श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1711–1720
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1711–1720
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अङ्गान् वङ्गान् कलिंगांश्च शुण्डिकान् मिथिलानथ ।
मागधान् कर्कखण्डांश्च निवेश्य विषयेऽऽत्मनः ॥ ८ ॥
आवशीरांश्च योध्यांश्च अहिक्षत्रं च निर्जयत् ।
पूर्वां दिशं विनिर्जित्य वत्सभूमिं तथागमत् ॥ ९ ॥
अंग, वंग, कलिंग, शुण्डिक, मिथिला, मगध और कर्कखण्ड– इन सब देशोंको अपने राज्यमें मिलाकर कर्णने आवशीर, योध्य और अहिक्षत्र देशको भी जीत लिया । इस प्रकार पूर्व दिशापर विजय प्राप्त करके उसने वत्सभूमिमें पदार्पण किया ॥ ८- ९ ॥
वत्सभूमिं विनिर्जित्य केवलां मृत्तिकावतीम् ।
मोहनं पत्तनं चैव त्रिपुरीं कोसलां तथा ॥ १० ॥
एतान् सर्वान् विनिर्जित्य करमादाय सर्वशः । वत्सभूमिको जीतकर कर्णने केवला, मृत्तिकावती, मोहन, पत्तन, त्रिपुरी तथा कोसला -इन सब देशोंको अपने अधिकारमें किया और सबसे कर लेकर ( दक्षिण दिशाकी ओर) प्रस्थान किया ॥ १० ॥
दक्षिणां दिशमास्थाय कर्णो जित्वा महारथान् ॥ ११ ॥
रुक्मिणं दाक्षिणात्येषु योधयामास सूतजः ।
स युद्धं तुमुलं कृत्वा रुक्मी प्रोवाच सूतजम् ॥ १२ ॥
दक्षिण दिशामें पहुँचकर कर्णने बड़े - बड़े महारथियोंको जीता । दाक्षिणात्योंमें रुक्मीके साथ कर्णने युद्ध किया । रुक्मीने पहले तो बड़ा भयंकर युद्ध किया, फिर उसने सूतपुत्र कर्णसे कहा ॥ ११-१२ ॥
प्रीतोऽस्मि तव राजेन्द्र विक्रमेण बलेन च ।
न ते विघ्नं करिष्यामि प्रतिज्ञां समपालयम् ॥ १३ ॥
' राजेन्द्र! मैं तुम्हारे बल और पराक्रमसे बहुत प्रसन्न हूँ । अतः तुम्हारे कार्यमें विघ्न नहीं डालूँगा । थोड़ी देर युद्ध करके मैंने केवल क्षत्रियधर्मका पालन किया है ॥ १३ ॥
प्रीत्या चाहं प्रयच्छामि हिरण्यं यावदिच्छसि ।
समेत्य रुक्मिणा कर्णः पाण्ड्यंशैलं च सोऽगमत् ॥ १४ ॥
' तुम जितना सोना ले जाना चाहो उतना मैं प्रसन्नतापूर्वक दे रहा हूँ। ' इस प्रकार रुक्मीसे मिलकर कर्णने पाण्ड्यदेश तथा श्रीशैलकी ओर प्रस्थान किया ॥
स केरलं रणे चैव नीलं चापि महीपतिम् ।
वेणुदारिसुतं चैव ये चान्ये नृपसत्तमाः ॥ १५ ॥
दक्षिणस्यां दिशि नृपान् करान् सर्वानदापयत् । उसने रणभूमिमें केरल नरेश, राजा नील तथा वेणुदारिपुत्रको हराया और दक्षिण दिशामें अन्य जितने प्रमुख भूपाल थे, उन सबको जीतकर उनसे कर वसूल किया ॥ १५३ ||
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शैशुपालिं ततो गत्वा विजिग्ये सूतनन्दनः ॥ १६ ॥
पार्श्वस्थांश्चापि नृपतीन् वशे चक्रे महाबलः । इसके बाद सूतपुत्र महाबली कर्णने चेदिदेशमें जाकर शिशुपालके पुत्रको हराया और उसके पार्श्ववर्ती नरेशोंको भी अपने अधीन कर लिया ॥ १६३ ॥
आवन्त्यांश्च वशे कृत्वा साम्ना च भरतर्षभ ।
वृष्णिभिः सह संगम्य पश्चिमामपि निर्जयत् ॥ १७ ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर उसने सामनीतिके द्वारा अवन्तीदेशके राजाओंको वशमें करके वृष्णिवंशी यादवोंसे हिल- मिलकर पश्चिम दिशापर भी विजय प्राप्त की ॥ १७ ॥
वारुणीं दिशमागम्य यवनान् बर्बरांस्तथा ।
नृपान् पश्चिमभूमिस्थान् दापयामास वै करान् ॥ १८ ॥
इसके बाद पश्चिम दिशामें जाकर यवन तथा बर्बर राजाओंको, जो पश्चिम देशके ही निवासी थे, पराजित करके उनसे कर लिया ॥ १८ ॥
विजित्य पृथिवीं सर्वां स पूर्वापरदक्षिणाम् ।
सम्लेच्छाटविकान् वीरः सपर्वतनिवासिनः ॥ १ ९ ॥
भद्रान् रोहितकांश्चैव आग्रेयान् मालवानपि ।
गणान् सर्वान् विनिर्जित्य नीतिकृत् प्रहसन्निव ॥ २० ॥
शशकान् यवनांश्चैव विजिग्ये सूतनन्दनः । इस प्रकार पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण सब दिशाओंकी समूची पृथ्वीको जीतकर म्लेच्छ, वनवासी, पर्वतीय, भद्र, रोहितक, आग्रेय तथा मालव आदि समस्त गणराज्योंको परास्त किया । इसके बाद नीतिके अनुसार काम करनेवाले सूतनन्दन कर्णने हँसते - हँसते शशक और यवन राजाओंको भी जीत लिया ॥ १ ९- २०१३ ॥ नग्नजित्प्रमुखांश्चैव गणान् जित्वा महारथान् ॥ २१ ॥
एवं स पृथिवीं सर्वां वशे कृत्वा महारथः ।
विजित्य पुरुषव्याघ्रो नागसाह्वयमागमत् ॥ २२ ॥
इस प्रकार पुरुषसिंह महारथी कर्ण नग्नजित् आदि महारथी नरेशसमुदायोंको जीतकर सारी पृथ्वीको पराजित करके अपने वशमें कर लेनेके पश्चात् हस्तिनापुरको लौट आया ॥ २१-२२ ॥
तमागतं महेष्वासं धार्तराष्ट्रो जनाधिपः ।
प्रत्युद्गम्य महाराज सभ्रातृपितृबान्धवः ॥ २३ ॥
अर्चयामास विधिना कर्णमाहवशोभिनम् ।
आश्रावयच्च तत् कर्म प्रीयमाणो जनेश्वरः ॥ २४ ॥
महाराज! रणमें शोभा पानेवाले महाधनुर्धर कर्णको आया हुआ जान भाई, पिता तथा बन्धु - बान्धवोंसहित राजा दुर्योधनने उसकी अगवानी की और विधिपूर्वक उसका स्वागत-
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सत्कार किया । तत्पश्चात् दुर्योधनने अत्यन्त प्रसन्न होकर कर्णके दिग्विजयकी सब ओर घोषणा करा दी ॥
यन्न भीष्मान्न च द्रोणान्न कृपान्न च बाह्निकात् ।
प्राप्तवानस्मि भद्रं ते त्वत्तः प्राप्तं मया हि तत् ॥ २५ ॥
तत्पश्चात् उसने कर्णसे कहा- ' वीरवर! तुम्हारा कल्याण हो । मुझे भीष्मजीसे, आचार्य द्रोणसे, कृपाचार्यसे तथा बाह्लिकसे भी जो वस्तु नहीं मिली थी, वह तुमसे प्राप्त हो गयी ॥ २५ ॥
बहुना च किमुक्तेन शृणु कर्ण वचो मम ।
सनाथोऽस्मि महाबाहो त्वया नाथेन सत्तम ॥ २६ ॥
‘ महाबाहु कर्ण! अधिक कहनेसे क्या लाभ? तुम मेरी बात सुनो । सत्पुरुषरत्न! तुम्हें अपना नाथ ( सहायक ) पाकर ही मैं सनाथ हूँ ॥ २६ ॥
न हि ते पाण्डवाः सर्वे कलामर्हन्ति षोडशीम् ।
अन्ये वा पुरुषव्याघ्र राजानोऽभ्युदितोदिताः ॥ २७ ॥
‘ पुरुषसिंह! वे समस्त पाण्डव अथवा अन्य श्रेष्ठतम नरेश तुम्हारी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते ॥ २७ ॥
स भवान् धृतराष्ट्रं तं गान्धारीं च यशस्विनीम् ।
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पश्य कर्ण महेष्वास अदितिं वज्रभृद् यथा ॥ २८ ॥
' महाधनुर्धर कर्ण! अब तुम मेरे पूज्य पिता धृतराष्ट्र तथा यशस्विनी माता गान्धारीका उसी प्रकार दर्शन करो, जैसे वज्रधारी इन्द्र माता अदितिका दर्शन करते हैं ' ॥ २८ ॥
ततो हलहलाशब्दः प्रादुरासीद् विशाम्पते ।
हाहाकाराश्च बहवो नगरे नागसाह्वये ॥ २ ९ ॥
जनमेजय! तदनन्तर हस्तिनापुर नगरमें सब ओर बड़ा भारी कोलाहल मच गया ।
अनेक प्रकारके हाहाकार सुनायी देने लगे ॥ २ ९ ॥
केचिदेनं प्रशंसन्ति निन्दन्ति स्म तथापरे ।
तूष्णीमासंस्तथा चान्ये नृपास्तत्र जनाधिप ॥ ३० ॥
राजन्! कोई तो कर्णकी प्रशंसा करते थे और दूसरे उसकी निन्दा । अन्य कितने ही राजा निन्दा और प्रशंसा कुछ भी न करके मौन थे ॥ ३० ॥
एवं विजित्य राजेन्द्र कर्णः शस्त्रभृतां वरः ।
सपर्वतवनाकाशां ससमुद्रां सनिष्कुटाम् ॥ ३१ ॥
देशैरुच्चावचैः पूर्णां पत्तनैर्नगरैरपि ।
द्वीपैश्चानूपसम्पूर्णैः पृथिवीं पृथिवीपते ॥ ३२ ॥
कालेन नातिदीर्घेण वशे कृत्वा तु पार्थिवान् ।
अक्षयं धनमादाय सूतजो नृपमभ्ययात् ॥ ३३ ॥
महाराज! इस प्रकार शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ सूतपुत्र कर्णने पर्वत, वन, खुले स्थान, समुद्र, उद्यान, ऊँचे - नीचे देश, पुर और नगर, द्वीप और जलयुक्त प्रदेशोंसे युक्त सारी पृथ्वीको जीतकर थोड़े ही समयमें समस्त राजाओंको वशमें कर लिया और उनसे अटूट धनराशि लेकर वह राजा धृतराष्ट्रके समीप आया ॥ ३१–३३ ॥
प्रविश्य च गृहं राजन्नभ्यन्तरमरिंदम ।
गान्धारीसहितं वीरो धृतराष्ट्रं ददर्श सः ॥ ३४ ॥
पुत्रवच्च नरव्याघ्र पादौ जग्राह धर्मवित् ।
धृतराष्ट्रेण चाश्लिष्य प्रेम्णा चापि विसर्जितः ॥ ३५ ॥
शत्रुसूदन जनमेजय! धर्मज्ञ वीर कर्णने अन्तःपुरमें प्रवेश करके गान्धारीसहित धृतराष्ट्रका दर्शन किया और पुत्रकी भाँति उसने उनके दोनों चरण पकड़ लिये । धृतराष्ट्रने भी उसे प्रेमपूर्वक हृदयसे लगाकर विदा किया ॥
तदा प्रभृति राजा च शकुनिश्चापि सौबलः ।
जानते निर्जितान् पार्थान् कर्णेन युधि भारत ॥ ३६ ॥
भारत! तबसे राजा दुर्योधन तथा सुबलपुत्र शकुनि युद्धमें कर्णद्वारा पाण्डवोंको पराजित हुआ ही समझने लगे ॥
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि कर्णदिग्विजये चतुष्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५४ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें कर्णदिग्विजयसम्बन्ध॑ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५४ ॥
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पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः कर्ण और पुरोहितकी सलाहसे दुर्योधनकी वैष्णवयज्ञके लिये तैयारी वैशम्पायन उवाच
जित्वा तु पृथिवीं राजन् सूतपुत्रो जनाधिप ।
अब्रवीत् परवीरघ्नो दुर्योधनमिदं वचः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - महाराज जनमेजय! शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सूतपुत्र कर्णने सारी पृथ्वीको जीतकर दुर्योधनसे इस प्रकार कहा ॥ १ ॥
कर्णउवाच
दुर्योधन निबोधेदं यत् त्वां वक्ष्यामि कौरव ।
श्रुत्वा वाचं तथा सर्वं कर्तुमर्हस्यरिंदम ॥ २ ॥
कर्ण बोला— कुरुनन्दन दुर्योधन! मैं जो कहता हूँ, उसे सुनो । शत्रुदमन! मेरी बात सुनकर उसके अनुसार सब कुछ करो ॥ २ ॥
तवाद्य पृथिवी वीर निःसपत्ना नृपोत्तम ।
तां पालय यथा शक्रो हतशत्रुर्महामनाः ॥ ३ ॥
वीर! नृपश्रेष्ठ! आज सारी पृथ्वी तुम्हारे लिये निष्कण्टक हो गयी है । जैसे महामना इन्द्र अपने शत्रुओंका संहार करके त्रिलोकीका पालन करते हैं, उसी प्रकार तुम भी इस पृथ्वीका पालन करो ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु कर्णेन कर्णं राजाब्रवीत् पुनः ।
न किंचिद् दुर्लभं तस्य यस्य त्वं पुरुषर्षभ ॥ ४ ॥
सहायश्चानुरक्तश्च मदर्थं च समुद्यतः ।
अभिप्रायस्तु मे कश्चित् तं वै शृणु यथातथम् ॥ ५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कर्णके ऐसा कहनेपर राजा दुर्योधनने पुनः उससे कहा — ‘ पुरुषश्रेष्ठ! जिसके सहायक तुम हो एवं जिसपर तुम्हारा अनुराग है, उसके लियेकुछ भी दुर्लभ नहीं है । तुम सदा मेरे हितके लिये उद्यत रहते हो । मेरा एक मनोरथ है, जिसे यथार्थरूपसे बतलाता हूँ, सुनो ' ॥ ४-५ ॥
राजसूयं पाण्डवस्य दृष्ट्वा क्रतुवरं महत् ।
मम स्पृहा समुत्पन्ना तां सम्पादय सूतज ॥ ६ ॥
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सूतनन्दन! ‘ पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके उस क्रतुश्रेष्ठ महान् राजसूययज्ञको देखकर मेरे मनमें
भी उसे करनेकी इच्छा जाग उठी है । तुम इस इच्छाको पूर्ण करो ' ॥ ६ ॥
एवमुक्तस्ततः कर्णो राजानमिदमब्रवीत् ।
तवाद्य पृथिवीपाला वश्याः सर्वे नृपोत्तम ॥ ७ ॥
आहूयन्तां द्विजवराः सम्भाराश्च यथाविधि ।
सम्भ्रियन्तां कुरुश्रेष्ठ यज्ञोपकरणानि च ॥ ८ ॥
दुर्योधनकी यह बात सुनकर कर्णने उससे यह कहा- 'नृपश्रेष्ठ! इस समय भूपाल तुम्हारे वशमें हैं । कुरुकुलश्रेष्ठ! उत्तम ब्राह्मणोंको बुलाओ और विधिपूर्वक यज्ञकी सामग्रियों तथा उपकरणोंको जुटाओ ॥ ७-८ ॥
ऋत्विजश्च समाहूता यथोक्ता वेदपारगाः ।
क्रियां कुर्वन्तु ते राजन् यथाशास्त्रमरिंदम ॥ ९ ॥
' शत्रुदमन नरेश! तुम्हारे द्वारा आमन्त्रित शास्त्रोक्त योग्यतासे सम्पन्न वेदज्ञ ऋत्विक् विधिके अनुसार सब कार्य करें ॥ ९ ॥
बह्वन्नपानसंयुक्तः सुसमृद्धगुणान्वितः ।
प्रवर्ततां महायज्ञस्तवापि भरतर्षभ ॥ १० ॥
‘ भरतश्रेष्ठ! तुम्हारा महायज्ञ भी प्रचुर अन्नपानकी सामग्रीसे युक्त और अत्यन्त समृद्धिशाली गुणोंसे सम्पन्न हो ' ॥ १० ॥
एवमुक्तस्तु कर्णेन धार्तराष्ट्रो विशाम्पते ।
पुरोहितं समानाय्य वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ११ ॥
राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं समाप्तवरदक्षिणम् ।
आहर त्वं मम कृते यथान्यायं यथाक्रमम् ॥ १२ ॥
राजन्! कर्णके इस प्रकार अनुमोदन करनेपर दुर्योधनने अपने पुरोहितको बुलाकर यह बात कही — ‘ ब्रह्मन्! आप मेरे लिये उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त क्रतुश्रेष्ठ राजसूयका यथोचित रीतिसे विधिपूर्वक अनुष्ठान करवाइये ' ॥ ११-१२ ॥ स एवमुक्तो नृपतिमुवाच द्विजसत्तमः । (ब्राह्मणैः सहितो राजन् ये तत्रासन् समागताः । ) न स शक्यः क्रतुश्रेष्ठो जीवमाने युधिष्ठिरे ॥ १३ ॥
आहर्तुं कौरवश्रेष्ठ कुले तव नृपोत्तम ।
दीर्घायुर्जीवति च ते धृतराष्ट्रः पिता नृप ॥ १४ ॥
अतश्चापि विरुद्धस्ते क्रतुरेष नृपोत्तम । नरेश्वर! राजाके इस प्रकार आदेश देनेपर विप्रवर पुरोहितने वहाँ आये हुए अन्य ब्राह्मणोंके साथ इस प्रकार उत्तर दिया । - ' कौरवश्रेष्ठ! नृपशिरोमणे! राजा युधिष्ठिरके जीते आपके कुलमें इस उत्तम क्रतु राजसूयका अनुष्ठान नहीं किया जा सकता । महाराज! अभी
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आपके दीर्घायु पिता धृतराष्ट्र भी जीवित हैं, इसलिये भी यह यज्ञ आपके लिये अनुकूल नहीं पड़ता ॥ अस्ति त्वन्यन्महत् सत्रं राजसूयसमं प्रभो ॥ १५ ॥
प्रभो! एक- दूसरा महान् यज्ञ है, जो राजसूयकी समानता रखता है ॥ १५ ॥
तेन त्वं यज राजेन्द्र शृणु चेदं वचो मम ।
य इमे पृथिवीपालाः करदास्तव पार्थिव ॥ १६ ॥
ते करान् सम्प्रयच्छन्तु सुवर्णं च कृताकृतम् ।
तेन ते क्रियतामद्य लाङ्गलं नृपसत्तम ॥ १७ ॥
' राजेन्द्र! आप उसीके द्वारा भगवान्का यजन कीजिये और इसके सम्बन्धमें मेरी यह बात सुनिये । पृथ्वीनाथ! ये जो सब भूपाल आपको कर देते हैं, इन्हें आज्ञा दीजिये — ये लोग आपको सुवर्णके बने हुए आभूषण तथा सुवर्ण ' कर' के रूपमें अर्पण करें । नृपश्रेष्ठ! उसी सुवर्णसे आप एक हल तैयार करवाइये ॥ १६-१७ ॥
यज्ञवाटस्य ते भूमिः कृष्यतां तेन भारत ।
तत्र यज्ञो नृपश्रेष्ठ प्रभूतान्नः सुसंस्कृतः ॥ १८ ॥
प्रवर्ततां यथान्यायं सर्वतो ह्यनिवारितः । ‘ भारत! उसी हलसे आपके यज्ञमण्डपकी भूमि जोती जाय । नृपश्रेष्ठ! उस जोती हुई भूमिमें ही उत्तम संस्कारसे सम्पन्न, प्रचुर अन्नपानसे युक्त और सबके लिये खुला हुआ यज्ञ यथोचितरूपसे प्रारम्भ किया जाय ॥ १८ ॥
एष ते वैष्णवो नाम यज्ञः सत्पुरुषोचितः ॥ १ ९ ॥
एतेन नेष्टवान् कश्चिदृते विष्णुं पुरातनम् ।
राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं स्पर्धत्येष महाक्रतुः ॥ २० ॥
‘ यह मैंने आपको वैष्णव नामक यज्ञ बताया है जिसका अनुष्ठान सत्पुरुषोंके लिये सर्वथा उचित है । पुरातन पुरुष भगवान् विष्णुके सिवा और किसीने अबतक इस यज्ञका अनुष्ठान नहीं किया है । यह महायज्ञ क्रतुश्रेष्ठ राजसूयसे टक्कर लेनेवाला है ॥ १ ९ -२० ॥
अस्माकं रोचते चैव श्रेयश्च तव भारत ।
निर्विघ्नश्च भवत्येष सफला स्यात् स्पृहा तव ॥ २१ ॥
‘ भारत! हमलोगोंको तो यही यज्ञ पसंद है और यही आपके लिये कल्याणकारी होगा । यह यज्ञ बिना किसी विघ्न - बाधाके सम्पन्न हो जाता है; अतः तुम्हारी यह यज्ञविषयक अभिलाषा भी इसीसे सफल होगी ॥ २१ ॥
(तस्मादेष महाबाहो तव यज्ञः प्रवर्तताम् । )
एवमुक्तस्तु तैर्विप्रैर्धार्तराष्ट्रो महीपतिः ।
कर्णं च सौबलं चैव भ्रातॄंश्चैवेदमब्रवीत् ॥ २२ ॥
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‘ इसलिये महाबाहो! तुम्हारा यह यज्ञ आरम्भ होना चाहिये । ' उन ब्राह्मणोंके ऐसा कहनेपर राजा दुर्योधनने कर्ण, शकुनि तथा अपने भाइयोंसे इस प्रकार कहा— ॥ २२ ॥
रोचते मे वचः कृत्स्नं ब्राह्मणानां न संशयः ।
रोचते यदि युष्माकं तस्मात् प्रब्रूत मा चिरम् ॥ २३ ॥
‘ बन्धुओ! मुझे तो इन ब्राह्मणोंकी सारी बातें रुचिकर जान पड़ती हैं, इसमें तनिक भी संशय नहीं है । यदि तुमलोगोंको भी यह बात अच्छी लगे तो शीघ्र अपनी सम्मति प्रकट करो ' ॥ २३ ॥
एवमुक्तास्तु ते सर्वे तथेत्यूचुर्नराधिपम् ।
संदिदेश ततो राजा व्यापारस्थान् यथाक्रमम् ॥ २४ ॥
हलस्य करणे चापि व्यादिष्टाः सर्वशिल्पिनः ।
यथोक्तं च नृपश्रेष्ठ कृतं सर्वं यथाक्रमम् ॥ २५ ॥
यह सुनकर उन सबने राजासे ' तथास्तु ' कहकर उसकी हाँ में हाँ मिला दी । तदनन्तर राजा दुर्योधनने काममें लगे हुए सब शिल्पियोंको क्रमशः हल बनानेकी आज्ञा दी । नृपश्रेष्ठ! राजाकी आज्ञा पाकर सब शिल्पियोंने तदनुसार सारा कार्य क्रमशः सम्पन्न किया ॥ २४-२५ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनयज्ञसमारम्भे पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनयज्ञसमारम्भविषयक दो सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५५ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २६ श्लोक हैं )
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षट्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः दुर्योधनके यज्ञका आरम्भ एवं समाप्ति वैशम्पायन उवाच
ततस्तु शिल्पिनः सर्वे अमात्यप्रवराश्च ये ।
विदुरश्च महाप्राज्ञो धार्तराष्ट्रे न्यवेदयन् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर समस्त शिल्पियों, श्रेष्ठ मन्त्रियों तथा परम बुद्धिमान् विदुरजीने दुर्योधनको सूचना दी – ॥ १ ॥
सज्जं क्रतुवरं राजन् प्राप्तकालं च भारत ।
सौवर्णं च कृतं सर्वं लाङ्गलं च महाधनम् ॥ २ ॥
‘ भारत! क्रतुश्रेष्ठ वैष्णवयज्ञकी सारी सामग्री जुट गयी है । यज्ञका नियत समय भी आ पहुँचा है और सोनेका बहुमूल्य हल भी पूर्णरूपसे बन गया है ' ॥ २ ॥
एतच्छ्रुत्वा नृपश्रेष्ठो धार्तराष्ट्रो विशाम्पते ।
आज्ञापयामास नृपः क्रतुराजप्रवर्तनम् ॥ ३ ॥
राजन्! यह सुनकर नृपश्रेष्ठ दुर्योधनने उस क्रतुराजको प्रारम्भ करनेकी आज्ञा दी ॥ ३ ॥
ततः प्रववृते यज्ञः प्रभूतार्थः सुसंस्कृतः ।
दीक्षितश्चापि गान्धारिर्यथाशास्त्रं यथाक्रमम् ॥ ४ ॥
फिर तो उत्तम संस्कारसे युक्त और प्रचुर धन- धान्यसे सम्पन्न वह वैष्णवयज्ञ आरम्भ हुआ । गान्धारीनन्दन दुर्योधनने शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार विधिपूर्वक उस यज्ञकी दीक्षा ली ॥ ४ ॥
प्रहृष्टो धृतराष्ट्रश्च विदुरश्च महायशाः ।
भीष्मो द्रोणः कृप, कर्णो गान्धारी च यशस्विनी ॥ ५ ॥
धृतराष्ट्र, महायशस्वी विदुर, भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण तथा यशस्विनी गान्धारीको इस यज्ञसे बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ५ ॥
निमन्त्रणार्थं दूतांश्च प्रेषयामास शीघ्रगान् ।
पार्थिवानां च राजेन्द्र ब्राह्मणानां तथैव च ॥ ६ ॥
राजेन्द्र! तदनन्तर समस्त भूपालों तथा ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करनेके लिये बहुत- से शीघ्रगामी दूत भेजे ॥ ६ ॥
प्रयाता यथोद्दिष्टा दूतास्त्वरितवाहनाः ।
तत्र कंचित् प्रयातं तु दूतं दुःशासनोऽब्रवीत् ॥ ७ ॥