श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1871–1880

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1871–1880

पृष्ठ 1871

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मयि शिष्ये च भृत्ये च सहाये च समाश्वस ॥ ६ ॥

‘ हम दोनों यहाँसे वानरराज सुग्रीवके पास चलें, जो ऋष्यमूक पर्वतके शिखरपर रहते हैं। मैं आपका शिष्य, सेवक और सहायक हूँ । मेरे रहते आपको धैर्य रखना चाहिये ' ॥ ६ ॥

एवं बहुविधैर्वाक्यैर्लक्ष्मणेन स राघवः ।

उक्तः प्रकृतिमापेदे कार्ये चानन्तरोऽभवत् ॥ ७ ॥

इस प्रकार लक्ष्मणद्वारा अनेक प्रकारके वचनोंसे धैर्य दिलाये जानेपर श्रीरामचन्द्रजी स्वस्थ हुए और आवश्यक कार्यमें लग गये ॥ ७ ॥

निषेव्य वारि पम्पायास्तर्पयित्वा पितॄनपि ।

प्रतस्थतुरुभौ वीरौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ ८ ॥

उन्होंने पम्पासरोवरके जलमें स्नान करके पितरोंका तर्पण किया । फिर उन दोनों वीर भ्राता श्रीराम और लक्ष्मणने वहाँसे प्रस्थान किया ॥ ८ ॥

तावृष्यमूकमभ्येत्य बहुमूलफलद्रुमम् ।

गिर्यग्रे वानरान् पञ्च वीरौ ददृशतुस्तदा ॥ ९ ॥

प्रचुर फल, मूल और वृक्षोंसे भरे हुए ऋष्यमूक पर्वतपर पहुँचकर उन दोनों वीरोंने देखा, पर्वतके शिखरपर पाँच वानर बैठे हुए हैं ॥ ९ ॥

सुग्रीवः प्रेषयामास सचिवं वानरं तयोः ।

बुद्धिमन्तं हनूमन्तं हिमवन्तमिव स्थितम् ॥ १० ॥

सुग्रीवने हिमालयके समान गम्भीर भावसे बैठे हुए अपने बुद्धिमान् सचिव हनुमान्को उन दोनोंके पास भेजा ॥ १० ॥

तेन सम्भाष्य पूर्वं तौ सुग्रीवमभिजग्मतुः ।

सख्यं वानरराजेन चक्रे रामस्तदा नृप ॥ ११ ॥

उनके साथ पहले बातचीत हो जानेपर वे दोनों भाई सुग्रीवके पास गये । राजन्! उस समय श्रीरामचन्द्रजीने वानरराज सुग्रीवके साथ मैत्री की ॥ ११ ॥

तद् वासो दर्शयामासुस्तस्य कार्ये निवेदिते ।

वानराणां तु यत् सीता ह्रियमाणा व्यपासृजत् ॥ १२ ॥

रामने सुग्रीवके समक्ष जब अपना कार्य निवेदन किया, तब उन्होंने श्रीरामको वह वस्त्र दिखाया, जिसे अपहरणकालमें सीताने वानरोंके बीचमें डाल दिया था ॥ १२ ॥

पृष्ठ 1872

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तत् प्रत्ययकरं लब्ध्वा सुग्रीवं प्लवगाधिपम् ।

पृथिव्यां वानरैश्वर्ये स्वयं रामोऽभ्यषेचयत् ॥ १३ ॥

रावणद्वारा सीताके अपहृत होनेका यह विश्वासजनक प्रमाण पाकर श्रीरामने स्वयं ही वानरराज सुग्रीवको अखिल भूमण्डलके वानरोंके सम्राट्पदपर अभिषिक्त कर दिया ॥ १३ ॥

प्रतिजज्ञे च काकुत्स्थः समरे वालिनो वधम् ।

सुग्रीवश्चापि वैदेह्याः पुनरानयनं नृप ॥ १४ ॥

साथ ही उन्होंने युद्धमें वालीके वधकी भी प्रतिज्ञा की । राजन्! तब सुग्रीवने भी विदेहनन्दिनी सीताको पुनः ढूँढ़ लानेकी प्रतिज्ञा की ॥ १४ ॥

इत्युक्त्वा समयं कृत्वा विश्वास्य च परस्परम् ।

अभ्येत्य सर्वे किष्किन्धां तस्थुर्युद्धाभिकाङ्क्षिणः ॥ १५ ॥

इस प्रकार प्रतिज्ञापूर्वक एक- दूसरेको विश्वास दिलाकर वे सब--के --सबस किष्किन्धापुरीमें आये और युद्धकी अभिलाषासे डटकर खड़े हो गये ॥ १५ ॥

सुग्रीवः प्राप्य किष्किन्धां ननादौघनिभस्वनः ।

नास्य तन्ममृषे वाली तारा तं प्रत्यषेधयत् ॥ १६ ॥

पृष्ठ 1873

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सुग्रीवने किष्किन्धामें जाकर बड़े जोरसे सिंहनाद किया, मानो बहुत बड़े जनसमूहका शब्द गूँज उठा हो । वालीको यह सहन नहीं हो सका। जब वह युद्धके लिये निकलने लगा, तब उसकी स्त्री ताराने उसे मना करते हुए कहा— ॥ १६ ॥

यथा नदति सुग्रीवो बलवानेष वानरः ।

मन्ये चाश्रयवान् प्राप्तो न त्वं निष्क्रान्तुमर्हसि ॥ १७ ॥

‘नाथ! आज सुग्रीव जिस प्रकार गर्जना कर रहा है, उससे मालूम होता है, इस समय उसका बल बढ़ा हुआ है । मेरी समझमें उसे कोई बलवान् सहायक मिल गया है, तभी वह

यहाँतक आ सका है । अतः आप घरसे न निकलें ' ॥ १७ ॥

हेममाली ततो वाली तारां ताराधिपाननाम् ।

प्रोवाच वचनं वाग्मी तां वानरपतिः पतिः ॥ १८ ॥

तब सुवर्णमालासे विभूषित तारापति वानरराज वाली, जो बातचीत करनेमें कुशल था, अपनी चन्द्रमुखी पत्नी तारासे इस प्रकार बोला- ॥ १८ ॥

सर्वभूतरुतज्ञा त्वं पश्य बुद्धया समन्विता ।

केन चाश्रयवान् प्राप्तो ममैष भ्रातृगन्धिकः ॥ १ ९ ॥

‘प्रिये! तुम समस्त प्राणियोंकी बोली समझती हो, साथ ही बुद्धिमती भी हो । अतः सोचो तो सही, यह मेरा नाममात्रका भाई किसका सहारा लेकर यहाँ आया है? ' ॥ १ ९ ॥

चिन्तयित्वा मुहूर्तं तु तारा ताराधिपप्रभा ।

पतिमित्यब्रवीत् प्राज्ञा शृणु सर्वं कपीश्वर ॥ २० ॥

तारा अपनी अंगकान्तिसे चन्द्रमाकी ज्योत्स्नाके समान उद्दीप्त हो रही थी । उस विदुषीने दो घड़ीतक विचार करके अपने पति से कहा - ' कपीश्वर! मैं सब बातें बताती हूँ, सुनिये ॥ २० ॥

हृतदारो महासत्त्वो रामो दशरथात्मजः ।

तुल्यारिमित्रतां प्राप्तः सुग्रीवेण धनुर्धरः ॥ २१ ॥

'दशरथनन्दन श्रीराम महान् शक्तिशाली वीर हैं । उनकी पत्नीका किसीने अपहरण कर लिया है । उसकी खोजके लिये उन्होंने सुग्रीवसे मित्रता की है और दोनोंने एक - दूसरेके शत्रुको शत्रु तथा मित्रको मित्र मान लिया है । श्रीरामचन्द्रजी बड़े धनुर्धर हैं ॥ २१ ॥

भ्राता चास्य महाबाहुः सौमित्रिरपराजितः ।

लक्ष्मणो नाम मेधावी स्थितः कार्यार्थसिद्धये ॥ २२ ॥

‘ उनके भाई महाबाहु सुमित्रानन्दन लक्ष्मणजी भी किसीसे परास्त होनेवाले नहीं हैं । उनकी बुद्धि बड़ी प्रखर है । वे श्रीरामके प्रत्येक कार्यकी सिद्धिके लिये उनके साथ रहते हैं ॥ २२ ॥

मैन्दश्च द्विविदश्चापि हनूमांश्चानिलात्मजः ।

जाम्बवानृक्षराजश्च सुग्रीवसचिवाः स्थिताः ॥ २३ ॥

पृष्ठ 1874

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‘ इनके सिवा, मैन्द, द्विविद, वायुपुत्र हनुमान् तथा ऋक्षराज जाम्बवान्—ये सुग्रीवके चार मन्त्री हैं ॥ २३ ॥

सर्व एते महात्मानो बुद्धिमन्तो महाबलाः ।

अलं तव विनाशाय रामवीर्यबलाश्रयात् ॥ २४ ॥

‘ ये सब - के - सब महामनस्वी, बुद्धिमान् और महाबली हैं । श्रीरामचन्द्रजीके बल-पराक्रमका सहारा मिल जानेसे ये लोग आपको मार डालनेमें समर्थ हैं' ॥ २४ ॥

तस्यास्तदाक्षिप्य वचो हितमुक्तं कपीश्वरः ।

पर्यशङ्कत तामीर्षुः सुग्रीवगतमानसाम् ॥ २५ ॥

यद्यपि ताराने वालीके हितकी बात कही थी, तो भी वानरराज वालीने उसके कथनपर आक्षेप किया और ईर्ष्यावश उसके मनमें यह शंका हो गयी कि तारा मन- ही- मन सुग्रीवको चाहती है ॥ २५ ॥

तारां परुषमुक्त्वा तु निर्जगाम गुहामुखात् ।

स्थितं माल्यवतोऽभ्याशे सुग्रीवं सोऽभ्यभाषत ॥ २६ ॥

ताराको कठोर बातें सुनाकर वाली किष्किन्धाकी गुफाके द्वारसे बाहर निकला और माल्यवान् पर्वतके निकट खड़े हुए सुग्रीवसे इस प्रकार बोला- ॥ २६ ॥

असकृत् त्वं मया पूर्वं निर्जितो जीवितप्रियः ।

मुक्तो ज्ञातिरिति ज्ञात्वा का त्वरा मरणे पुनः ॥ २७ ॥

‘ अरे! तू तो पहले अनेक बार युद्धमें मेरेद्वारा परास्त हो चुका है और जीवनका अधिक लोभ होनेके कारण भागकर जान बचाता फिरा है। मैंने भी अपना भाई समझकर तुझे जीवित छोड़ दिया है । फिर आज तुझे मरनेके लिये इतनी उतावली क्यों हो गयी है? ' ॥

इत्युक्तः प्राह सुग्रीवो भ्रातरं हेतुमद् वचः ।

प्राप्तकालममित्रघ्नो रामं सम्बोधयन्निव ॥ २८ ॥

वालीके ऐसा कहनेपर शत्रुहन्ता सुग्रीव श्रीरामचन्द्रजीको परिस्थितिका ज्ञान कराते हुए- से अपने उस भाईसे अवसरके अनुरूप युक्तियुक्त वचन बोले— ॥

हृतराज्यस्य मे राजन् हृतदारस्य च त्वया ।

किं मे जीवितसामर्थ्यमिति विद्धि समागतम् ॥ २ ९ ॥

' राजन्! तुमने मेरा राज्य हर लिया है, मेरी स्त्रीको भी अपने अधिकारमें कर लिया है, ऐसी दशामें मुझमें जीवित रहनेकी शक्ति ही कहाँ है? यही सोचकर मरनेके लिये चला आया हूँ । आप मेरे आगमनका यही उद्देश्य समझ लें ' ॥ २ ९ ॥

एवमुक्त्वा बहुविधं ततस्तौ संनिपेततुः ।

समरे वालिसुग्रीवौ शालतालशिलायुधी ॥ ३० ॥

इस प्रकार बहुत - सी बातें करके वाली और सुग्रीव दोनों एक- दूसरेसे गुँथ गये । उस युद्धमें साखू और ताड़के वृक्ष तथा पत्थरकी चट्टानें – ये ही उनके अस्त्र- शस्त्र थे ॥ ३० ॥

पृष्ठ 1875

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उभौ जघ्नतुरन्योन्यमुभौ भूमौ निपेततुः ।

उभौ ववल्गतुश्चित्रं मुष्टिभिश्च निजघ्नतुः ॥ ३१ ॥

दोनों दोनोंपर प्रहार करते, दोनों जमीनपर गिर जाते, फिर दोनों ही उछल- कूदकर विचित्र ढंगसे पैंतरे बदलते तथा मुक्कों और घूसों से एक- दूसरेको मारते थे ॥ ३१ ॥

उभौ रुधिरसंसिक्तौ नखदन्तपरिक्षतौ ।

शुशुभाते तदा वीरौ पुष्पिताविव किंशुकौ ॥ ३२ ॥

दोनों नख और दाँतोंके आघातसे क्षत - विक्षत हो रक्तसे लथपथ हो रहे थे । उस समय वे दोनों वीर खिले हुए पलासके दो वृक्षोंकी भाँति शोभा पाते थे ॥ ३२ ॥

न विशेषस्तयोर्युद्धे यदा कश्चन दृश्यते ।

सुग्रीवस्य तदा मालां हनुमान् कण्ठ आसजत् ॥ ३३ ॥

जब युद्धमें उन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं दिखायी दिया, तब हनुमानजीने सुग्रीवकी पहचानके लिये उनके गलेमें एक माला डाल दी ॥ ३३ ॥

स मालया तदा वीरः शुशुभे कण्ठसक्तया ।

श्रीमानिव महाशैलो मलयो मेघमालया ॥ ३४ ॥

कण्ठमें पड़ी हुई उस मालासे वीर सुग्रीव उस समय मेघपंक्तिसे सुशोभित महापर्वत मलयकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ३४ ॥

कृतचिह्नं तु सुग्रीवं रामो दृष्ट्वा महाधनुः ।

विचकर्ष धनुः श्रेष्ठं वालिमुद्दिश्य लक्ष्यवत् ॥ ३५ ॥

विस्फारस्तस्य धनुषो यन्त्रस्येव तदा बभौ ।

वितत्रास तदा वाली शरेणाभिहतोरसि ॥ ३६ ॥

महाधनुर्धर श्रीरामचन्द्रजीने सुग्रीवको चिह्न धारण किये देख वालीको लक्ष्य बनाकर अपना महान् धनुष खींचा। उस धनुषकी टंकार मशीनकी भयंकर आवाजके समान जान पड़ती थी । उसे सुनकर वाली भयभीत हो उठा । इतनेमें ही श्रीरामके बाणने उसकी छातीपर भारी चोट की ॥ ३५-३६ ॥

पृष्ठ 1876

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स भिन्नहृदयो वाली वक्राच्छोणितमुद्वमन् ।

ददर्शावस्थितं रामं ततः सौमित्रिणा सह ॥ ३७ ॥

इससे वालीका वक्षःस्थल विदीर्ण हो गया और वह अपने मुँहसे रक्त वमन करने लगा ।

सामने ही उसे लक्ष्मणके साथ खड़े हुए श्रीराम दिखायी दिये ॥ ३७ ॥

गर्हयित्वा स काकुत्स्थं पपात भुवि मूर्च्छितः ।

तारा ददर्श तं भूमौ तारापतिसमौजसम् ॥ ३८ ॥

तब वह ( छिपकर आघात करनेके कारण) श्रीरामचन्द्रजीकी निन्दा करके पृथ्वीपर गिर पड़ा और मूर्च्छित हो गया। ताराने चन्द्रमाके समान तेजस्वी अपने वीर पति वालीको प्राणहीन होकर पृथ्वीपर पड़ा देखा ॥

हते वालिनि सुग्रीवः किष्किन्धां प्रत्यपद्यत ।

तां च तारापतिमुखीं तारां निपतितेश्वराम् ॥ ३ ९ ॥

वालीके मारे जानेपर अनाथ हुई किष्किन्धापुरी तथा चन्द्रमुखी तारा सुग्रीवको प्राप्त हुई ॥ ३ ९ ॥

रामस्तु चतुरो मासान् पृष्ठे माल्यवतः शुभे ।

निवासमकरोद् धीमान् सुग्रीवेणाभ्युपस्थितः ॥ ४० ॥

परम बुद्धिमान् श्रीरामचन्द्रजीने माल्यवान् पर्वतकी सुन्दर घाटीमें वर्षाके चार महीनोंतक निवास किया । समय- समयपर सुग्रीव भी उनकी सेवामें उपस्थित होते रहते

पृष्ठ 1877

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थे ॥ ४० ॥

रावणोऽपि पुरीं गत्वा लङ्कां कामबलात्कृतः ।

सीतां निवेशयामास भवने नन्दनोपमे ॥ ४१ ॥

अशोकवनिकाभ्याशे तापसाश्रमसंनिभे ।

भर्तृस्मरणतन्वङ्गी तापसीवेषधारिणी ॥ ४२ ॥

इधर कामके वशीभूत हुए रावणने भी लंकापुरीमें पहुँचकर सीताको अशोकवाटिकाके निकट तपस्वी मुनियोंके आश्रमकी भाँति शान्तिपूर्ण तथा नन्दनवनके समान रमणीय भवनमें ठहराया । पतिका निरन्तर चिन्तन करते - करते सीताका शरीर दुर्बल हो गया था । वे तपस्विनीवेषमें वहाँ रहती थीं ॥ ४१-४२ ॥

उपवासतपःशीला तत्रास पृथुलेक्षणा ।

उवास दुःखवसतिं फलमूलकृताशना ॥ ४३ ॥

उपवास और तपस्या करनेका उनका स्वभाव-सा बन गया था । विशाल नेत्रोंवाली जानकी वहाँ फल - मूल खाकर बड़े दुःखसे दिन बिताती थीं ॥ ४३ ॥

दिदेश राक्षसीस्तत्र रक्षणे राक्षसाधिपः ।

प्रासासिशूलपरशुमुद्गरालातधारिणीः ॥ ४४ ॥

राक्षसराज रावणने सीताकी रक्षाके लिये कुछ राक्षसियोंको नियुक्त कर दिया था, जो भाला, तलवार, त्रिशूल, फरसा, मुद्गर और जलती हुई लुआठी लिये वहाँ पहरा देती थीं ॥ ४४ ॥

द्वयक्षीं त्र्यक्षीं ललाटाक्षीं दीर्घजिह्वामजिह्विकाम् ।

त्रिस्तनीमेकपादां च त्रिजटामेकलोचनाम् ॥ ४५ ॥

उनमेंसे किसीके दो आँखें थीं, किसीके तीन । किसीके ललाटमें ही आँखें थीं, किसीके बहुत बड़ी जिह्वा थी, तो किसीके जीभ थी ही नहीं । किसीके तीन स्तन थे तो किसीका एक पैर । कोई अपने सिरपर तीन जटाएँ रखती थी तो किसीके एक ही आँख थी ॥ ४५ ॥

एताश्चान्याश्च दीप्ताक्ष्यः करभोत्कटमूर्द्धजाः ।

परिवार्यासते सीतां दिवारात्रमतन्द्रिताः ॥ ४६ ॥

ये तथा दूसरी बहुत- सी राक्षसियाँ निद्रा और आलस्यको छोड़कर दिन - रात सीताको घेरे रहती थीं । उनकी आँखें आगकी तरह प्रज्वलित होती थीं और सिरके बाल ऊँटोंके समान रूखे तथा भूरे थे ॥ ४६ ॥

तास्तु तामायतापाङ्गीं पिशाच्यो दारुणस्वराः ।

तर्जयन्ति सदा रौद्राः परुषव्यञ्जनस्वराः ॥ ४७ ॥

वे पिशाची स्त्रियाँ देखनेमें बड़ी भयंकर थीं । उनका स्वर अत्यन्त दारुण था । उनके मुखसे जो स्वर और व्यंजन निकलते थे, वे बड़े कठोर होते थे । वे राक्षसियाँ निम्नांकित बातें कहकर विशाल नेत्रोंवाली सीताको सदा डाँटती- फटकारती रहती थीं- ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 1878

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खादाम पाटयामैनां तिलशः प्रविभज्य ताम् ।

येयं भर्तारमस्माकमवमन्येह जीवति ॥ ४८ ॥

' अरी! यह हमारे स्वामीकी अवहेलना करके अबतक यहाँ जीवित कैसे है? हम इसे चीर डालें । इसे तिल - तिल काटकर खा जायँ ' ॥ ४८ ॥

इत्येवं परिभर्त्सन्तीस्त्रास्यमाना पुनः पुनः ।

भर्तृशोकसमाविष्टा निःश्वस्येदमुवाच ताः ॥ ४९ ॥

इस तरह कठोर वचनोंद्वारा डराने- धमकानेवाली उन राक्षसियोंसे बार- बार डरायी जाती हुई सीता पतिवियोगके शोकसे संतप्त हो लंबी साँसें खींचती हुई बोलीं- ॥

आर्याः खादत मां शीघ्रं न मे लोभोऽस्ति जीविते ।

विना तं पुण्डरीकाक्षं नीलकुञ्चितमूर्धजम् ॥ ५० ॥

अप्येवाहं निराहारा जीवितप्रियवर्जिता ।

शोषयिष्यामि गात्राणि व्याली तालगता यथा ॥ ५१ ॥

न त्वन्यमभिगच्छेयं पुमांसं राघवादृते ।

इति जानीत सत्यं मे क्रियतां यदनन्तरम् ॥ ५२ ॥

' बहिनो! तुमलोग शीघ्र मुझे मारकर खा जाओ । अब इस जीवनके लिये मुझे तनिक भी लोभ नहीं है । मैं काले घुँघराले केश- कलापसे सुशोभित अपने स्वामी कमलनयन भगवान् श्रीरामके बिना जीना ही नहीं चाहती । प्राणवल्लभ रघुनाथजीके दर्शनसे वंचित होनेके कारण निराहार ही रहकर ताड़के पेड़पर रहनेवाली नागिनकी तरह मैं अपने शरीरको सुखा डालूँगी; परंतु श्रीरामके सिवा दूसरे किसी पुरुषका सेवन कदापि नहीं करूँगी । मेरी इस बातको सत्य समझो और इसके बाद जो कुछ करना हो, करो ' ॥ ५०– ५२ ॥

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा राक्षस्यस्ताः खरस्वनाः ।

आख्यातुं राक्षसेन्द्राय जग्मुस्तत् सर्वमादृताः ॥ ५३ ॥

सीताकी यह बात सुनकर कठोर बोली बोलनेवाली वे राक्षसियाँ राक्षसराज रावणको आदरपूर्वक वह सब समाचार निवेदन करनेके लिये चली गयीं ॥ ५३ ॥

गतासु तासु सर्वासु त्रिजटा नाम राक्षसी ।

सान्त्वयामास वैदेहीं धर्मज्ञा प्रियवादिनी ॥ ५४ ॥

वहाँ केवल धर्मको जाननेवाली प्रियवादिनी त्रिजटा नामकी राक्षसी रह गयी । अन्य सब राक्षसियोंके चले जानेपर उसने सीताको सान्त्वना देते हुए कहा– ॥ ५४ ॥

सीते वक्ष्यामि ते किंचिद् विश्वासं कुरु मे सखि ।

भयं त्वं त्यज वामोरु शृणु चेदं वचो मम ॥ ५५ ॥

' सखी सीते! मैं तुमसे एक बात कहूँगी । तुम मुझपर विश्वास करो । वामोरु! तुम भय छोड़ो और मेरी यह बात सुनो ॥ ५५ ॥

पृष्ठ 1879

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अविन्ध्यो नाम मेधावी वृद्धो राक्षसपुङ्गवः ।

स रामस्य हितान्वेषी त्वदर्थे हि स मावदत् ॥ ५६ ॥

‘ यहाँ अविन्ध्य नामसे प्रसिद्ध एक बुद्धिमान्, वृद्ध और श्रेष्ठ राक्षस रहते हैं जो सदा श्रीरामचन्द्रजीके हितका चिन्तन करते रहते हैं । उन्होंने तुमसे कहनेके लिये मेरेद्वारा यह संदेश भेजा है ॥ ५६ ॥

सीता मद्वचनाद् वाच्या समाश्वास्य प्रसाद्य च ।

भर्ता ते कुशली रामो लक्ष्मणानुगतो बली ॥ ५७ ॥

सख्यं वानरराजेन शक्रप्रतिमतेजसा ।

कृतवान् राघवः श्रीमांस्त्वदर्थे च समुद्यतः ॥ ५८ ॥

मा च तेऽस्तु भयं भीरु रावणाल्लोकगर्हितात् ।

नलकूबरशापेन रक्षिता ह्यसि नन्दिनि ॥ ५ ९ ॥

शप्तो ह्येष पुरा पापो वधूं रम्भां परामृशन् ।

न शक्नोत्यवशां नारीमुपैतुमजितेन्द्रियः ॥ ६० ॥

क्षिप्रमेष्यति ते भर्ता सुग्रीवेणाभिरक्षितः ।

सौमित्रिसहितो धीमांस्त्वां चेतो मोक्षयिष्यति ॥ ६१ ॥

‘ उनका कहना है कि त्रिजटे! तुम मेरी ओरसे सीताको समझा-बुझाकर संतुष्ट करके यह कहना कि— ' तुम्हारे स्वामी महाबली श्रीराम लक्ष्मणसहित सकुशल हैं । श्रीमान् रघुनाथजीने इन्द्रतुल्य तेजस्वी वानरराज सुग्रीवके साथ मैत्री की है और तुम्हें यहाँसे छुड़ानेके लिये उद्योग आस्मभ कर दिया है; अतः भीरु! अब तुम्हें लोकनिन्दित रावणसे तनिक भी भय नहीं करना चाहिये । नन्दिनी! नलकूबरने रावणको जो शाप दे रखा है, उसीसे तुम सदा सुरक्षित रहोगी । कुछ समय पहलेकी बात है, इस पापी रावणने नलकूबरकी पत्नी एवं अपनी पुत्रवधूके तुल्य रम्भाका स्पर्श किया था, इसीसे उसको शाप प्राप्त हुआ है । यद्यपि यह रावण जितेन्द्रिय नहीं है, तो भी किसी अवशा- स्वतन्त्रतापूर्वक उसे न चाहनेवाली नारीके पास नहीं जा सकता है । सुग्रीवद्वारा सुरक्षित तुम्हारे स्वामी बुद्धिमान् भगवान् श्रीराम अपने भाई लक्ष्मणके साथ शीघ्र ही यहाँ आयेंगे और तुम्हें यहाँसे छुड़ा ले जायँगे ' ॥ ५७–६१ ॥

स्वप्ना हि सुमहाघोरा दृष्टा मेऽनिष्टदर्शनाः ।

विनाशायास्य दुर्बुद्धेः पौलस्त्यकुलघातिनः ॥ ६२ ॥

( अविन्ध्यका संदेश सुनाकर फिर त्रिजटाने अपनी ओरसे कहा- ) ‘ सखी! मैंने भी रातमें बड़े भयंकर स्वप्न देखे हैं, जो इस पुलस्त्यकुल- घातक दुर्बुद्धि रावणके विनाश एवं अनिष्टकी सूचना देनेवाले हैं ॥ ६२ ॥

दारुणो ह्येष दुष्टात्मा क्षुद्रकर्मा निशाचरः ।

स्वभावाच्छीलदोषेण सर्वेषां भयवर्धनः ॥ ६३ ॥

पृष्ठ 1880

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‘यह दारुण दुष्टात्मा तथा क्षुद्रकर्म करनेवाला निशाचर अपने स्वभाव और शीलदोषसे सब लोगोंका भय बढ़ा रहा है ॥ ६३ ॥

स्पर्धते सर्वदेवैर्यः कालोपहतचेतनः ।

मया विनाशलिङ्गानि स्वप्ने दृष्टानि तस्य वै ॥ ६४ ॥

' कालसे इसकी बुद्धि मारी गयी है; अतः यह समस्त देवताओंसे ईर्ष्या रखता है । मैंने स्वप्नमें जो कुछ देखा है, वह सब इसके विनाशकी सूचना दे रहा है ॥ ६४ ॥

तैलाभिषिक्तो विकचो मज्जन् पङ्के दशाननः ।

असकृत् खरयुक्ते तु रथे नृत्यन्निव स्थितः ॥ ६५ ॥

‘ सपनेमें मैंने देखा है कि रावण तेलसे नहाये, मूँड़ मुँड़ाये, कीचड़में डूब रहा है । फिर कई बार देखनेमें आया कि वह गदहोंसे जुते हुए रथपर खड़ा होकर नृत्य - सा कर रहा है ॥ ६५ ॥

कुम्भकर्णादयश्चेमे नग्नाः पतितमूर्धजाः ।

गच्छन्ति दक्षिणामाशां रक्तमाल्यानुलेपनाः ॥ ६६ ॥

‘ उसके साथ ही ये कुम्भकर्ण आदि राक्षस भी मूँड़ मुड़ाये, लाल चन्दन लगाये, लाल फूलोंकी माला पहने, नंगे होकर दक्षिण दिशाकी ओर जा रहे हैं ॥ ६६ ॥

श्वेतातपत्रः सोष्णीषः शुक्लमाल्यानुलेपनः ।

श्वेतपर्वतमारूढ एक एव विभीषणः ॥ ६७ ॥

' केवल विभीषण ही श्वेत छत्र धारण किये, सफेद पगड़ी पहने एवं श्वेत पुष्पोंकी मालासे अलंकृत हो श्वेत चन्दन लगाये श्वेतपर्वतपर आरूढ दिखायी दिये ॥ ६७ ॥

सचिवाश्चास्य चत्वारः शुक्लमाल्यानुलेपनाः ।

श्वेतपर्वतमारूढा मोक्ष्यन्तेऽस्मान्महाभयात् ॥ ६८ ॥

‘ इनके चारों मन्त्री भी श्वेत पुष्पमाला और चन्दनसे चर्चित हो श्वेतपर्वतके शिखरपर बैठे थे; अतः विभीषणके साथ वे भी आनेवाले महान् भयसे मुक्त हो जायँगे' ॥ ६८ ॥

रामस्यास्त्रेण पृथिवी परिक्षिप्ता ससागरा ।

यशसा पृथिवीं कृत्स्नां पूरयिष्यति ते पतिः ॥ ६ ९ ॥

'स्वप्नमें मुझे यह भी दिखायी दिया है कि भगवान् श्रीरामके बाणोंसे समुद्रसहित सारी पृथ्वी आच्छादित हो गयी है; अतः यह निश्चित है कि तुम्हारे पतिदेव अपने सुयशसे समस्त भूमण्डलको परिपूर्ण कर देंगे ॥ ६ ९ ॥

अस्थिसंचयमारूढो भुञ्जानो मधुपायसम् ।

लक्ष्मणश्च मया दृष्टो दिधक्षुः सर्वतो दिशम् ॥ ७० ॥

‘ इसी तरह मैंने लक्ष्मणको भी देखा है । वे हड्डियोंके ढेरपर बैठे हुए मधुमिश्रित खीर खा रहे थे और ऐसा जान पड़ता था मानो वे समस्त दिशाओंको दग्ध कर देना चाहते हैं ॥ ७० ॥