श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1121–1130

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1121–1130

पृष्ठ 1121

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(निवातकवचयुद्धपर्व ) पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः अर्जुनका गन्धमादन पर्वतपर आकर अपने भाइयोंसे मिलना वैशम्पायन उवाच ततः कदाचिद्धरिसम्प्रयुक्तं महेन्द्रवाहं सहसोपयातम् । विद्युत्प्रभं प्रेक्ष्य महारथानां हर्षोऽर्जुनं चिन्तयतां बभूव ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर किसी समय हरे रंगके घोड़ोंसे जुता हुआ देवराज इन्द्रका रथ सहसा आकाशमें प्रकट हुआ, मानो बिजली चमक उठी हो । उसे देखकर अर्जुनका चिन्तन करते हुए महारथी पाण्डवोंको बड़ा हर्ष हुआ ॥ १ ॥

स दीप्यमानः सहसान्तरिक्षं प्रकाशयन् मातलिसंगृहीतः । बभौ महोल्केव घनान्तरस्था शिखेव चाग्नेर्ज्वलिता विधूमा ॥ २ ॥

उस रथका संचालन मातलि कर रहे थे । वह दीप्तिमान् रथ सहसा अन्तरिक्षलोकको प्रकाशित करता हुआ इस प्रकार सुशोभित होने लगा, मानो बादलोंके भीतर बड़ी भारी उल्का प्रकट हुई हो अथवा अग्निकी धूमरहित ज्वाला प्रज्वलित हो उठी हो ॥ २ ॥

तमास्थितः संददृशे किरीटी स्रग्वी नवान्याभरणानि बिभ्रत् । धनंजयो वज्रधरप्रभावः श्रिया ज्वलन् पर्वतमाजगाम ॥ ३ ॥

उस दिव्य रथपर बैठे हुए किरीटधारी अर्जुन स्पष्ट दिखायी देने लगे । उनके कण्ठमें दिव्य हार शोभा पा रहा था और उन्होंने स्वर्गलोकके नूतन आभूषण धारण कर रखे थे । उस समय धनंजयका प्रभाव वज्रधारी इन्द्रके समान जान पड़ता था । वे अपनी दिव्य कान्तिसे प्रकाशित होते हुए गन्धमादन पर्वतपर आ पहुँचे ॥ ३ ॥

स शैलमासाद्य किरीटमाली

पृष्ठ 1122

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महेन्द्रवाहादवरुह्य तस्मात् । धौम्यस्य पादावभिवाद्य धीमा- नजातशत्रोस्तदनन्तरं च ॥ ४ ॥

वृकोदरस्यापि च वन्द्यपादौ माद्रीसुताभ्यामभिवादितश्च । समेत्य कृष्णां परिसान्त्व्य चैनां प्रह्वोऽभवद् भ्रातुरुपह्वरे सः ॥ ५ ॥

पर्वतपर पहुँचकर बुद्धिमान् किरीटधारी अर्जुन देवराज इन्द्रके उस दिव्य रथसे उतर पड़े। उस समय सबसे पहले उन्होंने महर्षि धौम्यके दोनों चरणोंमें मस्तक झुकाया । तदनन्तर अजातशत्रु युधिष्ठिर तथा भीमसेनके चरणों में प्रणाम किया । इसके बाद नकुल और सहदेवने आकर अर्जुनको प्रणाम किया तत्पश्चात् द्रौपदीसे मिलकर अर्जुनने उसे बहुत आश्वासन दिया और अपने भाई युधिष्ठिरके समीप आकर वे विनीत भावसे खड़े हो गये ॥ ४-५ ॥

पृष्ठ 1123

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स्वर्गसे लौटकर अर्जुन धर्मराजको प्रणाम कर रहे हैं । बभूव तेषां परमः प्रहर्ष-

पृष्ठ 1124

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स्तेनाप्रमेयेण समागतानाम् । स चापि तान् प्रेक्ष्य किरीटमाली ननन्द राजानमभिप्रशंसन् ॥ ६ ॥

अप्रमेय वीर अर्जुनसे मिलकर सब पाण्डवोंको बड़ा हर्ष हुआ । अर्जुन भी उन सबसे मिलकर बड़े प्रसन्न हुए तथा राजा युधिष्ठिरकी भूरि- भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ६ ॥

यमास्थितः सप्त जघान पूगान् दितेः सुतानां नमुचेर्निहन्ता । तमिन्द्रवाहं समुपेत्य पार्थाः प्रदक्षिणं चक्रुरदीनसत्त्वाः ॥ ७ ॥

नमुचिनाशक इन्द्रने जिसपर बैठकर दैत्योंके सात यूथोंका संहार किया था, उस इन्द्ररथके समीप जाकर उदार हृदयवाले कुन्तीपुत्रोंने उसकी परिक्रमा की ॥ ७ ॥

ते मातलेश्चक्रुरतीव हृष्टाः सत्कारमग्रयं सुरराजतुल्यम् । सर्वान् यथावच्च दिवौकसस्ते पप्रच्छुरेनं कुरुराजपुत्राः ॥ ८ ॥

साथ ही, उन्होंने अत्यन्त हर्षमें भरकर मातलिका देवराज इन्द्रके समान सर्वोत्तम विधिसे सत्कार किया । इसके बाद उन पाण्डवोंने मातलिसे सम्पूर्ण देवताओंका यथावत् कुशल- समाचार पूछा ॥ ८ ॥

तानप्यसौ मातलिरभ्यनन्दत् पितेव पुत्राननुशिष्य पार्थान् । ययौ रथेनाप्रतिमप्रभेण पुनः सकाशं त्रिदिवेश्वरस्य ॥ ९ ॥

मातलिने भी पाण्डवोंका अभिनन्दन किया और जैसे पिता पुत्रको उपदेश देता है, उसी प्रकार पाण्डवोंको कर्तव्यकी शिक्षा देकर वे पुनः अपने अनुपम कान्तिशाली रथके द्वारा वगलोकके स्वामी इन्द्रके समीप चले गये ॥ गते तु तस्मिन् नरदेववर्यः शक्रात्मजः शक्ररिपुप्रमाथी । (साक्षात् सहस्राक्ष इव प्रतीतः श्रीमान् स्वदेहादवमुच्य जिष्णुः । ) शक्रेण दत्तानि ददौ महात्मा महाधनान्युत्तमरूपवन्ति ॥ १० ॥

दिवाकराभाणि विभूषणानि प्रियः प्रियायै सुतसोममात्रे ।

पृष्ठ 1125

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मातलिके चले जानेपर इन्द्रशत्रुओंका संहार करनेवाले देवेन्द्रकुमार नृपश्रेष्ठ महात्मा श्रीमान् अर्जुनने, जो साक्षात् सहस्रलोचन इन्द्रके समान प्रतीत होते थे, अपने शरीरसे उतारकर इन्द्रके दिये हुए बहुमूल्य, उत्तम तथा सूर्यके समान देदीप्यमान दिव्य आभूषण अपनी प्रियतमा सुतसोमकी माता द्रौपदीको समर्पित कर दिये ॥ ततः स तेषां कुरुपुङ्गवानां तेषां च सूर्याग्निसमप्रभाणाम् ॥ ११ ॥

विप्रर्षभाणामुपविश्य मध्ये सर्वं यथावत् कथयांबभूव । एवं मयास्त्राण्युपशिक्षितानि शक्राच्च वाताच्च शिवाच्च साक्षात् ॥ १२ ॥

तदनन्तर उन कुरुश्रेष्ठ पाण्डवों तथा सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी ब्रह्मर्षियोंके बीचमें बैठकर अर्जुनने अपना सब समाचार यथावत् रूपसे कह सुनाया । ' मैंने अमुक प्रकारसे इन्द्र, वायु और साक्षात् शिवसे दिव्यास्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त की है ॥ ११-१२ ॥ तथैव शीलेन समाधिनाथ प्रीताः सुरा मे सहिताः सहेन्द्राः । संक्षेपतो वै स विशुद्धकर्मा तेभ्यः समाख्याय दिवि प्रवासम् ॥ १३ ॥

माद्रीसुताभ्यां सहितः किरीटी सुष्वाप तामावसतिं प्रतीतः ॥ १४ ॥

' मेरे शील- स्वभाव तथा चित्तकी एकाग्रतासे इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता मुझपर बहुत प्रसन्न रहते थे । निर्दोष कर्म करनेवाले अर्जुनने अपने स्वर्गीय प्रवासका सब समाचार उन सबको संक्षेपसे बताकर नकुल सहदेवके साथ निश्चिन्त होकर उस आश्रममें शयन किया ॥ १३-१४ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वण्यर्जुनसमागमे पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें अर्जुनसमागमविषयक एक सौ पैंसठवाँअध्याय पूराहुआ ॥ १६५ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर १४३ श्लोक हैं )

पृष्ठ 1126

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षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः इन्द्रका पाण्डवोंके पास आना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर स्वर्गको लौटना वैशम्पायन उवाच

ततो रजन्यां व्युष्टायां धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।

भ्रातृभिः सहितः सर्वैरवन्दत धनंजयः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर रात बीतनेपर प्रातःकाल उठकर समस्त भाइयोंसहित अर्जुनने धर्मराज युधिष्ठिरको प्रणाम किया ॥ १ ॥

एतस्मिन्नेव काले तु सर्ववादित्रनिःस्वनः ।

बभूव तुमुलः शब्दस्त्वन्तरिक्षे दिवौकसाम् ॥ २ ॥

इसी समय अन्तरिक्षमें देवताओंके सम्पूर्ण वाद्योंकी तुमुल ध्वनि गूँज उठी ॥ २ ॥

रथनेमिस्वनश्चैव घण्टाशब्दश्च भारत ।

पृथग् व्यालमृगाणां च पक्षिणामिव सर्वशः ॥ ३ ॥

भारत! रथके पहियोंकी घर्घराहट, घंटानाद तथा सर्प, मृग एवं पक्षियोंके कोलाहल सब ओर पृथक् - पृथक् सुनायी दे रहे थे ॥ ३ ॥

( वोन्मुखास्ते ददृशुः प्रीयमाणाः कुरूद्वहाः । मरुद्भिरन्वितं शक्रमापतन्तं विहायसा II )

ते समन्तादनुययुर्गन्धर्वाप्सरसां गणाः ।

विमानैः सूर्यसंकाशैर्देवराजमरिंदमम् ॥ ४ ॥

पाण्डवोंने प्रसन्नतापूर्वक उस ध्वनिकी ओर आँख उठाकर देखा, तो उन्हें देवराज इन्द्र दृष्टिगोचर हुए जो सम्पूर्ण मरुद्गण आदि देवताओंके साथ आकाशमार्गसे आ रहे थे । गन्धर्वों और अप्सराओंके समूह सूर्यके समान तेजस्वी विमानोंद्वारा शत्रुदमन देवराजको चारों ओरसे घेरकर उन्हींके पथका अनुसरण कर रहे थे ॥ ४ ॥

ततः स हरिभिर्युक्तं जाम्बूनदपरिष्कृतम् ।

मेघनादिनमारुह्य श्रिया परमया ज्वलन् ॥५ ॥

पार्थानभ्याजगामाथ देवराजः पुरंदरः । थोड़ी ही देरमें हरे रंगके घोड़ोंसे जुते हुए, मेघ गर्जनाके समान गम्भीर घोष करनेवाले,

जाम्बूनद नामक सुवर्णसे अलंकृत रथपर आरूढ़ देवराज इन्द्र पाण्डवोंके पास आ पहुँचे ।

उस समय वे अपनी उत्कृष्ट प्रभासे अत्यन्त उद्भासित हो रहे थे ॥ ५३ ॥

आगत्य च सहस्राक्षो रथादवरुरोह वै ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1127

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तं दृष्ट्वैव महात्मानं धर्मराजो युधिष्ठिरः ।

भ्रातृभिः सहितः श्रीमान् देवराजमुपागमत् ॥ ७ ॥

निकट आनेपर सहस्रलोचन इन्द्र रथसे उतर गये । उन महामना देवराजको देखते ही भाइयोंसहित श्रीमान् धर्मराज युधिष्ठिर उनके पास गये ॥ ६-७ ॥

पूजयामास चैवाथ विधिवद् भूरिदक्षिणः ।

यथार्हममितात्मानं विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ ८ ॥

यज्ञोंमें प्रचुर दक्षिणा देनेवाले युधिष्ठिर शास्त्रवर्णित पद्धतिसे अमितबुद्धि इन्द्रका विधिवत् स्वागत - सत्कार किया ॥ ८ ॥

धनंजयश्च तेजस्वी प्रणिपत्य पुरंदरम् ।

भृत्यवत् प्रणतस्तस्थौ देवराजसमीपतः ॥ ९ ॥

तेजस्वी अर्जुन भी इन्द्रको प्रणाम करके उनके समीप सेवककी भाँति विनीतभावसे खड़े हो गये ॥ ९ ॥

आप्यायत महातेजाः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।

धनंजयमभिप्रेक्ष्य विनीतं स्थितमन्तिके ॥ १० ॥

जटिलं देवराजस्य तपोयुक्तमकल्मषम् ।

हर्षेण महताऽऽविष्टः फाल्गुनस्याथ दर्शनात् ॥ ११ ॥

पृष्ठ 1128

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महातेजस्वी कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर अर्जुनको देवराजके समीप विनीतभावसे स्थित देख बड़े प्रसन्न हुए । अर्जुनके सिरपर जटा बँध गयी थी । वे देवराजके आदेशके अनुसार तपस्यामें लगे रहते थे; अतः सर्वथा निष्पाप हो गये थे । अर्जुनको देखनेसे उन्हें महान् हर्ष हुआ था ॥ १०-११ ॥

वभूव परमप्रीतो देवराजं च पूजयन् ।

तं तथादीनमनसं राजानं हर्षसम्प्लुतम् ॥ १२ ॥

उवाच वचनं धीमान् देवराजः पुरंदरः ।

त्वमिमां पृथिवीं राजन् प्रशासिष्यसि पाण्डव ।

स्वस्ति प्राप्नुहि कौन्तेय काम्यकं पुनराश्रमम् ॥ १३ ॥

अतः देवराजका पूजन करके वे बड़े प्रसन्न हुए । उदारचित्त राजा युधिष्ठिरको इस प्रकार हर्षमें मग्न देखकर परम बुद्धिमान् देवराज इन्द्रने कहा - पाण्डुनन्दन! तुम इस पृथ्वीका शासन करोगे । कुन्तीकुमार! अब तुम पुनः काम्यक वनके कल्याणकारी आश्रममें चले जाओ ॥ १२-१३ ॥ अस्त्राणि लब्धानि च पाण्डवेन सर्वाणि मत्तः प्रयतेन राजन् । कृतप्रियश्चास्मि धनंजयेन जेतुं न शक्यस्त्रिभिरेष लोकैः ॥ १४ ॥

' राजन्! पाण्डुनन्दन अर्जुनने एकाग्रचित्त होकर मुझसे सम्पूर्ण दिव्यास्त्र प्राप्त कर लिये हैं । साथ ही इन्होंने मेरा बड़ा प्रिय कार्य सम्पन्न किया है । तीनों लोकोंके समस्त प्राणी इन्हें युद्धमें परास्त नहीं कर सकते ' ॥ १४ ॥

एकमुक्त्वा सहस्राक्षः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ।

जगाम त्रिदिवं हृष्टः स्तूयमानो महर्षिभिः ॥ १५ ॥

कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर इन्द्र महर्षियोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए सानन्द स्वर्गलोकको चले गये ॥ १५ ॥

धनेश्वरगृहस्थानां पाण्डवानां समागमम् ।

शक्रेण य इदं विद्वानधीयीत समाहितः ॥ १६ ॥

संवत्सरं ब्रह्मचारी नियतः संशितव्रतः ।

स जीवेद्धि निराबाधः स सुखी शरदां शतम् ॥ १७ ॥

धनाध्यक्ष कुबेरके घरमें टिके हुए पाण्डवोंका जो इन्द्रके साथ समागम हुआ था, उस प्रसंगको जो विद्वान् एकाग्रचित्त होकर प्रतिदिन पढ़ता है और संयम- नियमसे रहकर कठोर व्रतका आश्रय ले एक वर्षतक ब्रह्मचर्यका पालन करता है, वह सब प्रकारकी बाधाओंसे रहित हो सौ वर्षोंतक सुखपूर्वक जीवन धारण करता है ॥

पृष्ठ 1129

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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकचवयुद्धपर्वणि इन्द्रागमने षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें इन्द्रागमनविषयक एक सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६६ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १८ श्लोक हैं )

पृष्ठ 1130

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सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या- यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा वैशम्पायन उवाच

यथागतं गते शक्रे भ्रातृभिः सह सङ्गतः ।

कृष्णया चैव बीभत्सुर्धर्मपुत्रमपूजयत् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! देवराज इन्द्रके चले जानेपर भाइयों तथा द्रौपदीके साथ मिलकर अर्जुनने धर्मपुत्र युधिष्ठिरको प्रणाम किया ॥ १ ॥

अभिवादयमानं तं मूर्क्युपाघ्राय पाण्डवम् ।

हर्षगद्गदया वाचा प्रहृष्टोऽर्जुनमब्रवीत् ॥ २ ॥

पाण्डुनन्दन अर्जुनको प्रणाम करते देख युधिष्ठिर बड़े प्रसन्न हुए एवं उनका मस्तक सूँघकर हर्षगद्गद - वाणीमें इस प्रकार बोले – ॥ २ ॥

कथमर्जुन कालोऽयं स्वर्गे व्यतिगतस्तव ।

कथं चास्त्राण्यवाप्तानि देवराजश्च तोषितः ॥ ३ ॥

‘ अर्जुन! स्वर्गमें तुम्हारा यह समय किस प्रकार बीता? कैसे तुमने दिव्यास्त्र प्राप्त किये और कैसे देवराज इन्द्रको संतुष्ट किया? ॥ ३ ॥

सम्यग् वा ते गृहीतानि कच्चिदस्त्राणि पाण्डव ।

कच्चित् सुराधिपः प्रीतो रुद्रो वास्त्राण्यदात् तव ॥ ४ ॥

'पाण्डुनन्दन! क्या तुमने सभी अस्त्र अच्छी तरह सीख लिये? क्या देवराज इन्द्र अथवा भगवान् रुद्रने प्रसन्न होकर तुम्हें अस्त्र प्रदान किये हैं? ॥ ४ ॥

यथा दृष्टश्च ते शक्रो भगवान् वा पिनाकधृक् ।

यथैवास्त्राण्यवाप्तानि यथैवाराधितश्च ते ॥ ५ ॥

यथोक्तवांस्त्वां भगवान् शतक्रतुररिंदम कृतप्रियस्त्वयास्मीति तस्य ते किं प्रियं कृतम् ॥ ६ ॥

' शत्रुदमन! तुमने जिस प्रकार देवराज इन्द्रका दर्शन किया है अथवा जैसे पिनाकधारी भगवान् शिवको देखा है, जिस प्रकार तुमने सब अस्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त की है और जैसे तुम्हारेद्वारा देवाराधनका कार्य सम्पादित हुआ है, वह सब बताओ । भगवान् इन्द्रने अभी-अभी कहा था कि ‘ अर्जुनने मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य सम्पन्न किया है ' सो वह उनका कौन-सा प्रिय कार्य था, जिसे तुमने सम्पन्न किया है ॥ ५-६ ॥