श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1701–1710

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1701–1710

पृष्ठ 1701

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प्रख्यातास्तेऽर्जुनं वीरं हनिष्यन्ति च मा शुचः ।

असपत्ना त्वया हीयं भोक्तव्या वसुधा नृप ॥ २४ ॥

इसीलिये हमलोंगोंने भी एक लाख दैत्यों तथा राक्षसोंको इस काममें लगा रखा है, जो संशप्तक नामसे विख्यात हैं । वे वीर अर्जुनको मार डालेंगे । अतः आप शोक न करें । नरेश्वर! आपको इस पृथ्वीका निष्कंटक राज्य भोगना है ॥ २३-२४ ॥

मा विषादं गमस्तस्मान्नैतत्त्वय्युपपद्यते ।

विनष्टे त्वयि चास्माकं पक्षो हीयेत कौरव ॥ २५ ॥

अतः कुरुनन्दन! आप विषाद न करें । यह आपको शोभा नहीं देता है । आपके नष्ट हो जानेपर तो हमारे पक्षका ही नाश हो जायगा ॥ २५ ॥

गच्छ वीर न ते बुद्धिरन्या कार्या कथञ्चन ।

त्वमस्माकं गतिर्नित्यं देवतानां च पाण्डवाः ॥ २६ ॥

वीरवर! जाइये । अब आपको किसी तरह भी अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये । देखिये, देवताओंने पाण्डवोंका आश्रय ले रखा है; परंतु हमारी गति तो सदा आप ही हैं ॥ २६ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा परिष्वज्य दैत्यास्तं राजकुञ्जरम् ।

समाश्वास्य च दुर्धर्षं पुत्रवद् दानवर्षभाः ॥ २७ ॥

स्थिरां कृत्वा बुद्धिमस्य प्रियाण्युक्त्वा च भारत ।

गम्यतामित्यनुज्ञाय जयमाप्नुहि चेत्यथ ॥ २८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! दुर्धर्ष वीर नृपशिरोमणि दुर्योधनसे ऐसा कहकर दैत्यों तथा दानवेश्वरोंने उसे पुत्रकी भाँति हृदयसे लगाया और आश्वासन देकर उसकी बुद्धिको स्थिर किया । भारत! तत्पश्चात् प्रिय वचन बोलकर उन्होंने दुर्योधनको जानेके लिये आज्ञा देते हुए कहा — ‘ अब आप जाइये और शत्रुओंपर विजय प्राप्त कीजिये ' ॥ २७-२८ ॥

तैर्विसृष्टं महाबाहुं कृत्या सैवानयत् पुनः ।

तमेव देशं यत्रासौ तदा प्रायमुपाविशत् ॥ २ ९ ॥

दैत्योंके विदा करनेपर उसी कृत्याने महाबाहु दुर्योधनको पुनः उसी स्थानपर पहुँचा दिया, जहाँ वह पहले आमरण उपवासके लिये बैठा था ॥ २ ९ ॥

प्रतिनिक्षिप्य तं वीरं कृत्या समभिपूज्य च ।

अनुज्ञाता च राज्ञा सा तथैवान्तरधीयत ॥ ३० ॥

वीर राजा दुर्योधनको वहाँ रखकर कृत्याने उसके प्रति सम्मान प्रदर्शित किया और उससे आज्ञा लेकर जैसे आयी थी, वैसे ही अदृश्य हो गयी ॥ ३० ॥

पृष्ठ 1702

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गतायामथ तस्यां तु राजा दुर्योधनस्तदा ।

स्वप्नभूतमिदं सर्वमचिन्तयत भारत ॥ ३१ ॥

( सम्मृश्य तानि वाक्यानि दानवोक्तानि दुर्मतिः । ) विजेष्यामि रणे पाण्डूनिति चास्याभवन्मतिः । भारत! कृत्याके चले जानेपर राजा दुर्योधनने इन सारी बातोंको स्वप्न समझा । दैत्योंके कहे हुए वचनोंपर विचार करके दुर्बुद्धि दुर्योधनके मनमें यह संकल्प उदित हुआ कि ‘ मैं युद्धमें पाण्डवोंको जीत लूँगा' ॥ ३१३ ॥

कर्णं संशप्तकांश्चैव पार्थस्यामित्रघातिनः ॥ ३२ ॥

अमन्यत वधे युक्तान् समर्थांश्च सुयोधनः । दुर्योधनने यह मान लिया कि संशप्तकगण तथा कर्ण ये शत्रुघाती अर्जुनके वधमें लगे हुए हैं और इसके लिये वे समर्थ हैं ॥ ३२३ ॥

एवमाशा दृढा तस्य धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः ॥ ३३ ॥

विनिर्जये पाण्डवानामभवद् भरतर्षभ । जनमेजय! इस प्रकार उस खोटी बुद्धिवाले धृतराष्ट्रपुत्रके मनमें पाण्डवोंपर विजय पानेकी दृढ़ आशा हो गयी ॥ ३३३ ॥

कर्णोऽप्याविष्टचित्तात्मा नरकस्यान्तरात्मना ॥ ३४ ॥

अर्जुनस्य वधे क्रूरां करोति स्म तदा मतिम् । इधर कर्ण भी नरकासुरकी अन्तरात्मासे आविष्टचित्त होनेके कारण अर्जुनका वध करनेके लिये क्रूरतापूर्ण संकल्प करने लगा ॥ ३४३ ॥

संशप्तकाश्च ते वीरा राक्षसाविष्टचेतसः ॥ ३५ ॥

रजस्तमोभ्यामाक्रान्ताः फाल्गुनस्य वधैषिणः । इसी प्रकार राक्षसोंसे आविष्टचित्त होकर वे संशप्तक वीर भी रजोगुण और तमोगुणसे आक्रान्त हो अर्जुनको मार डालनेकी इच्छा रखने लगे ॥ ३५३ ॥

भीष्मद्रोणकृपाद्याश्च दानवाक्रान्तचेतसः ॥ ३६ ॥

न तथा पाण्डुपुत्राणां स्नेहवन्तो विशाम्पते । राजन्! भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य आदिके मनपर भी दानवोंने अधिकार कर लिया था । अतः पाण्डवोंके प्रति उनका भी वैसा स्नेह नहीं रह गया ॥ ३६ ॥

( कृत्ययाऽऽनाय्यकथितं यत् तस्यां निशि दानवैः । ) न चाचचक्षे कस्मैचिदेतद् राजा सुयोधनः ॥ ३७ ॥

दानवोंने रातमें कृत्याद्वारा अपने यहाँ बुलाकर जो बातें कही थीं, उन्हें राजा दुर्योधनने किसीपर भी प्रकट नहीं किया ॥ ३७ ॥

दुर्योधनं निशान्ते च कर्णो वैकर्तनोऽब्रवीत् ।

पृष्ठ 1703

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स्मयन्निवाञ्जलिं कृत्वा पार्थिवं हेतुमद् वचः ॥ ३८ ॥

वह रात बीतनेपर सूर्यपुत्र कर्णने आकर राजा दुर्योधनसे हाथ जोड़ मुसकराते हुए यह युक्तियुक्त वचन कहा— ॥ ३८ ॥

न मृतो जयते शत्रूञ्जीवन् भद्राणि पश्यति ।

मृतस्य भद्राणि कुतः कौरवेय कुतो जयः ॥ ३ ९ ॥

‘ कुरुनन्दन! मरा हुआ मनुष्य कभी शत्रुओंपर विजय नहीं पाता । जो जीवित रहता है

वह कभी सुखके दिन भी देखता है । मरे हुए को कहाँ सुख और कहाँ विजय? ॥ ३ ९ ॥

न कालोऽद्य विषादस्य भयस्य मरणस्य वा ।

परिष्वज्याब्रवीच्चैनं भुजाभ्यां स महाभुजः ॥ ४० ॥

' यह समय शोक मनाने, भयभीत होने अथवा मरनेका नहीं है ', यह कहकर महाबाहु कर्णने दोनों भुजाओंसे खींचकर दुर्योधनको हृदयसे लगा लिया और कहा - ॥ ४० ॥

उत्तिष्ठ राजन् किं शेषे कस्माच्छोचसि शत्रुहन् ।

शत्रून् प्रताप्य वीर्येण स कथं मृत्युमिच्छसि ॥ ४१ ॥

' शत्रुघाती नरेश! उठो, क्यों सो रहे हो? किसलिये शोक करते हो? अपने पराक्रमसे शत्रुओंको संतप्त करके अब मृत्युकी इच्छा क्यों करते हो? ॥ ४१ ॥

अथवा ते भयं जातं दृष्ट्वार्जुनपराक्रमम् ।

सत्यं ते प्रतिजानामि वधिष्यामि रणेऽर्जुनम् ॥ ४२ ॥

' अथवा यदि तुम्हें अर्जुनका पराक्रम देखकर भय हो गया हो तो मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि मैं युद्धमें अर्जुनको अवश्य मार डालूँगा ॥ ४२ ॥

गते त्रयोदशे वर्षे सत्येनायुधमालभे ।

आनयिष्याम्यहं पार्थान् वशं तव जनाधिप ॥ ४३ ॥

' महाराज! मैं धनुष छूकर सचाईके साथ यह शपथ ग्रहण करता हूँ कि तेरहवाँ वर्ष व्यतीत होते ही पाण्डवोंको तुम्हारे वशमें ला दूँगा ' ॥ ४३ ॥

एवमुक्तस्तु कर्णेन दैत्यानां वचनात् तथा ।

प्रणिपातेन चाप्येषामुदतिष्ठत् सुयोधनः ॥ ४४ ॥

कर्णके ऐसा कहनेपर और इन दुःशासन आदि भाइयोंके प्रणामपूर्वक अनुनय--विनय करनेपर दैत्योंके वचनोंका स्मरण करके दुर्योधन अपने आसनसे उठ खड़ा हुआ ॥ ४४ ॥

दैत्यानां तद् वचः श्रुत्वा हृदि कृत्वा स्थिरां मतिम् ।

ततो मनुजशार्दूलो योजयामास वाहिनीम् ॥ ४५ ॥

रथनागाश्वकलिलां पदातिजनसंकुलाम् ।

गङ्गौघप्रतिमा राजन् सा प्रयाता महाचमूः ॥ ४६ ॥

दैत्योंके पूर्वोक्त कथनको याद करके नरश्रेष्ठ दुर्योधनने पाण्डवोंसे युद्ध करनेका पक्का विचार कर लिया और फिर हस्तिनापुर जानेके लिये रथ, हाथी, घोड़े और पैदल सैनिकोंसे

पृष्ठ 1704

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युक्त अपनी चतुरंगिणी सेनाको तैयार होनेकी आज्ञा दी । राजन्! वह विशाल वाहिनी गंगाके प्रवाहके समान चलने लगी ॥ ४५-४६ ॥

श्वेतच्छत्रैः पताकाभिश्चामरैश्च सुपाण्डुरैः ।

रथैर्नागैः पदातैश्च शुशुभेऽतीव संकुला ॥ ४७ ॥

व्यपेताभ्रघने काले द्यौरिवाव्यक्तशारदी । श्वेत छत्र, पताका, शुभ चँवर, रथ, हाथी और पैदल योद्धाओंसे भरी हुई वह कौरव-सेना शरत्कालमें कुछ - कुछ व्यक्त शारदीय सुषमासे सुशोभित आकाशकी भाँति शोभा पा रही थी ॥ ४७ ॥

जयाशीर्भिर्द्विजेन्द्रैः स स्तूयमानोऽधिराजवत् ॥ ४८ ॥

गृह्णन्नञ्जलिमालाश्च धार्तराष्ट्रो जनाधिपः ।

सुयोधनो ययावग्रे श्रिया परमया ज्वलन् ॥ ४ ९ ॥

धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन सम्राट्की भाँति श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके मुखसे विजयसूचक आशीर्वादोंके साथ अपनी स्तुति सुनता तथा लोगोंकी प्रणामाञ्जलियोंको ग्रहण करता हुआ उत्कृष्ट शोभासे प्रकाशित हो आगे- आगे चला ॥ ४८-४९ ॥

कर्णेन सार्धं राजेन्द्र सौबलेन च देविना ।

दुःशासनादयश्चास्य भ्रातरः सर्व एव ते ॥ ५० ॥

भूरिश्रवाः सोमदत्तो महाराजश्च बाह्लिकः ।

रथैर्नानाविधाकारैर्हयैर्गजवरैस्तथा ॥ ५१ ॥

प्रयान्तं नृपसिंहं तमनुजग्मुः कुरूद्वहाः ।

कालेनाल्पेन राजेन्द्र स्वपुरं विविशुस्तदा ॥ ५२ ॥

राजेन्द्र! कर्ण तथा द्यूतकुशल शकुनिके साथ दुःशासन आदि सब भाई, भूरिश्रवा, सोमदत्त तथा महाराज बाह्लीक- ये सभी कुरुकुलरत्न नाना प्रकारके रथों, गजराजों तथा घोड़ोंपर बैठकर राजसिंह दुर्योधनके पीछे - पीछे चल रहे थे । जनमेजय! थोड़े समयमें उन सबने अपनी राजधानी हस्तिनापुरमें प्रवेश किया ॥ ५०–५२ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनपुरप्रवेशे द्विपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनका नगरमें प्रवेशविषयक दो सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५२ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठका १३ श्लोक मिलाकर कुल ५३३ श्लोक हैं )

पृष्ठ 1705

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त्रिपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः भीष्मका कर्णकी निन्दा करते हुए दुर्योधनको पाण्डवोंसे संधि करनेका परामर्श देना, कर्णके क्षोभपूर्ण वचन और दिग्विजयके लिये प्रस्थान जनमेजय उवाच

वसमानेषु पार्थेषु वने तस्मिन् महात्मसु ।

धार्तराष्ट्रा महेष्वासाः किमकुर्वत सत्तमाः ॥ १ ॥

जनमेजय बोले- मुने! जब महात्मा पाण्डव उस वनमें निवास करते थे, उन दिनों महान् धनुर्धर नरश्रेष्ठ धृतराष्ट्र - पुत्रोंने क्या किया? ॥ १ ॥

कर्णो वैकर्तनश्चैव शकुनिश्च महाबलः ।

भीष्मद्रोणकृपाश्चैव तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ २ ॥

सूर्यपुत्र कर्ण, महाबली शकुनि, भीष्म, द्रोण तथा कृपाचार्य – इन सबने कौन - सा कार्य किया? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ २ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं गतेषु पार्थेषु विसृष्टे च सुयोधने ।

आगते हास्तिनपुरं मोक्षिते पाण्डुनन्दनैः ॥ ३ ॥

भीष्मोऽब्रवीन्महाराज धार्तराष्ट्रमिदं वचः । वैशम्पायनजीने कहा - महाराज! पाण्डवोंद्वारा गन्धर्वोंसे छुटकारा मिल जानेपर जब दुर्योधन विदा होकर हस्तिनापुर पहुँच गया और पाण्डव जाकर पूर्ववत् वनमें ही रहने लगे तब भीष्मजीने धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनसे यह बात कही - ॥ ३३ ॥

पृष्ठ 1706

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उक्तं तात यथा पूर्वं गच्छतस्ते तपोवनम् ॥ ४ ॥

गमनं मे न रुचितं तव तत्र कृतं च ते । ' तात! तुम्हारे तपोवन जाते समय जैसा कि मैंने पहले ही कह दिया था, वही आज भी कह रहा हूँ । मुझे तुम्हारा वहाँ जाना अच्छा नहीं लगा और वहाँ जाकर तुमने जो कुछ किया, वह भी पसंद नहीं आया ॥ ४३ ॥

ततः प्राप्तं त्वया वीर ग्रहणं शत्रुभिर्बलात् ॥ ५ ॥

मोक्षितश्चासि धर्मज्ञैः पाण्डवैर्न च लज्जसे । ' वीर! शत्रुओंने तुम्हें वहाँ बलपूर्वक बंदी बना लिया और धर्मज्ञ पाण्डवोंने तुम्हें उस संकटसे छुड़ाया है । क्या अब भी तुम्हें लज्जा नहीं आती? ॥ ५३ ॥

प्रत्यक्षं तव गान्धारे ससैन्यस्य विशाम्पते ॥ ६ ॥

सूतपुत्रोऽपयाद् भीतो गन्धर्वाणां तदा रणात् । ‘ गान्धारीनन्दन! सेनासहित तुम्हारे सामने ही सूतपुत्र कर्ण गन्धर्वोंसे भयभीत हो युद्धभूमिसे भाग निकला ॥ ६३ ॥

क्रोशतस्तव राजेन्द्र ससैन्यस्य नृपात्मज ॥ ७ ॥

दृष्टस्ते विक्रमश्चैव पाण्डवानां महात्मनाम् ।

पृष्ठ 1707

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राजेन्द्र! राजकुमार! जब सेनासहित तुम चीखते - चिल्लाते रहे उस समय महात्मा पाण्डवोंने जो पराक्रम कर दिखाया था वह भी तुमने प्रत्यक्ष देखा है ॥ ७३ ॥

कर्णस्य च महाबाहो सूतपुत्रस्य दुर्मतेः ॥ ८ ॥

न चापि पादभाक् कर्णः पाण्डवानां नृपोत्तम ।

धनुर्वेदे च शौर्ये च धर्मे वा धर्मवत्सल ॥ ९ ॥

महाबाहो! उस समय खोटी बुद्धिवाले सूतपुत्र कर्णका पराक्रम भी तुमसे छिपा नहीं था । नृपश्रेष्ठ! धर्मवत्सल! मेरा तो ऐसा विश्वास है कि धनुर्वेद, शौर्य और धर्माचरणमें कर्ण पाण्डवोंकी अपेक्षा चौथाई योग्यता भी नहीं रखता है ॥ ८ -९ ॥

तस्मादहं क्षमं मन्ये पाण्डवैस्तैर्महात्मभिः ।

संधिं संधिविदां श्रेष्ठ कुलस्यास्य विवृद्धये ॥ १० ॥

‘ अतः संधिवेत्ताओंमें श्रेष्ठ नरेश! मैं तो इस कुलके अभ्युदयके लिये उन महात्मा पाण्डवोंके साथ संधि कर लेना ही उचित समझता हूँ' ॥ १० ॥

एवमुक्तश्च भीष्मेण धार्तराष्ट्रो जनेश्वरः ।

प्रहस्य सहसा राजन् विप्रतस्थे ससौबलः ॥ ११ ॥

राजन्! भीष्मके ऐसा कहनेपर राजा दुर्योधन हँस पड़ा और शकुनिके साथ सहसा वहाँसे अन्यत्र चला गया ॥ ११ ॥

तं तु प्रस्थितमाज्ञाय कर्णदुःशासनादयः ।

अनुजग्मुर्महेष्वासा धार्तराष्ट्रं महाबलम् ॥ १२ ॥

महाबली दुर्योधनको अन्यत्र गया जान कर्ण और दुःशासन आदि महान् धनुर्धरोंने उसका अनुसरण किया ॥ १२ ॥

तांस्तु सम्प्रस्थितान् दृष्ट्वा भीष्मः कुरुपितामहः ।

लज्जया व्रीडितो राजन् जगाम स्वं निवेशनम् ॥ १३ ॥

राजन्! उन सबको वहाँसे प्रस्थान करते देख कुरुकुलपितामह भीष्म लज्जित होकर अपने आवास- स्थानको चले गये ॥ १३ ॥

गते भीष्मे महाराज धार्तराष्ट्रो जनेश्वरः ।

पुनरागम्य तं देशममन्त्रयत मन्त्रिभिः ॥ १४ ॥

महाराज! भीष्मके चले जानेपर राजा दुर्योधन फिर उसी स्थानपर लौट आया और अपने मन्त्रियोंके साथ गुप्त मन्त्रणा करने लगा-- ॥ १४ ॥

किमस्माकं भवेच्छ्रेयः किं कार्यमवशिष्यते ।

कथं च सुकृतं तत् स्यान्मन्त्रयामोऽद्य यद्धितम् ॥ १५ ॥

‘ मित्रो! क्या करनेसे हमलोगोंकी भलाई होगी? हमारे लिये कौन - सा कार्य शेष रह गया है? कैसे करनेसे हमारा कार्य शुभ परिणामजनक होगा? क्या करनेमें हमारा हित है? आज इसी विषयपर हमलोगोंको विचार करना है ' ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1708

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कर्णउवाच

दुर्योधन निबोधेदं यत् त्वां वक्ष्यामि कौरव ।

भीष्मोऽस्मान् निन्दति सदा पाण्डवांश्च प्रशंसति ॥ १६ ॥

कर्ण बोला – कुरुकुलरत्न दुर्योधन! मैं तुमसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसपर ध्यान दो ।

भीष्म सदा हमारी निन्दा और पाण्डवोंकी प्रशंसा करते रहते हैं ॥ १६ ॥

त्वद् द्वेषाच्च महाबाहो ममापि द्वेष्टुमर्हति ।

विगर्हते च मां नित्यं त्वत्समीपे नरेश्वर ॥ १७ ॥

महाबाहो! वे तुम्हारे प्रति द्वेष होनेसे मुझसे भी द्वेष रखते हैं । नरेश्वर! तुम्हारे सामने वे सदा मेरी निन्दा ही किया करते हैं ॥ १७ ॥

सोऽहं भीष्मवचस्तद् वै न मृष्यामीह भारत ।

त्वत्समक्षं यदुक्तं च भीष्मेणामित्रकर्षण ॥ १८ ॥

पाण्डवानां यशो राजंस्तव निन्दां च भारत ।

अनुजानीहि मां राजन् सभृत्यबलवाहनम् ॥ १९ ॥

भारत! तुम्हारे सामने भीष्मने जो कुछ कहा है, उसे मैं सहन नहीं कर सकता । शत्रुदमन! भरतकुलनन्दन! उन्होंने जो पाण्डवोंका यश गाया और तुम्हारी निन्दा की है, यह मेरे लिये असह्य है । अतः तुम मुझे सेवक, सेना तथा सवारियोंके साथ दिग्विजय करनेकी आज्ञा दो ॥

जेष्यामि पृथिवीं राजन् सशैलवनकाननाम् ।

जिता च पाण्डवैर्भूमिश्चतुर्भिर्बलशालिभिः ॥ २० ॥

तामहं ते विजेष्यामि एक एव न संशयः ।

सम्पश्यतु सुदुर्बुद्धिर्भीष्मः कुरुकुलाधमः ॥ २१ ॥

राजन्! मैं पर्वत, वन और काननोंसहित सारी पृथ्वीको जीत लूँगा। जिस भूमिपर चार बलशाली पाण्डवोंने मिलकर विजय पायी है उसे मैं तुम्हारे लिये अकेला ही जीत लूँगा, इसमें संशय नहीं है । खोटी बुद्धिवाला कुरु- कुलाधम भीष्म मेरे इस पराक्रमको अपनी आँखों देखे ॥

अनिन्द्यं निन्दते यो हि अप्रशंस्यं प्रशंसति ।

स पश्यतु बलं मेऽद्य आत्मानं तु विगर्हतु ॥ २२ ॥

जो अनिन्दनीयकी निन्दा और अप्रशंसनीयकी प्रशंसा करता है, वह भीष्म आज मेरा बल देख ले और अपने - आपको धिक्कारे ॥ २२ ॥

अनुजानीहि मां राजन् ध्रुवो हि विजयस्तव ।

प्रतिजानामि ते सत्यं राजन्नायुधमालभे ॥ २३ ॥

राजन्! मुझे आज्ञा दो । तुम्हारी विजय निश्चित है । यह मैं तुमसे प्रतिज्ञापूर्वक सत्य कहता हूँ और शस्त्र छूकर शपथ करता हूँ ॥ २३ ॥

पृष्ठ 1709

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तच्छ्रुत्वा तु वचो राजन् कर्णस्य भरतर्षभ ।

प्रीत्या परमया युक्तः कर्णमाह नराधिपः ॥ २४ ॥

भरतश्रेष्ठ राजन्! कर्णकी यह बात सुनकर राजा दुर्योधनने बड़ी प्रसन्नताके साथ उससे कहा— ॥ २४ ॥

धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे त्वं महाबलः ।

हितेषु वर्तसे नित्यं सफलं जन्म चाद्य मे ॥ २५ ॥

' वीर! मैं धन्य हूँ, तुम्हारे अनुग्रहका पात्र हूँ; क्योंकि तुम जैसे महाबली सुहृद् सदा मेरे

हितसाधनमें लगे रहते हैं । आज मेरा जन्म सफल हो गया ॥ २५ ॥

यदा च मन्यसे वीर सर्वशत्रुनिबर्हणम् ।

तदा निर्गच्छ भद्रं ते ह्यनुशाधि च मामिति ॥ २६ ॥

‘ वीरवर! जब तुम्हें विश्वास है कि तुम्हारे द्वारा सब शत्रुओंका संहार हो सकता है तब तुम दिग्विजयके लिये यात्रा करो । तुम्हारा कल्याण हो । मुझे आवश्यक व्यवस्थाके लिये आज्ञा दो ॥ २६ ॥

एवमुक्तस्तदा कर्णो धार्तराष्ट्रेण धीमता ।

सर्वमाज्ञापयामास प्रायात्रिकमरिंदम ॥ २७ ॥

जनमेजय! बुद्धिमान् दुर्योधनके इस प्रकार कहनेपर कर्णने यात्रासम्बन्धी सारी आवश्यक तैयारीके लिये आज्ञा दे दी ॥ २७ ॥

प्रययौ च महेष्वासो नक्षत्रे शुभदैवते ।

शुभे तिथौ मुहूर्ते च पूज्यमानो द्विजातिभिः ॥ २८ ॥

मङ्गलैश्च शुभैः स्नातो वाग्भिश्चापि प्रपूजितः ।

नादयन् रथघोषेण त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ २९ ॥

तदनन्तर महान् धनुर्धर कर्णने मांगलिक शुभ पदार्थोंसे जलके द्वारा स्नान करके द्विजातियोंकी आशीर्वादमय वाणीसे सम्मानित एवं प्रशंसित हो शुभ नक्षत्र, शुभ तिथि और शुभ मुहूर्तमें यात्रा की । उस समय वह अपने रथकी घर्घराहटसे चराचर भूतोंसहित समस्त त्रिलोकीको प्रतिध्वनित कर रहा था ॥ २८-२९ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि कर्णदिग्विजये त्रिपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५३ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें कर्णदिग्विजयविषयक दो सौ तिरपनवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २५३ ॥

पृष्ठ 1710

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चतुष्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः कर्णके द्वारा सारी पृथ्वीपर दिग्विजय और हस्तिनापुरमें उसका सत्कार वैशम्पायन उवाच

ततः कर्णो महेष्वासो बलेन महता वृतः ।

द्रुपदस्य पुरं रम्यं रुरोध भरतर्षभ ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - भरतश्रेष्ठ जनमेजय! तदनन्तर महाधनुर्धर कर्णने अपनी विशाल सेनाके साथ जाकर राजा द्रुपदके रमणीय नगरको चारों ओरसे घेर लिया ॥ १ ॥

युद्धेन महता चैनं चक्रे वीरं वशानुगम् ।

सुवर्णं रजतं चापि रत्नानि विविधानि च ॥ २ ॥

करं च दापयामास द्रुपदं नृपसत्तम ।

तं विनिर्जित्य राजेन्द्र राजानस्तस्य येऽनुगाः ॥ ३ ॥

तान् सर्वान् वशगांश्चक्रे करं चैनानदापयत् । फिर महान् युद्ध करके उसने वीर द्रुपदको अपने वशमें कर लिया और उन्हें सोना, चाँदी, भाँति - भाँतिके रत्न एवं कर देनेके लिये विवश किया । नृपश्रेष्ठ महाराज जनमेजय! इस प्रकार द्रुपदको जीतकर कर्णने उनके अनुयायी नरेशोंको भी अपने अधीन कर लिया और उन सबसे भी कर वसूल किया ॥ २-३३ ॥ अथोत्तरां दिशं गत्वा वशे चक्रे नराधिपान् ॥ ४ ॥

भगदत्तं च निर्जित्य राधेयो गिरिमारुहत् ।

हिमवन्तं महाशैलं युध्यमानश्च शत्रुभिः ॥ ५ ॥

प्रययौ च दिशः सर्वान् नृपतीन् वशमानयत् ।

स हैमवतिकान् जित्वा करं सर्वानदापयत् ॥ ६ ॥

तत्पश्चात् उसने उत्तर दिशामें जाकर वहाँके राजाओंको अपने वशमें कर लिया । भगदत्तको जीतकर राधानन्दन कर्ण शत्रुओंसे युद्ध करता हुआ महान् पर्वत हिमालयपर आरूढ़ हुआ । वहाँसे सब दिशाओंमें जाकर उसने समस्त राजाओंको अपने अधीन किया और हिमालयप्रदेशके समस्त भूपालोंको जीतकर उनसे कर लिया ॥ ४–६ ॥

नेपालविषये ये च राजानस्तानवाजयत् ।

अवतीर्य ततः शैलात् पूर्वां दिशमभिद्रुतः ॥ ७ ॥

तदनन्तर नेपालदेशमें जो राजा थे, उनपर भी विजय प्राप्त की, फिर हिमालय पर्वतसे उतरकर उसने पूर्व दिशाकी ओर धावा किया ॥ ७ ॥