श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 221–230

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 221–230

पृष्ठ 221

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आत्मानमपि च क्रुद्धः प्रेषयेद् यमसादनम् ॥ ६ ॥

क्रोधवश वह अवध्य पुरुषोंकी भी हत्या कर सकता है और वधके योग्य मनुष्योंकी भी पूजामें तत्पर हो सकता है । इतना ही नहीं, क्रोधी मानव ( आत्महत्याद्वारा ) अपने - आपको भी यमलोकका अतिथि बना सकता है ॥ ६ ॥

एतान् दोषान् प्रपश्यद्भिर्जितः क्रोधो मनीषिभिः ।

इच्छद्भिः परमं श्रेय इह चामुत्र चोत्तमम् ॥ ७ ॥

इन दोषोंको देखनेवाले मनस्वी पुरुषोंने, जो इहलोक और परलोकमें भी परम उत्तम कल्याणकी इच्छा रखते हैं, क्रोधको जीत लिया है ॥ ७ ॥

तं क्रोधं वर्जितं धीरैः कथमस्मद्विधश्चरेत् ।

एतद् द्रौपदि संधाय न मे मन्युः प्रवर्धते ॥ ८ ॥

अतः धीर पुरुषोंने जिसका परित्याग कर दिया है । उस क्रोधको मेरे जैसा मनुष्य कैसे उपयोगमें ला सकता है? द्रुपदकुमारी! यही सोचकर मेरा क्रोध कभी बढ़ता नहीं है ॥ ८ ॥

आत्मानं च परांश्चैव त्रायते महतो भयात् ।

क्रुध्यन्तमप्रतिक्रुध्यन् द्वयोरेष चिकित्सकः ॥ ९ ॥

क्रोध करनेवाले पुरुषके प्रति जो बदलेमें क्रोध नहीं करता, वह अपनेको और दूसरोंको भी महान् भयसे बचा लेता है । वह अपने और पराये दोनोंके दोषोंको दूर करनेके लिये चिकित्सक बन जाता है ॥ ९ ॥

मूढो यदि क्लिश्यमानः क्रुध्यतेऽशक्तिमान् नरः ।

बलीयसां मनुष्याणां त्यजत्यात्मानमात्मना ॥ १० ॥

यदि मूढ़ एवं असमर्थ मनुष्य दूसरोंके द्वारा क्लेश दिये जानेपर स्वयं भी बलिष्ठ मनुष्योंपर क्रोध करता है तो वह अपने ही द्वारा अपने- आपका विनाश कर देता है ॥ १० ॥

तस्यात्मानं संत्यजतो लोका नश्यन्त्यनात्मनः ।

तस्माद् द्रौपद्यशक्तस्य मन्योर्नियमनं स्मृतम् ॥ ११ ॥

अपने चित्तको वशमें न रखनेके कारण क्रोधवश देहत्याग करनेवाले उस मनुष्यके लोक और परलोक दोनों नष्ट हो जाते हैं । अतः द्रुपदकुमारी! असमर्थके लिये अपने क्रोधको रोकना ही अच्छा माना गया है ॥ ११ ॥

विद्वांस्तथैव यः शक्तः क्लिश्यमानो न कुप्यति ।

अनाशयित्वा क्लेष्टारं परलोके च नन्दति ॥ १२ ॥

इसी प्रकार जो विद्वान् पुरुष शक्तिशाली होकर भी दूसरोंद्वारा क्लेश दिये जानेपर स्वयं क्रोध नहीं करता, वह क्लेश देनेवालेका नाश न करके परलोकमें भी आनन्दका भागी होता ॥ १२ ॥

तस्माद् बलवता चैव दुर्बलेन च नित्यदा ।

पृष्ठ 222

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क्षन्तव्यं पुरुषेणाहुरापत्स्वपि विजानता ॥ १३ ॥

इसलिये बलवान् या निर्बल सभी विज्ञ मनुष्योंको सदा आपत्तिकालमें भी क्षमाभावका ही आश्रय लेना चाहिये ॥ १३ ॥

मन्योर्हि विजयं कृष्णे प्रशंसन्तीह साधवः ।

क्षमावतो जयो नित्यं साधोरिह सतां मतम् ॥ १४ ॥

कृष्णे! साधु पुरुष क्रोधको जीतनेकी ही प्रशंसा करते हैं । संतोंका यह मत है कि इस जगत्में क्षमाशील साधु पुरुषकी सदा जय होती है ॥ १४ ॥

सत्यं चानृततः श्रेयो नृशंस्याच्चानृशंसता ।

तमेवं बहुदोषं तु क्रोधं साधुविवर्जितम् ॥ १५ ॥

मादृशः प्रसृजेत् कस्मात् सुयोधनवधादपि । झूठसे सत्य श्रेष्ठ है । क्रूरतासे दयालुता श्रेष्ठ है, अतः दुर्योधन मेरा वध कर डाले तो भी इस प्रकार अनेक दोषोंसे भरे हुए और सत्पुरुषोंद्वारा परित्यक्त क्रोधका मेरे - जैसा पुरुष कैसे उपयोग कर सकता है? ॥ १५३ ॥

तेजस्वीति यमाहुर्वै पण्डिता दीर्घदर्शिनः ॥ १६ ॥

न क्रोधोऽभ्यन्तरस्तस्य भवतीति विनिश्चितम् । दूरदर्शी विद्वान् जिसे तेजस्वी कहते हैं, उसके भीतर क्रोध नहीं होता; यह निश्चित बात है ॥ १६३ ॥

यस्तु क्रोधं समुत्पन्नं प्रज्ञया प्रतिबाधते ॥ १७ ॥

तेजस्विनं तं विद्वांसो मन्यन्ते तत्त्वदर्शिनः । जो उत्पन्न हुए क्रोधको अपनी बुद्धिसे दबा देता है, उसे तत्त्वदर्शी विद्वान् तेजस्वी मानते हैं ॥ १७ ॥

क्रुद्धो हि कार्यं सुश्रोणि न यथावत् प्रपश्यति ।

नाकार्यं न च मर्यादां नरः क्रुद्धोऽनुपश्यति ॥ १८ ॥

सुन्दरी! क्रोधी मनुष्य किसी कार्यको ठीक -ठीक नहीं समझ पाता । वह यह भी नहीं जानता कि मर्यादा क्या है ( अर्थात् क्या करना चाहिये ) और क्या नहीं करना चाहिये ॥ १८ ॥

हन्त्यवध्यानपि क्रुद्धो गुरून् क्रुद्धस्तुदत्यपि ।

तस्मात् तेजसि कर्तव्यः क्रोधो दूरे प्रतिष्ठितः ॥ १ ९ ॥

क्रोधी मनुष्य अवध्य पुरुषोंका वध कर देता है । क्रोधी मनुष्य गुरुजनोंको कटु वचनोंद्वारा पीड़ा पहुँचाता है । इसलिये जिसमें तेज हो, उस पुरुषको चाहिये कि वह क्रोधको अपनेसे दूर रखे ॥ १ ९ ॥

दाक्ष्यं ह्यमर्षः शौर्यं च शीघ्रत्वमिति तेजसः ।

गुणा! क्रोधाभिभूतेन न शक्याः प्राप्तुमञ्जसा ॥ २० ॥

पृष्ठ 223

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दक्षता, अमर्ष, शौर्य और शीघ्रता - ये तेजके गुण हैं । जो मनुष्य क्रोधसे दबा हुआ है, वह इन गुणोंको सहजमें ही नहीं पा सकता ॥ २० ॥

क्रोधं त्यक्त्वा तु पुरुषः सम्यक् तेजोऽभिपद्यते ।

कालयुक्तं महाप्राज्ञे क्रुद्धैस्तेजः सुदुःसहम् ॥ २१ ॥

क्रोधका त्याग करके मनुष्य भलीभाँति तेज प्राप्त कर लेता है । महाप्राज्ञे! क्रोधी पुरुषोंके लिये समयके उपयुक्त तेज अत्यन्त दुःसह है ॥ २१ ॥

क्रोधस्त्वपण्डितैः शश्वत् तेज इत्यभिनिश्चितम् ।

रजस्तु लोकनाशाय विहितं मानुषं प्रति ॥ २२ ॥

मूर्खलोग क्रोधको ही सदा तेज मानते हैं। परन्तु रजोगुणजनित क्रोधका यदि मनुष्योंके प्रति प्रयोग हो तो वह लोगोंके नाशका कारण होता है ॥ २२ ॥

तस्माच्छश्वत् त्यजेत् क्रोधं पुरुषः सम्यगाचरन् ।

श्रेयान् स्वधर्मानपगो न क्रुद्ध इति निश्चितम् ॥ २३ ॥

अतः सदाचारी पुरुष सदा क्रोधका परित्याग करे । अपने वर्णधर्मके अनुसार न चलनेवाला मनुष्य ( अपेक्षाकृत) अच्छा, किंतु क्रोधी नहीं अच्छा- यह निश्चय है ॥ २३ ॥

यदि सर्वमबुद्धीनामतिक्रान्तमचेतसाम् ।

अतिक्रमो मद्विधस्य कथंस्वित् स्यादनिन्दिते ॥ २४ ॥

साध्वी द्रौपदी! यदि मूर्ख और अविवेकी मनुष्य क्षमा आदि सद्गुणोंका उल्लंघन कर जाते हैं तो मेरे जैसा विज्ञ पुरुष उनका अतिक्रमण कैसे कर सकता है? ॥ २४ ॥

यदि न स्युर्मानुषेषु क्षमिणः पृथिवीसमाः ।

न स्यात् संधिर्मनुष्याणां क्रोधमूलो हि विग्रहः ॥ २५ ॥

यदि मनुष्योंमें पृथ्वीके समान क्षमाशील पुरुष न हों तो मानवोंमें कभी सन्धि हो ही नहीं सकती; क्योंकि झगड़ेकी जड़ तो क्रोध ही है ॥ २५ ॥

अभिषक्तो ह्यभिषजेदाहन्याद् गुरुणा हतः ।

एवं विनाशो भूतानामधर्मः प्रथितो भवेत् ॥ २६ ॥

यदि कोई अपनेको सतावे तो स्वयं भी उसको सतावे । औरोंकी तो बात ही क्या है, यदि गुरुजन अपनेको मारें तो उन्हें भी मारे बिना न छोड़े; ऐसी धारणा रखनेके कारण सब प्राणियोंका ही विनाश हो जाता है और अधर्म बढ़ जाता है ॥ २६ ॥

आक्रुष्टः पुरुषः सर्वं प्रत्याक्रोशेदनन्तरम् ।

प्रतिहन्याद्धतश्चैव तथा हिंस्याच्च हिंसितः ॥ २७ ॥

यदि सभी क्रोधके वशीभूत हो जायँ तो एक मनुष्य दूसरेके द्वारा गाली खाकर स्वयं भी बदलेमें उसे गाली दे सकता है । मार खानेवाला मनुष्य बदलेमें मार सकता है । एकका अनिष्ट होनेपर वह दूसरेका भी अनिष्ट कर सकता है ॥ २७ ॥

हन्युर्हि पितरः पुत्रान् पुत्राश्चापि तथा पितॄन् ।

पृष्ठ 224

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हन्युश्च पतयो भार्याः पतीन् भार्यास्तथैव च ॥ २८ ॥

पिता पुत्रोंको मारेंगे और पुत्र पिताको, पति पत्नियोंको मारेंगे और पत्नियाँ पतिको ॥ २८ ॥

एवं संकुपिते लोके शमः कृष्णे न विद्यते ।

प्रजानां संधिमूलं हि शमं विद्धि शुभानने ॥ २९ ॥

कृष्णे! इस प्रकार सम्पूर्ण जगत्के क्रोधका शिकार हो जानेपर तो कहीं शान्ति नहीं रहती । शुभानने! तुम यह जान लो कि सम्पूर्ण प्रजाकी शान्ति सन्धिमूलक ही है ॥ २ ९ ॥

ताः क्षिपेरन् प्रजाः सर्वाः क्षिप्रं द्रौपदि तादृशे ।

तस्मान्मन्युर्विनाशाय प्रजानामभवाय च ॥ ३० ॥

द्रौपदी! यदि राजा तुम्हारे कथनानुसार क्रोधी हो जाय तो सारी प्रजाओंका शीघ्र ही नाश हो जायगा । अतः यह समझ लो कि क्रोध प्रजावर्गके नाश और अवनतिका कारण है ॥ ३० ॥

यस्मात् तु लोके दृश्यन्ते क्षमिणः पृथिवीसमाः ।

तस्माज्जन्म च भूतानां भवश्च प्रतिपद्यते ॥ ३१ ॥

इस जगत्में पृथ्वीके समान क्षमाशील पुरुष भी देखे जाते हैं, इसीलिये प्राणियोंकी उत्पत्ति और वृद्धि होती रहती है ॥ ३१ ॥

क्षन्तव्यं पुरुषेणेह सर्वापत्सु सुशोभने ।

क्षमावतो हि भूतानां जन्म चैव प्रकीर्तितम् ॥ ३२ ॥

सुशोभने! पुरुषको सभी आपत्तियोंमें क्षमाभाव रखना चाहिये । क्षमाशील पुरुषसे ही समस्त प्राणियोंका जीवन बताया गया है ॥ ३२ ॥

आक्रुष्टस्ताडितः क्रुद्धः क्षमते यो बलीयसा ।

यश्च नित्यं जितक्रोधो विद्वानुत्तमपूरुषः ॥ ३३ ॥

जो बलवान् पुरुषके गाली देने या कुपित होकर मारनेपर भी क्षमा कर जाता है तथा जो सदा अपने क्रोधको काबू में रखता है, वही विद्वान् है और वही श्रेष्ठ पुरुष है ॥ ३३ ॥

प्रभाववानपि नरस्तस्य लोकाः सनातनाः ।

क्रोधनस्त्वल्पविज्ञानः प्रेत्य चेह च नश्यति ॥ ३४ ॥

वही मनुष्य प्रभावशाली कहा जाता है । उसीको सनातन लोक प्राप्त होते हैं । क्रोधी मनुष्य अल्पज्ञ होता है । वह इस लोक और परलोक दोनोंमें विनाशका ही भागी होता है ॥ ३४ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीमा गाथा नित्यं क्षमावताम् ।

गीताः क्षमावता कृष्णे काश्यपेन महात्मना ॥ ३५ ॥

इस विषयमें जानकार लोग क्षमावान् पुरुषोंकी गाथाका उदाहरण देते हैं । कृष्णे! क्षमावान् महात्मा काश्यपने इस गाथाका गान किया है ॥ ३५ ॥

पृष्ठ 225

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क्षमा धर्मः क्षमा यज्ञः क्षमा वेदाः क्षमाः श्रुतम् ।

य एतदेवं जानाति स सर्वं क्षन्तुमर्हति ॥ ३६ ॥

क्षमा धर्म है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा वेद है और क्षमा शास्त्र है । जो इस प्रकार जानता है, वह सब कुछ क्षमा करनेके योग्य हो जाता है ॥ ३६ ॥

क्षमा ब्रह्म क्षमा सत्यं क्षमा भूतं च भावि च ।

क्षमा तपः क्षमा शौचं क्षमयेदं धृतं जगत् ॥ ३७ ॥

क्षमा ब्रह्म है, क्षमा सत्य है, क्षमा भूत है, क्षमा भविष्य है, क्षमा तप है और क्षमा शौच है । क्षमाने ही सम्पूर्ण जगत्को धारण कर रखा है ॥ ३७ ॥

अति यज्ञविदां लोकान् क्षमिणः प्राप्नुवन्ति च ।

अति ब्रह्मविदां लोकानति चापि तपस्विनाम् ॥ ३८ ॥

क्षमाशील मनुष्य यज्ञवेत्ता, ब्रह्मवेत्ता और तपस्वी पुरुषोंसे भी ऊँचे लोक प्राप्त करते हैं ॥ ३८ ॥

अन्ये वै यजुषां लोकाः कर्मिणामपरे तथा ।

क्षमावतां ब्रह्मलोके लोकाः परमपूजिताः ॥ ३ ९ ॥

( सकामभावसे ) यज्ञकर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले पुरुषोंके लोक दूसरे हैं एवं ( सकामभावसे ) वापी, कूप, तडाग और दान आदि कर्म करनेवाले मनुष्योंके लोक दूसरे हैं । परंतु क्षमावानोंके लोक ब्रह्मलोकके अन्तर्गत हैं; जो अत्यन्त पूजित हैं ॥ ३ ९ ॥

क्षमा तेजस्विनां तेजः क्षमा ब्रह्म तपस्विनाम् ।

क्षमा सत्यं सत्यवतां क्षमा यज्ञः क्षमा शमः ॥ ४० ॥

क्षमा तेजस्वी पुरुषोंका तेज है, क्षमा तपस्वियोंका ब्रह्म है, क्षमा सत्यवादी पुरुषोंका सत्य है । क्षमा यज्ञ है और क्षमा शम ( मनोनिग्रह) है ॥ ४० ॥

तां क्षमां तादृशीं कृष्णे कथमस्मद्विधस्त्यजेत् ।

यस्यां ब्रह्म च सत्यं च यज्ञा लोकाश्च धिष्ठिताः ॥ ४१ ॥

कृष्णे! जिसका महत्त्व ऐसा बताया गया है, जिसमें ब्रह्म, सत्य, यज्ञ और लोक सभी प्रतिष्ठित हैं, उस क्षमाको मेरे जैसा मनुष्य कैसे छोड़ सकता है ॥ ४१ ॥

क्षन्तव्यमेव सततं पुरुषेण विजानता ।

यदा हि क्षमते सर्वं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ४२ ॥

विद्वान् पुरुषको सदा क्षमाका ही आश्रय लेना चाहिये । जब मनुष्य सब कुछ सहन कर लेता है, तब वह ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ ४२ ॥

क्षमावतामयं लोकः परश्चैव क्षमावताम् ।

इह सम्मानमृच्छन्ति परत्र च शुभां गतिम् ॥ ४३ ॥

क्षमावानोंके लिये ही यह लोक है । क्षमावानोंके लिये ही परलोक है । क्षमाशील पुरुष इस जगत्में सम्मान और परलोकमें उत्तम गति पाते हैं ॥ ४३ ॥

पृष्ठ 226

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येषां मन्युर्मनुष्याणां क्षमयाभिहतः सदा ।

तेषां परतरे लोकास्तस्मात् क्षान्तिः परा मता ॥ ४४ ॥

जिन मनुष्योंका क्रोध सदा क्षमाभावसे दबा रहता है, उन्हें सर्वोत्तम लोक प्राप्त होते हैं । अतः क्षमा सबसे उत्कृष्ट मानी गयी है ॥ ४४ ॥

इति गीताः काश्यपेन गाथा नित्यं क्षमावताम् ।

श्रुत्वा गाथाः क्षमायास्त्वं तुष्य द्रौपदि मा क्रुधः ॥ ४५ ॥

इस प्रकार काश्यपजीने नित्य क्षमाशील पुरुषोंकी इस गाथाका गान किया है । द्रौपदी! क्षमाकी यह गाथा सुनकर संतुष्ट हो जाओ, क्रोध न करो ॥ ४५ ॥

पितामहः शान्तनवः शमं सम्पूजयिष्यति ।

कृष्णश्च देवकीपुत्रः शमं सम्पूजयिष्यति ॥ ४६ ॥

मेरे पितामह शान्तनुनन्दन भीष्म शान्तिभावका ही आदर करेंगे । देवकीनन्दन श्रीकृष्ण भी शान्तिभावका ही आदर करेंगे ॥ ४६ ॥

आचार्यो विदुरः क्षत्ता शममेव वदिष्यतः ।

कृपश्च संजयश्चैव शममेव वदिष्यतः ॥ ४७ ॥

आचार्य द्रोण और विदुर भी शान्तिको ही अच्छा कहेंगे । कृपाचार्य और संजय भी शान्त रहना ही अच्छा बतायेंगे ॥ ४७ ॥

सोमदत्तो युयुत्सुश्च द्रोणपुत्रस्तथैव च ।

पितामहश्च नो व्यासः शमं वदति नित्यशः ॥ ४८ ॥

सोमदत्त, युयुत्सु, अश्वत्थामा तथा हमारे पितामह व्यास भी सदा शान्तिका ही उपदेश देते हैं ॥ ४८ ॥

एतैर्हि राजा नियतं चोद्यमानः शमं प्रति ।

राज्यं दातेति मे बुद्धिर्न चेल्लोभान्नशिष्यति ॥ ४ ९ ॥

ये सब लोग यदि राजा धृतराष्ट्रको सदा शान्तिके लिये प्रेरित करते रहेंगे तो वे अवश्य मुझे राज्य दे देंगे, ऐसा मुझे विश्वास है । यदि नहीं देंगे तो लोभके कारण नष्ट हो जायँगे ॥ ४ ९ ॥

कालोऽयं दारुणः प्राप्तो भरतानामभूतये ।

निश्चितं मे सदैवैतत् पुरस्तादपि भाविनि ॥ ५० ॥

सुयोधनो नार्हतीति क्षमामेवं न विन्दति ।

अर्हस्तत्राहमित्येवं तस्मान्मां विन्दते क्षमा ॥ ५१ ॥

इस समय भरतवंशके विनाशके लिये यह बड़ा भयंकर समय आ गया है । भामिनि! मेरा पहलेसे ही ऐसा निश्चित मत है कि सुयोधन कभी भी इस प्रकार क्षमा - भावको नहीं अपना सकता, वह इसके योग्य नहीं है । मैं इसके योग्य हूँ, इसलिये क्षमा मेरा ही आश्रय लेती है ॥

पृष्ठ 227

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एतदात्मवतां वृत्तमेष धर्मः सनातनः ।

क्षमा चैवानृशंस्यं च तत् कर्तास्म्यहमञ्जसा ॥ ५२ ॥

क्षमा और दया यही जितात्मा पुरुषोंका सदाचार है और यही सनातनधर्म है, अतः यथार्थ रूपसे क्षमा और दयाको ही अपनाऊँगा ॥ ५२ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्रौपदीयुधिष्ठिरसंवादे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें द्रौपदी- युधिष्ठिरसंवादविषयक उनतीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २ ९ ॥

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त्रिंशोऽध्यायः दुःखसे मोहित द्रौपदीका युधिष्ठिरकी बुद्धि, धर्म एवं ईश्वरके न्यायपर आक्षेप द्रौपद्युवाच

नमो थात्रे विधात्रे च यौ मोहं चक्रतुस्तव ।

पितृपैतामहे वृत्ते वोढव्ये तेऽन्यथा मतिः ॥ १ ॥

द्रौपदीने कहा- राजन्! उस धाता ( ईश्वर) और विधाता ( प्रारब्ध ) को नमस्कार हैं, जिन्होंने आपकी बुद्धिमें मोह उत्पन्न कर दिया । पिता- पितामहोंके आचारका भार वहन करनेमें भी आपका विचार दिखायी देता है ॥ १ ॥

कर्मभिश्चिन्तितो लोको गत्यां गत्यां पृथग्विधः ।

तस्मात् कर्माणि नित्यानि लोभान्मोक्षं यियासति ॥ २ ॥

नेह धर्मानृशंस्याभ्यां न क्षान्त्या नार्जवेन च ।

पुरुषः श्रियमाप्नोति न घृणित्वेन कर्हिचित् ॥ ३ ॥

कर्मोंके अनुसार उत्तम, मध्यम, अधम योनिमें भिन्न -भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतलायी गयी है, अतः कर्म नित्य हैं ( भोगे बिना उन कर्मोंका क्षय नहीं होता ) । मूर्ख लोग लोभसे ही मोक्ष पानेकी इच्छा रखते हैं । इस जगत्में धर्म, कोमलता, क्षमा, विनय और दयासे कोई भी मनुष्य कभी धन और ऐश्वर्यकी प्राप्ति नहीं कर सकता ॥ २-३ ॥

पृष्ठ 229

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द्रौपदी और भीमसेनका युधिष्ठिरसे संवाद त्वां च व्यसनमभ्यागादिदं भारत दुःसहम् ।

पृष्ठ 230

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यत् त्वं नार्हसि नापीमे भ्रातरस्ते महौजसः ॥ ४ ॥

भारत! इसी कारण तो आपपर भी यह दुःसह संकट आ गया, जिसके योग्य न तो आप हैं और न आपके महातेजस्वी ये भाई ही हैं ॥ ४ ॥

न हि तेऽध्यगमञ्जातु तदानीं नाद्य भारत ।

धर्मात् प्रियतरं किंचिदपि चेज्जीवितादिह ॥ ५ ॥

भरतकुलतिलक! आपके भाइयोंने न तो पहले कभी और न आज ही धर्मसे अधिक

प्रिय दूसरी किसी वस्तुको समझा है । अपितु धर्मको जीवनसे भी बढ़कर माना है ॥ ५ ॥

धर्मार्थमेव ते राज्यं धर्मार्थं जीवितं च ते ।

ब्राह्मणा गुरवश्चैव जानन्त्यापि च देवताः ॥ ६ ॥

आपका राज्य धर्मके लिये ही है, आपका जीवन भी धर्मके लिये ही है । ब्राह्मण, गुरुजन और देवता सभी इस बातको जानते हैं ॥ ६ ॥

भीमसेनार्जुनौ चोभौ माद्रेयौ च मया सह ।

त्यजेस्त्वमिति मे बुद्धिर्न तु धर्मं परित्यजेः ॥ ७ ॥

मुझे विश्वास है कि आप मेरेसहित भीमसेन, अर्जुन और नकुल सहदेवको भी त्याग देंगे; किंतु धर्मका त्याग नहीं करेंगे ॥ ७ ॥

राजानं धर्मगोप्तारं धर्मो रक्षति रक्षितः ।

इति मे श्रुतमार्याणां त्वां तु मन्ये न रक्षति ॥ ८ ॥

मैंने आर्योंके मुँहसे सुना है कि यदि धर्मकी रक्षा की जाय तो वह धर्मरक्षक राजाकी स्वयं भी रक्षा करता है । किंतु मुझे मालूम होता है कि वह आपकी रक्षा नहीं कर रहा है ॥ ८ ॥

अनन्या हि नरव्याघ्र नित्यदा धर्ममेव ते ।

बुद्धिः सततमन्वेति च्छायेव पुरुषं निजा ॥ ९ ॥

नरश्रेष्ठ! जैसे अपनी छाया सदा मनुष्यके पीछे चलती है, उसी प्रकार आपकी बुद्धि सदा अनन्यभावसे धर्मका ही अनुसरण करती है ॥ ९ ॥

नावमंस्था हि सदृशान् नावराञ्छ्रेयसः कुतः ।

अवाप्य पृथिवीं कृत्स्नां न ते शृङ्गमवर्धत ॥ १० ॥

आपने अपने समान और अपनेसे छोटोंका भी कभी अपमान नहीं किया । फिर अपनेसे बड़ोंका तो करते ही कैसे? सारी पृथ्वीका राज्य पाकर भी आपका प्रभुताविषयक अहंकार कभी नहीं बढ़ा ॥ १० ॥

स्वाहाकारैः स्वधाभिश्च पूजाभिरपि च द्विजान् ।

दैवतानि पितॄंश्चैव सततं पार्थ सेवसे ॥ ११ ॥

कुन्तीनन्दन! आप स्वाहा, स्वधा और पूजाके द्वारा देवताओं, पितरों और ब्राह्मणोंकी सदा सेवा करते रहते हैं ॥ ११ ॥