श्रीगणेशाय नमः।

रामोपाख्यान : क्या किसी पवित्र स्त्री पर भी पाप का कलङ्क लग सकता है?

चरित्र की शुद्धता और सन्देह

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड २ · वनपर्व · अध्याय 273–292 · पृष्ठ 1824–1962

16,245 शब्द · 82 मिनटका पाठ · 52 श्लोक

मार्कण्डेय ने युधिष्ठिर से कहा

युधिष्ठिर के शोक निवारण हेतु

जनमेजय ने पूछा—"इस प्रकार द्रौपदी का अपहरण होने पर, महान क्लेश उठाने के पश्चात् पाण्डवों ने कौन सा कार्य किया?"

तथा समभवच्चापि यदुवाच विभीषणः ।
क्षणेनातीन्द्रियाण्येषां चक्षूंष्यासन् युधिष्ठिर ॥

युधिष्ठिर! जैसा विभीषणने बताया था, उसका वैसा ही प्रभाव देखनेमें आया । इन सबकी आँखें क्षणभरमें अतीन्द्रिय वस्तुओंका साक्षात्कार करनेवाली हो गयीं ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 290 · श्लोक 14पृष्ठ 1938

वैशम्पायनजी बोले—"हे जनमेजय! इस प्रकार जयद्रथ को जीतकर द्रौपदी को छुड़ा लेने के पश्चात् धर्मराज युधिष्ठिर मुनि-मण्डली के साथ बैठे हुए थे। महर्षि लोग भी पाण्डवों पर आए हुए सङ्कट को सुनते और उसके लिये बारम्बार शोक प्रकट करते थे। उन्हीं में से मार्कण्डेय जी को लक्ष्य करके पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर ने इस प्रकार कहा।"

अतीव चित्रमाश्चर्य शक्रप्रह्लादयोरिव ॥

वे दोनों ही एक- दूसरेको जीतनेके लिये उत्सुक थे । उस समय उनमें इन्द्र और प्रह्लादकी भाँति अत्यन्त अद्भुत तथा आश्चर्यजनक युद्ध होने लगा ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 290 · श्लोक 18पृष्ठ 1939

युधिष्ठिर बोले—"भगवन्! आप भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालों के ज्ञाता हैं। देवर्षियों में भी आपका नाम विख्यात है। अतः आपसे मैं अपने हृदय का एक सन्देह पूछता हूँ, उसका निवारण कीजिये। यह परम सौभाग्यशालिनी द्रुपदकुमारी यज्ञ की वेदी से प्रकट हुई है, अतः अयोनिजा है; इसे महात्मा पाण्डु के पुत्रवधू होने का गौरव भी मिला है। मेरी समझ में भगवान् काल, विधिनिर्मित दैव और समस्त प्राणियों की भवितव्यता—ये तीनों ही प्रबल हैं, इनको कोई टाल नहीं सकता। अन्यथा हमारी इस पत्नी को, जो धर्म को जानने वाली तथा धर्म के पालन में तत्पर रहने वाली है, ऐसा भाव कैसे स्पर्श कर सकता था? यह तो ठीक वैसा ही है जैसे किसी शुद्ध आचार-विचार वाले मनुष्य पर झूठी चोरी का कलङ्क लग जाए। इसने कभी कोई पाप या निन्दित कर्म नहीं किया है; द्रौपदी ने ब्राह्मणों के प्रति सेवा-सत्कार आदि के रूप में महान धर्म का आचरण किया है। ऐसी स्त्री का भी मूढबुद्धि पापी राजा जयद्रथ ने बलपूर्वक अपहरण कर लिया। इस अपहरण के ही कारण उसका सिर मूँड़ा गया, वह अपने सहायकों सहित युद्ध में पराजित हुआ और हम लोग सिन्धु-देश की सेना का संहार करके पुनः द्रौपदी को लौटा लाए हैं। इस प्रकार हमने जिसे कभी सोचा तक न था, वह अपनी पत्नी का अपहरण रूपी अपमान हमें प्राप्त हुआ और मिथ्या व्यवसाय में लगे हुए बान्धवों ने हमें देश से निर्वासित कर दिया। अतः मैं पूछता हूँ, क्या संसार में मेरे जैसा मन्दभाग्य मनुष्य कोई और भी है अथवा आपने पहले कभी मुझ जैसे भाग्यहीन को कहीं देखा या सुना है?"

जनमेजय उवाच

एवं हृतायां कृष्णायां प्राप्य क्लेशमनुत्तमम् ।
अत ऊर्ध्वं नरव्याघ्राः किमकुर्वत पाण्डवाः ॥

जनमेजयने पूछा – इस प्रकार द्रौपदीका अपहरण होनेपर महान् क्लेश उठानेके पश्चात् मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी पाण्डवोंने कौन- सा कार्य किया?

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 273 · श्लोक 1पृष्ठ 1825

मार्कण्डेयजी ने कहा—"भरतश्रेष्ठ! श्रीरामचन्द्रजी को भी वनवास तथा स्त्री-वियोग का अनुपम दुःख सहन करना पड़ा था। दुरात्मा राक्षसराज महाबली रावण अपनी माया फैलाकर आश्रम से उनकी पत्नी सीता को वेगपूर्वक हर ले गया और अपने कार्य में बाधा डालने वाले गृध्रराज जटायु को उसने वहीं मार गिराया। फिर श्रीरामचन्द्रजी सुग्रीव की सेना का सहारा लेकर समुद्र पर पुल बाँधकर लङ्का में गये और अपने तीखे बाणों से उसको भस्म करके वहाँ से सीता को वापस लाये।"

अशोकवनिकास्थां तां रामदर्शनलालसाम् ।
खड्गमादाय दुष्टात्मा जवेनाभिपपात ह ॥

दुष्टात्मा दशानन हाथमें तलवार लेकर अशोक वाटिकामें श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकी लालसासे बैठी हुई सीताजीके पास बड़े वेगसे दौड़ा गया ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 290 · श्लोक 27पृष्ठ 1940

युधिष्ठिर ने पूछा—"भगवन्! श्रीरामचन्द्रजी किस कुल में प्रकट हुए थे? उनका बल और पराक्रम कैसा था? रावण किसका पुत्र था और उसका रामचन्द्रजी से क्या वैर था? भगवन्! ये सभी बातें मुझे अच्छी प्रकार बताइये। मैं अनायास ही महान कर्म करने वाले भगवान् श्रीराम का चरित्र सुनना चाहता हूँ।"

एवं बहुविधैर्वाक्यैरविन्ध्यो रावणं तदा ।
क्रुद्धं संशमयामास जगृहे च स तद्वचः ॥

इस तरह अनेक प्रकारके वचनोंद्वारा अविन्ध्यने रावणका क्रोध शान्त किया और रावणने भी उसकी बात मान ली ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 290 · श्लोक 32पृष्ठ 1940

मार्कण्डेयजी ने कहा—"राजन्! इक्ष्वाकुवंश में अज नाम से प्रसिद्ध एक महान राजा हो गये हैं। उनके पुत्र थे दशरथ, जो सदा स्वाध्याय में संलग्न रहने वाले और पवित्र थे। उनके चार पुत्र हुए—राम, लक्ष्मण, महाभी भरत और शत्रुघ्न। वे सब धर्म और अर्थ के तत्त्व को जानने वाले थे। श्रीरामचन्द्रजी की माता कौसल्या थीं, भरत की माता कैकेयी थीं तथा शत्रुओं को सन्ताप देने वाले लक्ष्मण और शत्रुघ्न सुमित्रा के पुत्र थे। राजन्! विदेह देश के राजा जनक की एक पुत्री थी, जिसका नाम सीता था; उसे स्वयं विधाता ने ही भगवान् श्रीराम की प्यारी रानी होने के लिये रचा था। जनेश्वर! इस प्रकार मैंने तुम्हें श्रीराम और सीता के जन्म का वृत्तान्त बताया है। अब रावण के भी जन्म का प्रसङ्ग सुनाऊँगा।"

"सम्पूर्ण जगत् के स्वामी, सबकी सृष्टि करने वाले, प्रजापालक, महातपस्वी और स्वयम्भू साक्षात् भगवान् ब्रह्माजी ही रावण के पितामह थे। ब्रह्माजी के एक परम प्रिय मानस पुत्र पुलस्त्यजी थे। उनसे उनकी गौ नाम की पत्नी के गर्भ से वैश्रवण नामक शक्तिशाली पुत्र उत्पन्न हुआ। राजन्! वैश्रवण अपने पिता को छोड़कर पितामह की सेवा में रहने लगे। इससे उन पर क्रोध करके पिता पुलस्त्य ने स्वयं को ही दूसरे रूप में प्रकट कर लिया। पुलस्त्य के आधे शरीर से जो दूसरा द्विज प्रकट हुआ, उसका नाम विश्रवा था। विश्रवा, वैश्रवण से बदला लेने के लिये उन पर सदा कुपित रहा करते थे। परन्तु पितामह ब्रह्माजी उन पर प्रसन्न थे; अतः उन्होंने वैश्रवण को अमरत्व प्रदान किया और धन का स्वामी तथा लोकपाल बना दिया। पितामह ने उनकी महादेवजी से मैत्री करायी, उन्हें नलकूबर नामक पुत्र दिया और राक्षसों से भरी हुई लङ्का को उनकी राजधानी बनाया। साथ ही उन्हें इच्छानुसार विचरने वाला पुष्पक नाम का एक विमान दिया। इसके सिवा ब्रह्माजी ने कुबेर को यक्षों का स्वामी बना दिया और उन्हें 'राजराज' की पदवी प्रदान की।"

मार्कण्डेयजी कहते हैं—"पुलस्त्य के क्रोध से उनके आधे शरीर से जो ‘विश्रवा’ नामक मुनि प्रकट हुए थे, वे कुबेर को कुपित दृष्टि से देखने लगे। युधिष्ठिर! राक्षसों के स्वामी कुबेर को जब यह बात मालूम हो गयी कि मेरे पिता मुझ पर रुष्ट रहते हैं, तब वे उन्हें प्रसन्न रखने का यत्न करने लगे। राजराज कुबेर स्वयं लङ्का में ही रहते थे। वे मनुष्यों द्वारा ढोई जाने वाली पालकी आदि की सवारी पर चलते थे, इसलिये 'नरवाहन' कहलाए। उन्होंने अपने पिता विश्रवा की सेवा के लिये तीन राक्षस कन्याओं को परिचारिकाओं के रूप में नियुक्त कर दिया था। भरतश्रेष्ठ! वे तीनों नाचने और गाने की कला में निपुण थीं तथा सदा ही उन महात्मा महर्षि को सन्तुष्ट रखने के लिये सचेष्ट रहती थीं। उनके नाम पुष्पोत्कटा, राका तथा मालिनी थे। वे तीनों सुन्दरियाँ अपना भला चाहती थीं, इसलिये एक-दूसरी से स्पर्धा रखकर मुनि की सेवा करती थीं। ऐश्वर्यशाली महात्मा उनकी सेवाओं से प्रसन्न हो गये और उनमें से प्रत्येक को लोकपालों के समान पराक्रमी पुत्र का वरदान दिया।"

"पुष्पोत्कटा से दो पुत्र जज्ञे—रावण और कुम्भकर्ण, जो राक्षसों के अधिपति थे। भूमण्डल में इनके समान बलवान दूसरा कोई नहीं था। मालिनी ने एक ही पुत्र विभीषण को जन्म दिया। राका के गर्भ से एक पुत्र और एक पुत्री हुई; पुत्र का नाम खर और पुत्री का नाम शूर्पणखा था। इन सब बालकों में विभीषण ही सबसे अधिक रूपवान्, सौभाग्यशाली, धर्मरक्षक तथा कर्तव्यपरायण थे। रावण के दस मस्तक थे; वही सबमें ज्येष्ठ तथा राक्षसों का स्वामी था। उत्साह, बल, धैर्य और पराक्रम में भी वह महान था। कुम्भकर्ण शारीरिक बल में सबसे बड़ा था और युद्ध में भी सबसे बढ़कर था; वह मायावी, रणकुशल और निशाचर बड़ा भयङ्कर भी था। खर धनुर्विद्या में विशेष पराक्रमी था तथा ब्राह्मणों से द्वेष रखने वाला मांसाहारी था। शूर्पणखा की आकृति बड़ी भयानक थी और वह ऋषि-मुनियों की तपस्या में विघ्न डाला करती थी। वे सभी बालक वेदवेत्ता, शूरवीर तथा ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने वाले थे और अपने पिता के साथ गन्धमादन पर्वत पर सुखपूर्वक रहते थे।"

"एक दिन नरवाहन कुबेर अपने महान ऐश्वर्य से युक्त होकर पिता के साथ बैठे थे। उसी अवस्थे में रावण आदि ने उनको देखा। उनका वैभव देखकर इन बालकों के हृदय में डाह पैदा हो गयी, अतः उन्होंने मन ही मन तपस्या करने का निश्चय किया। उन्होंने घोर तपस्या द्वारा ब्रह्माजी को सन्तुष्ट कर लिया। रावण सहस्रों वर्षों तक एक पैर से खड़ा रहा; वह चित्त को एकाग्र करके पञ्चाग्नि का सेवन करता और केवल वायु पीकर रहता था। कुम्भकर्ण ने भी आहार का संयम किया, भूमि पर सोता और कठोर नियमों का पालन करता था। विभीषण केवल एक सूखा पत्ता खाकर रहते थे; उनका उपवास में ही प्रेम था। बुद्धिमान् एवं उदारबुद्धि विभीषण सदा जप किया करते थे। उन्होंने भी उतने समय तक तीव्र तपस्या की। खर और शूर्पणखा प्रसन्न मन से तपस्या में लगे अपने भाइयों की परिचर्या और रक्षा करते थे।"

"एक हजार वर्ष पूर्ण होने पर दुर्धर्ष दशानन ने अपना मस्तक काटकर अग्नि में उसकी आहुति दे दी। इस अद्भुत कर्म से लोकेश्वर ब्रह्माजी बहुत सन्तुष्ट हुए। तदनन्तर ब्रह्माजी स्वयं वहाँ गये और तपस्वियों को रोकते हुए वरदान देने के लिये कहा—'पुत्रो! मैं तुम सब पर प्रसन्न हूँ, वर माँगो और तपस्या से निवृत्त हो जाओ। केवल अमरत्व को छोड़कर जिसकी जो इच्छा हो, वह माँग लो; उसका मनोरथ पूर्ण होगा।' उन्होंने रावण की ओर लक्ष्य करके कहा—'तुमने महत्त्वपूर्ण पद प्राप्त करने की इच्छा से अपने जिन-जिन मस्तकों की अग्नि में आहुति दी है, वे सब पूर्ववत् तुम्हारे शरीर में इच्छानुसार जुड़ जाएँगे। तुम्हारे शरीर में कोई कुरूपता नहीं होगी, तुम इच्छानुसार रूप धारण कर सकोगे तथा युद्ध में शत्रुओं पर विजयी होओगे, इसमें संशय नहीं है।' ब्रह्माजी ने यह भी कहा—'तुमने जिन लोगों का नाम लिया है, इनमें से किसी से भी तुम्हें भय नहीं होगा; केवल मनुष्य को छोड़कर तुम सबसे निर्भय रहो। तुम्हारा भला हो!'"

रावण उवाच

ब्रह्मोवाच य एते कीर्तिताः सर्वे न तेभ्योऽस्ति भयं तव ।
ऋते मनुष्याद् भद्रं ते तथा तद् विहितं मया ॥

ब्रह्माजीने कहा — तुमने जिन लोगोंका नाम लिया है, इनमेंसे किसीसे भी तुम्हें भय नहीं होगा । केवल मनुष्यको छोड़कर तुम सबसे निर्भय रहो । तुम्हारा भला हो । तुम्हारे लिये मनुष्यसे होनेवाले भयका विधान मैंने ही किया है ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 275 · श्लोक 26पृष्ठ 1834

"मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! ब्रह्माजी के ऐसा कहने पर दसमुख रावण बहुत प्रसन्न हुआ; वह दुर्बुद्धि नरभक्षी राक्षस मनुष्यों की अवहेलना करता था। तत्पश्चात् ब्रह्माजी ने कुम्भकर्ण से वर माँगने को कहा, परन्तु उसकी बुद्धि तमोगुण से ग्रस्त थी; अतः उसने अधिक काल तक नींद लेने का वर माँगा। 'ऐसा ही होगा' कहकर ब्रह्माजी विभीषण के पास गये और बोले—'बेटा! मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ, अतः तुम भी वर माँगो।' ब्रह्माजी ने यह बात बार-बार दुहरायी। विभीषण बोले—'भगवन्! बहुत बड़ा सङ्कट आने पर भी मेरे मन में कभी पाप का विचार न उठे तथा बिना सीखे ही मेरे हृदय में ब्रह्मास्त्र के प्रयोग और उपसंहार की विधि स्फुरित हो जाये।' ब्रह्माजी ने कहा—'शत्रुनाशन! राक्षस योनि में जन्म लेकर भी तुम्हारी बुद्धि अधर्म में नहीं लगती; इसलिये मैं तुम्हें अमरत्व भी देता हूँ।'"

"राजन्! राक्षस दशानन ने वर प्राप्त कर लेने पर सबसे पहले अपने भाई कुबेर को युद्ध में पराजित किया और उन्हें लङ्का के राज्य से बहिष्कृत कर दिया। भगवान् कुबेर लङ्का छोड़कर गन्धर्व, यक्ष, राक्षस तथा किम्पुरुषों के साथ गन्धमादन पर्वत पर आकर रहने लगे। रावण ने आक्रमण करके उनका पुष्पक विमान भी छीन लिया। तब कुबेर ने कुपित होकर उसे शाप दिया—'अरे! यह विमान तेरी सवारी में नहीं आ सकेगा। जो युद्ध में तुझे मार डालेगा, उसीका यह वाहन होगा। मैं तेरा बड़ा भाई होने के कारण मान्य था, परन्तु तूने मेरा अपमान किया है; इससे बहुत शीघ्र तेरा नाश हो जायेगा।' महाराज! विभीषण धर्मात्मा थे। उन्होंने सत्पुरुषों के मार्ग का ध्यान रखकर सदा अपने भाई कुबेर का अनुसरण किया; अतः वे उत्तम लक्ष्मी से सम्पन्न हुए।"

विभीषणस्तु धर्मात्मा सतां मार्गमनुस्मरन् ।
अन्वगच्छन्महाराज श्रिया परमया युतः ॥

महाराज! विभीषण धर्मात्मा थे । उन्होंने सत्पुरुषोंके मार्गका ध्यान रखकर सदा अपने भाई कुबेरका अनुसरण किया; अतः वे उत्तम लक्ष्मीसे सम्पन्न हुए ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 275 · श्लोक 36पृष्ठ 1837

बलोन्मत्त रावण इच्छानुसार रूप धारण करने और आकाश में भी चलने में समर्थ था। उसने दैत्यों और देवताओं पर आक्रमण करके उनके पास जो रत्न या रत्नभूत वस्तुएँ थीं, उन सबका अपहरण कर लिया। उसने सम्पूर्ण लोकों को रुला दिया था; इसलिये वह रावण कहलाता है। दशानन का बल उसके इच्छानुसार बढ़ जाता था; अतः वह सदा देवताओं को भयभीत किये रहता था।

रावयामास लोकान् यत् तस्माद्रावण उच्यते ।
दशग्रीवः कामबलो देवानां भयमादधत् ॥

उसने सम्पूर्ण लोकोंको रुला दिया था; इसलिये वह रावण कहलाता है । दशाननका बल उसके इच्छानुसार बढ़ जाता था; अतः वह सदा देवताओंको भयभीत किये रहता था ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 275 · श्लोक 40पृष्ठ 1838

मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! तत्पश्चात् रावण से कष्ट पाये हुए ब्रह्मर्षि, देवर्षि तथा सिद्धगण अग्निदेव को आगे करके ब्रह्माजी की शरण में गये। अग्निदेव बोले- "भगवन्! आपने पहले जो वरदान देकर विश्रवा के पुत्र महाबली रावण को अवध्य कर दिया है, वह महाबलवान् राक्षस अब संसार की समस्त प्रजा को अनेक प्रकार से सता रहा है; अतः आप ही उसके भय से हमारी रक्षा कीजिये। आपके सिवा हमारा दूसरा कोई रक्षक नहीं है।"

मार्कण्डेय उवाच

अग्निरुवाच योऽसौ विश्रवसः पुत्रो दशग्रीवो महाबलः ।
अवध्यो वरदानेन कृतो भगवता पुरा ॥

स बाधते प्रजाः सर्वा विप्रकारैर्महाबलः ।
ततो नस्त्रातु भगवन् नान्यस्त्राता हि विद्यते ॥

अग्निदेव बोले- भगवन्! आपने पहले जो वरदान देकर विश्रवाके पुत्र महाबली रावणको अवध्य कर दिया है, वह महाबलवान् राक्षस अब संसारकी समस्त प्रजाको अनेक प्रकारसे सता रहा है; अतः आप ही उसके भयसे हमारी रक्षा कीजिये । आपके सिवा हमारा दूसरा कोई रक्षक नहीं है ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 276 · श्लोक 2-3पृष्ठ 1839

ब्रह्माजी ने कहा - "अग्ने! देवता या असुर उसे युद्ध में नहीं जीत सकते। उसके विनाश के लिये जो आवश्यक कार्य था, वह कर दिया गया। अब सब प्रकार से उस दुष्ट का दमन हो जायेगा।" ब्रह्माजी ने आगे कहा - "उस राक्षस के निग्रह के लिये मैंने चतुर्भुज भगवान् विष्णु से अनुरोध किया था। मेरी प्रार्थना से वे भगवान् भूतल पर अवतार ले चुके हैं। वे योद्धाओं में श्रेष्ठ हैं; अतः वे ही रावण के दमन का कार्य करेंगे।"

मार्कण्डेय उवाच

ब्रह्मोवाच न स देवासुरैः शक्यो युद्धे जेतुं विभावसो ।
विहितं तत्र यत् कार्यमभितस्तस्य निग्रहः ॥

ब्रह्माजीने कहा - अग्ने! देवता या असुर उसे युद्धमें नहीं जीत सकते । उसके विनाशके लिये जो आवश्यक कार्य था, वह कर दिया गया । अब सब प्रकारसे उस दुष्टका दमन हो जायगा ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 276 · श्लोक 4पृष्ठ 1839

मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर ब्रह्माजी ने उन देवताओं के समीप ही इन्द्र से कहा — "तुम समस्त देवताओं के साथ भूतल पर जन्म ग्रहण करो। वहाँ रीछों और वानरों की स्त्रियों से ऐसे वीर पुत्र को उत्पन्न करो, जो इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ, बलवान् तथा भूतल पर अवतीर्ण हुए भगवान् विष्णु के योग्य सहायक हों।"

मार्कण्डेय उवाच

विष्णोः सहायानृक्षीषु वानरीषु च सर्वशः ।
जनयध्वं सुतान् वीरान् कामरूपबलान्वितान् ॥

‘ वहाँ रीछों और वानरोंकी स्त्रियोंसे ऐसे वीर पुत्रको उत्पन्न करो, जो इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ, बलवान् तथा भूतलपर अवतीर्ण हुए भगवान् विष्णुके योग्य सहायक हों'

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 276 · श्लोक 7पृष्ठ 1840

तदनन्तर देवता, गन्धर्व और नाग अपने - अपने अंश एवं अंशांश से इस पृथ्वी पर अवतीर्ण होने के लिये परस्पर परामर्श करने लगे। वरदायक देवता ब्रह्माजी ने उन सबके सामने ही दुन्दुभी नाम वाली गन्धर्वी को आज्ञा दी कि 'तुम भी देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये भूतल पर जाओ।' पितामह की बात सुनकर गन्धर्वी दुन्दुभी मनुष्यलोक में आकर मन्थरा नाम से प्रसिद्ध कुबड़ी दासी हुई।

मार्कण्डेय उवाच

पितामहवचः श्रुत्वा गन्धर्वी दुन्दुभी ततः ।
मन्थरा मानुषे लोके कुब्जा समभवत् तदा ॥

पितामहकी बात सुनकर गन्धर्वी दुन्दुभी मनुष्यलोकमें आकर मन्थरा नामसे प्रसिद्ध कुबड़ी दासी हुई ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 276 · श्लोक 10पृष्ठ 1840

इन्द्र आदि समस्त श्रेष्ठ देवता भी वानरों तथा रीछों की उत्तम स्त्रियों से सन्तान उत्पन्न करने लगे। वे सब वानर और रीछ यश तथा बल में अपने पिता देवताओं के समान ही हुए। वे पर्वतों के शिखर तोड़ डालने की शक्ति रखते थे; शाल और ताल के वृक्ष तथा पत्थरों की चट्टानें ही उनके आयुध थे। उनका शरीर वज्र के समान दुर्भेद्य और सुदृढ़ था। वे सभी राशि-राशि बल के आश्रय थे। उनका बल और पराक्रम इच्छा के अनुसार प्रकट होता था। वे सब के सब युद्ध करने की कला में दक्ष थे। उनके शरीर में दस हजार हाथियों के समान बल था। तेज चलने में वे वायु के वेग को लजा देते थे। उनका कोई घर-बार नहीं था; जहाँ इच्छा होती वहीं रह जाते थे। उनमें से कुछ लोग केवल वनों में ही रहते थे।

इस प्रकार सारी व्यवस्था करके लोक स्रष्टा भगवान् ब्रह्मा ने मन्थरा बनी हुई दुन्दुभी को जो - जो काम जैसे - जैसे करना था, वह सब समझा दिया। वह मन के समान वेग से चलने वाली थी। उसने ब्रह्माजी की बात को अच्छी तरह समझकर उसके अनुसार ही कार्य किया। वह इधर-उधर घूम-फिरकर वैर की आग प्रज्वलित करने में लग गयी।

सा तद्वचः समाज्ञाय तथा चक्रे मनोजवा ।
इतश्चेतश्च गच्छन्ती वैरसन्धुक्षणे रता ॥

वह मनके समान वेगसे चलनेवाली थी । उसने ब्रह्माजीकी बातको अच्छी तरह समझकर उसके अनुसार ही कार्य किया । वह इधर-उधर घूम-फिरकर वैरकी आग प्रज्वलित करनेमें लग गयी ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 276 · श्लोक 16पृष्ठ 1841

युधिष्ठिर ने पूछा— "ब्रह्मन्! आपने श्रीरामचन्द्रजी आदि सभी भाइयों के जन्म की कथा तो पृथक् - पृथक् सुना दी, अब मैं उनके वनवास का कारण सुनना चाहता हूँ; उसे कहिये। राजा दशरथ के वीर पुत्र दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण तथा मिथिलेशकुमारी यशस्विनी सीता को वन में क्यों जाना पड़ा?"

मार्कण्डेयजी ने कहा- "राजन्! अपने पुत्रों के जन्म से महाराज दशरथ को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे सदा सत्कर्म में तत्पर रहने वाले, धर्मपरायण तथा बड़े - बूढ़ों के सेवक थे। राजा के वे महातेजस्वी पुत्र क्रमशः बढ़ने लगे। उन्होंने उपनयन के पश्चात् विधिवत् ब्रह्मचर्य का पालन किया और वेदों तथा रहस्य सहित धनुर्वेद के पारङ्गत विद्वान् हुए। समयानुसार जब उनका विवाह हो गया, तब राजा दशरथ बड़े प्रसन्न तथा सुखी हुए।"

चारों पुत्रों में बुद्धिमान् श्रीराम सबसे बड़े थे। वे अपने मनोहर रूप एवं सुन्दर स्वभाव से समस्त प्रजा को आनन्दित करते थे- सबका मन उन्हीं में रमता था। इसके सिवा वे पिता के मन में भी आनन्द बढ़ाने वाले थे। 'अभिषेकाय रामस्य यौवराज्येन भारत।' युधिष्ठिर! राजा दशरथ बड़े बुद्धिमान् थे। उन्होंने यह सोचकर कि अब मेरी अवस्था बहुत अधिक हो गयी; अतः श्रीराम को युवराज पद पर अभिषिक्त कर देना चाहिये; इस विषय में अपने मन्त्री और धर्मज्ञ पुरोहितों से सलाह ली।

श्रीराम के शरीर की दीप्ति से दमकती रहती थी। युद्ध में उनका पराक्रम देवराज इन्द्र से कम नहीं था। वे समस्त धर्मों के पारङ्गत विद्वान् और बृहस्पतिके समान बुद्धिमान् थे। सम्पूर्ण प्रजा का उनमें अनुराग था। वे सभी विद्याओं में प्रवीण और जितेन्द्रिय थे। उनका अद्भुत रूप देखकर शत्रुओं के भी नेत्र और मन लुभा जाते थे। वे दुष्टों का दमन करने में समर्थ, साधुओं के संरक्षक, धर्मात्मा, धैर्यवान, दुर्धर्ष, विजयी तथा किसी से भी परास्त न होने वाले थे। कौसल्या का आनन्द बढ़ाने वाले अपने पुत्र श्रीराम को देख - देख कर राजा दशरथ को बड़ी प्रसन्नता होती थी।

राजन्! तुम्हारा भला हो। महातेजस्वी तथा परम पराक्रमी राजा दशरथ श्रीरामचन्द्रजी के गुणों का स्मरण करते हुए बड़ी प्रसन्नता के साथ पुरोहित से बोले — "ब्रह्मन्! आज पुष्य नक्षत्र है। रात में इसे परम पवित्र योग प्राप्त होने वाला है। आप राज्याभिषेक की सामग्री तैयार कीजिये और श्रीराम को भी इसकी सूचना दे दीजिये।"

राजा की यह बात मन्थरा ने भी सुन ली। वह ठीक समय पर कैकेयी के पास जाकर यों बोली— "केकयनन्दिनि! आज राजा ने तुम्हारे लिये महान् दुर्भाग्य की घोषणा की है। खोटे भाग्य वाली रानी! इससे अच्छा तो यह होता कि तुम्हें क्रोध में भरा हुआ प्रचण्ड विषधर सर्प डँस लेता। रानी कौसल्या का भाग्य अवश्य अच्छा है, जिनके पुत्र का राज्याभिषेक होगा। तुम्हारा ऐसा सौभाग्य कहाँ? जिसका पुत्र राज्य का अधिकारी ही नहीं है।"

मन्थरा के वचनों को सुनकर देवी कैकेयी समस्त आभूषणों से विभूषित होकर, परम सुन्दर रूप बनाकर एकान्त में अपने पति के पास गयी। उसकी मुस्कराहट से उसके शुद्ध भाव की सूचना मिल रही थी। वह हँसती और प्रेम जताती हुई मधुर वाणी में बोली— "सच्ची प्रतिघ्ञा करने वाले महाराज! आपने पहले जो 'तेरा मनोरथ सफल करूँगा' ऐसा वर दिया था, उसे आज पूर्ण कीजिये और उस सङ्कट से मुक्त हो जाइये।"

राजन ने कहा — "प्रिये! यह तो बड़े हर्ष की बात है। मैं अभी तुम्हें वर देता हूँ। तुम्हारी जो इच्छा हो, ले लो। आज मैं तुम्हारे कहने से किसको कैद करने के अयोग्य को कैद कर दूँ अथवा किसको मुक्त कर दूँ? किसे धन दे दूँ अथवा किसका सर्वस्व हरण कर लूँ? ब्राह्मणधन के अतिरिक्त यहाँ अथवा अन्यत्र जो कुछ भी मेरे पास धन है, उस पर तुम्हारा अधिकार है। मैं इस समय इस भूमण्डल का राजराजेश्वर हूँ, चारों वर्णों की रक्षा करने वाला हूँ। कल्याणि! तुम्हारा जो भी अभिलषित मनोरथ हो, उसे बताओ, देर न करो।"

राजा की बात को समझकर और उन्हें सब प्रकार से वचनबद्ध कर अपनी शक्ति को ठीक - ठीक जान लेने के बाद कैकेयी ने उनसे कहा— "महाराज! आपने श्रीराम के लिये जो राज्याभिषेक का सामान तैयार कराया है, वह भरत को प्राप्त हो और राम वन में चले जायें।"

आभिषेचनिकं यत् ते रामार्थमुपकल्पितम् ।
भरतस्तदवाप्नोतु वनं गच्छतु राघवः ॥

'महाराज! आपने श्रीरामके लिये जो राज्याभिषेकका सामान तैयार कराया है, वह भरतको प्राप्त हो और राम वनमें चले जायँ'

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 277 · श्लोक 26पृष्ठ 1846

कैकेयी का यह अप्रिय एवं भयानक परिणाम वाला वचन सुनकर राजा दशरथ दुःख से आतुर होकर अपने मुँह से कुछ भी बोल न सके। श्रीरामचन्द्रजी शक्तिशाली होने के साथ ही बड़े धर्मात्मा थे। उन्होंने पिता के पूर्वोक्त वरदान की बात जानकर, राजा के सत्य की रक्षा हो, इस उद्देश्य से स्वयं ही वन को प्रस्थान किया।

राजन्! तुम्हारा कल्याण हो। श्रीरामचन्द्रजी के वन जाते समय उत्तम शोभा से सम्पन्न उनके भाई लक्ष्मण ने तथा उनकी पत्नी विदेहराजकुमारी जनकनन्दिनी सीता ने भी उनका अनुसरण किया। श्रीरामचन्द्रजी के वन में चले जाने पर राजा दशरथ ने अपने पुत्रों के वियोग में प्राण त्याग दिए।

यह देखकर कैकेयी ने भरत को ननिहाल से बुलवाया और कहा— "बेटा! तुम्हारे पिता महाराज दशरथ स्वर्गलोक को सिधार गये तथा श्रीराम और लक्ष्मण वन में निवास करते हैं। अब यह विशाल राज्य सब प्रकार से सुखद और निष्कण्टक हो गया है। तुम इसे ग्रहण करो।"

भरत बड़े धर्मात्मा थे। वे माता की बात सुनकर बोले — "कुलकलङ्किनी जननी! तूने धन के लोभ में पड़कर यह कितनी बड़ी क्रूरता का काम किया है? पति की हत्या की और इस कुल का विनाश कर डाला। मेरे मस्तक पर कलङ्क की टीका लगाकर तू अपना मनोरथ पूर्ण कर ले।" ऐसा कहकर भरत फूट - फूटकर रोने लगे।

तामुवाच स धर्मात्मा नृशंसं बत ते कृतम् ।
पतिं हत्वा कुलं चेदमुत्साद्य धनलुब्धया ॥

अयशः पातयित्वा मे मूर्ध्नि त्वं कुलपांसने ।
सकामा भव मे मातरित्युक्त्वा प्ररुरोद ह ॥

भरत बड़े धर्मात्मा थे । वे माताकी बात सुनकर उससे बोले - ' कुलकलंकिनी जननी! तूने धनके लोभमें पड़कर यह कितनी बड़ी क्रूरताका काम किया है? पतिकी हत्या की और इस कुलका विनाश कर डाला । ' मेरे मस्तकपर कलंकका टीका लगाकर तू अपना मनोरथ पूर्ण कर ले । ' ऐसा कहकर भरत फूट- फूटकर रोने लगे ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 277 · श्लोक 33-34पृष्ठ 1847

उन्होंने सारी प्रजा और मन्त्रियों आदि के निकट अपनी सफाई दी तथा भाई श्रीराम को वन से लौटा लाने की लालसा से उन्हीं के पथ का अनुसरण किया। वे कौसल्या, सुमित्रा तथा कैकेयी को सवारियों द्वारा आगे भेजकर स्वयं अत्यन्त दुःखी होकर शत्रुघ्न के साथ पैदल ही वन को चले। श्रीरामचन्द्रजी को लौटा लाने की अभिलाषा से उन्होंने वसिष्ठ, वामदेव और दूसरे सहस्रों ब्राह्मणों तथा नगर एवं जनपद के लोगों को साथ लेकर यात्रा की।

उस समय श्रीरामचन्द्रजी ने कहा — "तात भरत! अयोध्या को लौट जाओ। तुम्हें प्रजा की रक्षा करनी चाहिये और मैं पिता के सत्य की रक्षा कर रहा हूँ।" ऐसा कहकर पिता की आज्ञा पालन करने वाले श्रीरामचन्द्रजी ने उन्हें विदा कर दिया। तब वे लौटकर बड़े भाई की चरणपादुकाओं को आगे रखकर नन्दिग्राम में ठहर गये और वहीं से राज्य की देख - भाल करने लगे।

श्रीरामचन्द्रजी ने वहाँ नगर और जनपद के लोगों के बराबर आने - जाने की आशङ्का से शरभङ्ग मुनि के आश्रम के पास विशाल वन में प्रवेश किया। वहाँ शरभङ्ग मुनि का सत्कार करके वे दण्डकारण्य में चले गये और वहाँ सुरम्य गोदावरी नदी के तटका आश्रय लेकर रहने लगे।

वहाँ रहते समय शूर्पणखा के नाक, कान और ओंठ काट लिये जाने के कारण श्रीरामचन्द्रजी का जनस्थान - निवासी खर नामक राक्षस के साथ महान् वैर हो गया। धर्मवत्सल श्रीरामचन्द्रजी ने तपस्वी मुनियों की रक्षा के लिये महाबली खर और दूषण को मारकर वहाँ के चौदह हजार राक्षसों का संहार कर डाला। उन बुद्धिमान् रघुनाथजी ने पुनः उस वन को क्षेमकारक धर्मारण्य बना दिया।

उन राक्षसों के मारे जाने पर शूर्पणखा, जिसकी नाक और ओंठ काट लिये गये थे, पुनः लङ्का में अपने भाई रावण के घर गयी। रावण के पास पहुँचकर वह राक्षसी दुःख से मूर्च्छित होकर भाई के चरणों में गिर पड़ी। उसके मुख पर रक्त बहकर सूख गया था।

बहिन का रूप इस प्रकार विकृत देखकर रावण क्रोध से मूर्च्छित हो उठा और दाँतों से दाँत पीसता हुआ रोषपूर्वक आसन से उठकर खड़ा हो गया। उसने अपने मन्त्रियों को विदा करके एकान्त में शूर्पणखा से पूछा— "भद्रे! किसने मेरी परवा न करके, मेरी सर्वथा अवहेलना करके तुम्हारी ऐसी दुर्दशा की है? कौन तीखे शूल के पास जाकर उसे अपने सारे अङ्गों में चुभोना चाहता है? कौन मूर्ख अपने सिर पर आग रखकर बेखटके सुख की नींद सो रहा है? कौन अत्यन्त भयङ्कर विषधर सर्प को पैर से कुचल रहा है? तथा कौन केसरी सिंह की दाढ़ों में हाथ डालकर निश्चिन्त खड़ा है?"

इस प्रकार बोलते हुए रावण के कान, नाक एवं आँख आदि छिद्रों से उसी प्रकार आग की चिनगारियाँ निकलने लगीं, जिस प्रकार रात को जलते हुए वृक्ष के छेदों से आग की लपटें निकलती हैं। तब रावण की बहिन शूर्पणखा ने श्रीराम के उस पराक्रम और खर - दूषण सहित समस्त राक्षसों के संहार का सारा वृत्तान्त सुनाया। यह सुनकर रावण ने अपने कर्तव्य का निश्चय किया और अपनी बहिन को सान्त्वना देकर नगर आदि की रक्षा का प्रबन्ध करके वह आकाश मार्ग से उड़ चला। उसे ऊपर - ही - ऊपर लाँघकर दशमुख रावण गोकर्णतीर्थ में गया, जो परमात्मा शूलपाणि शिव का प्रिय एवं अविचल स्थान है।

तमतीत्याथ गोकर्णमभ्यगच्छद् दशाननः ।
दयितं स्थानमव्यग्रं शूलपाणेर्महात्मनः ॥

उसे ऊपर-ही-ऊपर लाँघकर दशमुख रावण गोकर्णतीर्थमें गया, जो परमात्मा शूलपाणि शिवका प्रिय एवं अविचल स्थान है ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 277 · श्लोक 55पृष्ठ 1851

मार्कण्डेय जी कहते हैं—हे युधिष्ठिर! जब रावण गोकर्णतीर्थ पहुँचा, तो वहाँ उसका सामना अपने पूर्ववर्ती मन्त्री मारीच से हुआ। मारीच श्रीराम के भय से ही उस स्थान पर आकर तपस्या कर रहा था। जैसे ही उसने रावण को आते देखा, वह सहसा उठकर खड़ा हो गया और उसने फल-मूल आदि से अतिथिसत्कार की सामग्रियों द्वारा रावण का विधिवत् पूजन किया।

जब रावण बैठकर विश्राम कर चुका, तब उसके पास बैठा मारीच—जो बातचीत में कुशल था—विनयपूर्वक बोला, ‘लङ्केश्वर! तुम्हारे शरीर का रङ्ग ठीक हालत में नहीं है। तुम उदास दिखाई देते हो। तुम्हारे नगर में कुशल तो है न? समस्त प्रजा और मन्त्री आदि पहले की भाँति तुम्हारी सेवा करते हैं न? राक्षसराज! कौन-सा ऐसा कार्य आ गया है, जिसके लिये तुम्हें यहाँ तक आना पड़ा? यदि वह मेरे द्वारा साध्य है, तो कितना ही कठिन क्यों न हो, उसे किया हुआ ही समझो।’

रावण क्रोध और अमर्ष से भरा हुआ था। उसने एक-एक करके राम द्वारा किए हुए सब कार्य सङ्क्षेप में सुनाए। सारी बातें सुनकर मारीच ने उसे समझाने का प्रयास किया, ‘दशानन! तुम श्रीराम से भिड़ने का साहस न करो। मैं उनके पराक्रम को जानता हूँ। इस जगत् में कौन ऐसा वीर है, जो परमात्मा श्रीराम के बाणों का वेग सह सके? मैं जो यहाँ सन्न्यासी बना बैठा हूँ, इसमें भी वे पुरुषरत्न श्रीराम ही कारण हैं। श्रीराम से वैर मोल लेना विनाश के मुख में जाना है। किस दुरात्मा ने तुम्हें ऐसी सलाह दी है?’

मारीच की बात सुनकर रावण और भी कुपित हो उठा। उसने डाँटते हुए कहा, ‘मारीच! यदि तू मेरी बात नहीं मानेगा, तो भी तेरी मृत्यु निश्चित ही है।’ मारीच ने मन ही मन सोचा कि यदि मृत्यु निश्चित ही है, तो श्रेष्ठ पुरुष के हाथ से मरना अच्छा है; अतः वह रावण का कार्य अवश्य करेगा। उसने पूछा, ‘अच्छा; बताओ, मुझे तुम्हारी क्या सहायता करनी होगी? इच्छा न होने पर भी मैं विवश होकर उसे करूँगा।’

तब दशानन ने कहा, ‘तुम एक ऐसे मनोहर मृग का रूप धारण करो जिसके सीतरह रत्नमय प्रतीत हों और शरीर के रोएँ भी रत्नों के समान चित्र-विचित्र दिखें। फिर राम के आश्रम पर जाकर सीता को लुभाओ। सीता तुम्हें देख लेने पर निश्चय ही राम से यह अनुरोध करेगी कि—"आप इस मृग को पकड़ लाइये।" तुम्हारे पीछे राम के आश्रम से दूर निकल जाने पर सीता को वश में लाना सहज हो जाएगा। मैं उसे हरकर ले जाऊँगा और दुर्बुद्धि राम अपनी प्यारी पत्नी के वियोग से व्याकुल होकर प्राण दे देगा। बस, मेरी इतनी ही सहायता कर दो।’

तमब्रवीद् दशग्रीवो गच्छ सीतां प्रलोभय ॥

रत्नशृङ्गी मृगो भूत्वा रत्नचित्रतनूरुहः ।
ध्रुवं सीता समालक्ष्य त्वां रामं चोदयिष्यति ॥

तब दशाननने उससे कहा –' तुम एक ऐसे मनोहर मृगका रूप धारण करो जिसके सींग रत्नमय प्रतीत हों और शरीरके रोएँ भी रत्नोंके ही समान चित्र - विचित्र दिखायी दें । फिर रामके आश्रमपर जाओ और सीताको लुभाओ । सीता तुम्हें देख लेनेपर निश्चय ही रामसे यह अनुरोध करेगी कि ' आप इस मृगको पकड़ लाइये '

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 278 · श्लोक 11-12पृष्ठ 1855

रावण के ऐसा कहने पर मारीच ने स्वयं का श्राद्ध-तर्पण किया और अत्यन्त दुःखी होकर रावण के पीछे-पीछे चल पड़ा। तदनन्तर दोनों ने योजना के अनुसार कार्य किया। रावण भिक्षापात्र हाथ में लिए एक त्रिदण्डधारी सन्न्यासी बन गया और मारीच मृग का रूप धरकर आश्रम की ओर बढ़ा। मारीच ने विदेहनन्दिनी सीता के समक्ष अपना मृगरूप प्रकट किया।

विधिक विधान से प्रेरित होकर सीता ने उस मृग को लाने के लिये श्रीराम को भेजा। श्रीराम ने सीता का प्रिय करने हेतु धनुष हाथ में लिया और लक्ष्मण को रक्षा का भार सौंपकर तुरन्त चल दिए। वे धनुष-बाण ले, पीठ पर तरकस बाँधकर और कटि में कृपाण लटकाए उस मृग के पीछे उसी प्रकार दौड़े, जैसे मृग के पीछे भगवान रुद्र दौड़े थे। वह मायावी राक्षस मारीच कभी छिप जाता तो कभी प्रकट हो जाता; इस प्रकार वह श्रीराम को आश्रम से बहुत दूर खींच ले गया। तब श्रीराम ने ताड़ लिया कि यह कोई मायावी राक्षस है और एक अमोघ बाण मारकर उस निशाचर को मार डाला।

मरते समय मारीच ने श्रीराम के ही स्वर में आर्तनाद किया—‘हा सीते! हा लक्ष्मण!’ उसकी वह करुणा भरी पुकार सुनकर सीता दौड़ पड़ीं। तब लक्ष्मण ने उन्हें ढाँढस बँधाया, ‘भीरु! डरने की कोई बात नहीं है। भला, कौन ऐसा है जो भगवान राम को मार सकेगा? तुम दो ही घड़ी में अपने पति श्रीराम को यहाँ उपस्थित देखोगी।’

लक्ष्मण की बात सुनकर रोती हुई सीता ने उन्हें सन्देह की दृष्टि से देखा। यद्यपि वे साध्वी और पतिव्रता थीं, तथापि स्त्री स्वभाववश उस समय उनकी बुद्धि मारी गई। उन्होंने लक्ष्मण को कठोर वचन कहे, ‘ओ मूढ़! तुम मन ही मन जिस वस्तु को पाना चाहते हो, तुम्हारा वह मनोरथ कभी पूर्ण न होगा। मैं स्वयं तलवार लेकर अपना गला काट लूँगी, पर्वत के शिखर से कूद जाऊँगी अथवा जलती हुई आग में समा जाऊँगी; परन्तु राम जैसे स्वामी को छोड़कर तुम जैसे नीच पुरुष का कदापि वरण न करूँगी।’

लक्ष्मण ने सीता के ये कठोर वचन सुनकर अपने दोनों कान बन्द कर लिए और बिना आँख उठाकर उनकी ओर देखे, श्रीराम के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए वहाँ से प्रस्थान कर दिया। इसी बीच रावण वहाँ दिखाई दिया। वह भयानक निशाचर सुन्दर रूप धारण करके, राख में छिपी आग के समान सन्न्यासी के वेष में था। उसने सीता को भोजन के लिये आमन्त्रित किया, पर जब सीता ने उसकी अवहेलना की, तो वह अपने असली रूप में प्रकट हो गया।

रावण ने कहा, ‘सीते! मैं राक्षसों का राजा रावण हूँ। समुद्र के पार मेरी रमणीय लङ्कापुरी है। वहाँ तुम मेरे साथ रहकर शोभा पाओगी। अतः मेरी पत्नी बन जाओ और इस तपस्वी राम को छोड़ दो।’ सीता ने क्रोधित होकर कहा, ‘बस, अब ऐसी बातें मुँह से न निकाल। नक्षत्रों सहित आकाश फट पड़े, पृथ्वी टूट जाए और अग्नि शीतल हो जाए, पर मैं रघुकुलनन्दन श्रीराम को नहीं छोड़ सकती।’

शैत्यमग्निरियान्नाहं त्यजेयं रघुनन्दनम् ॥

रावणके ऐसे वचन सुनकर सुन्दरी जनककिशोरीने अपने दोनों कान बंद कर लिये और उससे इस प्रकार कहा— ' बस, अब ऐसी बातें मुँहसे न निकाल । नक्षत्रोंसहित आकाश फट पड़े, पृथ्वी टूक- टूक हो जाय और अग्नि अपनी उष्णताका त्याग करके शीतल हो जाय, परंतु मैं रघुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजीको नहीं छोड़ सकती ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 278 · श्लोक 38पृष्ठ 1859

सीता जब आश्रम में लौटने लगीं, तो रावण ने उनका मार्ग रोक लिया और उन्हें डराया-धमकाया। भय के मारे सीता मूर्च्छित हो गईं। तब रावण ने उनके केश पकड़ लिए और उन्हें आकाश मार्ग से लङ्का की ओर ले जाने लगा। उस समय तपस्विनी सीता ‘हा राम—हा राम’ कहती हुई रो रही थीं।

तभी पर्वत की गुफा में रहने वाले गृध्रराज जटायु ने उन्हें देखा। जटायु ने क्रोधित होकर कहा, ‘निशाचर! मिथिलेश कुमारी को छोड़ दे! मेरे जीते-जी तू इन्हें कैसे हर ले जाएगा? यदि तूने सीता को नहीं छोड़ा, तो मेरे हाथ से जीवित नहीं बचेगा।’ ऐसा कहकर जटायु ने अपने नखों से रावण को घायल कर दिया। उसने सैकड़ों घाव किए, जिससे रावण का शरीर रक्त से भर गया। तब रावण ने तलवार से जटायु के दोनों पङ्ख काट दिए और सीता को लेकर आगे बढ़ गया।

रास्ते में सीता ने अपना एक दिव्य पीला वस्त्र आकाश में गिरा दिया। रावण कुछ ही समय में लङ्का की चहारदीवारी के निकट पहुँच गया। दूसरी ओर, जब श्रीराम और लक्ष्मण आश्रम लौटे, तो श्रीराम ने देखा कि कुटी उजाड़ है और कलश फूटे पड़े हैं। श्रीराम अत्यन्त दुःखी हुए और उन्होंने लक्ष्मण को कोसते हुए पूछा कि वे सीता को अकेला छोड़कर कैसे चले आए।

तभी उन्हें मार्ग में घायल जटायु दिखे। श्रीराम ने उन्हें राक्षस समझकर धनुष तान लिया, तब जटायु ने कहा, ‘आप दोनों का भला हो! मैं राजा दशरथ का मित्र जटायु हूँ।’ उन्होंने बताया कि सीता को छुड़ाने के युद्ध में रावण ने उन्हें घायल कर दिया है। जटायु ने दक्षिण दिशा की ओर सङ्केत किया और अपने प्राण त्याग दिए। श्रीराम ने पिता के मित्र का विधिपूर्वक अन्त्येष्टि-संस्कार किया। तदनन्तर, वे दोनों दुःखी मन से दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े।

दुःखशोकसमाविष्टौ वैदेहीहरणार्दितौ ।
जग्मतुर्दण्डकारण्यं दक्षिणेन परंतपौ ॥

सीताका अपहरण हो जानेसे दोनों भाइयोंको बड़ी वेदना हुई । वे दुःख और शोकमें डूब गये । फिर शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीराम और लक्ष्मण दण्डकारण्यसे दक्षिण दिशाकी ओर चल दिये ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 279 · श्लोक 26पृष्ठ 1865

भाइयों! आगे की कथा इस प्रकार है कि श्रीराम और लक्ष्मण वन के मार्ग से जा रहे थे, तभी उनके सामने एक अत्यन्त भयङ्कर दृश्य प्रकट हुआ। सामने एक 'कबन्ध' दिखाई दिया—एक ऐसा धड़ जो देखने में अत्यन्त भयानक था; वह मेघ के समान काला और पर्वत के समान विशालकाय था। साखू की शाखा के समान उसके कन्धे और बड़ी-बड़ी भुजाएँ थीं। उसकी चौड़ी छाती में दो बड़ी-बड़ी आँखें चमक रही थीं और लम्बे से पेट में एक बहुत बड़ा मुख दिखाई दे रहा था। वह एक राक्षस था।

अचानक उस राक्षस ने आकर लक्ष्मण का एक हाथ पकड़ लिया। यह देखकर सुमित्रानन्दन लक्ष्मण तत्काल अत्यन्त दुःखी हो गए। जिस ओर उस राक्षस का मुख था, वे उसी ओर खिञ्चते चले जा रहे थे। विवश होकर वे श्रीराम की ओर देखने लगे और अत्यन्त विषाद में भरकर बोले— "भैया! देखिये, मेरी यह क्या अवस्था हो रही है? विदेहकुमारी का अपहरण, मेरा इस प्रकार असमय में विपत्तिग्रस्त होना, आपका राज्य से निर्वासन तथा पिताजी की मृत्यु—सङ्कट पर सङ्कट आता जा रहा है। जान पड़ता है, जब आप सीता के साथ अयोध्या में लौटकर पिता-पितामहों की परम्परा से प्राप्त इस भूमण्डल के राज्य पर प्रतिष्ठित होंगे, उस समय मैं आपका दर्शन न कर सकूँगा। जो लोग कुश, लाजा और शमीपत्र आदि द्वारा राज्य पर अभिषिक्त हुए आप आर्य के मेघों के आवरण से रहित शरत्कालीन चन्द्रमा के समान मनोहर मुख का दर्शन करेंगे, वे धन्य हैं!"

बुद्धिमान लक्ष्मण इस प्रकार विभिन्न प्रकार से विलाप करने लगे। किन्तु भगवान श्रीराम घबराए नहीं। उन्होंने शान्त स्वर में कहा— "नरश्रेष्ठ! तुम खेद न करो। मेरे रहते यह राक्षस कोई चीज नहीं है; इससे तुम्हें कोई हानि नहीं पहुँच सकती। तुम इसकी दाहिनी बाँह काट डालो, मैं बायीं भुजा काट रहा हूँ।" इतना कहते ही श्रीरामचन्द्रजी ने अपनी अत्यन्त तीखी तलवार से उस राक्षस की एक बाँह तिल के पौधे की तरह काटकर गिरा दी। तदनन्तर बलवान लक्ष्मण ने भी अपने खड्ग से उसकी दाहिनी बाँह काट डाली और अपने भाई श्रीराम को खड़ा देखकर उसकी पसली पर भी बड़े जोर से प्रहार किया। फिर वह महान राक्षस कबन्ध प्राणशून्य होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा।

ततोऽस्य दक्षिणं बाहु खड्गेनाजघ्निवान् बली ।
सौमित्रिरपि सम्प्रेक्ष्य भ्रातरं राघवं स्थितम् ॥

पुनर्जघान पार्श्वे वै तद् रक्षो लक्ष्मणो भृशम् ।
गतासुरपतद् भूमौ कबन्धः सुमहांस्ततः ॥

तदनन्तर बलवान् सुमित्रानन्दन लक्ष्मणने भी अपने खड्गसे उसकी दाहिनी बाँह काट डाली और अपने भाई श्रीरामको खड़ा देखकर उन्होंने उसकी पसलीपर भी बड़े जोरसे प्रहार किया। फिर तो वह महान् राक्षस कबन्ध प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 279 · श्लोक 38-39पृष्ठ 1867

तभी उस मृतक देह से एक दिव्य रूपधारी पुरुष निकलकर आकाश में प्रकट हुआ। वह सूर्य के समान देदीप्यमान हो रहा था। श्रीराम ने कौतूहलवश पूछा— "तुम कौन हो? अपना परिचय दो। मेरे पूछने पर अपनी इच्छा के अनुसार बताओ, यह कैसी अद्भुत एवं आश्चर्यमयी घटना प्रतीत हो रही है?"

उस दिव्य पुरुष ने उत्तर दिया— "राजन्! मैं विश्वावसु नामक गन्धर्व हूँ। एक ब्राह्मण के शाप से इस राक्षस योनि में आ गया था। लङ्कावासी राक्षसराज रावण ने आपकी पत्नी सीता का अपहरण किया है। आप वानरराज सुग्रीव से मिलिये, वे आपकी सहायता करेंगे। यह थोड़ी ही दूर पर पवित्र जल से भरा हुआ पम्पासरोवर है, जिसमें हंस और कारण्डव आदि पक्षी चहक रहे हैं। वह सरोवर ऋष्यमूक पर्वत से सटा हुआ है। वहीं अपने चार मन्त्रियों के साथ सुवर्णमालाधारी वानरराज वाली के भाई सुग्रीव निवास करते हैं। उनसे मिलकर आप अपने दुःख का कारण बताइये; उनका शील-स्वभाव आपके ही समान है और वे निश्चय ही आपकी सहायता करेंगे। मैं तो इतना ही कह सकता हूँ कि आपकी जनकनन्दिनी सीता से अवश्य भेंट होगी। वानरराज सुग्रीव को रावण के घर का पता निश्चय ही ज्ञात है।" ऐसा कहकर वह महातेजस्वी दिव्य पुरुष वहीं अन्तर्हित हो गया।

तस्याचचक्षे गन्धर्वो विश्वावसुरहं नृप ।
प्राप्तो ब्राह्मणशापेन योनिं राक्षससेविताम् ॥

रावणेन हता सीता राज्ञा लङ्काधिवासिना ।
सुग्रीवमभिगच्छस्व स ते साह्यं करिष्यति ॥

उसने कहा — ' राजन्! मैं विश्वावसु नामक गन्धर्व हूँ। एक ब्राह्मणके शापसे इस राक्षसयोनिमें आ गया था - लंकावासी राक्षसराज रावणने आपकी पत्नी सीताका अपहरण किया है । आप वानरराज सुग्रीवसे मिलिये । वे आपकी सहायता करेंगे '

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 279 · श्लोक 42-43पृष्ठ 1868

वीरवर श्रीराम और लक्ष्मण दोनों को उसके दर्शन और वार्तालाप से बड़ा विस्मय हुआ। इसके पश्चात, मार्कण्डेय जी कहते हैं कि सीताहरण के दुःख से पीड़ित श्रीरामचन्द्रजी पम्पासरोवर पर गये, जो वहाँ से थोड़ी ही दूर था। उस सरोवर में बहुत-से कमल और उत्पल खिले हुए थे। उस वन में अमृत की सी सुगन्ध लिए मन्द गति से प्रवाहित होने वाली शीतल वायु का स्पर्श पाकर श्रीराम अपने मन में प्रिया सीता का चिन्तन करने लगे। अपनी प्राणवल्लभा का बारम्बार स्मरण करके वे कामबाण से सन्तप्त होकर विलाप करने लगे।

मार्कण्डेय उवाच

विललाप स राजेन्द्रस्तत्र कान्तामनुस्मरन् ।
कामबाणाभिसंतप्तः सौमित्रिस्तमथाब्रवीत् ॥

अपनी प्राणवल्लभाका बारंबार स्मरण करके कामबाणसे संतप्त हुए - से महाराज श्रीराम विलाप करने लगे । उस समय सुमित्रानन्दन लक्ष्मणने उनसे कहा- ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 280 · श्लोक 3पृष्ठ 1870

उस समय लक्ष्मण ने उन्हें धैर्य बँधाते हुए कहा— "मानद! मन पर काबू रखने वाले और वृद्धों के समान संयम से रहने वाले पुरुष को जैसे कोई रोग नहीं छू सकता, उसी प्रकार आपको इस दैन्यभाव का स्पर्श शोभा नहीं देता। आपको सीता तथा उनके अपहरण करने वाले रावण का समाचार मिल गया है; अब आप अपने पुरुषार्थ और बुद्धिबल से जानकी को प्राप्त कीजिये। हम दोनों यहाँ से वानरराज सुग्रीव के पास चलें, जो ऋष्यमूक पर्वत के शिखर पर रहते हैं। मैं आपका शिष्य, सेवक और सहायक हूँ; मेरे रहते आपको धैर्य रखना चाहिये।"

मार्कण्डेय उवाच

न त्वामेवंविधो भावः स्प्रष्टुमर्हति मानद ।
आत्मवन्तमिव व्याधिः पुरुषं वृद्धशीलिनम् ॥

‘ मानद! मनपर काबू रखनेवाले तथा वृद्धोंके समान संयम - नियमसे रहनेवाले पुरुषको जैसे कोई रोग नहीं छू सकता, उसी प्रकार आपको ऐसे दैन्यभावका स्पर्श होना उचित नहीं जान पड़ता है '

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 280 · श्लोक 4पृष्ठ 1870

लक्ष्मण के वचनों से श्रीराम स्वस्थ हुए और आवश्यक कार्य में लग गए। उन्होंने पम्पासरोवर के जल में स्नान कर पितरों का तर्पण किया और फिर दोनों भाई वहाँ से प्रस्थान कर गए। प्रचुर फल-मूलों से भरे ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचकर उन्होंने देखा कि शिखर पर पाँच वानर बैठे हैं। सुग्रीव ने हिमालय के समान गम्भीर भाव से अपने बुद्धिमान सचिव हनुमान को उनके पास भेजा। बातचीत होने के पश्चात वे दोनों भाई सुग्रीव के पास गये और वहाँ श्रीराम ने सुग्रीव के साथ मैत्री की।

तेन सम्भाष्य पूर्वं तौ सुग्रीवमभिजग्मतुः ।
सख्यं वानरराजेन चक्रे रामस्तदा नृप ॥

उनके साथ पहले बातचीत हो जानेपर वे दोनों भाई सुग्रीवके पास गये । राजन्! उस समय श्रीरामचन्द्रजीने वानरराज सुग्रीवके साथ मैत्री की ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 280 · श्लोक 11पृष्ठ 1871

जब श्रीराम ने अपना कार्य निवेदन किया, तब सुग्रीव ने उन्हें वह वस्त्र दिखाया जो अपहरण के समय सीता ने वानरों के बीच डाल दिया था। रावण द्वारा सीता के अपहृत होने का यह विश्वासजनक प्रमाण पाकर श्रीराम ने स्वयं ही सुग्रीव को अखिल भूमण्डल के वानरों के सम्राट पद पर अभिषिक्त कर दिया और साथ ही बाली के वध की प्रतिज्ञा भी की। सुग्रीव ने भी विदेहनन्दिनी सीता को ढूँढ़ लाने की प्रतिज्ञा की।

तत् प्रत्ययकरं लब्ध्वा सुग्रीवं प्लवगाधिपम् ।
पृथिव्यां वानरैश्वर्ये स्वयं रामोऽभ्यषेचयत् ॥

रावणद्वारा सीताके अपहृत होनेका यह विश्वासजनक प्रमाण पाकर श्रीरामने स्वयं ही वानरराज सुग्रीवको अखिल भूमण्डलके वानरोंके सम्राट्पदपर अभिषिक्त कर दिया ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 280 · श्लोक 13पृष्ठ 1872

प्रतिज्ञापूर्वक एक-दूसरे को विश्वास दिलाकर वे सब किष्किन्धापुरी में आये। वहाँ पहुँचकर सुग्रीव ने बड़े जोर से सिंहनाद किया, जिससे मानो बहुत बड़े जनसमूह का शब्द गूँज उठा हो। यह सुनकर बाली क्रोधित होकर निकलने लगा। उसकी पत्नी तारा ने उसे रोकते हुए कहा— "नाथ! आज सुग्रीव जिस प्रकार गर्जना कर रहा है, उससे मालूम होता है कि उसका बल बढ़ गया है। मुझे लगता है उसे कोई बलवान सहायक मिल गया है, अतः आप घर से न निकलें।"

इत्युक्त्वा समयं कृत्वा विश्वास्य च परस्परम् ।
अभ्येत्य सर्वे किष्किन्धां तस्थुर्युद्धाभिकाङ्क्षिणः ॥

इस प्रकार प्रतिज्ञापूर्वक एक- दूसरेको विश्वास दिलाकर वे सब--के --सबस किष्किन्धापुरीमें आये और युद्धकी अभिलाषासे डटकर खड़े हो गये ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 280 · श्लोक 15पृष्ठ 1872

परन्तु सुवर्णमाला से विभूषित तारापति बाली ने अपनी चन्द्रमुखी पत्नी से कहा— "प्रिये! तुम बुद्धिमती हो, तो सोचो कि मेरा यह नाममात्र का भाई किसका सहारा लेकर आया है?" तारा ने दो घड़ी विचार करके कहा— "कपीश्वर! सुनिये, दशरथनन्दन श्रीराम महान शक्तिशाली वीर हैं। उनकी पत्नी का अपहरण हुआ है और उन्होंने सुग्रीव से मित्रता की है। उनके भाई लक्ष्मण भी किसी से परास्त होने वाले नहीं हैं। इनके सिवा मैन्द, द्विविद, हनुमान और जाम्बवान जैसे महाबली मन्त्री भी हैं। ये सब श्रीराम के बल-पराक्रम का सहारा पाकर आपको मार डालने में समर्थ हैं।"

सर्व एते महात्मानो बुद्धिमन्तो महाबलाः ।
अलं तव विनाशाय रामवीर्यबलाश्रयात् ॥

‘ ये सब - के - सब महामनस्वी, बुद्धिमान् और महाबली हैं । श्रीरामचन्द्रजीके बल-पराक्रमका सहारा मिल जानेसे ये लोग आपको मार डालनेमें समर्थ हैं'

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 280 · श्लोक 24पृष्ठ 1874

यद्यपि तारा ने हित की बात कही, पर ईर्ष्यालु बाली ने उस पर आक्षेप लगाया कि वह मन ही मन सुग्रीव को चाहती है। क्रोधित होकर बाली गुफा के द्वार से बाहर निकला और सुग्रीव से बोला— "अरे! तू तो पहले अनेक बार मेरे द्वारा पराजित हो चुका है और भागकर जान बचाता फिरा है। मैंने तुझे भाई समझकर छोड़ दिया था, फिर आज मरने के लिए इतनी उतावली क्यों है?"

सुग्रीव ने उत्तर दिया— "राजन्! तुमने मेरा राज्य और मेरी स्त्री दोनों छीन ली हैं, ऐसी दशा में मुझमें जीवित रहने की शक्ति कहाँ है? मैं तो मरने ही चला आया हूँ।" इस प्रकार दोनों योद्धाओं में युद्ध छिड़ गया। वे साखू, ताड़के के वृक्षों और चट्टानों को अस्त्र बनाकर एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे। वे उछल-कूद कर मुक्कों से वार करते और रक्त से लथपथ हो जाते। जब युद्ध में कोई अन्तर नहीं दिख रहा था, तब हनुमान ने सुग्रीव की पहचान हेतु उसके गले में एक माला डाल दी।

महाधनुर्धर श्रीराम ने सुग्रीव को चिह्न धारण किए देख बाली को लक्ष्य बनाया और धनुष खींचा। उस धनुष की टङ्कार भयङ्कर थी। बाण की चोट से बाली का वक्षस्थल विदीर्ण हो गया और वह रक्त वमन करने लगा। सामने उसे श्रीराम दिखे, तो उसने छिपकर वार करने के कारण उनकी निन्दा की और पृथ्वी पर गिर पड़ा।

इधर, काम के वशीभूत रावण ने सीता को अशोकवाटिका के निकट एक रमणीय भवन में ठहराया था। पति का स्मरण करते-करते सीता दुर्बल हो गई थीं। वे तपस्विनी बन चुकी थीं और फल-मूल खाकर बड़े दुःख से दिन बिताती थीं। उनकी रक्षा के लिए भयङ्कर राक्षसियाँ नियुक्त थीं— जिनकी आँखें आग की तरह प्रज्वलित थीं, सिर के बाल ऊँटों जैसे रूखे थे और जिनका स्वर अत्यन्त दारुण था। वे राक्षसियाँ सीता को डाँटती रहती थीं— "अरी! यह हमारे स्वामी की अवहेलना करके अब तक जीवित कैसे है? इसे तिल-तिल काटकर खा जाएँ!"

इन कठोर वचनों से डरी हुई सीता ने लम्बी साँस खींचते हुए कहा— "आर्याः खादत मां शीघ्रं न मे लोभोऽस्ति जीविते। (हे राक्षसियों! मुझे शीघ्र खा जाओ, मुझे जीवित रहने का लोभ नहीं है।) भगवान श्रीराम के बिना मैं अपने शरीर को सुखा डालूँगी, परन्तु उनके सिवा दूसरे किसी पुरुष का सेवन कदापि नहीं करूँगी।" यह सुनकर वे राक्षसियाँ रावण को समाचार देने चली गईं।

सीता मद्वचनाद् वाच्या समाश्वास्य प्रसाद्य च ।
भर्ता ते कुशली रामो लक्ष्मणानुगतो बली ॥

सख्यं वानरराजेन शक्रप्रतिमतेजसा ।
कृतवान् राघवः श्रीमांस्त्वदर्थे च समुद्यतः ॥

मा च तेऽस्तु भयं भीरु रावणाल्लोकगर्हितात् ।
नलकूबरशापेन रक्षिता ह्यसि नन्दिनि ॥

शप्तो ह्येष पुरा पापो वधूं रम्भां परामृशन् ।
न शक्नोत्यवशां नारीमुपैतुमजितेन्द्रियः ॥

क्षिप्रमेष्यति ते भर्ता सुग्रीवेणाभिरक्षितः ।
सौमित्रिसहितो धीमांस्त्वां चेतो मोक्षयिष्यति ॥

तनिक भी भय नहीं करना चाहिये । नन्दिनी! नलकूबरने रावणको जो शाप दे रखा है, उसीसे तुम सदा सुरक्षित रहोगी । कुछ समय पहलेकी बात है, इस पापी रावणने नलकूबरकी पत्नी एवं अपनी पुत्रवधूके तुल्य रम्भाका स्पर्श किया था, इसीसे उसको शाप प्राप्त हुआ है । यद्यपि यह रावण जितेन्द्रिय नहीं है, तो भी किसी अवशा- स्वतन्त्रतापूर्वक उसे न चाहनेवाली नारीके पास नहीं जा सकता है । सुग्रीवद्वारा सुरक्षित तुम्हारे स्वामी बुद्धिमान् भगवान् श्रीराम अपने भाई लक्ष्मणके साथ शीघ्र ही यहाँ आयेंगे और तुम्हें यहाँसे छुड़ा ले जायँगे '

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 280 · श्लोक 57–61पृष्ठ 1879

वहाँ केवल धर्मज्ञ त्रिजटा नामक राक्षसी रह गई। उसने सीता को सान्त्वना देते हुए कहा— "सखी सीते! भय छोड़ो। यहाँ अविन्ध्य नामक एक श्रेष्ठ राक्षस रहते हैं जो श्रीराम के हित का चिन्तन करते हैं। उन्होंने मेरे द्वारा यह सन्देश भेजा है कि तुम सुरक्षित हो क्योंकि नलकूबर ने रावण को शाप दिया है कि वह किसी भी स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उसे नहीं छू सकता। सुग्रीव के माध्यम से तुम्हारे स्वामी शीघ्र ही यहाँ आकर तुम्हें छुड़ा ले जाएंगे।" त्रिजटा ने आगे कहा— "सखी! मैंने रात में भयङ्कर स्वप्न देखे हैं, जो रावण के विनाश का सङ्केत देते हैं।"

"सखी! मैंने स्वप्न में जो कुछ देखा है, वह सब इसके विनाश की सूचना दे रहा है। सपने में मैंने देखा है कि रावण तेल से नहाये, मूँड़ मुँड़ाये, कीचड़ में डूब रहा है। फिर कई बार देखने में आया कि वह गदहों से जुते हुए रथ पर खड़ा होकर नृत्य-सा कर रहा है। उसके साथ ही ये कुम्भकर्ण आदि राक्षस भी मूँड़ मुँड़ाये, लाल चन्दन लगाये, लाल फूलों की माला पहने, नङ्गे होकर दक्षिण दिशा की ओर जा रहे हैं। इनके चारों मन्त्री भी श्वेत पुष्पमाला और चन्दन से चर्चित हो श्वेत पर्वत के शिखर पर बैठे थे; अतः विभीषण के साथ वे भी आने वाले महान् भय से मुक्त हो जाएँगे। स्वप्न में मुझे यह भी दिखाई दिया है कि भगवान श्रीराम के बाणों से समुद्र सहित सारी पृथ्वी आच्छादित हो गयी है; अतः यह निश्चित है कि तुम्हारे पतिदेव अपने सुयश से समस्त भूमण्डल को परिपूर्ण कर देंगे। इसी तरह मैंने लक्ष्मण को भी देखा है। वे हड्डियों के ढेर पर बैठे हुए मधु मिश्रित खीर खा रहे हैं और ऐसा जान पड़ता है मानो वे समस्त दिशाओं को दग्ध कर देना चाहते हैं। सपने में मैंने तुमको भी कई बार देखा। तुम्हारे सारे अङ्ग खून से तर हो रहे थे। तुम रोती हुई उत्तर दिशा की ओर जा रही थीं और एक व्याघ्र तुम्हारी रक्षा कर रहा था। विदेहनन्दिनी सीते! इस सपने से यही प्रतीत होता है कि तुम शीघ्र ही अपने स्वामी से मिलकर हर्ष का अनुभव करोगी। भाई लक्ष्मण सहित श्रीरामचन्द्र जी से तुम्हारी अवश्य भेंट होगी; इसमें अब अधिक विलम्ब नहीं है।"

हर्षमेष्यसि वैदेहि क्षिप्रं भर्त्रा समन्विता ।
राघवेण सह भ्रात्रा सीते त्वमचिरादिव ॥

‘ विदेहनन्दिनी सीते! इस सपनेसे यही प्रतीत होता है कि तुम शीघ्र ही अपने स्वामीसे मिलकर हर्षका अनुभव करोगी । भाई लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजीसे तुम्हारी अवश्य भेंट होगी; इसमें अब अधिक विलम्ब नहीं है '

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 280 · श्लोक 72पृष्ठ 1881

त्रिजटा की यह बात सुनकर मृगशावक से नेत्रों वाली सीता को पुनः पतिदेव से मिलने की आशा बँध गयी। इतने में ही अत्यन्त क्रूर स्वभाव वाली वे भयङ्कर पिशाचिनियाँ रावण के दरबार से वहाँ लौटकर आयीं। आकर उन्होंने देखा कि सीता त्रिजटा के साथ पूर्ववत् अपने स्थान पर बैठी है।

मार्कण्डेय जी कहते हैं— युधिष्ठिर! तदनन्तर एक दिन जब पतिव्रता सीता स्वामी के वियोग के दुःख से पीड़ित, मैले कपड़े पहने, केवल चूड़ामणि मात्र आभूषण धारण किये, राक्षसियों से घिरी हुई एक शिला पर बैठी दीन भाव से रो रही थीं, उसी समय देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष और किम्पुरुष— किसी से कभी युद्ध में पराजित न होने वाला रावण कामबाण से पीड़ित होकर अशोकवाटीका में गया। वहाँ उसने सीता को देखा और कामवेदना से व्यथित होकर वह उनके समीप चला गया।

रावण ने दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे। उसके कानों में सुन्दर मणिमय कुण्डल झलक रहे थे। वह विचित्र माला और मुकुट पहने मूर्तिमान वसन्त के समान शोभासम्पन्न जान पड़ता था। उसने बड़े यत्न से अपने आप को वस्त्राभूषणों द्वारा सजा रखा था, तो भी कल्पवृक्ष के समान आह्लादजनक नहीं जान पड़ता था; अपितु श्मशान भूमि के चैत्य वृक्ष की भाँति भूषित होने पर भी भयानक प्रतीत होता था। सूक्ष्म कटिप्रदेश वाली सीता के समीप खड़ा हुआ वह राक्षस रोहिणी नक्षत्र के निकट पहुँचे हुए शनैश्चर ग्रह के समान भयङ्कर दिखायी देता था।

कामदेव के बाणों से घायल हुआ रावण, मृगी के समान भयभीत हुई उस सुन्दरी अबला को सम्बोधित करके इस प्रकार बोला— "सीते! आजतक तुमने जो अपने पति पर इतना अनुग्रह दिखाया, यह बहुत हुआ। तन्वङ्गि! अब मुझ पर कृपा करो, जिससे तुम्हें शृङ्गार धारण कराया जाय। वरारोहे! मुझे अङ्गीकार करो और बहुमूल्य वस्त्राभूषणों से भूषित हो मेरी सब स्त्रियों में श्रेष्ठ तथा सुन्दरी पटरानी बनो। मेरे महल में देवताओं की कन्याएँ, गन्धर्वों की युवती स्त्रियाँ, दानव किशोरियाँ तथा दैत्यों की रमणियाँ मेरी भार्याओं के रूप में विद्यमान हैं। चौदह करोड़ पिशाच मेरी आज्ञा के अधीन रहते हैं। इनसे दूने नरभक्षी राक्षस मेरे सेवक हैं, जो अत्यन्त भयङ्कर कर्म करने वाले हैं। इनकी अपेक्षा तिगुनी सङ्ख्या मेरे आज्ञापालक यक्षों की है। यक्षों में से कुछ ही मेरे भाई धनाध्यक्ष कुबेर की सेवा में रहते हैं। भद्रे! वामोरु! जब मैं मधुपान की गोष्ठी में बैठता हूँ, उस समय मेरे भाई की भाँति मेरी सेवा में भी गन्धर्वों सहित अप्सराएँ उपस्थित होती हैं। मैं भी कुबेर के ही समान साक्षात् ब्रह्मर्षि विश्रवा मुनि का पुत्र हूँ। इन्द्र, यम, वरुण और कुबेर— इन चार लोकपालों के सिवा पाँचवें लोकपाल के रूप में मेरा सुयश सर्वत्र फैला हुआ है। भामिनि! देवराज इन्द्र की भाँति मुझे भी दिव्य भक्ष्य-भोज्य पदार्थ तथा नाना प्रकार के पेय रस उपलब्ध होते हैं। सुश्रोणि! वनवास का कष्ट प्रदान करने वाले तुम्हारे पूर्वकृत दुष्कर्म की समाप्ति हो जानी चाहिये; इसके लिये तुम मन्दोदरी की भाँति मेरी भार्या हो जाओ।"

उस नीच निशाचर के विरुद्ध विदेहराजकुमारी सीता ने अपना मुँह फेर लिया। परम सुन्दर जाँघों से सुशोभित, पति को ही देवता मानने वाली सुमुखी सीता ने तिनके की ओट कर ली और रोते हुए उस निशाचर से बोलीं— "राक्षसराज! तुम्हारे मुख से ऐसी दुःखदायिनी बातें अनेक बार निकली हैं और मुझ अभागिनी को वे सारी बातें बार-बार सुननी पड़ी हैं। भद्रसुख! तुम्हारा भला हो। तुम अपना मन मेरी ओर से हटा लो। मैं परायी स्त्री हूँ, पतिव्रता हूँ। तुम कभी किसी तरह मुझे नहीं पा सकते। एक दीन मानवकन्या होने के कारण मैं तुम जैसे निशाचर की भार्या होने योग्य नहीं हूँ। मुझ विवश अबला को बलपूर्वक अपमानित करके तुम्हें क्या सुख मिलेगा? तुम्हारे पिता ब्राह्मण हैं। ब्रह्मा से उत्पन्न होने के कारण वे ब्रह्मा के ही समान हैं। तुम भी लोकपालों के समान हो, फिर धर्म का पालन क्यों नहीं करते? महेश्वर के सखा राजराज धनाध्यक्ष प्रभु कुबेर को अपना भाई बता रहे हो, तो भी यहाँ ऐसा बर्ताव करते हुए तुम्हें लज्जा क्यों नहीं आती?"

इतना कहकर तन्वङ्गी सीता ने अपने मुख और गर्दन को कपड़े से ढक लिया और फूट-फूटकर रोने लगी। उस समय उनकी छाती धड़क रही थी और स्तन काँप रहे थे। अच्छी तरह रोती हुई सीता के मस्तक पर बँधी हुई विशाल काली वेणी ऐसी दिखायी दे रही थी मानो सिर पर कोई काली नागिन हो।

सीता के ऐसे निष्ठुर वचन सुनकर रावण ने कहा— "सीते! भले ही कामदेव मेरे शरीर को पीड़ा देता रहे, परन्तु मैं तुम जैसी मनोहर मुस्कान वाली सुन्दरी युवती को राजी किये बिना तुम्हारे साथ समागम नहीं करूँगा। तुम आज भी उस मनुष्य राम के प्रति ही अनुराग दिखाती जा रही हो, जो हम लोगों का आहार है। ऐसी दशा में मैं क्या कर सकता हूँ?" ऐसा कहकर राक्षसराज रावण वहीं अन्तर्धान होकर अपनी अभीष्ट दिशा की ओर चल दिया।

किं नु शक्यं मया कर्तुं यत् त्वमद्यापि मानुषम् ॥

आहारभूतमस्माकं राममेवानुरुध्यसे ॥

' तुम आज भी उस मनुष्य रामके प्रति ही, जो हम लोगोंका आहार है, अनुराग दिखाती जा रही हो; ऐसी दशामें मैं क्या कर सकता हूँ?

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 281 · श्लोक 28-29पृष्ठ 1885

मार्कण्डेय जी कहते हैं— युधिष्ठिर! इधर श्रीराम और लक्ष्मण सुग्रीव से सुरक्षित माल्यवान पर्वत के पृष्ठ भाग पर रहने लगे। कुछ काल के अनन्तर जब वर्षा ऋतु बीत गयी, तब उन्हें आकाश निर्मल दिखाई दिया। शरद ऋतु के निर्मल आकाश में ग्रह-नक्षत्रों सहित चन्द्रमा को देखकर शत्रुसंहारक श्रीराम अभी पर्वत पर सोये ही थे कि कुमुद, उत्पल और पद्म की सुगन्ध लेकर बहती शीतल वायु ने उन्हें सहसा जगा दिया।

प्रातः काल श्रीराम को राक्षस के भवन में कैद अपनी पत्नी सीता का स्मरण हुआ। वे खिन्नचित्त होकर लक्ष्मण से बोले— "लक्ष्मण! जाओ और पता लगाओ कि किष्किन्धा में वानरराज सुग्रीव क्या कर रहा है? जान पड़ता है, स्वार्थ-साधन की कला में पण्डित कृतघ्न सुग्रीव विषय-भोगों में आसक्त होकर अपने कर्तव्य को भूल गया है। उस वानरकुल-कलङ्क मूर्ख को मैंने ही राज्य पर अभिषिक्त किया था। इसके कारण सम्पूर्ण वानर, लङ्गूर तथा रीछ उसकी सेवा करते हैं। रघुकुलतिलक महाबाहु लक्ष्मण! इसी सुग्रीव के लिये मैंने तुम्हारे साथ किष्किन्धा के उद्यान में जाकर वाली का वध किया था। मैं तो उस नीच वानर को इस भूतल पर कृतघ्न मानता हूँ, क्योंकि वह इस अवस्थामें पहुँचकर मुझे भूल गया है। वह अपनी की हुई प्रतिज्ञा का पालन करना नहीं जानता और अपनी मन्दबुद्धि के कारण मुझ उपकारी की भी अवहेलना कर रहा है। यदि वह विषय-सुख में आसक्त होकर सीता की खोज के लिये कोई उद्योग न कर रहा हो, तो उसे भी तुम वाली के मार्ग से उसी लोक को पहुँचा देना जहाँ एक-एक कर सभी प्राणियों को जाना पड़ता है। लक्ष्मण! यदि वानरराज हमारे कार्य के लिये कुछ चेष्टा कर रहा हो, तो उसे साथ लेकर तुरन्त लौट आना, देर न लगाना।"

भाई के कहने पर लक्ष्मण धनुष-बाण लेकर किष्किन्धा की ओर चल दिए। वहाँ पहुँचकर वे बेरोक-टोक भीतर घुस गए। उन्हें क्रोध में आते देख राजा सुग्रीव उनकी अगवानी के लिये आगे आए। सुग्रीव ने विनीत भाव से लक्ष्मण की पूजा की और उन्हें अपने साथ ले गये। लक्ष्मण ने श्रीराम की कही हुई सारी बातें सुग्रीव को सुना दीं।

यह सब सुनकर सुग्रीव ने हाथ जोड़े और कहा— "लक्ष्मण! मैं न तो दुर्बुद्धि हूँ, न अकृतज्ञ और न ही निर्दय। मैंने सीता की खोज के लिये जो प्रयत्न किया है, उसे सुनिये। मैंने सब दिशाओं में सभी विनयशील वानरों को भेज दिया है और उनके लौटने का समय एक महीने के अन्दर निश्चित कर दिया है। वे सब वन, पर्वत, नगर और समुद्र सहित इस पूरी पृथ्वी पर सीता को खोजेंगे। वह एक मास पाँच रात में पूरा हो जाएगा, उसके पश्चात आप श्रीराम के साथ सीता का प्रिय समाचार सुनेंगे।"

सुग्रीव की प्रशंसा कर लक्ष्मण उन्हें लेकर श्रीराम के पास गये और बताया कि सीता का अनुसन्धान कार्य आरम्भ हो गया है। दो मास बीत जाने पर कुछ वानर उतावली के साथ सुग्रीव के पास आए और कहने लगे— "वानरराज! वाली ने तथा आपने भी जिस मधुवन की रक्षा की थी, उसे हनुमान जी (राजाज्ञा के बिना ही) अपने उपभोग में ला रहे हैं। उनके साथ अङ्गद और अन्य श्रेष्ठ वानर भी भाग ले रहे हैं, जिन्हें आपने दक्षिण दिशा में भेजा था।"

इन वानरों के बर्ताव से सुग्रीव को विश्वास हो गया कि वे सफल होकर लौटे हैं। श्रीराम ने भी अनुमान लगा लिया कि सीता मिल चुकी है। हनुमान आदि श्रेष्ठ वानर जब श्रीराम के समीप आए, तो उनकी चाल-ढाल और मुख की कान्ति देखकर श्रीराम को विश्वास हो गया कि इन्होंने सीता को देख लिया है।

गतिं च मुखवर्णं च दृष्ट्वा रामो हनूमतः ।
अगमत् प्रत्ययं भूयो दृष्टा सीतेति भारत ॥

युधिष्ठिर! हनुमान्जीकी चाल- ढाल और मुखकी कान्ति देखकर श्रीरामचन्द्रजीको यह विश्वास हो गया कि इन्होंने सीताको देखा है ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 282 · श्लोक 32पृष्ठ 1893

सभी वानरों ने श्रीराम को प्रणाम किया। श्रीराम ने उनसे पूछा— "क्या तुम लोग सीता का अमृतमय समाचार सुनाकर मुझे जीवनदान दोगे? क्या तुम्हें कार्य में सफलता मिली? सीता को बिना छुड़ाए और शत्रुओं का संहार किये बिना मैं जीवित नहीं रह सकता।"

श्रीराम के ऐसे कहने पर वायुपुत्र हनुमान ने उत्तर दिया— "श्रीराम! मैं आपको प्रिय समाचार सुना रहा हूँ। मैंने जनकनन्दिनी सीता का दर्शन किया है।"

पर्वत, वन तथा अनेक आखरोसहित सम्पूर्ण दक्षिण दिशामें श्रीसीताजी का अनुसन्धान करके जब हमलोग थक गये और यहाँ लौटने का समय व्यतीत हो गया, तब हमें एक बहुत बड़ी गुफा दिखाई दी। वह कई योजन लम्बी थी। उसके भीतर घने जङ्गल थे और बहुत-से कीड़े रहा करते थे। उस गहन गुफा में प्रवेश करके हमने बहुत दूर तक का रास्ता पार कर लिया और तत्पश्चात् हमें सूर्य के प्रकाश का दर्शन हुआ। उसी गुफा के अन्दर एक दिव्य भवन शोभा पा रहा था।

रघुनन्दन! वह सुन्दर भवन दैत्यराज मय का निवासस्थान बताया जाता है। उसमें प्रभावती नाम की एक तपस्विनी तप कर रही थी। उसने हमें अनेक प्रकार के भोज्य पदार्थ तथा भाँति-भाँति के पीने योग्य रस दिये। उन्हें खाकर हमें नूतन बल प्राप्त हुआ। फिर उसी के बताये हुए मार्ग से जब हम गुफा से बाहर निकले, तब हमें लवण समुद्र के निकटवर्ती सह्य, मलय और दर्दुर नामक महान पर्वत दिखाई दिये।

फिर हमलोग मलयाचल पर चढ़कर समुद्र की ओर देखने लगे। उसकी विशालता देखकर हमारा हृदय विषाद से भर गया। हम खिन्न और व्यथित हो गये; हमें जीवन की कोई आशा न रही। उस महासागर का विस्तार कई सौ योजनों में था, जिसमें तिमि, मगर और बड़े-बड़े मत्स्य निवास करते थे। उसके इस स्वरूप का स्मरण करके हम सब लोग बहुत दुःखी हो गये। अन्त में अनशन करके प्राण त्याग देने का सङ्कल्प लेकर हम सब लोग वहाँ बैठ गये। फिर आपस में बातचीत होने लगी और बीच में जटायुका प्रसङ्ग छिड़ गया।

इतने में ही हमने दूसरे गरुड़की भाँति एक भयङ्कर पक्षी को देखा जो पर्वत शिखर के समान जान पड़ता था। उसका स्वरूप बड़ा डरावना था। वह पक्षी हमें खा जाने की युक्ति सोचने लगा। फिर हमारे पास आकर बोला— “अजी! कौन मेरे भाई जटायुकी बात कर रहा था? मैं उसका बड़ा भाई पक्षिराज सम्पाति हूँ। हम दोनों एक-दूसरे से होड़ लगाकर आकाश में सूर्यमण्डल तक पहुँचने के लिये उड़े थे। निर्दग्धपक्षः पतितो ह्यहमस्मिन् महागिरौ। इससे मेरी ये दोनों पाँखें जल गयीं, परन्तु जटायु के पङ्ख नहीं जले। तबसे दीर्घकाल व्यतीत हो गया। उन्हीं दिनों मैंने अपने प्रिय भाई गृध्रराज जटायु को देखा था। पङ्ख जल जाने से मैं इसी महान पर्वत पर गिर पड़ा।”

सम्पाति जब इस तरह की बातें कर रहा था, उस समय हमलोगोंने बताया कि जटायु मारे गये हैं। साथ ही हमने सङ्क्षेपसे आपके ऊपर आये हुए इस सङ्कट का समाचार भी निवेदन कर दिया। “इच्छामि सर्वमेवैतच्छ्रोतुं प्लवगसत्तमाः।” राजन्! यह अत्यन्त अप्रिय वृत्तान्त सुनकर उस सम्पातिके मन में बड़ा खेद हुआ। शत्रुदमन! उसने पुनः हमलोगोंसे पूछा— “श्रेष्ठ वानरगण! वे श्रीराम कौन हैं, सीता कैसी है और जटायु किस प्रकार मारे गये? ये सब बातें मैं विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ।”

स सम्पातिस्तदा राजन् श्रुत्वा सुमहदप्रियम् ॥

विषण्णचेताः पप्रच्छ पुनरस्मानरिंदम ।
कः स रामः कथं सीता जटायुश्च कथं हतः ॥

इच्छामि सर्वमेवैतच्छ्रोतुं प्लवगसत्तमाः । ‘ राजन्! यह अत्यन्त अप्रिय वृत्तान्त सुनकर उस सम्पातिके मनमें बड़ा खेद हुआ । शत्रुदमन! उसने पुनः हमलोगोंसे पूछा— ' श्रेष्ठ वानरगण! वे श्रीराम कौन हैं, सीता कैसी है और जटायु किस प्रकार मारे गये? ये सब बातें मैं विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ'

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 282 · श्लोक 52-53पृष्ठ 1896

तब मैंने सम्पातिके समक्ष आप पर सङ्कट आने का यह सारा वृत्तान्त और अपने आमरण अनशन का कारण विस्तारपूर्वक बताया। “भवित्री तत्र वैदेही न मेऽस्त्यत्र विचारणा।” तब पक्षिराज सम्पाति ने अपने निम्नाङ्कित वचन द्वारा हमें उत्साहित करके उठाया— “वानरो! मैं रावण को जानता हूँ। उसकी महापुरी लङ्का भी मैंने देखी है। वह समुद्र के उस पार त्रिकूटगिरिकी कन्दरा में बसी है। विदेहकुमारी सीता अवश्य वहीं होंगी, इस विषय में मुझे कोई अन्यथा विचार नहीं हो रहा है।”

“सागरक्रमणे मन्त्रं मन्त्रयामः परन्तप।” परन्तप! उसकी यह बात सुनकर हमलोग तुरन्त उठे और समुद्र पार करने के विषय में परस्पर सलाह करने लगे। जब कोई भी समुद्र को लाँघने का साहस न कर सका, तब मैं अपने पिता वायु के स्वरूप में प्रविष्ट होकर वह सौ योजन विस्तृत महासागर लाँघ गया। उस समय समुद्र के जल में एक राक्षसी रहती थी, जिसे अपने मार्ग में विघ्न डालने पर मैंने मार डाला था।

लङ्का में पहुँचकर रावण के अन्तःपुर में मैंने सती सीता का दर्शन किया, जो अपने पतिदेवता के दर्शन की लालसा से निरन्तर उपवास और तपस्या किया करती हैं। “जटिला मलदिग्धाङ्गी कृशा दीना तपस्विनी।” उनके केश जटा के रूप में परिणत हो गये थे। अङ्ग-अङ्ग में मैल जम गयी थी। वे दीन, दुर्बल और तपस्विनी दिखायी देती थीं। कई भिन्न-भिन्न कारणों से उन्हें आर्या सीता के रूप में पहचानकर मैं एकान्त में उनके निकट गया और इस प्रकार बोला— “देवि सीते! मैं श्रीरामचन्द्रजी का दूत पवनपुत्र हनुमान् नामक वानर हूँ। आपके दर्शन के लिये मैं आकाशमार्ग से यहाँ आया हूँ। दोनों भाई राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण कुशल से हैं। सम्पूर्ण वानरों के अधीश्वर सुग्रीव इस समय उनकी रक्षामें तत्पर हैं। देवि! सुमित्रानन्दन लक्ष्मण के साथ भगवान् श्रीराम ने आपको अपने सकुशल होने का समाचार कहलाया है।

“प्रत्ययं कुरु मे देवि वानरोऽस्मि न राक्षसः।” उनके मित्र होने के नाते सुग्रीव भी आपका कुशल-मङ्गल पूछते हैं। आपके स्वामी भगवान् श्रीराम सम्पूर्ण वानरों की सेना के साथ शीघ्र यहाँ पधारेंगे। देवि! मेरा विश्वास कीजिये। मैं राक्षस नहीं, वानर हूँ।”

तदनन्तर सीता ने दो घड़ी तक कुछ सोचकर मुझसे इस प्रकार कहा— “महाबाहो! मैं अविन्ध्यके कहने से यह विश्वास करती हूँ कि तुम हनुमान् हो। अविन्ध्य राक्षसकुल में उत्पन्न होते हुए भी वृद्ध एवं आदरणीय हैं। उन्होंने ही तुम्हारे-जैसे मन्त्रियों से युक्त सुग्रीव का परिचय दिया है। वत्स! अब तुम भगवान् श्रीराम के पास जाओ।” ऐसा कहकर सती साध्वी सीता ने अपनी पहचान के लिये एक मणि दी, जिसको धारण करके वे अबतक अपने प्राणों की रक्षा करती आयी हैं। जानकी ने विश्वास दिलाने के लिये यह एक कथा भी सुनाई थी— “एकाक्षिविकलः काकः सुदुष्टात्मा कृतश्च वै।” पुरुषसिंह! उस कथा का मुख्य विषय यह है कि आपने महापर्वत चित्रकूट पर रहते समय किसी कौए के ऊपर एक सींक का बाण चलाया था और उस दुष्टात्मा कौए को एक आँख से वञ्चित कर दिया था। यह प्रसङ्ग उन्होंने केवल अपनी पहचान कराने के उद्देश्य से प्रस्तुत किया था।

कथितस्तेन सुग्रीवस्त्वद्विधैः सचिवैर्वृतः ।
गम्यतामिति चोक्त्वा मां सीता प्रादादिमं मणिम् ॥

धारिता येन वैदेही कालमेतमनिन्दिता ।
प्रत्ययर्थं कथां चेमां कथयामास जानकी ॥

‘ उन्होंने ही तुम्हारे - जैसे मन्त्रियोंसे युक्त सुग्रीवका परिचय दिया है । वत्स! अब तुम भगवान् श्रीरामके पास जाओ। ' ऐसा कहकर सती साध्वी सीताने अपनी पहचानके लिये यह एक मणि दी, जिसको धारण करके वे अबतक अपने प्राणोंकी रक्षा करती आयी हैं । जानकीने विश्वास दिलानेके लिये यह एक कथा भी सुनायी थी- ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 282 · श्लोक 68-69पृष्ठ 1898

“तदनन्तर मैंने जान-बूझकर अपने-आपको राक्षसों द्वारा पकड़वा दिया और लङ्कापुरी को जलाकर समुद्र के इस पार आ पहुँचा।” यह सब समाचार सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने प्रियवादी हनुमान् का अत्यन्त आदर-सत्कार किया।

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्व के अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्व में हनुमान् जी के लङ्का से लौटने से सम्बन्ध रखने वाला दो सौ बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ।

मार्कण्डेयजी कहते हैं— “युधिष्ठिर! तदनन्तर सुग्रीव की आज्ञा के अनुसार बड़े-बड़े वानरवीर माल्यवान् पर्वत पर लक्ष्मण आदि के साथ बैठे हुए भगवान् श्रीराम के पास पहुँचने लगे। सबसे पहले वाली के श्वशुर श्रीमान् सुषेण श्रीरामचन्द्रजी की सेवा में उपस्थित हुए। उनके साथ वेगशाली वानरों की सहस्र कोटि सेना थी। फिर महापराक्रमी वानरराज गज और गवय पृथक्-पृथक् एक-एक अरब सेना के साथ आते दिखाई दिये। महाराज! गोलाङ्गूल जातिका वानर गवाक्ष, जो देखने में बड़ा भयङ्कर था, साठ सहस्र कोटि वानर सेना साथ लिये दृष्टिगोचर हुआ। गन्धमादन पर्वत पर रहनेवाला गन्धमादन नाम से विख्यात वानर दस खरब सेना साथ लेकर आया। पनस नामक बुद्धिमान् तथा महाबली वानर सत्तावन करोड़ सेना साथ लेकर आया। वानरों में वृद्ध तथा अत्यन्त पराक्रमी श्रीमान् दधिमुख भयङ्कर तेज से सम्पन्न विशाल सेना के साथ आये। जिनके मुख पर तिलक का चिह्न शोभा पा रहा था तथा जो भयङ्कर पराक्रम करने वाले थे, उन दस खरब रीछों की सेना के साथ वहाँ जाम्बवान् दिखाई दिये।

महाराज! ये तथा और भी बहुत-से वानर यूथपतियों के भी यूथपति थे, जिनकी कोई सङ्ख्या नहीं थी, वे सब श्रीरामचन्द्रजी के कार्य से वहाँ एकत्र हुए। उनके अङ्ग पर्वतों के शिखर के सदृश जान पड़ते थे। वे सबके सब सिंहों के समान गरजते और इधर-उधर दौड़ते थे। उनका सम्मिलित शब्द बड़ा भयङ्कर प्रतीत होता था। कोई पर्वत-शिखर के समान ऊँचे थे तो कोई भैंसों के सदृश मोटे और काले। कितनों के मुख सिन्दूर के समान लाल रङ्ग के थे। वे वानर सैनिक उछलते, गिरते-पड़ते, कूदते-फाँदते और धूल उड़ाते हुए चारों ओर से एकत्र हो रहे थे। वानरों की वह विशाल सेना भरे-पूरे महासागर के समान दिखाई देती थी। सुग्रीव की आज्ञा से उस समय माल्यवान् पर्वत के आस-पास ही उस समस्त सेना का पड़ाव पड़ गया।

तदनन्तर उन समस्त श्रेष्ठ वानरों के सब ओर से एकत्र हो जाने पर सुग्रीव सहित भगवान् श्रीराम ने एक दिन शुभ तिथि, उत्तम नक्षत्र और शुभ मुहूर्त में युद्ध के लिये प्रस्थान किया। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो वे उस व्यूहरचनायुक्त सेना द्वारा सम्पूर्ण लोकों का संहार करने जा रहे हों। उस सेना के मुहाने पर वायुपुत्र हनुमानजी विद्यमान थे। किसी से भी भय न मानने वाले सुमित्रानन्दन लक्ष्मण उसके पृष्ठभाग की रक्षा कर रहे थे। दोनों रघुवंशी वीर श्रीराम और लक्ष्मण हाथों में गोह के चमड़े के बने हुए दस्ताने पहने हुए थे। वे ग्रहों से घिरे हुए चन्द्रमा और सूर्य की भाँति वानरजातीय मन्त्रियों के बीच में होकर चल रहे थे। श्रीरामचन्द्रजी के सम्मुख साल, ताल और शिला रूपी आयुध लिये वे समस्त वानर सैनिक सूर्योदय के समय पके हुए धान के विशाल खेतों के समान जान पड़ते थे।

नल, नील, अङ्गद, क्राथ, मैन्द तथा द्विविद द्वारा सुरक्षित हुई वह विशाल वानरसेना श्रीरामचन्द्रजी का कार्य सिद्ध करने के लिये आगे बढ़ती चली जा रही थी। जहाँ फल-मूल की बहुतायत होती, मधु और कन्द-मूल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते तथा जल की अधिक सुविधा होती, ऐसे कल्याणकारी पर्वतीय शिखरों पर डेरा डालती हुई वह वानरसेना बिना किसी विघ्न-बाधा के खारे पानी वाले समुद्र के निकट जा पहुँची। असङ्ख्य ध्वजा-पताकाओं से सुशोभित वह विशाल वाहिनी दूसरे महासागर के समान जान पड़ती थी। सागर के तटवर्ती वन में पहुँचकर उसने अपना पड़ाव डाला।

तत्पश्चात् मुख्य-मुख्य वानरों के बीच में बैठे हुए दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम ने सुग्रीव से यह समयोचित बात कही— “मित्रो! हमारी यह सेना बहुत बड़ी है और सामने अत्यन्त दुस्तर महासागर लहरें ले रहा है। ऐसी दशा में आपलोग समुद्र के पार जाने के लिये कौन-सा उपाय ठीक समझते हैं?”

तब वहाँ बहुत-से दूसरे-दूसरे वानर, जो बड़े अभिमानी थे, कहने लगे— “हम तो समुद्र को लाँघ जाने में समर्थ हैं, परन्तु सब नहीं लाँघ सकते।” कुछ वानर बड़ी-बड़ी नावों के द्वारा समुद्र के पार जाने का निश्चय प्रकट करने लगे। कुछ ने नाव-डोंगी आदि विविध साधनों द्वारा पार जाने की बात बतायी। परन्तु श्रीरामचन्द्रजी ने उनकी यह सलाह मानने से इनकार कर दिया और सबको सान्त्वना देते हुए कहा—

“वीरो! सभी वानरों में इतनी शक्ति नहीं है कि वे सौ योजन विस्तृत समुद्र को लाँघ सकें; अतः तुम लोगों का यह निर्णय सर्वमान्य सिद्धान्त के रूप में ग्राह्य नहीं है। इतनी बड़ी सेना को पार उतारने के लिये हमारे पास अधिक नौकाएँ भी नहीं हैं। मेरे जैसा पुरुष अपने स्वार्थ के लिये व्यापारियों के व्यवसाय को हानि कैसे पहुँचा सकता है? इसके सिवा नौका आदि से यात्रा करने पर हमारी सेना छिट-फुट होकर बहुत दूर तक फैल जायगी, जिससे शत्रु इसका नाश कर सकता है। इसलिए डोंगी और नाव पर बैठकर पार उतरने की बात मुझे ठीक नहीं जँचती। मैं तो किसी उपाय से इस समुद्र की ही आराधना आरम्भ करूँगा। इसके तट पर अन्न-जल छोड़कर धरना दूँगा। इससे यह अवश्य मुझे दर्शन देगा तथा कोई मार्ग दिखायेगा। यदि यह स्वयं प्रकट होकर कोई मार्ग नहीं दिखायेगा तो मैं अग्नि और वायु से भी अधिक तेजस्वी दिव्यास्त्रों द्वारा इसे जलाकर भस्म कर डालूँगा।”

न चेद् दर्शयिता मार्गं धक्ष्याम्येनमहं ततः ।
महास्त्रैरप्रतिहतैरत्यग्निपवनोज्ज्वलैः ॥

‘ यदि यह स्वयं प्रकट होकर कोई मार्ग नहीं दिखायेगा तो मैं अग्नि और वायुसे भी अधिक तेजस्वी तथा कभी न चूकनेवाले महान् दिव्यास्त्रोंद्वारा इसे जलाकर भस्म कर डालूँगा'

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 283 · श्लोक 31पृष्ठ 1904

ऐसा कहकर लक्ष्मण सहित श्रीरामचन्द्रजी ने आचमन करके समुद्र के तट पर कुश की चटाई बिछाकर उस पर लेटकर विधिपूर्वक धरना दे दिया। तब नदों और नदियों के स्वामी श्रीमान् समुद्रदेव ने जल-जन्तुओं के साथ प्रकट होकर स्वप्न में श्रीरामचन्द्रजी को दर्शन दिए। वह सैकड़ों रत्न के आखरो से घिरा हुआ था। उसने 'कौसल्यानन्दन' कहकर श्रीराम को सम्बोधित किया और मधुर वाणी में इस प्रकार कहा—

“नरश्रेष्ठ! कहो, मैं यहाँ तुम्हारी क्या सहायता करूँ? सगरपुत्रों से संवर्धित होने के कारण मैं भी इक्ष्वाकुवंशीय तथा तुम्हारा भाई-बन्धु हूँ।” यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने उससे कहा— “नद-नदीश्वर! मैं अपनी सेना के लिये तुम्हारे द्वारा दिया गया मार्ग चाहता हूँ, जिससे जाकर पुलस्त्य कुलाङ्गार दशमुख रावण को मार सकूँ। यदि इस प्रकार याचना करने पर तुम मुझे मार्ग न दोगे तो मैं दिव्यास्त्रों से तुम्हें सुखा दूँगा।”

यद्येवं याचतो मार्गं न प्रदास्यति मे भवान् ।
शरैस्त्वां शोषयिष्यामि दिव्यास्त्रप्रतिमन्त्रितैः ॥

' यदि इस प्रकार याचना करनेपर तुम मुझे मार्ग न दोगे तो मैं दिव्यास्त्रोंसे अभिमन्त्रित बाणोंद्वारा तुम्हें सुखा दूँगा '

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 283 · श्लोक 37पृष्ठ 1905

श्रीरामचन्द्रजी का यह वचन सुनकर वरुणालय समुद्र व्यथित हो उठा और खड़े हुए हाथ जोड़कर बोला— “श्रीराम! मैं तुम्हारा सामना नहीं करना चाहता और न मैं तुम्हारे मार्ग में विघ्न डालने की इच्छा रखता हूँ। मेरी यह बात सुनो और जो कर्तव्य हो, उसे करो। यदि मैं इस समय तुम्हारी आज्ञा से तुम्हें मार्ग दे दूँगा तो दूसरे लोग भी इसी प्रकार धनुष के बल से मुझपर हुक्म चलाया करेंगे। तुम्हारी सेना में एक नल नामक वानर है जो शिल्पियों के लिये आदरणीय है। वह अपने हाथ से उठाकर जो भी काठ, तिनका या पत्थर मेरे भीतर डाल देगा, वह सब मैं जल के ऊपर धारण कर लूँगा। वही तुम्हारे लिये पुल हो जायगा।”

ऐसा कहकर समुद्र अन्तर्धान हो गया। तत्पश्चात् श्रीराम ने उठकर नल से कहा— “तुम समुद्र पर एक पुल तैयार करो। मैं जानता हूँ, तुममें यह कार्य करने की शक्ति है।” वह आज भी भूमण्डल में 'नलसेतु' के नाम से विख्यात है। श्रीरामजी की आज्ञा मानकर समुद्र ने उस पर्वताकार पुल को अपने ऊपर धारण किया।

श्रीरामचन्द्रजी अभी समुद्र के किनारे ही थे कि राक्षसराज रावण के भाई धर्मात्मा विभीषण अपने चार मन्त्रियों के साथ उनसे मिलने के लिये आये। महामना श्रीराम ने स्वागतपूर्वक उन्हें अपनाया। उस समय सुग्रीव के मन में यह शङ्का हुई कि 'कहीं यह शत्रुका कोई गुप्तचर न हो', परन्तु श्रीरामचन्द्रजी ने उनकी सत्य चेष्टाओं, उत्तम आचरणों और मुख-नेत्र आदि के सङ्केतों से सूचित होने वाले मनोभावों की सम्यक समीक्षा करके सन्तोष प्राप्त कर लिया। उन्होंने विभीषण का बहुत आदर किया और उन्हें समस्त राक्षसों के राज्य पर अभिषिक्त कर दिया तथा लक्ष्मण का सुहृद् तथा अपना सलाहकार बना लिया।

विभीषण की सलाह से श्रीरामचन्द्रजी ने उसी सेतु द्वारा एक ही महीने में सेना सहित महासागर को पार कर लिया। तत्पश्चात् उन्होंने लङ्का की सीमा में पहुँचकर वानरों द्वारा वहाँ के बहुत-से बड़े-बड़े उद्यानों को छिन्न-भिन्न करा दिया।

मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! लङ्का के उस वन में अन्न और जल की बहुत सुभीता थी। फल और मूल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे; अतः वहीं सेना की छावनी डालकर श्रीरामचन्द्रजी विधिपूर्वक उसकी रक्षा करते रहे।

इधर रावण लङ्का में शास्त्रोक्त प्रकार से बनी हुई युद्ध-सामग्री का सङ्ग्रह करने लगा। लङ्का की चहारदीवारी और नगर के द्वार अत्यन्त सुदृढ़ थे, जो स्वभाव से ही दुर्धर्ष थे; किसी भी आक्रमणकारी का वहाँ पहुँचना अत्यन्त कठिन था। नगर के चारों ओर सात गहरी खाइयाँ थीं, जिनमें अगाध जल भरा रहता था और उनमें मत्स्य तथा मगर आदि जल-जन्तु निवास करते थे। इन खाइयों में सब ओर खैर के खूँटे गड़े हुए थे। वहाँ मजबूत किवाड़ लगे थे और गोला बरसाने वाले यन्त्र यथास्थान लगे हुए थे। इनके सिवा वहाँ बहुत-से शृङ्ग और गोले जमा किये गये थे। इन सब कारणों से उन खाइयों को पार करना बहुत कठिन था। विषधर सर्पों के समूह, सैनिक, सर्जरस और धूल—इन सबसे संयुक्त और सुरक्षित होने के कारण भी वे खाइयाँ दुर्गम थीं। नगर के सभी दरवाजों पर छिपकर बैठने के लिये बुर्ज बने हुए थे, जिन्हें स्थावर गुल्म कहा जाता था; और घूम-फिरकर रक्षा करने वाले जो सैनिक नियुक्त किये गये थे, वे जङ्गम गुल्म कहलाते थे। इनमें अधिकांश पैदल थे और बहुत से हाथी-सवार तथा घुड़सवार भी थे।

श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा से महाबली अङ्गद दूत बनकर लङ्कापुरी के द्वार पर आये। राक्षसराज रावण को उनके आगमन की सूचना दी गयी। अनुमति मिलने पर उन्होंने निर्भय होकर पुरी में प्रवेश किया। अनेक करोड़ राक्षसों के बीच में जाते हुए अङ्गद, मेघों की घटा से घिरे हुए सूर्यदेव के समान सुशोभित हो रहे थे। मन्त्रियों से घिरकर बैठे हुए पुलस्त्य-नन्दन रावण के पास पहुँचकर कुशल वक्ता अङ्गद ने रावण को सम्बोधित करते हुए श्रीरामचन्द्रजी का सन्देश इस प्रकार कहना आरम्भ किया—

"राजन्! कोसल देश के महाराज महायशस्वी श्रीरामचन्द्रजी ने तुमसे कहने के लिये जो समयोचित सन्देश भेजा है, उसे सुनो और तदनुसार कार्य करो। जो राजा अपने मन को काबू में न रखकर अन्याय में तत्पर रहता है, उसका आश्रय लेकर उसके अधीन रहनेवाले नगर और देश भी अनीतिपरायण होकर नष्ट हो जाते हैं। सीता का बलपूर्वक अपहरण करके मेरा अपराध तो अकेले तुमने किया है, परन्तु इसके कारण अन्य निर्दोष लोग भी मारे जायँगे। तुमने बल और अहङ्कार से उन्मत्त होकर पहले जिन वनवासी ऋषियों की हत्या की, देवताओं का अपमान किया, राजर्षियों के प्राण लिये तथा रोती-बिलखती अबलाओं का भी अपहरण किया था—उन सब अत्याचारों का फल अब तुम्हें प्राप्त होने वाला है। मैं मन्त्रियों सहित तुम्हें मार डालूँगा। साहस हो तो युद्ध करो और पौरुष का परिचय दो। निशाचर! यद्यपि मैं मनुष्य हूँ, तो भी मेरे धनुष का बल देखना। जनक-नन्दिनी सीता को छोड़ दो, अन्यथा कभी मेरे हाथ से जीवित नहीं बचोगे। मैं अपने तीखे बाणों द्वारा इस संसार को राक्षसों से सूना कर दूँगा।"

इति तस्य ब्रुवाणस्य दूतस्य परुषं वचः ।
श्रुत्वा न ममृषे राजा रावणः क्रोधमूर्च्छितः ॥

श्रीरामचन्द्रजीके दूतके मुखसे ऐसी कठोर बातें सुनकर राजा रावण सहन न कर सका । वह क्रोधसे मूर्च्छित हो उठा ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 284 · श्लोक 17पृष्ठ 1912

दूत के मुख से ऐसी कठोर बातें सुनकर राजा रावण सहन न कर सका; वह क्रोध से मूर्च्छित हो उठा। तब स्वामी के सङ्केत को समझने वाले चार निशाचर अपनी जगह से उठे और जिस प्रकार पक्षी सिंह को पकड़ता है, उसी प्रकार वे अङ्गद के चारों अङ्गों को पकड़ने लगे। अङ्गद ने उन चारों राक्षसों को अपने अङ्गों से दबा लिया और आकाश में उछलकर महल की छत पर जा चढ़े। उनके इस वेग से वे चारों राक्षस पृथ्वी पर जा गिड़े; उनकी छाती फट गयी और अत्यधिक चोट लगने के कारण उन्हें बड़ी पीड़ा हुई। छत पर चढ़े हुए अङ्गद फिर उस महल के कँगूरे से कूद पड़े और लङ्कापुरी को लाँघकर सुवेल पर्वत के समीप आ पहुँचे।

फिर कोसल-नरेश श्रीरामचन्द्रजी से मिलकर तेजस्वी वानर अङ्गद ने रावण के दरबार की सारी बातें बताईं। श्रीराम ने अङ्गद की बड़ी प्रशंसा की और फिर वे विश्राम करने लगे। तदनन्तर भगवान श्रीराम ने वायु के समान वेगशाली वानरों की सम्पूर्ण सेना द्वारा एक साथ लङ्का पर धावा बोल दिया और उसकी चहारदीवारी तुड़वा डाली। नगर के दक्षिण द्वार में प्रवेश करना बहुत कठिन था, परन्तु लक्ष्मण ने विभीषण और जाम्बवान को आगे करके उसे भी धूल में मिला दिया। तत्पश्चात् उन्होंने हथेली के समान श्वेत और लाल रङ्ग के युद्धकुशल वानरों की दस खरब सेना के साथ लङ्का में प्रवेश किया। उनके भुजा, ऊरु, हाथ और जङ्घा विशाल थे तथा अङ्गों की कान्ति धुएँ के समान काली थी; ऐसे तीन करोड़ रीछ सैनिक भी उनके साथ लङ्का में जाकर युद्ध के लिये डटे हुए थे। उस समय वानरों के उछलने-कूदने और गिरने-पड़ने से इतनी धूल उड़ी कि उससे सूर्य की प्रभा नष्ट सी हो गयी और उसका दिखना बन्द हो गया।

राजन्! धान के फूल जैसे रङ्गवाले, मौलसिरी के पुष्प सदृश कान्तिवाले, प्रातःकाल के सूर्य के समान अरुण प्रभावाले तथा सनई के समान सफेद रङ्गवाले वानरों से व्याप्त होने के कारण लङ्का की चहारदीवारी चारों ओर कपिल वर्ण की दिखाई देती थी। स्त्रियों और वृद्धों सहित समस्त लङ्कावासी राक्षस इस दृश्य को आश्चर्यचकित होकर देख रहे थे। वानर सैनिक वहाँ के मणिनिर्मित खम्भों और ऊँचे-ऊँचे महलों के कङ्गूरों को तोड़ने-फोड़ने लगे। गोलाबारी करने वाले यन्त्रों के शिखरों को उन्होंने चूर-चूर करके दूर फेंक दिया। पहियों वाली तोपों, शृङ्गों और गोलों को लेकर महान कोलाहल करते हुए वानर उन्हें लङ्का में फेंकने लगे। जो निशाचर चहारदीवारी की रक्षा के लिये खड़े थे, वे वानरों द्वारा खदेड़े जाने पर भाग खड़े हुए।

तदनन्तर राक्षसराज रावण की आज्ञा पाकर इच्छानुसार रूप धारण करने वाले राक्षस लाख-लाख की टोली बनाकर नगर से बाहर निकले। उनकी आकृति बड़ी विकराल थी। वे अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करते हुए वनवासी वानरों को खदेड़ने लगे और अपने पराक्रम का परिचय देने लगे। उड़द के ढेर जैसे काले-कलूटे उन भयङ्कर निशाचरों ने लड़कर पुनः चहारदीवारी को वानरों से सूना कर दिया। उनके शूलों की मार से अनेक श्रेष्ठ वानर धराशायी हो गये। इसी प्रकार वानरों ने खम्भों की मार से कितने ही निशाचरों को ढेर किया। वीर राक्षसों और वानरों के बीच ऐसा युद्ध हुआ कि वे एक-दूसरे को नखों और दाँतों से काट खाते थे। दोनों ओर से गर्जना करते हुए वानर तथा राक्षस इस प्रकार युद्ध कर रहे थे कि मरकर पृथ्वी पर गिर जाने के बाद भी एक-दूसरे को छोड़ते नहीं थे। उधर श्रीरामचन्द्रजी भी बादल की वर्षा के समान बाणों की वर्षा करने लगे, जो लङ्का में घुसकर निशाचरों के प्राण लेने लगी। क्लेश और थकावट पर विजय पाने वाले सुदृढ़ धनुर्धर लक्ष्मण भी 'नाराच' नामक बाणों द्वारा दुर्ग के भीतर रहने वाले राक्षसों को मार गिराने लगे। इस प्रकार भीषण मार-काट मचाने के बाद वानर सेना लक्ष्य सिद्धिपूर्वक विजय पाकर श्रीराम की आज्ञा से शिविर की ओर लौट गई।

मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! जब वानर-सैनिक शिविर में प्रवेश करने लगे, उस समय रावण की सेना में पर्वण, पतन, जम्भ, खर, क्रोधवश, हरि, प्ररुज, अरुज और प्रघस आदि पिशाच तथा अधम राक्षसों के अनेक दल आकर उन पर धावा बोल पड़े। वे दुरात्मा निशाचर 'अन्तर्धान विद्या' से अदृश्य होकर आक्रमण कर रहे थे। विभीषण उस विद्या के जानकार थे, अतः उन्होंने उनकी शक्ति को नष्ट कर दिया; फिर वे सभी वानरों की दृष्टि में आ गये। वानर बलवान थे और कूद-कूदकर उन्हें मारने लगे, जिससे वे राक्षस प्राणशून्य होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।

रावण के लिये यह बात असह्य हो उठी। वह पिशाचों और राक्षसों की भयङ्कर सेना से घिरा हुआ दल-बल लेकर लङ्का से बाहर निकला। वह युद्धशास्त्र का ज्ञाता था और उसने शुक्राचार्य के मत के अनुसार व्यूह-रचना करके सब वानरों को घेर लिया। श्रीरामचन्द्रजी ने देखा कि दशमुख रावण व्यूहाकार सेना के साथ निकल रहा है, तब उन्होंने भी बृहस्पति की बतायी हुई रीति से अपनी सेना का व्यूह बनाया। तदनन्तर रावण श्रीरामचन्द्रजी के साथ युद्ध करने लगा और लक्ष्मण ने इन्द्रजित् के साथ युद्ध प्रारम्भ किया। सुग्रीव ने विरूपाक्ष से, निखर्वट ने तार से, नल ने तुण्ड का और पटुश ने पनस के साथ युद्ध किया। जो जिसे अपने जोड़ का समझता था, उसी के साथ उसकी भिड़न्त हुई।

विरूपाक्षेण सुग्रीवस्तारेण च निखर्वटः ।
तुण्डेन च नलस्तत्र पटुशः पनसेन च ॥

सुग्रीवने विरूपाक्षके साथ युद्ध किया । निखर्वट नामक राक्षस तार नामक वानरसे जा भिड़ा । नलने निशाचर तुण्डका सामना किया तथा पटुश नामक राक्षस पनस वानरके साथ युद्ध करने लगा ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 285 · श्लोक 9पृष्ठ 1918

पूर्वकाल में देवताओं और असुरों के बीच जैसा भयङ्कर युद्ध हुआ था, वैसा ही यह सङ्ग्राम बढ़ता जा रहा था। रावण ने शक्ति, शूल और खड्ग की वर्षा करके श्रीराम को पीड़ा दी, तो श्रीराम ने लोहे के तीखे बाणों से उसे पीड़ित किया। इसी प्रकार लक्ष्मण ने इन्द्रजित् को घायल किया और इन्द्रजित् ने लक्ष्मण को अनेक बाणों से बींध डाला। इधर विभीषण प्रहस्त पर और प्रहस्त विभीषण पर तीखे बाणों की वर्षा कर रहे थे, परन्तु दोनों में से कोई भी व्यथा का अनुभव नहीं कर रहा था। यह सङ्ग्राम इतना भयङ्कर था कि तीनों लोकों के चराचर प्राणी व्यथित हो उठे।

तदनन्तर युद्ध में निष्ठुर पराक्रम दिखाने वाले प्रहस्त ने सहसा विभीषण के पास पहुँचकर गर्जना की और उन पर गदा से आघात किया। उस भयानक वेग वाली गदा से आहत होकर भी बुद्धिमान विभीषण हिमालय के समान सुस्थिर खड़े रहे। तत्पश्चात् विभीषण ने एक विशाल 'महाशक्ति' हाथ में ली, जिसमें सौ घण्टियाँ लगी थीं। उसे अभिमन्त्रित कर उन्होंने प्रहस्त के मस्तक पर दे मारा। उस महाशक्ति के वेग से प्रहस्त का मस्तक धड़ से अलग हो गया और वह उखड़े हुए वृक्ष की भाँति धराशायी हो गया।

निशाचर प्रहस्त को मरा देख धूम्राक्ष बड़े वेग से वानरों की ओर दौड़ा। मेघों की काली घटा के समान भयानक दिखने वाली उसकी सेना को आते देख श्रेष्ठ वानर भयभीत होकर भागने लगे। उन भयभीत वानरों को देखकर कपिकेसरी हनुमानजी ने धूम्राक्ष का सामना करने के लिये आगे कदम बढ़ाया। पवनकुमार को युद्ध के लिये उपस्थित देख सभी वानर उतावली होकर लौट आए। फिर श्रीराम और रावण की सेनाओं के बीच अत्यन्त भयङ्कर कोलाहल आरम्भ हो गया। उस घोर सङ्ग्राम में धरती पर रक्त की कीचड़ जम गयी थी। इसी समय धूम्राक्ष अपने बाणों से वानर सेना को खदेड़ने लगा। तब शत्रुविजयी हनुमान ने अपनी ओर आते हुए उस विशालकाय राक्षस को बड़े वेग से धर दबाया। उन दोनों के बीच भयङ्कर युद्ध छिड़ गया; वे इन्द्र और प्रह्लाद की भाँति एक-दूसरे को जीतने के लिए लड़ रहे थे। निशाचर धूम्राक्ष ने गदाओं और परिघों से हनुमानजी को चोट पहुँचाई, तो हनुमानजी ने उस राक्षस पर तने और डालियों सहित वृक्षों से प्रहार किया।

जब राक्षस प्रवर धूम्राक्ष मारा गया, तो उसे देखकर अन्य वानर और भालुओं के मन में अपनी शक्ति के प्रति अटूट विश्वास जाग उठा। वे उत्साह से भर गए और देखते ही देखते राक्षसों पर टूट पड़े। विजय के उल्लास में डूबे उन बलवान वानर वीरों की मार खाकर राक्षस हताश हो गए और भयभीत होकर लङ्कापुरी की ओर भागने लगे।

मरने से बचे हुए उन निशाचरों ने भग्न मन लेकर, टूटे हुए हृदय के साथ लङ्कापुरी में प्रवेश किया और रावण के समीप जाकर युद्ध का सारा समाचार ज्यों का त्यों सुना दिया। जब उन्होंने सुना कि श्रेष्ठ वानर वीरों ने सेना सहित प्रहस्त और महाधनुर्धर धूम्राक्ष को मार डाला है, तो रावण बड़ी देर तक शोकभरे उच्छ्वास लेता रहा। फिर वह अपने श्रेष्ठ सिंहासन से उछलकर खड़ा हो गया और गर्जना करते हुए बोला— "अब यह कुम्भकर्ण के पराक्रम दिखलाने का समय आ गया है!"

श्रुत्वा तु रावणस्तेभ्यः प्रहस्तं निहतं युधि ।
धूम्राक्षं च महेष्वासं ससैन्यं वानरर्षभैः ॥

सुदीर्घमिव निःश्वस्य समुत्पत्य वरासनात् ।
उवाच कुम्भकर्णस्य कर्मकालोऽयमागतः ॥

उनके मुखसे श्रेष्ठ वानर वीरोंद्वारा युद्धमें सेनासहित प्रहस्त तथा महाधनुर्धर धूम्राक्षके मारे जानेका वृत्तान्त सुनकर रावण बड़ी देरतक शोकभरे उच्छ्वास लेता रहा । फिर वह अपने श्रेष्ठ सिंहासनसे उछलकर खड़ा हो गया और बोला- ' अब यह कुम्भकर्णके पराक्रम दिखलानेका समय आ गया है '

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 286 · श्लोक 18-19पृष्ठ 1922

ऐसा कहकर रावण ने अत्यन्त उच्च स्वर में बजने वाले भाँति-भाँतिके बाजे बजवाए ताकि सोये हुए कुम्भकर्ण की नींद टूट सके। उसने महान प्रयत्न करके उसे जगाया। जब वह भयभीत राक्षसराज रावण देख रहा था कि महाबली कुम्भकर्ण अब स्वस्थ, शान्त और निद्रा से मुक्त होकर बैठ गया है, तब उसने उससे कहा— "भैया कुम्भकर्ण! तुम धन्य हो जिसे ऐसी नींद आती है! हम लोगों पर जो यह अत्यन्त दारुण एवं महान भय उपस्थित हुआ है, इसका तुम्हें पता ही नहीं है। यह राम सेतु द्वारा समुद्र को लाँघकर, हमारी अवहेलना करके वानरों के साथ यहाँ आ पहुँचा है और राक्षसों का महासंहार कर रहा है। मैंने इसकी पत्नी जनककुमारी सीता का अपहरण किया था और उसे वापस लेने के लिए ही राम महासागर पर पुल बाँधकर यहाँ आया है। उसने हमारे प्रहस्त आदि प्रमुख स्वजनों को मार डाला है। हे शत्रुसूदन! तुम्हारे सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है जो उसको मार सके। बलवानों में श्रेष्ठ वीर! तुम शत्रुओं का दमन करने वाले हो। आज कवच धारण करके निकलो और राम आदि समस्त शत्रुओं का समरभूमि में संहार कर डालो। दूषण के छोटे भाई वज्रवेग और प्रमाथी अपनी विशाल सेना के साथ तुम्हारा अनुसरण करेंगे।"

ऐसा कहकर राक्षसराज रावण ने वज्रवेग और प्रमाथी को युद्ध की सारी बातें समझाकर आदेश दिया। वे दोनों वीर 'तथास्तु' कहकर कुम्भकर्ण के आगे-आगे तुरन्त नगर से बाहर निकल गए।

जब कुम्भकर्ण सेवकों सहित अपने नगर से निकलकर सामने खड़ा हुआ, तो उसने देखा कि वानर सेना विजय के उल्लास से सुशोभित होकर खड़ी है। जब उसने भगवान श्रीराम के दर्शन की इच्छा से उस सेना में दृष्टि डाली, तो उसे हाथ में धनुष लिए सुमित्रा नन्दन लक्ष्मण खड़े दिखाई दिए। इतने में ही वानरों ने चारों ओर से आकर कुम्भकर्ण को घेर लिया और बड़े-बड़े पेड़ उखाड़कर उस पर प्रहार करने लगे। अनेक प्रकार के भयङ्कर आयुधों से वानर राक्षसराज कुम्भकर्ण को चोट पहुँचाने लगे।

उस भीषण प्रहार के बीच, कुम्भकर्ण जोर-जोर से हँसने लगा और वानरों को पकड़-पकड़कर खाने लगा। देखते ही देखते बल, चण्डबल और वज्रबाहु नामक वानर उसके मुख के ग्रास बन गए। कुम्भकर्ण का यह दुःखदायी कर्म देखकर तार आदि वानर भयभीत होकर जोर-जोर से चीत्कार करने लगे। अपने सैनिकों और वानर वीरों का वह उच्च स्वर में किया जाता हुआ चीत्कार सुनकर सुग्रीव निर्भय होकर कुम्भकर्ण की ओर दौड़े। कपिश्रेष्ठ सुग्रीव का हृदय और उनका वेग दोनों ही महान थे। उन्होंने एक विशाल शाल वृक्ष को अपने हाथों से उठाकर कुम्भकर्ण के मस्तक पर पटक दिया; जिससे वह वृक्ष दो टूक हो गया, तथापि वे उसे कोई व्यथा नहीं पहुँचा सके।

शाल के स्पर्श से कुम्भकर्ण कुछ सावधान हुआ। उसने सहसा गर्जना की और सुग्रीव को दोनों हाथों से बलपूर्वक पकड़कर अपने साथ खींच लिया। कुम्भकर्ण द्वारा सुग्रीव का अपहरण होते देख, मित्रों का आनन्द बढ़ाने वाले वीर लक्ष्मण तुरन्त उसकी ओर दौड़े। शत्रुवीरों का संहार करने वाले लक्ष्मण ने कुम्भकर्ण के सामने जाकर एक महावेगशाली, सुवर्णमय पङ्ख से सुशोभित महान बाण चलाया। वह बाण उसके कवच को काटकर शरीर में धँस गया और रक्तरञ्जित धरती को चीरकर उसमें समा गया।

छाती छिद जाने के कारण महाधनुर्धर कुम्भकर्ण ने वानरराज सुग्रीव को तो छोड़ दिया, परन्तु बड़े वेग से लक्ष्मण की ओर घूमकर बोला— "अरे! खड़ा रह, खड़ा रह!" इतना कहकर उसने एक बहुत बड़ी शिला हाथ में ली और लक्ष्मण की ओर दौड़ा। तभी लक्ष्मण ने अत्यन्त शीघ्रता से तीखी धार वाले दो 'क्षुर' नामक बाण मारकर कुम्भकर्ण की ऊपर उठी हुई दोनों भुजाओं को काट डाला। भुजाएँ कटते ही वह चार भुजाओं वाला हो गया और उन चारों में उसने बड़ी-बड़ी चट्टानें उठा लीं। यह देख लक्ष्मण ने फिर से बाण चलाकर उसकी उन चारों भुजाओं को भी काट दिया।

चिच्छेद निशिताग्राभ्यां स बभूव चतुर्भुजः ॥

तब लक्ष्मणने भी बड़ी शीघ्रताके साथ तीखी धारवाले दो क्षुर नामक बाण मारकर अपनी ओर आते हुए कुम्भकर्णकी ऊपर उठी हुई दोनों भुजाओंको काट डाला । उनके कटते ही वह चार भुजाओंसे युक्त हो गया ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 287 · श्लोक 16पृष्ठ 1929

अब कुम्भकर्ण ने अपना शरीर अत्यन्त विशाल बना लिया, जिससे उसके अनेक पैर, सिर और भुजाएँ हो गईं। यह देख लक्ष्मण ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया और उस पर्वत के समान विशाल शरीर वाले राक्षस को चीर डाला। जैसे बिजली के आघात से वृक्ष जल जाता है, वैसे ही लक्ष्मण के दिव्यास्त्र से आहत होकर महापराक्रमी कुम्भकर्ण रणभूमि में गिर पड़ा।

तत एनं महावेगैरर्दयामास तोमरैः ।
तानागतान् स चिच्छेद सौमित्रिर्निशितैः शरैः ॥

उसने अत्यन्त वेगशाली तोमरोंकी वर्षा करके लक्ष्मणको पीड़ा पहुँचानेकी चेष्टा की, परंतु लक्ष्मणने तीखे बाणोंसे उन सब तोमरोंको पास आते ही काट गिराया ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 288 · श्लोक 13पृष्ठ 1933

अपने सैनिकों को इस प्रकार भागते देख, दूषण के दोनों भाई वज्रवेग और प्रमाथी अत्यन्त क्रोधित होकर लक्ष्मण पर धावा बोल पड़े। लक्ष्मण ने सिंहनाद करते हुए उन दोनों की गति को बाणों से रोक दिया। इन दोनों राक्षसों और बुद्धिमान लक्ष्मण के बीच रोंगटे खड़े कर देने वाला भयङ्कर युद्ध दो घड़ी तक चलता रहा। इसी बीच वायु नन्दन हनुमान ने पर्वत का शिखर उठाकर वज्रवेग पर आक्रमण किया और उसके प्राण ले लिए, वहीं महाबली नील ने एक विशाल चट्टान से प्रमाथी का कचूमर निकाल दिया।

मुहूर्तमेवमभवद् वज्रवेगप्रमाथिनोः ।
सौमित्रेश्च महाबाहोः सम्प्रहारः सुदारुणः ॥

इस प्रकार वज्रवेग, प्रमाथी और महाबाहु लक्ष्मणका वह भयंकर संग्राम दो घड़ीतक अबाधगतिसे चलता रहा ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 287 · श्लोक 25पृष्ठ 1930

तदुपरान्त श्रीराम और रावण की सेनाओं के बीच भीषण सङ्ग्राम आरम्भ हो गया। इस युद्ध में वानरों ने सैकड़ों राक्षसों को मारा, परन्तु अधिकांश राक्षस ही मारे जा रहे थे।

शतशो नैरृतान् वन्या जघ्नुर्वन्यांश्च नैरृताः ।
नैर्ऋतास्तत्र वध्यन्ते प्रायेण न तु वानराः ॥

वनवासी वानरोंने सैकड़ों राक्षसोंको तथा राक्षसोंने वानरोंको घायल किया । उस युद्धमें अधिकांश राक्षस ही मारे जा रहे थे, वानर नहीं ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 287 · श्लोक 29पृष्ठ 1930

जब रावण को पता चला कि कुम्भकर्ण, प्रहस्त और धूम्राक्ष मारे गए हैं, तो उसने अपने पुत्र इन्द्रजित से कहा— "सुपुत्र! तुमने इन्द्र को जीतकर उज्ज्वल यश कमाया है। अब तुम स्वयं राम, लक्ष्मण और सुग्रीव का वध करो। वे तुम्हारे बाणों का सामना नहीं कर पाएंगे। प्रहस्त और कुम्भकर्ण ने जो बदला नहीं चुकाया, उसे तुम चुकता करो। आज तुम शत्रुओं का संहार करके मेरा आनन्द बढ़ाओ।"

मार्कण्डेय उवाच

त्वया हि मम सत्पुत्र यशो दीप्तमुपार्जितम् ।
जित्वा वज्रधरं संख्ये सहस्राक्षं शचीपतिम् ॥

' सुपुत्र! तुमने युद्धमें सहस्र नेत्रोंवाले वज्रधारी शचीपति इन्द्रको जीतकर उज्ज्वल यशका उपार्जन किया है ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 288 · श्लोक 3पृष्ठ 1932

इन्द्रजित ने 'बहुत अच्छा' कहकर पिता की आज्ञा मानी और कवच बाँधकर रथ पर सवार होकर निकल पड़ा। उसने अपना नाम घोषित करते हुए लक्ष्मण को ललकारा। दोनों ही योद्धा दिव्यास्त्रों के ज्ञाता थे और परस्पर बड़ी स्पर्धा में थे। जब इन्द्रजित बाणों की वर्षा कर लक्ष्मण को पीड़ा देने लगा, तो लक्ष्मण ने तीखे बाणों से उन तमाम तोमरों को हवा में ही काट गिराया।

तभी वालिपुत्र अङ्गद ने एक वृक्ष उठाकर इन्द्रजित के मस्तक पर दे मारा, परन्तु वह विचलित नहीं हुआ। उसने अङ्गद की बाईं पसली में गदा से प्रहार किया, जिसका जवाब अङ्गद ने क्रोधपूर्वक एक साखू का तना उठाकर दिया। उस वृक्ष से इन्द्रजित का रथ और उसके घोड़े नष्ट हो गए। सारथी के मारे जाने पर इन्द्रजित माया का आश्रय लेकर वहाँ से अदृश्य हो गया।

भगवान श्रीराम ने सेना की रक्षा करते हुए देखा कि वह राक्षस छिपकर बाणों की वर्षा कर रहा है। इन्द्रजित ने श्रीराम और लक्ष्मण के अङ्गों को असङ्ख्य बाणों से क्षत-विक्षत कर दिया। वानरों ने सोचा कि वह राक्षस छिप गया है, तो वे बड़ी-बड़ी शिलाएँ लेकर आकाश में उड़ने लगे ताकि उसकी खोज कर सकें। माया से आवृत होने के कारण वह राक्षस किसी को दिखाई नहीं दे रहा था, परन्तु उसके बाणों की वर्षा से श्रीराम और लक्ष्मण ऊपर से नीचे तक व्याप्त हो गए और आकाश से गिरे हुए सूर्य-चन्द्रमा की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़े।

मार्कण्डेय जी कहते हैं— युधिष्ठिर! उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण को पृथ्वी पर पड़े देख रावणकुमार इन्द्रजित्ने, जिनके लिये देवताओं का वर प्राप्त था, उन बाणों द्वारा उन्हें सब ओर से बाँध लिया। इन्द्रजित् द्वारा बाणों के बन्धन से बँधे हुए वे दोनों वीर पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण पिञ्जड़े में बन्द हुए दो पक्षियों की भाँति शोभा पा रहे थे।

उन दोनों को सैकड़ों बाणों से व्याप्त एवं पृथ्वी पर पड़े देख वानरों सहित सुग्रीव उन्हें सब ओर से घेरकर खड़े हो गये। सुषेण, मैन्द, द्विविद, कुमुद, अङ्गद, हनुमान्, नील, तार तथा नल के साथ कपिराज सुग्रीव उन दोनों बन्धुओं की रक्षा करने लगे। तदनन्तर अपने कर्तव्य कर्म को पूरा करके विभीषण उस स्थान पर आये। उन्होंने प्रज्ञास्त्र द्वारा उन दोनों वीरों को होश में लाकर जगाया। फिर सुग्रीव ने दिव्य मन्त्रों द्वारा अभिमन्त्रित विशल्या नामक महौषधि द्वारा उनके अङ्गों से बाण निकालकर उन्हें क्षणभर में स्वस्थ कर दिया। होश में आ जाने पर वे दोनों नरश्रेष्ठ महारथी वीर बाणों से रहित होकर, आलस्य और थकावट त्यागकर क्षणभर में उठ खड़े हुए।

ततो विश्राव्य विस्पष्टं नाम राक्षसपुङ्गवः ।
आह्वयामास समरे लक्ष्मणं शुभलक्षणम् ॥

तत्पश्चात् उस राक्षसराजने स्पष्टरूपसे अपने नामकी घोषणा करके शुभलक्षण लक्ष्मणको युद्धके लिये ललकारा ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 288 · श्लोक 9पृष्ठ 1933

युधिष्ठिर! तदनन्तर विभीषण ने इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजी को नीरोग एवं स्वस्थ देख हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा— ‘शत्रुदमन! राजाधिराज कुबेर की आज्ञा से एक गुह्यक यह जल लिये हुए श्वेतपर्वत से चलकर आपके समीप आया है। परन्तप! महाराज कुबेर आपको यह जल इस उद्देश्य से समर्पित कर रहे हैं कि आप इसे नेत्रों में लगाकर माया से अदृश्य हुए प्राणियों को देख सकें। उन्होंने कहा है कि आप इस जल से अपने दोनों नेत्र धोकर अदृश्य प्राणियों को भी देख सकेंगे और आप जिसे यह जल अर्पित करेंगे, वह मनुष्य भी अदृश्य भूतों को देखने में समर्थ होगा।’

'बहुत अच्छा' कहकर श्रीरामचन्द्रजी ने वह अभिमन्त्रित जल ले लिया। फिर उन्होंने तथा महामना लक्ष्मण ने भी उससे अपने दोनों नेत्र धोये। युधिष्ठिर! जैसा विभीषण ने बताया था, उसका वैसा ही प्रभाव देखने में आया। इन सबकी आँखें क्षणभर में अतीन्द्रिय वस्तुओं का साक्षात्कार करने वाली हो गयीं।

इन्द्रजित्ने उस दिन युद्ध में जो पराक्रम कर दिखाया था, अपने उस वीरोचित कर्म को पिता से बताकर वह पुनः युद्ध के मुहाने की ओर लौटने लगा। उसे क्रोध में भरकर पुनः युद्ध की इच्छा से आते देख विभीषण की सम्मति से लक्ष्मण ने उस पर धावा किया। इन्द्रजित् विजय के उल्लास से सुशोभित हो रहा था। अभी उसने नित्यकर्म भी नहीं किया था; उसी अवस्थामें सचेत हुए लक्ष्मण ने कुपित होकर उसे मार डालने की इच्छा से उस पर बाणों द्वारा प्रहार करना आरम्भ किया। वे दोनों ही एक-दूसरे को जीतने के लिये उत्सुक थे। उस समय उनमें इन्द्र और प्रह्लाद की भाँति अत्यन्त अद्भुत तथा आश्चर्यजनक युद्ध होने लगा।

इन्द्रजित्ने तीखे तथा मर्मभेदी बाणों द्वारा सुमित्रा-कुमार लक्ष्मण को बींध डाला। इसी प्रकार लक्ष्मण ने भी अग्निके समान दाहक स्पर्श वाले तीखे सायकों द्वारा रावणकुमार इन्द्रजित्को घायल कर दिया। वीर सुमित्राकुमार ने अग्निके समान दाहक तीन बाणों द्वारा जिस प्रकार इन्द्रजित्के प्राण लिये, वह बताता हूँ; सुनो। एक बाण द्वारा उन्होंने इन्द्रजित्की धनुष धारण करने वाली भुजा को काटकर शरीर से अलग कर दिया। दूसरे बाण द्वारा नाराच लिये हुए शत्रुकी दूसरी भुजा को धराशायी कर दिया। तत्पश्चात् मोटी धार वाले और चमकीले तीसरे बाण से उन्होंने सुन्दर नासिका और शोभाशाली कुण्डलों से विभूषित शत्रु के मस्तक को भी धड़ से अलग कर दिया। भुजाओं और कन्धों के कट जाने से उसका धड़ बड़ा भयङ्कर दिखाई देता था। इन्द्रजित्को मारकर बलवानों में श्रेष्ठ लक्ष्मण ने अपने अस्त्रों द्वारा उसके सारथिको भी मार गिराया।

उस समय घोड़ें उस ही खाली रथ को लङ्कापुरी में पहुँचाया। रावण ने देखा— मेरे पुत्र का रथ उसके बिना ही लौट आया है। तब पुत्र को मारा गया जान भय के मारे रावण का मन उद्भ्रान्त हो उठा। वह शोक और मोह से आतुर होकर विदेहनन्दिनी सीता को मार डालने के लिये उद्यत हो गया। दुष्टात्मा दशानन हाथ में तलवार लेकर अशोक वाटिकामें श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन की लालसा से बैठी हुई सीताजी के पास बड़े वेग से दौड़ा गया।

दूषित बुद्धि वाले उस निशाचर के इस पापपूर्ण निश्चय को जानकर मन्त्री अविन्ध्य ने समझा-बुझाकर उसका क्रोध शान्त किया। किस मुक्ति से उसने रावण को शान्त किया, यह बताता हूँ, सुनो— ‘राक्षसराज! आप लङ्का के समुज्ज्वल सम्राट् पद पर विराजमान होकर एक अबला को न मारें। यह स्त्री होकर आपके वश में पड़ी है, आपके घर में कैद है; ऐसी दशानन यह तो मरी हुई है। इसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर देने से ही इसका वध नहीं होगा, ऐसा मेरा विचार है। इसके पति को ही मार डालिये। उसके मारे जाने पर यह स्वतः मर जायगी। साक्षात् इन्द्र भी पराक्रम में आपकी समानता नहीं कर सकते। आपने अनेक बार युद्ध में इन्द्र सहित सम्पूर्ण देवताओं को भयभीत एवं पराजित किया है।’ इस तरह अनेक प्रकार के वचनों द्वारा अविन्ध्य ने रावण का क्रोध शान्त किया और रावण ने भी उसकी बात मान ली। फिर उस निशाचर ने युद्ध के लिये प्रस्थान करने का निश्चय करके तलवार रख दी और आज्ञा दी— 'मेरा रथ तैयार किया जाय।'

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्व के अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्व में इन्द्रजित्-वध विषयक दो सौ नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ।

मार्कण्डेय जी कहते हैं— युधिष्ठिर! अपने प्रिय पुत्र इन्द्रजित् के मारे जाने पर दशमुख रावण का क्रोध बहुत बढ़ गया। वह सुवर्ण तथा रत्नों से विभूषित रथ पर बैठकर लङ्कापुरी से बाहर निकला। हाथों में अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाले भयङ्कर राक्षस उसे घेरकर चले। वह वानर-यूथपतियों से युद्ध करता हुआ श्रीरामचन्द्रजी की ओर दौड़ा। उसे क्रोधपूर्वक आक्रमण करते देख मैन्द, नील, नल, अङ्गद, हनुमान् और जाम्बवान् ने सेना सहित आगे बढ़कर उसे चारों ओर से घेर लिया। उन रीछ और वानर-सेनापतियों ने दशानन के देखते-देखते वृक्षों की मार से उसकी सेना का संहार आरम्भ कर दिया।

मार्कण्डेय उवाच

ततः क्रुद्धो दशग्रीवः प्रिये पुत्रे निपातिते ।
निर्ययौ रथमास्थाय हेमरत्नविभूषितम् ॥

स वृतो राक्षसैर्घोरैर्विविधायुधपाणिभिः ।
अभिदुद्राव रामं स योधयन् हरियूथपान् ॥

मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! अपने प्रिय पुत्र इन्द्रजित्के मारे जानेपर दशमुख रावणका क्रोध बहुत बढ़ गया । वह सुवर्ण तथा रत्नोंसे विभूषित रथपर बैठकर लंकापुरीसे बाहर निकला । हाथोंमें अनेक प्रकारके अस्त्र - शस्त्र धारण करनेवाले भंयकर राक्षस उसे घेरकर चले । वह वानर-यूथपतियोंसे युद्ध करता हुआ श्रीरामचन्द्रजीकी ओर दौड़ा ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 290 · श्लोक 1-2पृष्ठ 1942

अपनी सेना को शत्रु द्वारा मारी जाती देख मायावी राक्षसराज रावण ने माया प्रकट की। उसके शरीर से सैकड़ों और हजारों राक्षस प्रकट होकर हाथों में बाण, शक्ति तथा ऋष्टि आदि आयुध लिये दिखाई देने लगे। श्रीरामचन्द्रजी ने अपने दिव्य अस्त्र के द्वारा उन सब राक्षसों को नष्ट कर दिया। तब राक्षसराज ने पुनः माया की सृष्टि की। भारत! दशानन ने श्रीराम और लक्ष्मण के ही बहुत-से रूप धारण करके श्रीराम और लक्ष्मण पर धावा किया। तदनन्तर वे राक्षस हाथों में धनुष-बाण लिये श्रीराम और लक्ष्मण को पीड़ा देते हुए उन पर टूट पड़े।

राक्षसराज रावण की उस माया को देखकर इक्ष्वाकुकुल का आनन्द बढ़ाने वाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण को तनिक भी घबराहट नहीं हुई। उन्होंने श्रीराम से यह महत्त्वपूर्ण बात कही— ‘भगवन्! अपने ही समान आकार वाले इन पापी राक्षसों को मार डालिये।’ तब श्रीराम ने रावण की माया से निर्मित अपने ही समान रूप धारण करने वाले उन सबको तथा अन्य राक्षसों को भी मार डाला।

इसी समय इन्द्र का सारथि मातलि हरे रङ्ग के घोड़ों से जुते हुए सूर्य के समान तेजस्वी रथ के साथ उस रणभूमि में श्रीरामचन्द्रजी के समीप आ पहुँचा। 'स्यन्दनेन जहि क्षिप्रं रावणं मा चिरं कृथाः।' मातलि बोला— ‘पुरुषसिंह श्रीराम! यह हरे रङ्ग के घोड़ों से जुता हुआ विजयशाली उत्तम रथ देवराज इन्द्र का है। इस विशाल रथ के द्वारा इन्द्र ने सैकड़ों दैत्यों और दानवों का समराङ्गण में संहार किया है। नरश्रेष्ठ! मेरे द्वारा सञ्चालित इस रथ पर बैठकर आप युद्ध में रावण को शीघ्र मार डालिये, विलम्ब न कीजिये।’

मातलिरुवाच अयं हर्यश्वयुक् जैत्रो मघोनः स्यन्दनोत्तमः ।
अनेन शक्रः काकुत्स्थ समरे दैत्यदानवान् ॥

शतशः पुरुषव्याघ्र रथोदारेण जघ्निवान् ।
तदनेन नरव्याघ्र मया यत्तेन संयुगे ॥

स्यन्दनेन जहि क्षिप्रं रावणं मा चिरं कृथाः । मातलि बोला – पुरुषसिंह श्रीराम! यह हरे रंगके घोड़ोंसे जुता हुआ विजयशाली उत्तम रथ देवराज इन्द्रका है । इस विशाल रथके द्वारा इन्द्रने सैकड़ों दैत्यों और दानवोंका समरांगणमें संहार किया है। नरश्रेष्ठ! मेरे द्वारा संचालित इस रथपर बैठकर आप युद्धमें रावणको शीघ्र मार डालिये, विलम्ब न कीजिये ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 290 · श्लोक 13-143पृष्ठ 1944

मातलिके ऐसा कहने पर श्रीरामचन्द्रजी ने उसकी बात पर इसलिये सन्देह किया कि कहीं यह भी राक्षस की माया ही न हो। तब विभीषण ने उनसे कहा— 'पुरुषसिंह! यह दुरात्मा रावण की माया नहीं है। रथेनाभिपपाताथ दशग्रीवं रुषान्वितः। महाद्युते! आप शीघ्र इन्द्र के इस रथ पर आरूढ़ होइये।' तब श्रीरामचन्द्रजी ने प्रसन्नतापूर्वक विभीषण से कहा— 'ठीक है।' यों कहकर उन्होंने रथ पर आरूढ़ होकर बड़े रोष के साथ दशमुख रावण पर आक्रमण किया।

इत्युक्तो राघवस्तथ्यं वचोऽशङ्कत मातलेः ॥

मायैषा राक्षसस्येति तमुवाच विभीषणः ।
नेयं माया नरव्याघ्र रावणस्य दुरात्मनः ॥

मातलिके ऐसा कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उसकी बातपर इसलिये संदेह किया कि कहीं यह भी राक्षसकी माया ही न हो । तब विभीषणने उनसे कहा - ' पुरुषसिंह! यह दुरात्मा रावणकी माया नहीं है ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 290 · श्लोक 15-16पृष्ठ 1944

'हाहाकृतानि भूतानि रावणे समभिद्रुते।' रावण पर श्रीराम की चढ़ाई होते ही समस्त प्राणी हाहाकार कर उठे, देवलोक में नगारे बज उठे और जोर-जोर से सिंहनाद होने लगा। दशकन्धर रावण तथा राजकुमार श्रीराम में उस समय महान् युद्ध छिड़ गया। उनका वह सङ्ग्राम संसार में अन्यत्र कहीं उपमा नहीं थी। उनका वह सङ्ग्राम उन्हीं के सङ्ग्राम के समान था। निशाचर रावण ने श्रीराम पर एक त्रिशूल चलाया, जो उठे हुए इन्द्र के वज्र तथा ब्रह्मदण्ड के समान अत्यन्त भयङ्कर था; परन्तु श्रीराम ने तत्काल अपने तीखे बाणों द्वारा उस त्रिशूल के टुकड़े-टुकड़े कर दिये।

अलब्धोपममन्यत्र तयोरेव तथाभवत् ।
स रामाय महाघोरं विससर्ज निशाचरः ॥

शूलमिन्द्राशनिप्रख्यं ब्रह्मदण्डमिवोद्यतम् ।
तच्छूलं सत्वरं रामश्चिच्छेद निशितैः शरैः ॥

उस युद्धकी संसारमें अन्यत्र कहीं उपमा नहीं थी । उनका वह संग्राम उन्हींके संग्रामके समान था । निशाचर रावणने श्रीरामपर एक त्रिशूल चलाया, जो उठे हुए इन्द्रके वज्र तथा ब्रह्मदण्डके समान अत्यन्त भयंकर था; परंतु श्रीरामने तत्काल अपने तीखे बाणोंद्वारा उस त्रिशूलके टुकड़े -टुकड़े कर दिये ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 290 · श्लोक 20-21पृष्ठ 1945

उनका यह दुष्कर कर्म देखकर दशानन रावण के मन में भय समा गया। फिर कुपित होकर उसने तुरन्त ही तीखे सायकों की वर्षा आरम्भ की। 'शक्तीश्च विविधाकाराः शतघ्नीश्च शितान् क्षुरान्।' उस समय श्रीरामचन्द्रजी के ऊपर भाँति-भाँतिके हजारों शस्त्र गिरने लगे तथा भुशुण्डी, शूल, मुसल, फरसे, नाना प्रकार की शक्तियाँ, शतघ्नी और तीखी धार वाले बाणों की वृष्टि होने लगी। 'भयात् प्रदुद्रुवुः सर्वे वानराः सर्वतोदिशम्।' राक्षस दशानन की उस विकराल माया को देखकर सब वानर भय के मारे चारों दिशाओं में भाग चले।

तब श्रीरामचन्द्रजी ने सोने के सुन्दर पङ्ख तथा उत्तम अग्रभाग वाले एक श्रेष्ठ बाण को तरकस से निकालकर उसे ब्रह्मास्त्र द्वारा अभिमन्त्रित किया। श्रीराम द्वारा ब्रह्मास्त्र से अभिमन्त्रित किये हुए उस उत्तम बाण को देखकर इन्द्र आदि देवताओं तथा गन्धर्वों के हर्ष की सीमा न रही। शत्रु के प्रति श्रीराम के मुख से ब्रह्मास्त्र का प्रयोग होता देख देवता, दानव और किन्नर यह समझ गये कि अब इस राक्षस की आयु बहुत थोड़ी रह गयी है।

ततः ससर्ज तं रामः शरमप्रतिमौजसम् रावणान्तकरं घोरं ब्रह्मदण्डमिवोद्यतम्। तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी ने उठे हुए ब्रह्मदण्ड के समान भयङ्कर तथा अप्रतिम तेजस्वी उस रावणविनाशक बाण को छोड़ दिया। युधिष्ठिर! श्रीराम द्वारा धनुष को दूर तक खींचकर छोड़े हुए उस बाण के लगते ही राक्षसराज रावण रथ, घोड़े और सारथिसहित इस प्रकार जलने लगा मानो भयङ्कर लपटों वाली आग के लपेट में आ गया हो। इस प्रकार अनायास ही महान् कर्म करने वाले श्रीरामचन्द्रजी के हाथों से रावण को मारा गया देख देवता, गन्धर्व तथा चारण बहुत प्रसन्न हुए। तदनन्तर पाँचों भूतोंने उस महान् भाग्यशाली रावण को त्याग दिया। ब्रह्मास्त्र के तेज से दग्ध होकर वह सम्पूर्ण लोकों से भ्रष्ट हो गया।

मुक्तमात्रेण रामेण दूराकृष्टेन भारत ॥

स तेन राक्षसश्रेष्ठः सरथः साश्वसारथिः ।
प्रजज्वाल महाज्वालेनाग्निनाभिपरिप्लुतः ॥

युधिष्ठिर! श्रीरामद्वारा धनुषको दूरतक खींचकर छोड़े हुए उस बाणके लगते ही राक्षसराज रावण रथ, घोड़े और सारथिसहित इस प्रकार जलने लगा मानो भयंकर लपटोंवाली आगके लपेटमें आ गया हो ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 290 · श्लोक 29-30पृष्ठ 1946

मार्कण्डेय जी कहते हैं— युधिष्ठिर! इस प्रकार नीच स्वभाव वाले देवद्रोही राक्षसराज रावण का वध करके भगवान् श्रीराम अपने मित्रों तथा लक्ष्मण के साथ बड़े प्रसन्न हुए। दशानन के मारे जाने पर देवता तथा महर्षिगण जययुक्त आशीर्वाद देते हुए उन महाबाहु की पूजा एवं प्रशंसा करने लगे। स्वर्गवासी सम्पूर्ण देवताओं तथा गन्धर्वों ने फूलों की वर्षा करते हुए उत्तम वाणी द्वारा कमलनयन भगवान् श्रीराम का स्तवन किया। श्रीराम की भलीभाँति पूजा करके वे सब जैसे आये थे, उसी प्रकार लौट गये। युधिष्ठिर! उस समय आकाश महान् उत्सव समारोह से भरा सा जान पड़ता था।

इसके बाद उत्तम बुद्धि से युक्त बूढ़े मन्त्री अविन्ध्य विभीषण सहित भगवती सीता को आगे करके लङ्कापुरी से बाहर निकले। वे ककुत्स्थकुलभूषण महात्मा श्रीरामचन्द्रजी से दीनतापूर्वक बोले— ‘महात्मन्! सदाचार से सुशोभित जनक किशोरी महारानी सीता को ग्रहण कीजिये।’ यह सुनकर इक्ष्वाकु नन्दन भगवान् श्रीराम ने उस उत्तम रथ से उतरकर सीता को देखा। उनके मुख पर आँसुओं की धारा बह रही थी। शिबिकामें बैठी हुई सर्वाङ्गसुन्दरी सीता शोक से दुबली हो गयी थीं। उनके समस्त अङ्गों में मैल जम गयी थी, सिर के बाल आपस में चिपककर जटा के रूप में परिणत हो गये थे और उनका वस्त्र काला पड़ा गया था।

श्रीरामचन्द्रजी के मन में यह सन्देह उत्पन्न हुआ कि सम्भव है, सीता पर किसी पुरुष के स्पर्श से वे अपवित्र हो गयी हों; अतः उन्होंने विदेहनन्दिनी सीता से कठोर वचनों द्वारा कहा— “विदेहकुमारी! मैंने तुम्हें रावण की कैद से छुड़ा दिया। अब तुम जाओ। मेरा जो कर्तव्य था, उसे मैंने पूरा कर दिया। भद्रे! मुझ जैसे पति को पाकर तुम्हें वृद्धावस्था तक किसी राक्षस के घर में न रहना पड़े, यही सोचकर मैंने उस निशाचर का वध किया है। धर्म के सिद्धान्त को जानने वाला मेरे जैसा कोई भी पुरुष दूसरे के हाथ में पड़ी हुई नारी को मुहूर्त भर के लिए भी कैसे ग्रहण कर सकता है? मिथिलेशनन्दिनी! तुम्हारा आचार-विचार शुद्ध रह गया हो अथवा अशुद्ध, अब मैं तुम्हें अपने उपयोग में नहीं ला सकता— ठीक उसी तरह, जैसे कुत्ते के चाटे हुए हविष्य को कोई भी ग्रहण नहीं करता।”

सहसा ये कठोर वचन सुनकर देवी सीता व्यथित होकर कटे हुए केले के वृक्ष की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ीं। जैसे श्वास लेने से दर्पण में पड़ा हुआ मुख का प्रतिबिम्ब मलिन हो जाता है, उसी प्रकार सीता के मुख पर उस समय जो हर्ष जनित कान्ति छा रही थी, वह एक ही क्षण में फिर विलीन हो गयी। श्रीरामचन्द्रजी का यह कथन सुनकर समस्त वानर तथा लक्ष्मण सबके सब मरे हुए के समान निश्चेष्ट हो गये। उसी समय इन्द्र, अग्नि, वायु, यम, वरुण, यक्षराज भगवान कुबेर तथा निर्मल चित्त वाले सप्तर्षिगण भी वहाँ आ गये। देवताओं और गन्धर्वों से भरा हुआ वह सम्पूर्ण अन्तरिक्ष इस प्रकार शोभा पाने लगा, मानो असङ्ख्य तारागणों से चित्रित शरद् ऋतु का आकाश हो।

तब उन सबके बीच में खड़ी होकर कल्याणमयी यशस्विनी सीता ने चौड़ी छाती वाले भगवान श्रीराम से कहा— “राजपुत्र! मैं आपको दोष नहीं देती, क्योंकि आप स्त्रियों और पुरुषों की कैसी गति है, यह अच्छी तरह जानते हैं। केवल मेरी यह बात सुन लीजिये। निरन्तर सञ्चरण करने वाले वायुदेव समस्त प्राणियों के भीतर विचरते हैं; यदि मैंने कोई पापाचार किया हो तो वे वायुदेवता मेरे प्राणों का परित्याग कर दें। यदि मैं पाप का आचरण करती होऊँ तो अग्नि, जल, आकाश, पृथ्वी और वायु— ये सब मिलकर मुझसे मेरे प्राणों का वियोग करा दें। वीर! यदि मैंने आपके सिवा दूसरे किसी पुरुष का स्वप्न में भी चिन्तन न किया हो, तो देवताओं के दिये हुए एकमात्र आप ही मेरे पति हों।”

राजपुत्र न ते दोषं करोमि विदिता हि ते ।
गतिः स्त्रीणां नराणां च शृणु चेदं वचो मम ॥

‘ राजपुत्र! मैं आपको दोष नहीं देती, क्योंकि आप स्त्रियों और पुरुषोंकी कैसी गति है, यह अच्छी तरह जानते हैं । केवल मेरी यह बात सुन लीजिये ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 291 · श्लोक 22पृष्ठ 1951

तदनन्तर आकाश में सब लोगों को साक्षी देती हुई एक सुन्दर वाणी उच्चरित हुई, जो परम पवित्र होने के साथ-साथ उन महामना वानरों को भी हर्ष प्रदान करने वाली थी। उस आकाशवाणी के रूप में वायुदेवता बोले— “रघुनन्दन! मैं सदा विचरण करने वाला वायुदेवता हूँ। सीता ने जो कुछ कहा है, वह सत्य है। राजन्! मिथिलेशकुमारी सर्वथा पाप शून्य हैं। आप अपनी इस पत्नी से निःसङ्कोच होकर मिलिये।” अग्निदेव ने कहा— “रघुनन्दन! मैं समस्त प्राणियों के शरीर में रहने वाला अग्नि हूँ। मुझे मालूम है कि मिथिलेशकुमारी के द्वारा कभी सूक्ष्म से भी सूक्ष्म अपराध नहीं हुआ है।” वरुणदेव ने कहा— “श्रीराम! समस्त प्राणियों के शरीर में जो जल तत्त्व है, वह मुझसे ही उत्पन्न हुआ है; अतः मैं तुमसे कहता हूँ, मिथिलेशकुमारी निष्पाप है, इसे ग्रहण करो।”

तत्पश्चात् ब्रह्माजी बोले— “वत्स! तुम राजर्षियों के धर्म पर चलने वाले हो; अतः तुममें ऐसा सद्विचार होना आश्चर्य की बात नहीं है। साधु सदाचारी श्रीराम! तुम मेरी यह बात सुनो। वीरवर! यह रावण देवता, गन्धर्व, नाग, यक्ष, दानव तथा महर्षियों का भी शत्रु था। इसे तुमने मार गिराया है। पूर्वकाल में मेरे ही प्रसाद से यह समस्त प्राणियों के लिये अवध्य हो गया था। किसी कारणवश ही कुछ काल तक इस पापी की उपेक्षा की गयी थी। दुरात्मा रावण ने अपने वध के लिये ही सीता का अपहरण किया था। नलकूबर के शाप द्वारा मैंने सीता की रक्षा का प्रबन्ध कर दिया था। पूर्वकाल में रावण को यह शाप दिया गया था कि यदि यह उसे न चाहने वाली किसी परायी स्त्री का बलपूर्वक सेवन करेगा, तो इसके मस्तक के सैकड़ों टुकड़े हो जायेंगे। अतः महातेजस्वी श्रीराम! तुम्हें सीता के विषय में कोई शङ्का नहीं करनी चाहिये। इसे ग्रहण करो। देवताओं के समान तेजस्वी वीर! तुमने रावण को मारकर देवताओं का महान कार्य सिद्ध किया है।”

राजा दशरथ ने कहा— “वत्स! मैं तुम्हारा पिता दशरथ हूँ, तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो। पुरुषोत्तम! मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि अब तुम अयोध्या का राज्य करो।” श्रीरामचन्द्रजी ने कहा— “राजेन्द्र! यदि आप मेरे पिता हैं तो मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आपकी आज्ञा से अब मैं रमणीय अयोध्यापुरी को लौट जाऊँगा।”

तदनन्तर पिता दशरथ ने अत्यन्त प्रसन्न होकर कुछ लाल नेत्रों वाले श्रीरामचन्द्रजी से पुनः कहा— “महाद्युते! तुम्हारे वनवास के चौदह वर्ष पूरे हो गये हैं। अब तुम अयोध्या जाओ और वहाँ का शासन अपने हाथ में लो।” इसके पश्चात श्रीरामचन्द्रजी ने देवताओं को नमस्कार किया और सुहृदों से अभिनन्दित होकर अपनी पत्नी सीता से मिले, मानो इन्द्र का शची से मिलन हुआ हो। इसके बाद परन्तप श्रीराम ने अविन्ध्य को अभीष्ट वरदान दिया तथा त्रिजटा राक्षसी को धन और सम्मान से सन्तुष्ट किया।

जब सब हो जाने पर इन्द्र आदि देवताओंसहित ब्रह्माजी ने भगवान राम से कहा— “कौसल्यानन्दन! कहो, आज मैं तुम्हें कौन-कौन से अभीष्ट वर प्रदान करूँ?” तब श्रीरामचन्द्रजी ने ये वर माँगे— “मेरी धर्म में सदा स्थिति रहे, शत्रुओं से कभी पराजय न हो तथा राक्षसों के द्वारा मारे गये वानर पुनः जीवित हो जायें।” यह सुनकर ब्रह्माजी ने कहा— “ऐसा ही हो!” उनके इतना कहते ही सभी वानर चेतना प्राप्त करके जी उठे। महासौभाग्यवती सीता ने भी हनुमानजी को यह वर दिया— “पुत्र! जबतक इस धरातल पर भगवान श्रीराम की कीर्ति बनी रहेगी, तबतक तुम्हारा जीवन स्थिर रहेगा। पिङ्गलनयन हनुमान! मेरी कृपा से तुम्हें सदा ही दिव्य भोग प्राप्त होते रहेंगे।”

तदनन्तर अनायास ही महान पराक्रम करने वाले वानरों के देखते-देखते वहाँ इन्द्र आदि सब देवता अन्तर्धान हो गये। श्रीरामचन्द्रजी को जनकनन्दिनी सीता के साथ विराजमान देख इन्द्रसारथि मातलिक को बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने सभी सुहृदों के बीच में कहा— “सत्यपराक्रमी श्रीराम! आपने देवता, गन्धर्व, यक्ष, मनुष्य, असुर और नाग— इन सबका दुःख दूर कर दिया है। जबतक यह पृथ्वी रहेगी, तबतक देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस तथा नागों सहित सम्पूर्ण जगत् के लोग आपकी कीर्ति का गान करेंगे।” ऐसा कहकर उसने श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा ली और सूर्य के समान तेजस्वी रथ द्वारा चला गया।

दृष्ट्वा रामं तु जानक्या संगतं शक्रसारथिः ॥

उवाच परमप्रीतः सुहृन्मध्य इदं वचः ।
देवगन्धर्वयक्षाणां मानुषासुरभोगिनाम् ॥

अपनीतं त्वया दुःखमिदं सत्यपराक्रम । श्रीरामचन्द्रजीको जनकनन्दिनी सीताके साथ विराजमान देख इन्द्रसारथि मातलिको बड़ी प्रसन्नता हुई । उसने सब सुहृदोंके बीचमें इस प्रकार कहा -' सत्यपराक्रमी श्रीराम! आपने देवता, गन्धर्व, यक्ष, मनुष्य, असुर और नाग- इन सबका दुःख दूर कर दिया है ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 291 · श्लोक 47-483पृष्ठ 1955

तदनन्तर जितेंद्रिय भगवान श्रीराम ने लङ्कापुरी की सुरक्षा का प्रबन्ध करके लक्ष्मण, सुग्रीव आदि सभी श्रेष्ठ वानरों, विभीषण तथा प्रधान-प्रधान सचिवों के साथ सीता को आगे करके, इच्छानुसार चलने वाले शोभाशाली पुष्पक विमान पर आरूढ़ होकर समुद्र को पार किया। समुद्र के इस पार आकर धर्मात्मा श्रीराम ने पहले जहाँ शयन किया था, उसी स्थान पर सम्पूर्ण वानरों के साथ विश्राम किया। फिर श्रीरघुनाथजी ने सबको अपने पास बुलाकर सबका यथायोग्य आदर-सत्कार किया तथा रत्नों की भेंट से सभी वानरों और रीछों को सन्तुष्ट करके बिदा किया।

जब वे रीछ, श्रेष्ठ वानर और लङ्गूर चले गये, तब सुग्रीव सहित श्रीरामने पुनः किष्किन्धापुरी की ओर प्रस्थान किया। विभीषण और सुग्रीव के साथ पुष्पक विमान द्वारा सीता को वन की शोभा दिखाते हुए श्रीराम ने किष्किन्धा में पहुँचकर अङ्गद को युवराज के पद पर अभिषिक्त किया। इसके बाद लक्ष्मण तथा सुग्रीव आदि के साथ श्रीराम जिस मार्ग से आये थे, उसी से अयोध्या की ओर प्रस्थित हुए।

जब वायुपुत्र हनुमानजी भरतजी की सारी चेष्टाओं को लक्ष्य करके उन्हें श्रीरामचन्द्रजी के पुनरागमन का समाचार सुनाकर लौट आये, तब श्रीरामचन्द्रजी नन्दिग्राम में आये। वहाँ आकर श्रीरामने देखा कि भरत चीरवस्त्र पहने हुए हैं, उनका शरीर मैल से भरा हुआ है और वे मेरी चरणपादुकाएँ आगे रखकर कुशासन पर बैठे हैं। लक्ष्मण सहित श्रीराम जब भरत और शत्रुघ्न से मिले, तो वे बहुत प्रसन्न हुए। सीता के दर्शन करके भरत और शत्रुघ्न को भी महान हर्ष प्राप्त हुआ।

फिर भरतजी ने बड़ी प्रसन्नता के साथ अयोध्या का राज्य श्रीरामचन्द्रजी को लौटा दिया। तत्पश्चात् वसिष्ठ और वामदेव दोनों ऋषियों ने मिलकर भगवान राम का राज्याभिषेक किया। श्रीरामने भाँति-भाँति के भोग अर्पित करके उन दोनों का सत्कार किया। तदनन्तर उन्हें कर्तव्य की शिक्षा देकर बड़े दुःख से विदा किया। इसके बाद पुष्पक विमान की पूजा करके श्रीरामने उसे कुबेर को लौटा दिया। तदनन्तर देवर्षियों सहित गोमती नदी के तट पर जाकर श्रीराम ने दस अश्वमेध यज्ञ किए।

मार्कण्डेयजी कहते हैं— महाबाहु युधिष्ठिर! इस प्रकार प्राचीन काल में अमिततेजस्वी श्रीराम ने वनवास जनित अत्यन्त भयङ्कर कष्ट भोगा था। तुम क्षत्रिय हो, शोक न करो; तुम तो उस मार्ग पर चल रहे हो जहाँ केवल अपने बाहुबल का भरोसा किया जाता है और जहाँ फल प्रत्यक्ष मिलता है। श्रीराम के कष्ट के सामने तुम्हारा कष्ट अणुमात्र भी नहीं है। तुम्हारे पास धनञ्जय जैसा भाई है और ये पराक्रमी भीमसेन, नकुल तथा सहदेव जैसे सहायक हैं। इन सबके होते हुए तुम विषाद क्यों करते हो? तुम्हारे ये भाई तो इन्द्र की सेना को भी परास्त कर सकते हैं। भरतभूषण! तुम भी अपने भाइयों की सहायता से शत्रुओं को जीत लोगे। देखो, द्रौपदी के मामले में भी तुम्हारे भाइयों ने अत्यन्त दुष्कर कार्य करके उसे लौटा लिया था। श्रीरामचन्द्रजी के पास तो केवल वानर और रीछ ही सहायक थे, जबकि तुम्हारे पास चार शूरवीर भाई हैं। अतः कुरुश्रेष्ठ! शोक न करो।

तस्मात् स त्वं कुरुश्रेष्ठ मा शुचो भरतर्षभ ।
त्वद्विधा हि महात्मानो न शोचन्ति परंतप ॥

अतः कुरुश्रेष्ठ! भरतभूषण! तुम शोक न करो । क्योंकि परंतप! तुम्हारे -जैसे महात्मा पुरुष कभी शोक नहीं करते ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 292 · श्लोक 13पृष्ठ 1961

In English

The Story of Rama, Sita, and the Rise of Ravana

Yudhisthira questions Markandeya about his misfortune regarding Draupadi's abduction. Markandeya describes the life of Rama and Sita before explaining how Ravana and his brothers gained power through intense penance and boons from Brahma.

This page answers

  • Who was the father of ravana?
  • What boon did brahma give to ravana?
  • How did ravana defeat kubera?
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  • Why did rama suffer exile and separation from sita?

Also written: Ramopakhyana, Rama, Yudhishthira, Markandeya, Sita, Ravana, Brahma, Pulastya, Vishrava, Kubera, Vibhishana, Shrirama, Lakshmana, Kaikeyi, Manthara, Bharata, Shurpanakha, Maricha, Jatayu, Kabandha, Sugriva, Hanumana, Vali, Tara, Trijata, Avindhya, Angada, Sampati, Prabhavati, Indrajita, Nala, Jambavana, Kumbhakarna, Prahasta, Dhumraksha, Matali, Dasharatha, Valmiki, रामोपाख्यान