर दिव्य सौगन्धिक कमलोंसे आवृत तथा रमणीय था । परम सुगन्धित सुवर्णमय कमल उसे ढँके हुए थे । उन कमलोंकी नाल उत्तम वैदूर्यमणिमय थी । वे कमल देखनेमें अत्यन्त विचित्र और मनोरम थे । हंस और कारण्डव आदि पक्षी उन कमलोंको हिलाते रहते थे, जिससे वे निर्मल पराग प्रकट किया करते थे ॥ ६-७ ॥

आक्रीडं राजराजस्य कुबेरस्य महात्मनः ।

गन्धर्वैरप्सरोभिश्च देवैश्च परमार्चिताम् ॥ ८ ॥

वह सरोवर राजाधिराज महाबुद्धिमान् कुबेरका क्रीडास्थल था । गन्धर्व, अप्सरा और देवता भी उसकी बड़ी प्रशंसा करते थे ॥ ८ ॥

सेवितामृषिभिर्दिव्यैर्यक्षैः किम्पुरुषैस्तथा ।

राक्षसैः किन्नरैश्चापि गुप्तां वैश्रवणेन च ॥ ९ ॥

दिव्य ऋषि- मुनि, यक्ष, किम्पुरुष, राक्षस और किन्नर उसका सेवन करते थे तथा साक्षात् कुबेरके द्वारा उसके संरक्षणकी व्यवस्था की जाती थी ॥ ९ ॥

तां च दृष्ट्वैव कौन्तेयो भीमसेनो महाबलः ।

बभूव परमप्रीतो दिव्यं सम्प्रेक्ष्य तत् सरः ॥ १० ॥

कुन्तीनन्दन महाबली भीमसेन उस दिव्य सरोवरको देखते ही अत्यन्त प्रसन्न हो गये ॥ १० ॥

तच्च क्रोधवशा नाम राक्षसा राजशासनात् ।

रक्षन्ति शतसाहस्राश्चित्रायुधपरिच्छदाः ॥ ११ ॥

महाराज कुबेरके आदेशसे क्रोधवश नामक राक्षस, जिनकी संख्या एक लाख थी, विचित्र आयुध और वेशभूषासे सुसज्जित हो उसकी रक्षा करते थे ॥ ११ ॥

ते तु दृष्ट्वैव कौन्तेयमजिनैः प्रतिवासितम् ।

रुक्माङ्गदधरं वीरं भीमं भीमपराक्रमम् ॥ १२ ॥

सायुधं बद्धनिस्त्रिंशमशङ्कितमरिंदमम् ।

पुष्करेप्सुमुपायान्तमन्योन्यमभिचुक्रुशुः ॥ १३ ॥

उस समय भयानक पराक्रमी कुन्तीकुमार वीरवर भीम अपने अंगोंमें मृगचर्म लपेटे हुए थे । भुजाओंमें सोनेके अंगद ( बाजूबंद ) पहन रखे थे । वे धनुष और गदा आदि आयुधोंसे युक्त थे । उन्होंने कमरमें तलवार बाँध रखी थी । वे शत्रुओंका दमन करनेमें समर्थ और निर्भीक थे । उन्हें कमल लेनेकी इच्छासे वहाँ आते देख वे पहरा देनेवाले राक्षस आपसमें कोलाहल करने लगे ॥

अयं पुरुषशार्दूलः सायुधोऽजिनसंवृतः ।

यच्चिकीर्षुरिह प्राप्तस्तत् सम्प्रष्टुमिहार्हथ ॥ १४ ॥

उनमें परस्पर इस प्रकार बातचीत हुई— 'देखो, यह नरश्रेष्ठ मृगचर्मसे आच्छादित होनेपर भी हाथमें आयुध लिये हुए है। यह यहाँ जिस कार्यके लिये आया है, उसे

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पूछो' ॥ १४ ॥

ततः सर्वे महाबाहुं समासाद्य वृकोदरम् ।

तेजोयुक्तमपृच्छन्त कस्त्वमाख्यातुमर्हसि ॥ १५ ॥

तब वे सब राक्षस परम तेजस्वी महाबाहु भीमसेनके पास आकर पूछने लगे — ' तुम कौन हो? ' यह बताओ ॥

मुनिवेषधरश्चैव सायुधश्चैव लक्ष्यसे ।

यदर्थमभिसम्प्राप्तस्तदाचक्ष्व महामते ॥ १६ ॥

' महामते! तुमने वेष तो मुनियोंका-सा धारण कर रखा है; परंतु आयुधोंसे सम्पन्न दिखायी देते हो । तुम किसलिये यहाँ आये हो? ' बताओ ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौगन्धिकाहरणे त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें सौगन्धिकाहरणविषयक एक सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५३ ॥

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चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः भीमसेनके द्वारा क्रोधवश नामक राक्षसोंकी पराजय और द्रौपदीके लिये सौगन्धिक कमलोंका संग्रह करना भीमउवाच

पाण्डवो भीमसेनोऽहं धर्मराजादनन्तरः ।

विशालां बदरीं प्राप्तो भ्रातृभिः सह राक्षसाः ॥ १ ॥

अपश्यत् तत्र पाञ्चाली सौगन्धिकमनुत्तमम् ।

अनिलोढमितो नूनं सा बहूनि परीप्सति ॥ २ ॥

भीमसेन बोले- राक्षसो! मैं धर्मराज युधिष्ठिरका छोटा भाई पाण्डुपुत्र भीमसेन हूँ और भाइयोंके विशाला बदरी नामक तीर्थमें आकर ठहरा हूँ। वहाँ पाञ्चालराजकुमारी द्रौपदीने सौगन्धिक नामक एक परम उत्तम कमल देखा । उसे देखकर वह उसी तरहके और भी बहुत- से पुष्प प्राप्त करना चाहती है, जो निश्चय ही यहींसे हवामें उड़कर वहाँ पहुँचा होगा ॥ १-२ ॥

तस्या मामनवद्याङ्गया धर्मपत्न्याः प्रिये स्थितम् ।

पुष्पाहारमिह प्राप्तं निबोधत निशाचराः ॥ ३ ॥

निशाचरो! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि मैं उसी अनिन्द्य सुन्दरी धर्मपत्नीका प्रिय मनोरथ पूर्ण करनेके लिये उद्यत हो बहुत -से सौगन्धिक पुष्पोंका अपहरण करनेके लिये ही यहाँ आया हूँ ॥ ३ ॥

राक्षसा ऊचुः

आक्रीडोऽयं कुबेरस्य दयितः पुरुषर्षभ ।

नेह शक्यं मनुष्येण विहर्तुं मर्त्यधर्मणा ॥ ४ ॥

राक्षसोंने कहा— नरश्रेष्ठ! यह सरोवर कुबेरकी परम प्रिय क्रीडास्थली है । इसमें मरणधर्मा मनुष्य विहार नहीं कर सकता ॥ ४ ॥

देवर्षयस्तथा यक्षा देवाश्चात्र वृकोदर ।

आमन्त्र्य यक्षप्रवरं पिबन्ति रमयन्ति च ।

गन्धर्वाप्सरसश्चैव विहरन्त्यत्र पाण्डव ॥ ५ ॥

वृकोदर! देवर्षि, यक्ष तथा देवता भी यक्षराज कुबेरकी अनुमति लेकर ही यहाँका जल पीते और इसमें विहार करते हैं । पाण्डुनन्दन! गन्धर्व और अप्सराएँ भी इसी नियमके अनुसार यहाँ विहार करती हैं ॥ ५ ॥

अन्यायेनेह यः कश्चिदवमान्य धनेश्वरम् ।

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विहर्तुमिच्छेद् दुर्वृत्तः स विनश्येन्न संशयः ॥ ६ ॥

जो कोई दुराचारी पुरुष धनाध्यक्ष कुबेरकी अवहेलना करके अन्यायपूर्वक यहाँ विहार करना चाहेगा, वह नष्ट हो जायगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ६ ॥

तमनादृत्य पद्मानि जिहीर्षसि बलादृतः ।

धर्मराजस्य चात्मानं ब्रवीषि भ्रातरं कथम् ॥ ७ ॥

भीमसेन! तुम अपने बलके घमंडमें आकर कुबेरकी अवहेलना करके यहाँसे कमलपुष्पोंका अपहरण करना चाहते हो । ऐसी दशामें अपने - आपको धर्मराजका भाई कैसे बता रहे हो? ॥ ७ ॥

आमन्त्र्य यक्षराजं वै ततः पिब हरस्व च ।

नातोऽन्यथा त्वया शक्यं किंचित् पुष्करमीक्षितुम् ॥ ८ ॥

पहले यक्षराजकी आज्ञा ले लो, उसके बाद इस सरोवरका जल पीओ और यहाँसे कमलकेफूल ले जाओ । ऐसा किये बिना तुम यहाँके किसी कमलकी ओर देख भी नहीं सकते ॥ ८ ॥

भीमसेन उवाच

राक्षसास्तं न पश्यामि धनेश्वरमिहान्तिके ।

दृष्ट्वापि च महाराजं नाहं याचितुमुत्सहे ॥ ९ ॥

न हि याचन्ति राजान एष धर्मः सनातनः ।

न चाहं हातुमिच्छामि क्षात्रधर्मं कथंचन ॥ १० ॥

भीमसेन बोले — राक्षसो! प्रथम तो मैं यहाँ आस- पास कहीं भी धनाध्यक्ष कुबेरको देख नहीं रहा हूँ, दूसरे यदि मैं उन महाराजको देख भी लूँ तो भी उनसे याचना नहीं कर सकता, क्योंकि क्षत्रिय किसीसे कुछ माँगते नहीं हैं, यही उनका सनातन धर्म है । मैं किसी तरह क्षात्र - धर्मको छोड़ना नहीं चाहता ॥ ९ -१० ॥

इयं च नलिनी रम्या जाता पर्वतनिर्झरे ।

नेयं भवनमासाद्य कुबेरस्य महात्मनः ॥ ११ ॥

यह रमणीय सरोवर पर्वतीय झरनोंसे प्रकट हुआ है, यह महामना कुबेरके घरमें नहीं ॥ ११ ॥

तुल्या हि सर्वभूतानामियं वैश्रवणस्य च ।

एवं गतेषु द्रव्येषु कः कं याचितुमर्हति ॥ १२ ॥

अतः इसपर अन्य सब प्राणियोंका और कुबेरका भी समान अधिकार है । ऐसी सार्वजनिक वस्तुओंके लिये कौन किससे याचना करेगा? ॥ १२ ॥

वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वा राक्षसान् सर्वान् भीमसेनो ह्यमर्षणः ।