श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1291–1300

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1291–1300

पृष्ठ 1291

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भरतकुलभूषण! उस समय जो भी तृण- काष्ठ अथवा सूखे - गीले पदार्थ होते हैं, वे सभी भस्मीभूत दिखायी देने लगते हैं ॥ ६८ ॥

ततः संवर्तको वह्निर्वायुना सह भारत ।

लोकमाविशते पूर्वमादित्यैरुपशोषितम् ॥ ६ ९ ॥

भारत! इसके बाद ‘ संवर्तक ' नामकी प्रलयकालीन अग्नि वायुके साथ उन सम्पूर्ण लोकोंमें फैल जाती है, जहाँका जल पहले सात सूर्योद्वारा सोख लिया गया है ॥ ६ ९ ॥

ततः स पृथिवीं भित्त्वा प्रविश्य च रसातलम् ।

देवदानवयक्षाणां भयं जनयते महत् ॥ ७० ॥

तत्पश्चात् पृथ्वीका भेदन कर वह अग्नि रसातलतक पहुँच जाती है तथा देवता, दानव और यक्षोंके लिये महान् भय उपस्थित कर देती है ॥ ७० ॥

निर्दहन् नागलोकं च यच्च किञ्चित् क्षिताविह ।

अधस्तात् पृथिवीपाल सर्वं नाशयते क्षणात् ॥ ७१ ॥

राजन्! वह नागलोकको जलाती हुई इस पृथ्वीके नीचे जो कुछ भी है, उस सबको क्षणभरमें नष्ट कर देती है ॥ ७१ ॥

ततो योजनविंशानां सहस्राणि शतानि च ।

निर्दहत्यशिवो वायुः स च संवर्तकोऽनलः ॥ ७२ ॥

इसके बाद वह अमंगलकारी प्रचण्ड वायु और वह संवर्तक अग्नि बाईस हजार योजन तकके लोगोंको भस्म कर डालती है ॥ ७२ ॥

सदेवासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम् ।

ततो दहति दीप्तः स सर्वमेव जगद् विभुः ॥ ७३ ॥

इस प्रकार सर्वत्र फैली हुई वह प्रज्वलित अग्नि देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग तथा राक्षसोंसहित सम्पूर्ण विश्वको भस्म कर डालती है ॥ ७३ ॥

ततो गजकुलप्रख्यास्तडिन्मालाविभूषिताः ।

उत्तिष्ठन्ति महामेघा नभस्यद्भुतदर्शनाः ॥ ७४ ॥

इसके बाद आकाशमें महान् मेघोंकी घोर घटा घिर आती है, जो अद्भुत दिखायी देता है । उनमेंसे प्रत्येक मेघ- समूह हाथियोंके झुंडकी भाँति विशालकाय और श्यामवर्ण तथा बिजलीकी मालाओंसे विभूषित होता है ॥ ७४ ॥

केचिन्नीलोत्पलश्यामाः केचित् कुमुदसंनिभाः ।

केचित् किञ्जल्कसंकाशाः केचित् पीताः पयोधराः ॥ ७५ ॥

केचिद्धारिद्रसंकाशाः कारण्डवनिभास्तथा ।

केचित् कमलपत्राभाः केचिद्धिङ्गुलसप्रभाः ॥ ७६ ॥

कुछ बादल नील कमलक समान श्याम और कुछ कुमुद- कुसुमके समान सफेद होते हैं । कुछ जलधरोंकी कान्ति केसरोंके समान दिखायी देती है । कुछ मेघ हल्दीके सदृश पीले

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और कुछ कारण्डव पक्षीके समान दृष्टिगोचर होते हैं । कोई- कोई कमलदलके समान और कुछ हिंगुल - जैसे जान पड़ते हैं ॥ ७५-७६ ॥

केचित् पुरवराकाराः केचिद् गजकुलोपमाः ।

केचिदञ्जनसंकाशाः केचिन्मकरसंनिभाः ॥ ७७ ॥

कुछ श्रेष्ठ नगरोंके समान, कुछ हाथियोंके झुंड- जैसे, कुछ काजलके रंगवाले और कुछ मगरोंकी - सी आकृतिवाले होते हैं ॥ ७७ ॥

विद्युन्मालापिनद्धाङ्गाः समुत्तिष्ठन्ति वै घनाः ।

घोररूपा महाराज घोरस्वननिनादिताः ।

ततो जलधराः सर्वे व्याप्नुवन्ति नभस्तलम् ॥ ७८ ॥

वे सभी बादल विद्युन्मालाओंसे अलंकृत होकर घिर आते हैं । महाराज! भयंकर गर्जना करनेके कारण उनका स्वरूप बड़ा भयानक जान पड़ता है । धीरे- धीरे वे सभी जलधर समूचे आकाशमण्डलको ढक लेते हैं ॥ ७८ ॥

तैरियं पृथिवी सर्वा सपर्वतवनाकरा ।

आपूर्यते महाराज सलिलौघपरिप्लुता ॥ ७ ९ ॥

महाराज! उनके वर्षा करनेपर पर्वत, वन और खानोंसहित यह सारी पृथ्वी अगाध जलराशिमें डूबकर सब ओरसे भर जाती है ॥ ७९ ॥

ततस्ते जलदा घोरा राविणः पुरुषर्षभ ।

सर्वतः प्लावयन्त्याशु चोदिताः परमेष्ठिना ॥ ८० ॥

पुरुषरत्न! तदनन्तर विधातासे प्रेरित हो गर्जन -तर्जन करनेवाले वे भयंकर मेघ शीघ्र सब ओर वर्षा करके सबको जलसे आप्लावित कर देते हैं ॥ ८० ॥

वर्षमाणा महत् तोयं पूरयन्तो वसुंधराम् ।

सुघोरमशिवं रौद्रं नाशयन्ति च पावकम् ॥ ८१ ॥

महान् जल- समूहकी वर्षा करके वसुन्धराको जलमें डुबोनेवाले वे समस्त मेघ उस अत्यन्त घोर, अमंगलकारी और भयानक अग्निको बुझा देते हैं ॥ ८१ ॥

ततो द्वादशवर्षाणि पयोदास्त उपप्लवे ।

धाराभिः पूरयन्तो वै चोद्यमाना महात्मना ॥ ८२ ॥

तदनन्तर प्रलयकालके वे पयोधर महात्मा ब्रह्माजीकी प्रेरणा पाकर पृथ्वीको परिपूर्ण करनेके लिये बारह वर्षोंतक धारावाहिक वृष्टि करते हैं ॥ ८२ ॥

ततः समुद्रः स्वां वेलामतिक्रामति भारत ।

पर्वताश्च विदीर्यन्ते मही चाप्सु निमज्जति ॥ ८३ ॥

भारत! तदनन्तर समुद्र अपनी सीमाको लाँघ जाता है, पर्वत फट जाते और पृथ्वी पानीमें:डूब'जाती है ॥ ८३ ॥

सर्वतः सहसा भ्रान्तास्ते पयोदा नभस्तलम् ।

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संवेष्टयित्वा नश्यन्ति वायुवेगपराहताः ॥ ८४ ॥

तत्पश्चात् समस्त आकाशको घेरकर सब ओर फैले हुए वे मेघ वायुके प्रचण्ड वेगसे छिन्न- भिन्न होकर सहसा अदृश्य हो जाते हैं ॥ ८४ ॥

ततस्तं मारुतं घोरं स्वयम्भूर्मनुजाधिप ।

आदिः पद्मालयो देवः पीत्वा स्वपिति भारत ॥ ८५ ॥

नरेश्वर! इसके बाद कमलमें निवास करनेवाले आदिदेव स्वयं ब्रह्माजी उस भयंकर वायुको पीकर सो जाते हैं ॥ ८५ ॥

तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे ।

नष्टे देवासुरगणे यक्षराक्षसवर्जिते ॥ ८६ ॥

निर्मनुष्ये महीपाल निःश्वापदमहीरुहे ।

अनन्तरिक्षे लोकेऽस्मिन् भ्रमाम्येकोऽहमाहतः ॥ ८७ ॥

इस प्रकार चराचर प्राणियों, देवताओं तथा असुर आदिके नष्ट हो जानेपर यक्ष, राक्षस, मनुष्य, हिंसक जीव, वृक्ष तथा अन्तरिक्षसे शून्य उस घोर एकार्णवमय जगत्में मैं अकेला ही इधर- उधर मारा - मारा फिरता हूँ ॥ ८६-८७ ॥

एकार्णवे जले घोरे विचरन् पार्थिवोत्तम ।

अपश्यन् सर्वभूतानि वैक्लव्यमगमं ततः ॥ ८८ ॥

नृपश्रेष्ठ! एकार्णवके उस भयंकर जलमें विचरते हुए जब मैंने किसी भी प्राणीको नहीं देखा, तब मुझे बड़ी व्याकुलता हुई ॥ ८८ ॥

ततः सुदीर्घं गत्वाहं प्लवमानो नराधिप ।

श्रान्तः क्वचिन्न शरणं लभाम्यहमतन्द्रितः ॥ ८ ९ ॥

नरेश्वर! उस समय आलस्यशून्य होकर सुदीर्घकाल--तक तैरता हुआ मैं दूर जाकर बहुत थक गया । परंतु कहीं भी मुझे कोई आश्रय नहीं मिला ॥ ८ ९ ॥

ततः कदाचित् पश्यामि तस्मिन् सलिलसंचये ।

न्यग्रोधं सुमहान्तं वै विशालं पृथिवीपते ॥ ९ ० ॥

राजन्! तदनन्तर एक दिन एकार्णवकी उस अगाध जलराशिमें मैंने एक बहुत विशाल बरगदका वृक्ष देखा ॥ ९ ० ॥

शाखायां तस्य वृक्षस्य विस्तीर्णायां नराधिप ।

पर्यङ्के पृथिवीपाल दिव्यास्तरणसंस्तृते ॥ ९ १ ॥

उपविष्टं महाराज पद्मेन्दुसदृशाननम् ।

फुल्लपद्मविशालाक्षं बालं पश्यामि भारत ॥ ९ २ ॥

नराधिप! उस वृक्षकी चौड़ी शाखापर एक पलंग था, जिसके ऊपर दिव्य बिछौने बिछे हुए थे । महाराज! उस पलंगपर एक सुन्दर बालक बैठा दिखायी दिया, जिसका मुख

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कमलके समान कमनीय शोभा धारण करनेवाला तथा चन्द्रमाके समान नेत्रोंको आनन्द देनेवाला था । उसके नेत्र प्रफुल्ल पद्मदलके समान विशाल थे ॥ ९ १- ९ २ ॥

ततो मे पृथिवीपाल विस्मयः सुमहानभूत् ।

कथं त्वयं शिशुः शेते लोके नाशमुपागते ॥ ९ ३ ॥

पृथ्वीनाथ! उसे देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ । मैं सोचने लगा- ' सारे संसारके नष्ट हो जानेपर भी यह बालक यहाँ कैसे सो रहा है? ' ॥ ९ ३ ॥

तपसा चिन्तयंश्चापि तं शिशुं नोपलक्षये ।

भूतं भव्यं भविष्यं च जानन्नपि नराधिप ॥ ९ ४ ॥

नरेश्वर! मैं भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंका ज्ञाता होनेपर भी तपस्यासे भलीभाँति चिन्तन करता ( ध्यान लगाता ) रहा, तो भी उस शिशुके विषयमें कुछ न जान सका ॥ ९ ४ ॥

अतसीपुष्पवर्णाभः श्रीवत्सकृतभूषणः ।

साक्षाल्लक्ष्म्या इवावासः स तदा प्रतिभाति मे ॥ ९ ५ ॥

उसकी अंगकान्ति अलसीके फूलकी भाँति श्याम थी। उसका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे विभूषित था । वह उस समय मुझे साक्षात् लक्ष्मीका निवासस्थान - सा प्रतीत होता था ॥ ९ ५ ॥

ततो मामब्रवीद् बालः स पद्मनिभलोचनः ।

श्रीवत्सधारी द्युतिमान् वाक्यं श्रुतिसुखावहम् ॥ ९ ६ ॥

जानामि त्वां परिश्रान्तं ततो विश्रामकाङ्क्षिणम् ।

मार्कण्डेय इहास्स्व त्वं यावदिच्छसि भार्गव ॥ ९ ७ ॥

मुझे विस्मयमें पड़ा देख कमलके समान नेत्रवाले उस श्रीवत्सधारी कान्तिमान् बालकने मुझसे इस प्रकार श्रवणसुखद वचन कहा– ' भृगुवंशी मार्कण्डेय! मैं तुम्हें जानता हूँ। तुम

बहुत थक गये हो और विश्राम चाहते हो । तुम्हारी जबतक इच्छा हो यहाँ बैठो ॥

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अभ्यन्तरं शरीरे मे प्रविश्य मुनिसत्तम ।

आस्स्व भो विहितो वासः प्रसादस्ते कृतो मया ॥ ९ ८ ॥

' मुनिश्रेष्ठ! मैंने तुमपर कृपा की है । तुम मेरे शरीरके भीतर प्रवेश करके विश्राम करो । वहाँ तुम्हारे रहनेके लिये व्यवस्था की गयी है ' ॥ ९ ८ ॥

ततो बालेन तेनैवमुक्तस्यासीत् तदा मम ।

निर्वेदो जीविते दीर्घे मनुष्यत्वे च भारत ॥ ९९ ॥

उस बालकके ऐसा कहनेपर उस समय मुझे अपने दीर्घ जीवन और मानव - शरीरपर बड़ा खेद और वैराग्य हुआ ॥ ९९ ॥

ततो बालेन तेनास्यं सहसा विवृतं कृतम् ।

तस्याहमवशो वक्त्रे दैवयोगात् प्रवेशितः ॥ १०० ॥

तदनन्तर उस बालकने सहसा अपना मुख खोला और मैं दैवयोगसे परवशकी भाँति उसमें प्रवेश कर गया ॥ १०० ॥

ततः प्रविष्टस्तत्कुक्षिं सहसा मनुजाधिप ।

सराष्ट्रनगराकीर्णां कृत्स्नां पश्यामि मेदिनीम् ॥ १०१ ॥

राजन्! उसमें प्रवेश करते ही मैं सहसा उस बालकके उदरमें जा पहुँचा । वहाँ मुझे समस्त राष्ट्रों और नगरोंसे भरी हुई यह सारी पृथ्वी दिखायी दी ॥ १०१ ॥

गङ्गां शतद्धुं सीतां च यमुनामथ कौशिकीम् ।

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चर्मण्वतीं वेत्रवतीं चन्द्रभागां सरस्वतीम् ॥ १०२ ॥

सिन्धुं चैव विपाशां च नदीं गोदावरीमपि ।

वस्वोकसारां नलिनीं नर्मदां चैव भारत ॥ १०३ ॥

नदीं ताम्रां च वेणां च पुण्यतोयां शुभावहाम् ।

सुवेणां कृष्णवेणां च इरामां च महानदीम् ॥ १०४ ॥

वितस्तां च महाराज कावेरीं च महानदीम् ।

शोणं च पुरुषव्याघ्र विशल्यां किम्पुनामपि ॥ १०५ ॥

एताश्चान्याश्च नद्योऽहं पृथिव्यां या नरोत्तम ।

परिक्रामन् प्रपश्यामि तस्य कुक्षौ महात्मनः ॥ १०६ ॥

नरश्रेष्ठ! फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा । घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता ( झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना - इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा ॥ १०२ – १०६ ॥

ततः समुद्रं पश्यामि यादोगणनिषेवितम् ।

रत्नाकरममित्रघ्न पयसो निधिमुत्तमम् ॥ १०७ ॥

शत्रुसूदन! इसके बाद जलजन्तुओंसे भरे हुए अगाध जलके भण्डार परम उत्तम रत्नाकर समुद्रको भी देखा ॥ १०७ ॥

तत्र पश्यामि गगनं चन्द्रसूर्यविराजितम् ।

जाज्वल्यमानं तेजोभिः पावकार्कसमप्रभम् ॥ १०८ ॥

वहाँ मुझे चन्द्रमा और सूर्यसे सुशोभित आकाशमण्डल दिखायी दिया, जो अनन्त तेजसे प्रज्वलित तथा अग्नि एवं सूर्यके समान देदीप्यमान था ॥ १०८ ॥

पश्यामि च महीं राजन् काननैरुपशोभिताम् । (सपर्वतवनद्वीपां निमग्नाशतसङ्कुलाम् । ) यजन्ते हि तदा राजन् ब्राह्मणा बहुभिर्मखैः ॥ १० ९ ॥ राजन्! वहाँकी भूमि विविध काननोंसे सुशोभित, पर्वत, वन और द्वीपोंसे उपलक्षित तथा सैकड़ों सरिताओंसे संयुक्त दिखायी देती थी । ब्राह्मणलोग नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना करते थे ॥ १० ९ ॥

क्षत्रियाश्च प्रवर्तन्ते सर्ववर्णानुरंजनैः ।

वैश्याः कृषिं यथान्यायं कारयन्ति नराधिप ॥ ११० ॥

नरेश्वर! क्षत्रिय राजा सब वर्णोंकी प्रजाका अनुरंजन करते - सबको सुखी और प्रसन्न रखते थे । वैश्य न्यायपूर्वक खेतीका काम और व्यापार करते थे ॥ ११० ॥

शुश्रूषायां च निरता द्विजानां वृषलास्तदा ।

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ततः परिपतन् राजंस्तस्य कुक्षौ महात्मनः ॥ १११ ॥

हिमवन्तं च पश्यामि हेमकूटं च पर्वतम् ।

निषधं चापि पश्यामि श्वेतं च रजतान्वितम् ॥ ११२ ॥

पश्यामि च महीपाल पर्वतं गन्धमादनम् ।

मन्दरं मनुजव्याघ्र नीलं चापि महागिरिम् ॥ ११३ ॥

पश्यामि च महाराज मेरुं कनकपर्वतम् ।

महेन्द्रं चैव पश्यामि विन्ध्यं च गिरिमुत्तमम् ॥ ११४ ॥

मलयं चापि पश्यामि पारियात्रं च पर्वतम् ।

एते चान्ये च बहवो यावन्तः पृथिवीधराः ॥ ११५ ॥

तस्योदरे मया दृष्टाः सर्वे रत्नविभूषिताः ।

सिंहान् व्याघ्रान् वराहांश्च पश्यामि मनुजाधिप ॥ ११६ ॥

शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा- शुश्रूषामें लगे रहते थे । राजन्! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे । ये तथा और भी बहुत - से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये । वे सब- के - सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे । राजन्! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याघ्र और वाराह आदि पशु भी देखे ॥ १११–११६ ॥

पृथिव्यां यानि चान्यानि सत्त्वानि जगतीपते ।

तानि सर्वाण्यहं तत्र पश्यन् पर्यचरं तदा ॥ ११७ ॥

पृथ्वीपते! भूमण्डलमें जितने प्राणी हैं, उन सबको देखते हुए मैं उस समय उस बालकके उदरमें विचरता रहा ॥ ११७ ॥

कुक्षौ तस्य नरव्याघ्र प्रविष्टः संचरन् दिशः ।

शक्रादींश्चापि पश्यामि कृत्स्नान् देवगणानहम् ॥ ११८ ॥

नरश्रेष्ठ! उस शिशुके उदरमें प्रविष्ट हो सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रमण करते हुए इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंके भी दर्शन हुए ॥ ११८ ॥

साध्यान् रुद्रांस्तथाऽऽदित्यान् गुह्यकान् पितरस्तदा ।

सर्पान् नागान् सुपर्णांश्च वसूनप्यश्विनावपि ॥ ११ ९ ॥

गन्धर्वाप्सरसो यक्षानृषींश्चैव महीपते ।

दैत्यदानवसङ्घांश्च नागांश्च मनुजाधिप ॥ १२० ॥

सिंहिकातनयांश्चापि ये चान्ये सुरशत्रवः ।

यच्च किंचिन्मया लोके दृष्टं स्थावरजङ्गमम् ॥ १२१ ॥

सर्वं पश्याम्यहं राजंस्तस्य कुक्षौ महात्मनः ।

चरमाणः फलाहारः कृत्स्नं जगदिदं विभो ॥ १२२ ॥

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पृथ्वीपते! साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, सर्प, नाग, सुपर्ण, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषियोंका भी मैंने दर्शन किया। दैत्य- दानवसमूह, नाग, सिंहिकाके पुत्र ( राहु आदि) तथा अन्य देवशत्रुओंको भी देखा । राजन्! इस लोकमें मैंने जो कुछ भी स्थावर- जंगम पदार्थ देखे थे, वे सब मुझे उस महात्माकी कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए । महाराज! मैं प्रतिदिन फलाहार करता और इस सम्पूर्ण जगत्में घूमता रहता ॥ ११ ९ -१२२ ॥

अन्तःशरीरे तस्याहं वर्षाणामधिकं शतम् ।

न च पश्यामि तस्याहं देहस्यान्तं कदाचन ॥ १२३ ॥

उस बालकके शरीरके भीतर मैं सौ वर्षसे अधिक कालतक घूमता रहा, तो भी कभी उसके शरीरका अन्त नहीं दिखायी दिया ॥ १२३ ॥

सततं धावमानश्च चिन्तयानो विशाम्पते । ( भ्रमंस्तत्र महीपाल यदा वर्षगणान् बहून् । ) आसादयामि नैवान्तं तस्य राजन् महात्मनः ॥ १२४ ॥

ततस्तमेव शरणं गतोऽस्मि विधिवत् तदा ।

वरेण्यं वरदं देवं मनसा कर्मणैव च ॥ १२५ ॥

युधिष्ठिर! मैं निरन्तर दौड़ लगाता और चिन्तामें पड़ा रहता था । महाराज! जब बहुत वर्षोंतक भ्रमण करनेपर भी उस महात्माके शरीरका अन्त नहीं मिला, तब मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा उन वरदायक एवं वरेण्य देवताकी ही विधिपूर्वक शरण ली ॥ १२४-१२५ ॥

ततोऽहं सहसा राजन् वायुवेगेन निःसृतः ।

महात्मनो मुखात् तस्य विवृतात् पुरुषोत्तम ॥ १२६ ॥

पुरुषरत्न युधिष्ठिर! उनकी शरण लेते ही मैं वायुके समान वेगसे उक्त महात्मा बालकके खुले हुए मुखकी राहसे सहसा बाहर निकल आया ॥ १२६ ॥

ततस्तस्यैव शाखायां न्यग्रोधस्य विशाम्पते ।

आस्ते मनुजशार्दूल कृत्स्नमादाय वै जगत् ॥ १२७ ॥

तेनैव बालवेषेण श्रीवत्सकृतलक्षणम् ।

आसीनं तं नरव्याघ्र पश्याम्यमिततेजसम् ॥ १२८ ॥

नरश्रेष्ठ राजन्! बाहर आकर देखा तो उसी बरगदकी शाखापर उसी बाल - वेषसे सम्पूर्ण जगत्को अपने उदरमें लेकर श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित वह अमिततेजस्वी बालक पूर्ववत् बैठा हुआ है ॥ १२७-१२८ ॥

ततो मामब्रवीद् बालः स प्रीतः प्रहसन्निव ।

श्रीवत्सधारी द्युतिमान् पीतवासा महाद्युतिः ॥ १२ ९ ॥

पृष्ठ 1299

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तब महातेजस्वी पीताम्बरधारी श्रीवत्सभूषित कान्तिमान् उस बालकने प्रसन्न होकर हँसते हुए - से मुझसे कहा— ॥ १२ ९ ॥

अपीदानीं शरीरेऽस्मिन् मामके मुनिसत्तम ।

उषितस्त्वं सुविश्रान्तो मार्कण्डेय ब्रवीहि मे ॥ १३० ॥

‘ मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेय! क्या तुम मेरे इस शरीरमें रहकर विश्राम कर चुके? मुझे बताओ ' ॥ १३० ॥

मुहूर्तादथ मे दृष्टिः प्रादुर्भूता पुनर्नवा ।

यया निर्मुक्तमात्मानमपश्यं लब्धचेतसम् ॥ १३१ ॥

फिर दो ही घड़ीमें मुझे एक नवीन दृष्टि प्राप्त हुई, जिससे मैं अपने - आपको मायासे मुक्त और सचेत अनुभव करने लगा ॥ १३१ ॥

तस्य ताम्रतलौ तात चरणौ सुप्रतिष्ठितौ ।

सुजातौ मृदुरक्ताभिरङ्गुलीभिर्विराजितौ ॥ १३२ ॥

प्रयत्नेन मया मूर्ध्ना गृहीत्वा ह्यभिवन्दितौ । तात! तदनन्तर मैंने कोमल और लाल रंगकी अँगुलियोंसे सुशोभित लाल- लाल तलवेवाले उस बालकके सुन्दर एवं सुप्रतिष्ठित चरणोंको प्रयत्नपूर्वक पकड़कर उन्हें अपने मस्तकसे प्रणाम किया ॥ १३२ ॥

दृष्ट्वा परिमितं तस्य प्रभावममितौजसः ॥ १३३ ॥

विनयेनाञ्जलिं कृत्वा प्रयत्नेनोपगम्य ह ।

दृष्टो मया स भूतात्मा देवः कमललोचनः ॥ १३४ ॥

उस अमित तेजस्वी शिशुका अनन्त प्रभाव देखकर मैं यत्नपूर्वक उसके समीप गया और विनीतभावसे हाथ जोड़कर सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा उस कमलनयन देवताका दर्शन किया ॥ १३३-१३४ ॥

तमहं प्राञ्जलिर्भूत्वा नमस्कृत्येदमब्रुवम् ।

ज्ञातुमिच्छामि देव त्वां मायां चैतां तवोत्तमाम् ॥ १३५ ॥

फिर हाथ जोड़े नमस्कार करके मैंने उससे इस प्रकार कहा—देव! मैं आपको और आपकी इस उत्तम मायाको जानना चाहता हूँ ॥ १३५ ॥

आस्येनानुप्रविष्टोऽहं शरीरे भगवंस्तव ।

दृष्टवानखिलान् सर्वान् समस्तान् जठरे हि ते ॥ १३६ ॥

‘ भगवन्! मैंने आपके मुखकी राहसे शरीरमें प्रवेश करके आपके उदरमें समस्त सांसारिक पदार्थोंका अवलोकन किया है ॥ १३६ ॥

तव देव शरीरस्था देवदानवराक्षसाः ।

यक्षगन्धर्वनागाश्च जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ १३७ ॥

पृष्ठ 1300

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'देव! आपके शरीरमें देवता, दानव, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, नाग तथा समस्त स्थावर-जंगमरूप जगत् विद्यमान है ॥

त्वत्प्रसादाच्च मे देव स्मृतिर्न परिहीयते ।

द्रुतमन्तःशरीरे ते सततं परिवर्तिनः ॥ १३८ ॥

' प्रभो! आपकी कृपासे आपके शरीरके भीतर निरन्तर शीघ्र गति से घूमते रहनेपर भी मेरी स्मरणशक्ति नष्ट नहीं हुई है ॥ १३८ ॥

निर्गतोऽहमकामस्तु इच्छया ते महाप्रभो ।

इच्छामि पुण्डरीकाक्ष ज्ञातुं त्वाहमनिन्दितम् ॥ १३ ९ ॥

' महाप्रभो! मैं अपनी अभिलाषा न रहनेपर भी केवल आपकी इच्छासे बाहर निकल आया हूँ । कमलनयन! आप सर्वोत्कृष्ट देवताको मैं जानना चाहता हूँ ॥ १३ ९ ॥

इह भूत्वा शिशुः साक्षात् किं भवानवतिष्ठते ।

पीत्वा जगदिदं सर्वमेतदाख्यातुमर्हसि ॥ १४० ॥

‘ आप इस सम्पूर्ण जगत्को पी करके यहाँ साक्षात् बालकवेषमें क्यों विराजमान हैं? यह सब बतानेकी कृपा करें ॥ १४० ॥

किमर्थं च जगत् सर्वं शरीरस्थं तवानघ ।

कियन्तं च त्वया कालमिह स्थेयमरिंदम ॥ १४१ ॥

‘ अनघ! यह सारा संसार आपके शरीरमें किसलिये स्थित है? शत्रुदमन! आप कितने समयतक यहाँ इस रूपमें रहेंगे? ॥ १४१ ॥

एतदिच्छामि देवेश श्रोतुं ब्राह्मणकाम्यया ।

त्वत्तः कमलपत्राक्ष विस्तरेण यथातथम् ॥ १४२ ॥

‘ देवेश्वर! कमलनयन! ब्राह्मणमें जो सहज जिज्ञासा होती है, उससे प्रेरित होकर मैं आपसे यह सब बातें यथाविधि विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ ॥ १४२ ॥

महद्धयेतदचिन्त्यं च यदहं दृष्टवान् प्रभो ।

इत्युक्तः स मया श्रीमान् देवदेवो महाद्युतिः ।

सान्त्वयन् मामिदं वाक्यमुवाच वदतां वरः ॥ १४३ ॥

' प्रभो! मैंने जो कुछ देखा है, यह अगाध और अचिन्त्य है । ' मेरे इस प्रकार पूछनेपर वे वक्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी देवाधिदेव श्रीभगवान् मुझे सान्त्वना देते हुए इस प्रकार बोले ॥ १४३ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें एक सौ अट्ठासीवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १८८ ॥