श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 211–220
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 211–220
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तं ते वनगतं दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते । विविध सवारियाँ और नाना प्रकारके वस्त्रोंसे जिनका सत्कार होता था, उन्हीं भीमसेनको वनमें कष्ट उठाते देख शत्रुओंके प्रति आपका क्रोध प्रज्वलित क्यों नहीं होता? ॥ २२३ ॥
अयं कुरून् रणे सर्वान् हन्तुमुत्सहते प्रभुः ॥ २३ ॥
त्वत्प्रतिज्ञां प्रतीक्षंस्तु सहतेऽयं वृकोदरः । ये शक्तिशाली भीमसेन युद्धमें समस्त कौरवोंको नष्ट कर देनेका उत्साह रखते हैं, परंतु आपकी प्रतिज्ञा- पूर्तिकी प्रतीक्षा करनेके कारण अबतक शत्रुओंके अपराधको सहन करते हैं ॥ २३३ ॥
योऽर्जुनेनार्जुनस्तुल्यो द्विबाहुर्बहुबाहुना ॥ २४ ॥
शरावमर्दे शीघ्रत्वात् कालान्तकयमोपमः ।
यस्य शस्त्रप्रतापेन प्रणताः सर्वपार्थिवाः ॥ २५ ॥
यज्ञे तव महाराज ब्राह्मणानुपतस्थिरे ।
तमिमं पुरुषव्याघ्रं पूजितं देवदानवैः ॥ २६ ॥
ध्यायन्तमर्जुनं दृष्ट्वा कस्माद् राजन् न कुप्यसि । राजन्! आपके जो भाई अर्जुन दो ही भुजाओंसे युक्त होनेपर भी सहस्र भुजाओंसे विभूषित कार्तवीर्य अर्जुनके समान पराक्रमी हैं, बाण चलानेमें अत्यन्त फुर्ती रखनेके कारण जो शत्रुओंके लिये काल, अन्तक और यमके समान भयंकर हैं; महाराज! जिनके शस्त्रोंके प्रतापसे समस्त भूपाल नतमस्तक हो आपके यज्ञमें ब्राह्मणोंकी सेवाके लिये उपस्थित हुए थे, उन्हीं इन देव - दानवपूजित पुरुषसिंह अर्जुनको चिन्तामग्न देखकर आप शत्रुओंपर क्रोध क्यों नहीं करते? ॥ २४–२६३ ॥ दृष्ट्वा वनगतं पार्थमदुःखार्हं सुखोचितम् ॥ २७ ॥
न च ते वर्धते मन्युस्तेन मुह्यमि भारत । भारत! दुःखके अयोग्य और सुख भोगनेके योग्य अर्जुनको वनमें दुःख भोगते देखकर भी जो शत्रुओंके प्रति आपका क्रोध नहीं उमड़ता, इससे मैं मोहित हो रही हूँ ॥ २७ ॥
यो देवांश्च मनुष्यांश्च सर्पाश्चैकरथोऽजयत् ॥ २८ ॥
तं ते वनगतं दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते । जिन्होंने एकमात्र रथकी सहायतासे देवताओं, मनुष्यों और नागोंपर विजय पायी है, उन्हीं अर्जुनको वनवासका दुःख भोगते देख आपका क्रोध क्यों नहीं बढ़ता? ॥ २८३ ॥
यो यानैरद्भुताकारैर्हयैर्नागैश्च संवृतः ॥ २ ९ ॥
प्रसह्य वित्तान्यादत्त पार्थिवेभ्यः परंतप ।
क्षिपत्येकेन वेगेन पञ्चबाणशतानि यः ॥ ३० ॥
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तं ते वनगतं दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते । परंतप! जिन्होंने पराजित नरेशोंके दिये हुए अद्भुत आकारवाले रथों, घोड़ों और हाथियोंसे घिरे हुए कितने ही राजाओंसे बलपूर्वक धन लिये थे, जो एक ही वेगसे पाँच सौ बाणोंका प्रहार करते हैं, उन्हीं अर्जुनको वनवासका कष्ट भोगते देख शत्रुओंपर आपका क्रोध क्यों नहीं बढ़ता? ॥ २ ९ -३० ॥ श्यामं बृहन्तं तरुणं चर्मिणामुत्तमं रणे ॥ ३१ ॥
नकुलं ते वने दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते । जो युद्धमें ढाल और तलवारसे लड़नेवाले वीरोंमें सर्वश्रेष्ठ है, जिनकी कद ऊँची है तथा जो श्यामवर्णके तरुण हैं, उन्हीं नकुलको आज वनमें कष्ट उठाते देखकर आपको क्रोध क्यों नहीं होता? ॥ ३१ ÷ || दर्शनीयं च शूरं च माद्रीपुत्रं युधिष्ठिर ॥ ३२ ॥
सहदेवं वने दृष्ट्वा कस्मात् क्षमसि पार्थिव । महाराज युधिष्ठिर! माद्रीके परम सुन्दर पुत्र शूरवीर सहदेवको वनवासका दुःख भोगते देखकर आप शत्रुओंको क्षमा कैसे कर रहे हैं? ॥ ३२ ॥
नकुलं सहदेवं च दृष्ट्वा ते दुःखितावुभौ ॥ ३३ ॥
अदुःखार्ही मनुष्येन्द्र कस्मान्मन्युर्न वर्धते । नरेन्द्र! नकुल और सहदेव दुःख भोगनेके योग्य नहीं हैं । इन दोनोंको आज दुःखी देखकर आपका क्रोध क्यों नहीं बढ़ रहा है? ॥ ३३३ ॥
द्रुपदस्य कुले जातां स्नुषां पाण्डोर्महात्मनः ॥ ३४ ॥
धृष्टद्युम्नस्य भगिनीं वीरपत्नीमनुव्रताम् ।
मां वै वनगतां दृष्ट्वा कस्मात् क्षमसि पार्थिव ॥ ३५ ॥
मैं द्रुपदके कुलमें उत्पन्न हुई महात्मा पाण्डुकी पुत्रवधू, वीर धृष्टद्युम्नकी बहिन तथा वीरशिरोमणि पाण्डवोंकी पतिव्रता पत्नी हूँ । महाराज! मुझे इस प्रकार वनमें कष्ट उठाती देखकर भी आप शत्रुओंके प्रति क्षमाभाव कैसे धारण करते हैं? ॥ ३४-३५ ॥
नूनं च तव वै नास्ति मन्युर्भरतसत्तम ।
यत् ते भ्रातॄंश्च मां चैव दृष्ट्वा न व्यथते मनः ॥ ३६ ॥
भरतश्रेष्ठ! निश्चय ही आपके हृदयमें क्रोध नहीं है, क्योंकि मुझे और अपने भाइयोंको भी कष्टमें पड़ा देख आपके मनमें व्यथा नहीं होती है! ॥ ३६ ॥
न निर्मन्युःक्षत्रियोऽस्ति लोके निर्वचनं स्मृतम् ।
तदद्य त्वयि पश्यामि क्षत्रिये विपरीतवत् ॥ ३७ ॥
संसारमें कोई भी क्षत्रिय क्रोधरहित नहीं होता, क्षत्रिय शब्दकी व्युत्पत्ति ही ऐसी है, जिससे उसका सक्रोध होना सूचित होता है ।* परंतु आज आप जैसे क्षत्रियमें मुझे यह
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क्रोधका अभाव क्षत्रियत्वके विपरीत- सा दिखायी देता है ॥ ३७ ॥
यो न दर्शयते तेजः क्षत्रियः काल आगते ।
सर्वभूतानि तं पार्थ सदा परिभवन्त्युत ॥ ३८ ॥
कुन्तीनन्दन! जो क्षत्रिय समय आनेपर अपने प्रभावको नहीं दिखाता, उसका सब प्राणी सदा तिरस्कार करते हैं ॥ ३८ ॥
तत् त्वया न क्षमा कार्या शत्रून् प्रति कथंचन ।
तेजसैव हि ते शक्या निहन्तुं नात्र संशयः ॥ ३ ९ ॥
महाराज! आपको शत्रुओंके प्रति किसी प्रकार भी क्षमाभाव नहीं धारण करना चाहिये । तेजसे ही उन सबका वध किया जा सकता है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है ॥ ३ ९ ॥
तथैव यः क्षमाकाले क्षत्रियो नोपशाम्यति ।
अप्रियः सर्वभूतानां सोऽमुत्रेह च नश्यति ॥ ४० ॥
इसी प्रकार जो क्षत्रिय क्षमा करनेके योग्य समय आनेपर शान्त नहीं होता, वह सब प्राणियोंके लिये अप्रिय हो जाता है और इहलोक तथा परलोकमें भी उसका विनाश ही होता है ॥ ४० ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्रौपदीपरितापवाक्ये सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमेंद्रौपदीके अनुतापपूर्णवचनविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २७ ॥
* क्षरते इति क्षत्रम्— जो दुष्टोंका क्षरण- नाश करता है, वह क्षत्रिय है ।
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अष्टाविंशोऽध्यायः द्रौपदीद्वारा प्रह्लाद - बलि- संवादका वर्णन - तेज और क्षमाके अवसर द्रौपद्युवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
प्रह्लादस्य च संवादं बलेर्वैरोचनस्य च ॥ १ ॥
द्रौपदी कहती है - महाराज! इस विषयमें प्रह्लाद तथा विरोचनपुत्र बलिके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ १ ॥
असुरेन्द्रं महाप्राज्ञं धर्माणामागतागमम् ।
बलिः पप्रच्छ दैत्येन्द्रं प्रह्लादं पितरं पितुः ॥ २ ॥
असुरोंके स्वामी परम बुद्धिमान् दैत्यराज प्रह्लाद सभी धर्मोंके रहस्यको जाननेवाले थे । एक समय बलिने उन अपने पितामह प्रह्लादजीसे पूछा ॥ २ ॥
बलिरुवाच
क्षमा स्विच्छ्रेयसी तात उताहो तेज इत्युत ।
एतन्मे संशयं तात यथावद् ब्रूहि पृच्छते ॥ ३ ॥
बलिने पूछा –तात! क्षमा और तेजमेंसे क्षमा श्रेष्ठ है अथवा तेज? यह मेरा संशय है ।
मैं इसका समाधान पूछता हूँ। आप इस प्रश्नका यथार्थ निर्णय कीजिये ॥ ३ ॥
श्रेयो यदत्र धर्मज्ञ ब्रूहि मे तदसंशयम् ।
करिष्यामि हि तत् सर्वं यथावदनुशासनम् ॥ ४ ॥
धर्मज्ञ! इनमें जो श्रेष्ठ है, वह मुझे अवश्य बताइये, मैं आपके सब आदेशोंका यथावत् पालन करूँगा ॥ ४ ॥
तस्मै प्रोवाच तत् सर्वमेवं पृष्टः पितामहः ।
सर्वनिश्चयवित् प्राज्ञः संशयं परिपृच्छते ॥ ५ ॥
बलिके इस प्रकार पूछनेपर समस्त सिद्धान्तोंके ज्ञाता विद्वान् पितामह प्रह्लादने संदेह निवारण करनेके लिये पूछनेवाले पौत्रके प्रति इस प्रकार कहा ॥ ५ ॥
प्रह्लादउवाच
न श्रेयः सततं तेजो न नित्यं श्रेयसी क्षमा ।
इति तात विजानीहि द्वयमेतदसंशयम् ॥ ६ ॥
प्रह्लाद बोले — तात! न तो तेज ही सदा श्रेष्ठ है और न क्षमा ही । इन दोनोंके विषयमें मेरा ऐसा ही निश्चय जानो, इसमें संशय नहीं है ॥ ६ ॥
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यो नित्यं क्षमते तात बहून् दोषान् स विन्दति ।
भृत्याः परिभवन्त्येनमुदासीनास्तथारयः ॥ ७ ॥
सर्वभूतानि चाप्यस्य न नमन्ति कदाचन ।
तस्मान्नित्यं क्षमा तात पण्डितैरपि वर्जिता ॥ ८ ॥
वत्स! जो सदा क्षमा ही करता है, उसे अनेक दोष प्राप्त होते हैं । उसके भृत्य, शत्रु तथा उदासीन व्यक्ति सभी उसका तिरस्कार करते हैं । कोई भी प्राणी कभी उसके सामने विनयपूर्ण बर्ताव नहीं करते, अतः तात! सदा क्षमा करना विद्वानोंके लिये भी वर्जित है ॥ ७-८ ॥
अवज्ञाय हि तं भृत्या भजन्ते बहुदोषताम् ।
आदातुं चास्य वित्तानि प्रार्थयन्तेऽल्पचेतसः ॥ ९ ॥
सेवकगण उसकी अवहेलना करके बहुत- से अपराध करते रहते हैं। इतना ही नहीं, वे मूर्ख भृत्यगण उसके धनको भी हड़प लेनेका हौसला रखते हैं ॥ ॥
यानं वस्त्राण्यलंकाराञ्छयनान्यासनानि च ।
भोजनान्यथ पानानि सर्वोपकरणानि च ॥ १० ॥
आददीरन्नधिकृता यथाकाममचेतसः ।
प्रदिष्टानि च देयानि न दद्युर्भर्तृशासनात् ॥ ११ ॥
विभिन्न कार्योंमें नियुक्त किये हुए मूर्ख सेवक अपने इच्छानुसार क्षमाशील स्वामीके रथ, वस्त्र, अलंकार, शय्या, आसन, भोजन, पान तथा समस्त सामग्रियोंका उपयोग करते रहते हैं तथा स्वामीकी आज्ञा होनेपर भी किसीको देनेयोग्य वस्तुएँ नहीं देते हैं ॥ १०-११ ॥
न चैनं भर्तृपूजाभिः पूजयन्ति कथंचन ।
अवज्ञानं हि लोकेऽस्मिन् मरणादपि गर्हितम् ॥ १२ ॥
स्वामीका जितना आदर होना चाहिये, उतना आदर वे किसी प्रकार भी नहीं करते । इस संसारमें सेवकोंद्वारा अपमान तो मृत्युसे भी अधिक निन्दित है ॥ १२ ॥
क्षमिणं तादृशं तात ब्रुवन्ति कटुकान्यपि ।
प्रेष्याः पुत्राश्च भृत्याश्च तथोदासीनवृत्तयः ॥ १३ ॥
तात! उपर्युक्त क्षमाशीलको अपने सेवक, पुत्र, भृत्य तथा उदासीनवृत्तिके लोग कटुवचन भी सुनाया करते हैं ॥ १३ ॥
अथास्य दारानिच्छन्ति परिभूय क्षमावतः ।
दाराश्चास्य प्रवर्तन्ते यथाकाममचेतसः ॥ १४ ॥
इतना ही नहीं, वे क्षमाशील स्वामीकी अवहेलना करके उसकी स्त्रियोंको भी हस्तगत करना चाहते हैं और वैसे पुरुषकी मूर्ख स्त्रियाँ भी स्वेच्छाचारमें प्रवृत्त हो जाती हैं ॥ १४ ॥
तथा च नित्यमुदिता यदि नाल्पमपीश्वरात् ।
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दण्डमर्हन्ति दुष्यन्ति दुष्टाश्चाप्यपकुर्वते ॥ १५ ॥
यदि उन्हें अपने स्वामीसे तनिक भी दण्ड नहीं मिलता तो वे सदा मौज उड़ाती हैं और आचारसे दूषित हो जाती हैं । दुष्टा होनेपर वे अपने स्वामीका अपकार भी कर बैठती ॥ १५ ॥
एते चान्ये च बहवो नित्यं दोषाः क्षमावताम् ।
अथ वैरोचने दोषानिमान् विद्ध्यक्षमावताम् ॥ १६ ॥
सदा क्षमा करनेवाले पुरुषोंको ये तथा और भी बहुत-से दोष प्राप्त होते हैं ।
विरोचनकुमार! अब क्षमा न करनेवालोंके दोषोंको सुनो ॥ १६ ॥
अस्थाने यदि वा स्थाने सततं रजसाऽऽवृतः ।
क्रुद्धो दण्डान् प्रणयति विविधान् स्वेन तेजसा ॥ १७ ॥
क्रोधी मनुष्य रजोगुणसे आवृत होकर योग्य या अयोग्य अवसरका विचार किये बिना ही अपने उत्तेजित स्वभावसे लोगोंको नाना प्रकारके दण्ड देता रहता है ॥ १७ ॥
मित्रैः सह विरोधं च प्राप्नुते तेजसाऽऽवृतः ।
आप्नोति द्वेष्यतां चैव लोकात् स्वजनतस्तथा ॥ १८ ॥
तेज ( उत्तेजना ) -से व्याप्त मनुष्य मित्रोंसे विरोध पैदा कर लेता है तथा साधारण लोगों और स्वजनोंका द्वेषपात्र बन जाता है ॥ १८ ॥
सोऽवमानादर्थहानिमुपालम्भमनादरम् ।
संतापद्वेषमोहांश्च शत्रूंश्च लभते नरः ॥ १ ९ ॥
वह मनुष्य दूसरोंका अपमान करनेके कारण सदा धनकी हानि उठाता है । उपालम्भ सुनता और अनादर पाता है । इतना ही नहीं, वह संताप, द्वेष, मोह तथा नये - नये शत्रु पैदा कर लेता है ॥ १ ९ ॥
क्रोधाद् दण्डान्मनुष्येषु विविधान् पुरुषोऽनयात् ।
भ्रश्यते शीघ्रमैश्वर्यात् प्राणेभ्यः स्वजनादपि ॥ २० ॥
मनुष्य क्रोधवश अन्यायपूर्वक दूसरे लोगोंपर नाना प्रकारके दण्डका प्रयोग करके अपने ऐश्वर्य, प्राण और स्वजनोंसे भी हाथ धो बैठता है ॥ २० ॥
योपकर्तृश्च हर्तृश्च तेजसैवोपगच्छति ।
तस्मादुद्विजते लोकः सर्पाद् वेश्मगतादिव ॥ २१ ॥
जो उपकारी मनुष्यों और चोरोंके साथ भी उत्तेजनायुक्त बर्ताव ही करता है, उससे सब लोग उसी प्रकार उद्विग्न होते हैं, जैसे घरमें रहनेवाले सर्पसे ॥ २१ ॥
यस्मादुद्विजते लोकः कथं तस्य भवो भवेत् ।
अन्तरं तस्य दृष्ट्वैव लोको विकुरुते ध्रुवम् ॥ २२ ॥
जिससे सब लोग उद्विग्न होते हैं, उसे ऐश्वर्यकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? उसका थोड़ा- सा भी छिद्र देखकर लोग निश्चय ही उसकी बुराई करने लगते हैं ॥ २२ ॥
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तस्मान्नात्युत्सृजेत् तेजो न च नित्यं मृदुर्भवेत् ।
काले काले तु सम्प्राप्ते मृदुस्तीक्ष्णोऽपि वा भवेत् ॥ २३ ॥
इसलिये न तो सदा उत्तेजनाका ही प्रयोग करे और न सर्वदा कोमल ही बना रहे । समय- समयपर आवश्यकताके अनुसार कभी कोमल और कभी तेज स्वभाववाला बन जाय ॥ २३ ॥
काले मृदुर्यो भवति काले भवति दारुणः ।
स वै सुखमवाप्नोति लोकेऽमुष्मिन्निहैव च ॥ २४ ॥
जो मौका देखकर कोमल होता है और उपयुक्त अवसर आनेपर भयंकर भी बन जाता है, वही इहलोक और परलोकमें सुख पाता है ॥ २४ ॥
क्षमाकालांस्तु वक्ष्यामि शृणु मे विस्तरेण तान् ।
ये ते नित्यमसंत्याज्या यथा प्राहुर्मनीषिणः ॥ २५ ॥
अब मैं तुम्हें क्षमाके योग्य अवसर बताता हूँ, उन्हें विस्तारपूर्वक सुनो, जैसा कि मनीषी पुरुष कहते हैं, उन अवसरोंका तुम्हें कभी त्याग नहीं करना चाहिये ॥ २५ ॥
पूर्वोपकारी यस्ते स्यादपराधे गरीयसि ।
उपकारेण तत् तस्य क्षन्तव्यमपराधिनः ॥ २६ ॥
जिसने पहले कभी तुम्हारा उपकार किया हो, उससे यदि कोई भारी अपराध हो जाय, तो भी पहलेके उपकारका स्मरण करके उस अपराधीके अपराधको तुम्हें क्षमा कर देना चाहिये ॥ २६ ॥
अबुद्धिमाश्रितानां तु क्षन्तव्यमपराधिनाम् ।
न हि सर्वत्र पाण्डित्यं सुलभं पुरुषेण वै ॥ २७ ॥
जिन्होंने अनजानमें अपराध कर डाला हो, उनका वह अपराध क्षमाके ही योग्य है; क्योंकि किसी भी पुरुषके लिये सर्वत्र विद्वत्ता ( बुद्धिमानी ) ही सुलभ हो, यह सम्भव नहीं है ॥ २७ ॥
अथ चेद् बुद्धिजं कृत्वा ब्रूयुस्ते तदबुद्धिजम् ।
पापान् स्वल्पेऽपि तान् हन्यादपराधे तथानृजून् ॥ २८ ॥
परंतु जो जान -बूझकर किये हुए अपराधको भी उसे कर लेनेके बाद अनजानमें किया हुआ बताते हों, उन उद्दण्ड पापियोंको थोड़े - से अपराधके लिये भी अवश्य दण्ड देना चाहिये ॥ २८ ॥
सर्वस्यैकोऽपराधस्ते क्षन्तव्यः प्राणिनो भवेत् ।
द्वितीये सति वध्यस्तु स्वल्पेऽप्यपकृते भवेत् ॥ २ ९ ॥
सभी प्राणियोंका एक अपराध तो तुम्हें क्षमा ही कर देना चाहिये । यदि उससे फिर दुबारा अपराध बन जाय तो थोड़े - से अपराधके लिये भी उसे दण्ड देना आवश्यक है ॥ २ ९ ॥
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अजानता भवेत् कश्चिदपराधः कृतो यदि ।
क्षन्तव्यमेव तस्याहुः सुपरीक्ष्य परीक्षया ॥ ३० ॥
अच्छी तरह जाँच-पड़ताल करनेपर यदि यह सिद्ध हो जाय कि अमुक अपराध अनजानमें ही हो गया है, तो उसे क्षमाके ही योग्य बताया गया है ॥ ३० ॥
मृदुना दारुणं हन्ति मृदुना हन्त्यदारुणम् ।
नासाध्यं मृदुना किंचित् तस्मात् तीव्रतरं मृदु ॥ ३१ ॥
मनुष्य कोमलभाव ( सामनीति ) के द्वारा उग्र स्वभाव तथा शान्त स्वभावके शत्रुका भी नाश कर देता है; मृदुतासे कुछ भी असाध्य नहीं है । अतः मृदुतापूर्ण नीतिको तीव्रतर (उत्तम) समझे ॥ ३१ ॥
देशकालौ तु सम्प्रेक्ष्य बलाबलमथात्मनः ।
नादेशकाले किंचित् स्याद् देशकालौ प्रतीक्षताम् ।
तथा लोकभयाच्चैव क्षन्तव्यमपराधिनः ॥ ३२ ॥
देश, काल तथा अपने बलाबलका विचार करके ही मृदुता (सामनीति) -का प्रयोग करना चाहिये । अयोग्य देश अथवा अनुपयुक्त कालमें उसके प्रयोगसे कुछ भी सिद्ध नहीं हो सकता; अतः उपयुक्त देश, कालकी प्रतीक्षा करनी चाहिये । कहीं लोकके भयसे भी अपराधीको क्षमादान देनेकी आवश्यकता होती है ॥ ३२ ॥
एत एवंविधाः कालाः क्षमायाः परिकीर्तिताः ।
अतोऽन्यथानुवर्तत्सु तेजसः काल उच्यते ॥ ३३ ॥
इस प्रकार ये क्षमाके अवसर बताये गये हैं । इनके विपरीत बर्ताव करनेवालोंको राहपर लानेके लिये तेज ( उत्तेजनापूर्ण बर्ताव ) -का अवसर कहा गया है ॥ ३३ ॥
तदहं तेजसः कालं तव मन्ये नराधिप ।
धार्तराष्ट्रेषु लुब्धेषु सततं चापकारिषु ॥ ३४ ॥
(द्रौपदी कहती है — ) नरेश्वर! धृतराष्ट्रके पुत्र लोभी तथा सदा आपका अपकार करनेवाले हैं; अतः उनके प्रति आपके तेजके प्रयोगका यह अवसर आया है, ऐसा मेरा मत है ॥ ३४ ॥
न हि कश्चित् क्षमाकालो विद्यतेऽद्य कुरून् प्रति ।
तेजसश्चागते काले तेज उत्स्रष्टुमर्हसि ॥ ३५ ॥
कौरवोंके प्रति अब क्षमाका कोई अवसर नहीं है । अब तेज प्रकट करनेका अवसर प्राप्त है; अतः उनपर आपको अपने तेजका ही प्रयोग करना चाहिये ॥ ३५ ॥
मृदुर्भवत्यवज्ञातस्तीक्ष्णादुद्विजते जनः ।
काले प्राप्ते द्वयं चैतद् यो वेद स महीपतिः ॥ ३६ ॥
कोमलतापूर्ण बर्ताव करनेवालेकी सब लोग अवहेलना करते हैं और तीक्ष्ण स्वभाववाले पुरुषसे सबको उद्वेग प्राप्त होता है । जो उचित अवसर आनेपर इन दोनोंका
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प्रयोग करना जानता है, वही सफल भूपाल है ॥ ३६ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्रौपदीवाक्ये ऽष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें द्रौपदीवाक्यविषयक अट्ठाईसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥
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एकोनत्रिंशोऽध्यायः युधिष्ठिरके द्वारा क्रोधकी निन्दा और क्षमाभावकी विशेष प्रशंसा युधिष्ठिरउवाच
क्रोधो हन्ता मनुष्याणां क्रोधो भावयिता पुनः ।
इति विद्धि महाप्राज्ञे क्रोधमूलौ भवाभवौ ॥ १ ॥
युधिष्ठिर बोले- परम बुद्धिमती द्रौपदी! क्रोध ही मनुष्योंको मारनेवाला है और क्रोध ही यदि जीत लिया जाय तो अभ्युदय करनेवाला है । तुम यह जान लो कि उन्नति और अवनति दोनों क्रोधमूलक ही हैं (क्रोधको जीतनेसे उन्नति और उसके वशीभूत होनेसे अवनति होती है ) ॥ १ ॥
यो हि संहरते क्रोधं भवस्तस्य सुशोभने ।
यः पुनः पुरुषः क्रोधं नित्यं न सहते शुभे ।
तस्याभावाय भवति क्रोधः परमदारुणः ॥ २ ॥
सुशोभने! जो क्रोधको रोक लेता है, उसकी उन्नति होती है और जो मनुष्य क्रोधके वेगको कभी सहन नहीं कर पाता, उसके लिये वह परम भयंकर क्रोध विनाशकारी बन जाता है ॥ २ ॥
क्रोधमूलो विनाशो हि प्रजानामिह दृश्यते ।
तत् कथं मादृशः क्रोधमुत्सृजेल्लोकनाशनम् ॥ ३ ॥
इस जगत्में क्रोधके कारण लोगोंका नाश होता दिखायी देता है; इसलिये मेरे - जैसा मनुष्य लोकविनाशक क्रोधका उपयोग दूसरोंपर कैसे करेगा? ॥ ३ ॥
क्रुद्धः पापं नरः कुर्यात् क्रुद्धो हन्याद् गुरूनपि ।
क्रुद्धः परुषया वाचा श्रेयसोऽप्यवमन्यते ॥ ४ ॥
क्रोधी मनुष्य पाप कर सकता है, क्रोधके वशीभूत मानव गुरुजनोंकी भी हत्या कर सकता है और क्रोधमें भरा हुआ पुरुष अपनी कठोर वाणीद्वारा श्रेष्ठ मनुष्योंका भी अपमान कर देता है ॥ ४ ॥
वाच्यावाच्ये हि कुपितो न प्रजानाति कर्हिचित् ।
नाकार्यमस्ति क्रुद्धस्य नावाच्यं विद्यते तथा ॥ ५ ॥
क्रोधी मनुष्य कभी यह नहीं समझ पाता कि क्या कहना चाहिये और क्या नहीं ।
क्रोधीके लिये कुछ भी अकार्य अथवा अवाच्य नहीं है ॥ ५ ॥
हिंस्यात् क्रोधादवध्यांस्तु वध्यान् सम्पूजयीत च ।